
शुक्रवार, 18 जुलाई 2014
क्या देश का रूपांतरण कर पाएगी मोदी सरकार?

एक बुलेट ट्रेन चाहिये या 800 राजधानी एक्सप्रेस ?
पुण्य प्रसून बाजपेयी
9 कोच की बुलेट ट्रेन की कीमत है 60 हजार करोड़ और 17 कोच की राजधानी एक्स प्रेस का खर्च है 75 करोड़। यानी एक बुलेट ट्रेन के बजट में 800 राजधानी एक्सप्रेस चल सकती हैं। तो फिर तेज रफ्तार किसे चाहिये और अगर चाहिये तो एक हजार करोड के रेल बजट में सिर्फ बुलेट ट्रेन के लिये बाकि 59 हजार करोड़ रुपये कहां से आयेंगे। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योकि मौजूदा वक्त में ट्रेक ठीक करने और नये रेलवे ट्रैक के जरिये रेलवे को विस्तार देने के लिये बीते तीस साल से सरकारों के पास 20 हजार करोड़ से लेकर 50 हजार करोड़ रुपये कभी नहीं रहे। जिसका असर है कि -हर दिन 95 लाख लोग बिना सीट मिले ही रेलगाड़ी में सफर करते हैं।
30 हजार किलोमीटर ट्रैक सुधारने की जरुरत है और 40 हजार किलोमीटर नया रेलवे ट्रैक बीते 10 बरस से एलान तले ही दबा हुआ है। यानी कोई भी रेल की हालात देख कर कह सकता है कि आजादी के बाद से ही रेल
इन्फ्रास्ट्क्चर को देश के विकास के साथ जोड़ने की दिशा में किसी ने सोचा ही नहीं। लेकिन अब प्रधाननमंत्री मोदी यह कहने से नहीं चुके कि रेल बजट गति, आधुनिकता और सुविधा के जरीये देश के विकास से जुड़ रहा है। तो पहला सवाल मोदी सरकार ने जैसे ही रेल विस्तार को देश के विकास से जोड़ने की सोची वैसे ही यह भेद भी खुल गया कि रेलवे ट्रेक में विस्तार के लिये पैसा आयेगा कहां से। और वह पैसा नहीं तो क्या इसलिये दुनिया के बाजार को लुभाने के लिये बुलेट ट्रेन से लेकर हाई स्पीड ट्रेन का जिक्र पीपीपी मॉडल या विदेशी निवेश के नजरिये की वजह से किया गया। हो जो भी देश का असल सच तो यही है कि देश का विकास एकतरफा और शहरी केन्द्रीकृत है । जिसकी वजह से ट्रेन में हर सफर करने वाले ज्यादातर लोग वो ग्रामीण और मजदूर तबका है जो गांव छोड काम की खोज में भटक रहा है। और इनकी तादाद हर दिन सवा करोड़ के करीब है। वजह भी यही है कि भारतीय रेल की तस्वीर जब भी आंकड़ों में उभरती है तो ऊपर से नीचे तक ठसाठस भरे यात्री और रफ्तार करीब 50 से 60 किलोमीटर प्रतिघंटे की।
ऐसे में हर कोई यह पूछ सकता है कि बुलेट ट्रेन की रफ्तार या हाई स्पीड की खोज भारतीय रेल की कितनी जरुरत है । या फिर ठसाठस भरे लोगों को रेलगाडी में बैठने भर के लिये सीट मुहैया कराना भारतीय रेल की पहली जरुरत है। इन दो सवालों को लेकर पहली बार राजीव गांधी उलझे थे जब उन्होंने भारत में बुलेट ट्रेन का सपना देखा था। लेकिन बुलेट ट्रेन भारत के लिये एक सपना बनकर रह गयी और ठसाठस लदे लोगों को भारत का सच मान लिया गया तो इसे सुधारने का सपना किसी ने देखा ही नहीं। लेकिन मोदी सरकार ने माना सपना सोचने के लिये पूरा करने के लिये होता है तो 60 हजार करोड़ की एक बुलेट ट्रेन मुंब्ई-अहमदाबाद के बीच अगले आम चुनाव से पहले यानी 2019 तक जरुर चल जायेगी। और यह तब हो रहा है जब अहमदाबाद से मंबुई तक के बुलेट ट्रेन की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट 3 बरस पहले ही तैयार हो चुकी है। दरअसल 19 जुलाई 2011 में ही फ्रेंच रेल ट्रांसपोर्ट कंपनी ने 634 किलोमीटर की इस यात्रा को दो घंटे में पूरा करने की बात कही थी। और डीपीआर में 56 हजार करोड़ का बजट बताया गया था। जो उस वक्त 50 हजार करोडं में पूरा करने की संबावना जतायी गयी थी। लेकिन रेल मंत्री ने बजट में इसकी लागत 60 हजार करोड़ बतायी। दरअसल फ्रेंच कंपनी ने अहमदाबाद से मुंबई होते हुये पुणे के बीच तक बुलेट ट्रेन का सपान दिखाया था। और इसकी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तैयार है। इसी तर्ज पर दिसबंर 2012 में ही केरल में कसराडोह और थिरुअंनतपुरम के बीच बुलेट ट्रेन की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट सरकार को सौपी जा चुकी है । यानी देश में बुलेट ट्रेन को लेकर जो रोमांच है उसपर अभी तक अमल में लाने का बीडा मनमोहन सरकार ने क्यों नहीं उठाया जबकि खुले बाजार और उपभोक्ताओ के लिये मनमोहन से ज्यादा कसमें किसी ने नहीं खायीं। हो जो भी भारत का सच यही है कि हर सरकार रेलवे की तमाम समस्याओं के हल के लिए कड़े क़दम उठाने से हिचकिचाती रही हैं. जिसकी वजह से एशिया के सबसे पुराने रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास नहीं हो सका ।
सरकार की नहीं, अपनी बदौलत जी रहा है किसान
किसान जिन्दा रहे या ना रहे यह आजादी के बाद से कभी किसी सरकार ने नहीं सोचा । फिर ऐसा क्या है कि मोदी सरकार के सामने सबसे बडा राजनीतिक संकट किसान ही हो चला है। नेहरु से लेकर मनमोहन सरकार तक की नीतियों तले किसान हाशिए पर ही ढकेले गये। फिर ऐसा क्या है कि मोदी सरकार हाशिये पर ढकेले गये किसानों का रोना पहले ही सत्र में रोने लगी है। बीते 67 बरस में जीडीपी में कृर्षि का योगदान लगातार कम होता चला गया लेकिन इसपर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया तो फिर ऐसा क्या है कि जिस खेती का योगदान जीडीपी में महज 13.7 फीसदी है, वह देश के बाकी 86.3 फीसदी के योगदान पर भारी पड़ रही है। तो पहली समझ तो यही है कि आजादी के वक्त जो खेती देश के जीडीपी में 66 फीसदी से ज्यादा योगदान देती थी वह घटते घटते मोदी के दौर में 13.7 फीसदी पर पहुंच गयी है। तो सवाल खेती और किसान जब किसी सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं रही है तो फिर ऐसा क्या है कि मानसून के कमजोर होने की खबर या फिर अनाज-सब्जियों की कीमत बढ़ने भर से सरकार ढोलने लगी है। क्योंकि इसी दौर में जीडीपी में सर्विस सेक्टर का योगदान 20 फीसदी से बढ़ते बढ़ते 67 फीसदी तक जा पहुंचा। यानी आजादी के वक्त जिस भूमिका में खेती थी आज की तारीख में उतनी ही पूंजी का योगदान सर्विस सेक्टर का है । तो फिर ऐसा क्या है कि किसानो को लेकर मोदी सरकार रोना रो रही है।
असल में जीडीपी में खेती का योगदान चाहे 13.7 फीसदी हो लेकिन आज भी देश की साठ फीसदी आबादी खेती के ही भरोसे जीवन जीती है। जबकि दूसरी तरफ सर्विस सेक्टर के जरीये चाहे ज्यादा मुनाफा बनाने की स्थित में हर सरकार रही हो लेकिन उस पर देश के महज 20 फिसदी जनसंख्या ही निर्भर है। तो क्या पहली बार मोदी सरकार यह समझा रही है कि खेती या किसान ही भारत का असल मर्म है या फिर किसानों की बात कर खेती के कॉरपोरेटीकरण की दिशा में मोदी सरकार कदम बढाने के लिये इतना रोना रो रही है। क्योंकि असल संकट नीतियों का है। सरकारी नीतियों से कोई इन्फ्रास्ट्रकचर कृषि के बनाया ही नहीं गया, जिसका असर यही हुआ कि खेती की ताकत कम की गयी और औघोगिक क्षेत्र में भी सरकार का ध्यान ना के बराबर रहा तो इसका असर यह हुआ कि बीते 50 बरस में औद्योगिक उत्पादन में सिर्फ 3 फीसदी की बढोतरी हुई। यानी हर सरकार के लिये विकास का रास्ता उस कमाई पर टिका जो विदेशी उत्पादों को भारत में लेकर आता या फिर भारत के कच्चे माले को कौड़ियों के मोल बाहर ले जाने का रास्ता खोलता। इस सर्विस की एवज में मिलने वाला कमीशन ही सरकारों के लिये विकास का ऑक्सीजन बन चुका है। ऐसे में याद कीजिये चुनाव प्रचार के दौर
में किसानों की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिये नरेद्र मोदी क्या कह रहे थे। उनका साफ कहना था समर्थन मूल्य फसल की लागत से कही ज्यादा दिया जायेगा। यानी खेती करने में जो पैसा खर्च होता है उसे मिलाकर ज्यादा दिया जायेगा । यानी तब वादा किया गया तो अब पूरा होना चाहिये लेकिन किसानों को जो समर्थन मूल्य मिल रहा है और जिस तेजी से खेती करने में महंगाई बढ़ रही है उसमें अब भी पचास फीसदी से ज्यादा का अंतर है। तो फिर किसान करें क्या ।
सरकार मानती है कि बीज, खाद, सिंचाई से लेकर मजदूरी तक महंगी हुई है। खेत से मंडी तक के बीच बिचौलियों की भूमिका बढ़ी है। मंडी से गोदाम तक के बीच जमाखोरों की तादाद बढ़ी है। तो फिर सरकार करे क्या। क्योंकि मौजूदा वक्त में देश में 8 करोड़ किसान है तो 25 करोड़ खेत मजदूर है। यानी सिर्फ समर्थन मूल्य से काम नहीं चलेगा बल्कि खेती में सरकार को निवेश करना ही होगा। और देश का आलम यह है कि कि चौथी से 12वीं पंचवर्षीय योजना में राष्ट्रीय आय का 1.3 फ़ीसद से भी कम कृषि में निवेश हुआ.। यानी जिस देश की 62 फिसदी आबादी खेती पर आश्रित हो। 50 से 52 फीसदी मजदूर खेत से ही जुड़े हों वहा सिर्फ 1.3 फिसदी खर्च से सरकार किसानों का क्या भला कर सकती है। उसका भी अंदरुनी सच यही है कि निजी निवेश को इसमें से निकाल दें तो राष्ट्रीय आय का सरकार सिर्फ 0.3 फीसदी ही निवेश कर रही है। यानी असल हकीकत है कि देश में जो भी हो रहा है वह किसान अपनी बदौलत कर रहा है ।
लेकिन अब बात मोदी सरकार की हो रही है तो उम्मीद यहकहकर लगा सकते है कि देस के पीएम एक गरीब परिवार में पैदा हुये है तो उनकी संवेदनशीलता ग्रामीण, किसान या कहे गरीब के प्रति बनी रहेगी । लेकिन सरकार के हाथ तो बंधे हैं। क्योंकि फुड सिक्योरटी बिल और सब्सिडी का आंकड़ा ही दो लाख करोड़ रुपये पार कर जाता है। तो खेती में निवेश सरकार बढ़ा नहीं सकती। इसके लिये तीन कदम उठाये जा सकते है। पहला -न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाज़ार मूल्य के बीच के अंतर को ख़त्म करना । दूसरा ,कृषि आधारित सभी चीज़ों पर से टैक्स हटाना और तीसरा कृषि रिटेल को देसी -विदेशी निवेश के लिये खोल देना। इसकी वकालत विश्व बैंक भी कर चुका है। लेकिन जिस देश में सरकार खेती के सिंचाई तक की व्यवस्था ना कर पायी हो और 67 फीसदी जमीन आज भी बारिश के पानी पर निर्भर होती हो । 21 फीसदी नदियों के पानी पर तो सरकार और किसान में तालमेल बैठता कहा है। उल्टे जैसे ही महंगाई और किसान का सवाल आता है वैसे ही जब सब कुछ आरोपों तले स्वाहा हो जाता हो तब कोई क्या करेगा। केन्द्र कहता है राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। अगर मोदी सरकार को भी लगता है कि खेती का मामला राज्य सरकार का मामला है तो फिर कृषि मंत्रालय की जरुरत क्या है। इस बंद कर देना चाहिये। क्योंकि यहां काम करने वाले सात हजार कर्मचारी तो कुछ करते ही नहीं है । और इसी कटघरे से देश की गरीबी निकलती है। जो तभी तेंदुलकर कमेटी तो कभी रंगराजन कमेठी तले आंकडों को मापती है कि देश में गरीबी कितनी कम हो गयी है । और विकास का पैमाना जीडीपी के आंकड़े पर आकर रुक जाता है । तो शायद संकट यही है कि चर्चा के लिये किसान और गरीबी है। नीतियों के लिये विकास दर और बुलेट ट्रेन से लेकर चकाचौंध इन्फ्रास्ट्रक्चर है।
संघ का शाह के जरिए राजनीतिक शह-मात का खेल
पुण्य प्रसून बाजपेयी |
जिस खामोशी से अमित शाह बीजेपी हेडक्वार्टर में बतौर अध्यक्ष होकर घुसे हैं उसने पोटली और ब्रीफकेस के आसरे राजनीति करने वालो की नींद उडा दी है। अध्यक्ष बनने के बाद भी खामोशी और खामोशी के साथ राज्यवार बीजेपी अध्यक्षों को बदलने की कवायद अमित शाह का पहला सियासी मंत्र है। इतना ही नहीं बीजेपी मुख्यालय के छोटे छोटे कमरो में कुर्सी पकड़े नेताओं की कुर्सी भी डिगेगी और समूचे संगठन को भी फेंटा जायेगा। इसीलिये नरेन्द्र मोदी के असल सिपहसलाहर अमित शाह को अध्यक्ष बनाया गया है। असल में आरएसएस और मोदी के टारेगट बेहद साफ हैं। बीते दस बरस में बीजेपी भोथरी हुई और दिल्ली का राजनीति ने जब हिन्दुत्व को आतंकवाद से जोड़ा तो भी दिल्ली के कद्दावर बीजेपी नेताओ की खुमारी नहीं टूटी। ऐसे में टारगेट साधने के लिये बीजेपी संगठन को पैना बनाना जरुरी है, क्योंकि विस्तार संघ का करना है। यह छोटे छोटे संवाद दिल्ली के झंडेवालान से लेकर नागपुर के महाल तक के हैं।
जहां स्वंयसेवकों को मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह लगने लगा है कि संघ का ढांचा कही ज्यादा प्रभावी तरीके से राजनीति को साध सकता है । ऐसे में स्वयंसेवक अगर देश भर में बीजेपी की सत्ता बनाने के लिये राज्यवार भी निकले तो फिर बीजेपी अपने बूते हर जगह सरकार क्यों नहीं बना सकती है। इसलिये संघ के तीन मंत्र अब बीजेपी में नजर आने वाले हैं। पहला , हर राज्य में बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बदला जायेगा। इसमे गुजरात के प्रदेश अध्यक्ष आरसी फलदू भी होंगे। दूसरा, संघ की शाखाओं से जिसका वास्ता रहा है या फिर एवीबीपी के जरीये जिसने राजनीति का ककहरा पढ़ा है, उसे नंबर एक और नंबर दो के तहत महत्व दिया जायेगा। और इन्हें ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया जायेगा। तीसरा जो भी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी की कीमत लगाते रहे हैं या फिर गठबंधन की राजनीति के जरीये बीजेपी को सत्ता में लाने का सपना परोसते रहे हैं, उन्हे दरकिनार किया जायेगा । संघ परिवार के भीतर बड़ा सवाल यह भी है कि स्वयंसेवक राजनीतिक प्रचार के जरीये बीजेपी के लिये तो राजनीतिक जमीन बना सकता है लेकिन गठबंधन के दलों को इससे लाभ क्यों मिलना चाहिये। इसलिये अमित शाह का टारगेट बीजेपी को अपने बूते खड़ा करने का है । यानी महाराष्ट्र , हरियाणा और झारखंड में बीजेपी अपने बूते जीत कैसे मिले। संयोग से तीनों ही राज्यों में बीजेपी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके पीछे समूची पार्टी चलने को तैयार हो। और दूसरा संकट है कि तीनों राज्य में बीजेपी के कार्यकर्ता अपने ही नेताओ को लेकर बंटे हुये हैं। और तीसरा संकट है कि बीजेपी विरासत की जिस राजनीति का विरोध करती है उसी विरासत की राजनीतिक डोर को बीजेपी के सहयोगी दल थामे हुये है। यानी संघ परिवार राजनीतिक तौर पर यह सोचने लगा है कि बीजेपी को मथा जाये तो एक आदर्श राजनीति खड़ी की जा सकती है। लेकिन इसके लिये मथने वाले को राजनीतिक तौर पर ईमानदारी बरतनी होगी। किसी को राजनीतिक मुनाफा देने से बचना होगा। पद को बेचने खरीदने का सिलसिला खत्म करना होगा । यानी संघ जिस प्रयोग को नीतिन गडकरी के जरीये अंजाम तक पहुंचाना चाहता था अब उसे अमित शाह अंजाम देंगे। याद किजिये तो गडकरी दिल्ली के नहीं थे, अमित शाह भी नहीं है । गडकरी संघ की शाखा से निकले। अमित शाह भी शाखा से ही निकले। गडकरी को-ओपरेटिव से लेकर कारपोरेट तक को जानने समझने वाले बिजनेस मैन भी रहे। अमित शाह ने भी केशुभाई के दौर में गुजरात वित्त कारपोरेशन के जरीये जिस तरह राजनीति को साधा वह अपने आप में कमाल का हुनर था और इस हुनर को मोदी ने बतौर जोहरी गुजरात का मुख्यमंत्री बनने केबाद परखा भी। संघ ने भी इस सच को बारीकी से परखा। दरअसल इन परिस्थितियों तक पहुंचने के लिये नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक जीत ने आक्सीजन का काम किया है। मोदी की जीत से पहले संघ को सिर्फ यही लगता रहा कि दिल्ली की राजनीति से बीजेपी को मुक्त करने के लिये नरेन्द्र मोदी को हथियार बनाया जा सकता है। और उसने बनाया भी । लेकिन जिस तरह मोदी के पक्ष में जनादेश आया उसने संघ परिवार के भीतर नये सवाल को जन्म दिया कि अगर दिल्ली की सत्ता साधी जा सकती है, तो फिर हर राज्य में बीजेपी अपने बूते सरकार क्यों नहीं बना सकती। और तो और पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर तक को साधने की सोच इसी दौर में संघ के भीतर जागी है। इसलिये पहली बार संघ भी यह मान रहा है कि धारा 370 और कश्मीरी पंडितों का मुद्दा सामाजिक तौर पर उठाने से पहले राजनीतिक तौर पर उठाना जरुरी है। इसी तरह वाम धारा के खत्म होने के बाद ममता बनर्जी की राजनीति को मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ कर साधने की जरुरत है। ध्यान दें तो मोदी सरकार ने राज्यो की राजनीति में सेंध लगाने के लिये अपने नजरिये को मुद्दो को उठाना शुरु कर भी दिया है। लेकिन इन मुद्दो पर संघ के स्वयंसेवकों से पहले बीजेपी के कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ना होगा। फिर बीजेपी का कार्यकर्ता तभी आगे बढेगा जब उसे अपने नेता पर भरोसा हो। जो बीते दिनो में डगमडाया है, इसे संघ ने अपने मंथन शिविर में बार बार माना है। यानी जिस तरह मोदी और बीजेपी चुनाव प्रचार में ही नहीं बल्कि सत्ता संभालने के बाद भी दो धाराओं की तरह दिखायी दे रहे है उसी तर्ज पर अमित शाह भी बीजेपी के पारंपरिक तौर तरीकों से अलग दिखायी देंगे, यह माना जा रहा है। असर इसी का है कि दिल्ली में बीजेपी हेडक्वार्टर में अमित शाह की दस्तक बेहद खामोशी से हुई। जबकि डेड बरस पहले 23 जनवरी 2103 को याद कीजिये तो जश्न के बीच राजनाथ की ताजपोश हुई थी । और अभी तक बीजेपी में परंपरा रही है कि अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद कार्यकर्ताओ को मीडिया के जरीये हर अध्यक्ष संबोधित करते भी रहा है।
लेकिन पहली बार नये अध्यक्ष अमित शाह कुछ नहीं बोले । पूरा दिन खामोश रहे । छिट-पुट, या कहे बिखरे , अलग थलग रहने वाले कार्यकर्ताओं ने हेडक्वार्टर के भीतर बाहर पटाखे छोड़े। लेकिन बीजेपी हेडक्वार्टर के 35 कमरों में से किसी कमरे के कोई पदाघिकारी उत्साह में झूमते नजर नहीं आये। झटके में बीजेपी मुख्यलय के भीतर संघ और बीजेपी के साहित्य या कहे प्रचार प्रसार की सामग्री बेचने वाली दुकान से अमित शाह की तस्वीर कार्यकर्ता खरीदने लगे. और शाम ढलते ढलते अमित शाह की तस्वीरे भी खत्म हो गयी । नये तस्वीरों के आर्डर दे दिये गये। लेकिन पहली बार बीजेपी हेडक्वाटर में यह आवाज भी सुनायी दी कि हिन्दी पट्टी में अब कार्यकर्ताओं के दिन लौटेंगे। क्योंकि यूपी में अमित शाह ने जब कद्दावरों को दरकिनार कर हर समीकरण को उलट दिया तो फिर आने वाले दिनो में कद्दवर होने का तमगा लगाकर सेटिंग करने वाले नेता अब गायब हो जायेंगे। यानी पहली बार जो नेता अदालत के दायरे में दागदार है। जिसपर गंभीर आरोप उसके अपने प्रदेश में लगे । और मामलों की जांच भी चल रही है उसी के जरीये बीजेपी की सफाई संघ परिवार ने देखी है । वैसे सच यह भी है कि संघ बीजेपी में जमी भ्रष्टाचार और कामचोरी की काई को घोना चाहता है और इसके लिये वह हर राजनीतिक प्रयोग करने को तैयार है। क्योंकि पहली बार संघ ने मनमोहन सरकार के दौर में अपने आस्तितव को खतरे में देखा। जब सरसंघचालक से लेकर इन्द्रेश कुमार समेत दर्जनो स्वयंसेवकों को आंतक के कटघरे में खड़ा किया गया। तो लोहा लोहे को काटता है । कुछ इसी अंदाज में संघ का यह राजनीतिक शुद्दीकरण मिशन है। जिसकी एक बिसात पर मोदी सबकुछ है तो दूसरी बिसात पर मोदी के वजीर अमित शाह सबकुछ है ।
आर्थिक संवृद्धि के लिए जरूरी है ऐसा बजट
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
गुरुवार, 10 जुलाई, 2014 को 17:54 IST तक के समाचार
भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकार का पहला बजट कमोबेश सकारात्मक रहा.
हालांकि सरकार ने रक्षा और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 26 प्रतिशत से 49 प्रतिशत करने के सिवाय अन्य कोई बड़े नीतिगत फ़ैसले नहीं किए.
टॉपिक
सरकार ने आम करदाताओं को थोड़ी राहत ज़रूर दी है. वहीं युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने पर भी सरकार का ज़ोर रहा.
चुनावी वादे के अनुरूप सरकार ने गंगा की सफ़ाई के लिए भी अच्छा ख़ासा बजट आबंटित किया है.
पढ़िए प्रमोद जोशी का विश्लेषण विस्तार से
मोदी सरकार ने अपने उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है, जिसकी घोषणा संसद के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने की थी.
लगातार दो साल से पाँच फीसदी के नीचे चली गई अर्थव्यवस्था को इस साल पाँच फीसदी के ऊपर जाने का मौका मिलने जा रहा है.
वित्त मंत्री का यह बजट भाषण सामान्य भाषणों से ज्यादा लंबा था और इसमें सपनों की बातें हैं.
सरकार को अभी यह बताना होगा कि वह राजस्व प्राप्तियों के लक्ष्यों को किस प्रकार हासिल करेगी.
उससे बड़ी चुनौती है कि वह जीडीपी की तुलना में राजकोषीय घाटे को 4.1 प्रतिशत के भीतर कैसे रखेगी, जिसे वह खुद मुश्किल काम मानती है.
रफ्ता-रफ्ता अच्छे दिन भी आएंगे
नरेंद्र मोदी की सरकार का बजट पेश होने की सुबह कोई पूछे कि अच्छे दिन कितनी दूर हैं तो कहा जा सकता है कि हालात बड़े मुश्किल हैं, पर दुःख भरे दिन बीत चुके हैं। वित्तीय स्वास्थ्य अच्छा होने के संकेत साफ हैं। रफ्ता-रफ्ता अच्छे दिन आ रहे हैं। सरकार का कहना है कि कीमतों का बढ़ना रुक रहा है। विदेशी निवेशकों के रुख में नाटकीय बदलाव आ रहा है। खराब मॉनसून के बावजूद मुद्रास्फीति को रोका जा सका तो यकीन मानिए कि निवेशकों का विश्वास भारतीय सिस्टम पर बढ़ेगा। आर्थिक सर्वेक्षण राहत के संकेत दे रहा है, पर आज किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद मत कीजिए। हाँ यह सम्भव है कि सरकार उत्पादन और आयात कर में कुछ राहतों की घोषणा करे, जिससे कुछ उपभोक्ता वस्तुएं सस्ती हो सकती हैं। पर पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी का बोझ कम करने के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ने से नहीं रोकी जा सकेंगी। इसके बाद सरकार राजकोषीय घाटे को काबू में ला सकेगी। भोजन और उर्वरकों पर सब्सिडी भी कम होने की सम्भावना है। इसके अलावा सब्सिडी देने के तरीके में बायोमीट्रिक्स के इस्तेमाल के बाबत भी कोई घोषणा बजट में हो सकती है। सर्वे में इस बात का उल्लेख है कि देश के सबसे धनी दस फीसदी लोग गरीबों के मुकाबले सात गुना ज्यादा सब्सिडी ले रहे हैं। हम समझते हैं कि यह योजना गरीबों के नाम पर बनी है, पर उसका फायदा अमीर उठाते हैं।
इस बजट में आयकर पर राहत की उम्मीद नौकरीपेशा लोगों को है। पर राजस्व आय में वृद्धि का कोई वैकल्पिक मार्ग न होने के कारण इस मामले में भी किसी बड़े कदम की आशा मत कीजिए। देश में सरकारी राजस्व जीडीपी का 9 फीसदी है, जिसे 20 फीसदी के आसपास होना चाहिए। भारत सरकार दुनिया में सबसे कम टैक्स वसूल पाने वाले देशों में है। इसका कारण यह भी है कि हम टैक्स देने वालों को पूरी तरह कर ढाँचे के भीतर नहीं ला पाए हैं। दूसरे ऐसी आर्थिक गतिविधियां नहीं हो पा रहीं हैं, जहाँ से टैक्स निकाला जा सके। सन 2008 के आसपास हमारा राजस्व 12 फीसदी के ऊपर चला गया था। राजस्व तभी बढ़ेगा जब आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेगी। जब राजस्व बढ़ेगा तभी सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों के लिए धन आएगा। इसी तरह सरकार के सामने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के बरक्स 4.1 फीसदी पर रखने की चुनौती है। इस साल 17 फरवरी को अंतरिम बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने यह लक्ष्य 4.1 फीसदी रखने की घोषणा की थी, पर यह अव्यावहारिक लक्ष्य था। यूपीए सरकार एनडीए सरकार के ऊपर भारी देनदारी छोड़कर गई है। सम्भव है कि सरकार अब इस लक्ष्य को 4.4 फीसदी पर लाने की कोशिश करे।
हाँ कुछ कानूनों में बदलाव की पहल वित्तमंत्री इस बजट भाषण में कर सकते हैं। इनमें सबसे प्रमुख है डायरेक्ट टैक्स कोड। सर्वेक्षण के मुताबिक़ खराब मानसून से निपटना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। आम जनता को अर्थ-व्यवस्था के स्वास्थ्य की तकनीकी शब्दावली समझ में नहीं आती। उसे महंगाई कम करने और रोजगार बढ़ाने वाली बातें समझ में आती हैं। और सरकार को विश्वास है कि दोनों दिशाओं में सुधार होगा।
आम बजट के ठीक पहले रखे गए दो दस्तावेजों का संदेश है कि भारत के कारोबारियों का उत्साह बढ़ाइए। वे सक्रिय होकर आगे आएंगे, तो अर्थव्यवस्था दो साल बाद सात से आठ फीसदी की दर से बढ़ने लगेगी। इसके साथ ही रोजगारों की संख्या बढ़ेगी। हाल के महीनों में निर्यात बढ़ने के कारण भुगतान संतुलन में घाटा कम हुआ है। भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यातोन्मुखी नहीं है। साथ ही विश्व व्यापार निर्यात नाजुक दौर से गुजर रहा है इसलिए यहाँ भी जोखिम है। मोदी सरकार का पहला आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि अप्रैल-मई के दौरान निर्यात में सुधार और आयात8.3 प्रतिशत घटने से 2014-15 की पहली तिमाही में व्यापार घाटे में 42.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2012-13 में व्यापार घाटा इससे पहले के 137 अरब 50 करोड़ डॉलर से बढ़कर 190 अरब 30 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया था। सन 2013-14 में निर्यात 325 अरब डॉलर लक्ष्य के मुकाबले 312.6 अरब डॉलर रहा और इसमें 4.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई जो इससे पहले के वित्त वर्ष के 1.8 प्रतिशत की नकारात्मक प्रगति की तुलना में एक अच्छा संकेत है। वर्ष के दौरान कपड़ा, चमड़ा, हस्तशिल्प तथा कालीन निर्यात में अपेक्षाकृत ज्यादा बढ़ोतरी रही।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 2014-15 के दौरान 5.4 से 5.9 प्रतिशत रहने का अनुमान का अनुमान व्यक्त किया गया है। लगातार दो साल से विकास दर पाँच फीसदी नीचे रही है। उसका पाँच फीसदी के ऊपर जाना शुभ संकेत है। थोक मूल्य सूचकांक में गिरावट की उम्मीद की जा रही है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2013-14- में राजकोषीय घाटा 4.5 फीसदी रहा, जो पिछले साल के मुकाबले कम है। चालू खाते और राजकोषीय घाटे में सुधार से 2014-15 के दौरान वृद्धि बढ़ेगी। इधर भारतीय रुपया स्थिर हुआ है जिससे स्पष्ट है कि विदेशी मुद्रा बाजार और पूंजी बाजारों में भरोसा बढ़ा है। रुपए की वार्षिक औसत विनिमय दर 2013-14 में प्रति डॉलर 60.50 रुपए रही, जो 2012-13 में 54.41 रुपए थी और जो 2011-12 में 47.92 रुपए थी। विदेशी मुद्रा भंडार मार्च 2014 के आखिर में बढ़कर 304.2 अरब डॉलर हो गया, जो मार्च 2013 के आखिर में 292 अरब डॉलर था।
भारतीय रेल की ओर से पिछले कुछ साल से आ रही खराब खबरों के बाद रेल मंत्री डी वी सदानंद गौड़ा ने कुछ अच्छी और खबरों को भी सुनाया। उन्होंने नई योजनाओं को लगभग रोक दिया है और कहा है कि हम पहले से चल रही परियोजनाओं को पूरा करके दिखाएंगे। निरर्थक योजनाओं की घोषणा करने से कोई लाभ नहीं जिन्हें पूरा न किया जा सके। हमारी सरकारें लोकलुभावन बातें करती रही हैं। भाजपा सरकार ने हीरक चतुर्भुज जैसी प्रचारात्मक योजना का उल्लेख किया है। बेहतर होगा कि पहले घिसती जा रही पुरानी पटरियों की जगह नई पटरियाँ लगाईं जाएं। फिलहाल रेलवे को सेफ्टी और सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए, जो इस रेल बजट में दिखाई पड़ता है।
आज के बजट में सरकार पूरी तरह कारोबारियों के पक्ष में जाती नजर नहीं आएगी। रेल बजट से ऐसा ही संकेत गया है। इसका प्रभाव शेयर बाजार में दिखाई पड़ा। फिलहाल ऊर्जा, रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए इस बजट में शुभ संकेत होंगे। सरकार की सारा ध्यान वित्तीय अनुशासन पर होगा। यानी निरर्थक खर्चों पर रोक और आय बढ़ाने के तरीकों पर विचार। भारत का सेवा क्षेत्र का कारोबार 9 फीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है। चीन के बाद यह दूसरी सबसे तेज दर है। चीन में इस क्षेत्र की विकास दर 10.9 फीसदी है। सेवा क्षेत्र पढ़े-लिखे या कुशल लोगों को रोजगार देता है। हमें विनिर्माण क्षेत्र में विकास की जरूरत है, क्योंकि यह क्षेत्र श्रम आधारित रोजगार देता है।
हरिभूमि में प्रकाशित
अमेरिकी चकाचौंध का न्यौता क्या गुल खिलायेगा भारत में?
पुण्य प्रसून बाजपेयी
बजट में ऐसा क्या है कि दुनिया मोदी की मुरीद हो रही है । और बजट के अगले ही दिन दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति का न्यौता दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के पीएम को मिल गया । असल में मौजूदा वक्त में भारत दुनिया के सबसे बड़े बाजार का प्रतीक है। और मोदी के बजट ने इन्फ्रास्ट्रक्चर,रक्षा उपक्रम, इनर्जी सिक्यूरटी के लिये जिस तरह दुनिया को भारत आने के लिये ललचाया है उसने मनमोहन इक्नामिक्स से कई कदम आगे छलांग लगा दी है। वजह भी यही है कि ओबामा मोदी की मुलाकात का इंतजार समूची दुनिया को है। और खुद अमेरिका भी इस सच को समझ रहा है कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां आने वाले वक्त में रेलवे में 5 से 10 लाख करोड़ का निवेश होना है। सड़क निर्माण में 2 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश होना है। बंदरगाहों को विकसित करने में भी 3-4 लाख करोड़ लगेंगे। इसी तरह सैकडो एयरपोर्ट बनाने में भी 3 से 4 लाख करोड का निवेश किया जाना है । वही भारतीय सेना की जरुरत जो अगले दस बरस की है, वह भी करीब 130 बिलियन डॉलर की है। यानी मोदी सरकार ने बजट को लेकर पहली बार दुनिया की आस भारत में पैसा लगाने को लेकर जगी है। क्योंकि बजट ने खुले संकेत दिये है कि भारत विकास के रास्ते को पकडने के लिये आर्थिक सीमायें तोड़ने को तैयार है और दुनिया भर के देश चाहे तो भारत में पूंजी लगा सकते है। असल में यह रास्ता मोदी सरकार की जरुरत है और यह जरुरत विकसित देशो को भारत में लाने को मजबूर करेगा। क्योंकि विकसित देशो की मजबूरी है कि वह अपने देश में इन्फ्रास्ट्क्चर का काम पूरा कर चुके है और तमाम विदेशी कंपनियों के सामने मंदी का संकट बरकरार है। यहा तक की चीन के सामने भी संकट है कि अगर अमेरिका की आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो फिर उसके यहा उत्पादित माल का होगा क्या। ऐसे में भारत में निर्माण का रास्ता विदेसी निवेश के लिये खुलता है तो अमेरिका, जापान, फ्रांस या चीन सरीखे देश कमाई भी कर सकते है।
ध्यान दे तो अमेरिका की रुची इनर्जी सिक्यूरटी के क्षेत्र में भारत के साथ समझौता करना है। क्योंकि भारत अगर वाकई अमेरिकी मॉडल के रास्ते चल निकलेगा तो फिर भविष्य में उर्जा के हर क्षेत्र को लेकर भारत को पूंजी लगानी भी होगी और उसकी जरुरते समझौता करने वाले देश पर निर्भर भी होगी । यानी रेल ,सड़क, एयरपोर्ट से लेकर तमाम इन्फ्रसट्क्चर के लिये अगले तीस बरस की जरुरतो के मद्देनजर कोयला, गैस,पेट्रोलियम और नेपथाल सरीखे इनर्जी पर भी अमेरिका समझौता करना चाहेगा । साथ ही न्यूक्लीयर प्लांट लगाने के बाद सप्लायर समझोते जो अभी तक अटके हुये है समझौते उसपर ओबामा मोदी के साथ समझौता करना चाहेंगे। यानी ओबामा से मोदी की मुलाकात दुनिया की पूंजी को भारत में लगाने की एक ऐसी छलांग साबित हो सकती है जिसके बाद देश में खेती और ग्रामीण भारत के सामने आसतित्व का संकट मंडराने लगे। क्योंकि विकास का यह रास्ता बीच में छोडा नहीं जा सकता और रास्ता पूरा करने के लिये खनिज संपदा ही नहीं बल्कि आदिवासी बहुल इलाको से लेकर २५ करोड़ के करीब खेत मजदूर के सामने संकट के बादल मंडराने लगे। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि दुनिया की पूंजी जब भारत में आयेगी तो उसके मुनाफे से ग्रामीण भारत का जीवन भी सुधारा जा सकता है । यानी मोदी सरकार का अगला कदम गरीब भारत को मुख्यधारा से जोड़ने का होगा । और असल परीक्षा तभी होगी । लेकिन मोदी सरकार जिस रास्ते पर निकल रही है उसमें वह गरीब भारत या फिर किसान, मजदूर या ग्रामीण भारत की जरुरतों को पूरा करने की दिशा में कैसे काम करेगी यह किसी बालीवुड की फिल्म की तरह लगता है। क्योंकि फिल्मों में ही नायक तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस कर देता है। यानी शुरु में नायक कितना भी बिगड़ा हो लेकिन तीन घंटे बाद वह आदर्श करार दिया जाता है । यानी मोदी सरकार की हर कड़वी गोली बीतते वक्त के साथ मिठास लायेगी यह सरकार कहने से नहीं चूक रही। लेकिन यह कौन समझेगा कि दुनिया का बाजार और विदेशी पूंजी जब भारत की जमीन पर अपने कारखाने लगायेगी तो डालर के मुकाबले रुपया चाहे मजबूत दिखायी देने लगे लेकिन तब मुठ्टी भर रुपये से नही थैली भर रुपये से ही न्यूनतम की जरुरते आ सकेगी । क्योंकि इन्फ्रास्ट्क्चर भारत में दुनिया के मुकाबले सस्ता जरुर है लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में आयतीत मिठास कड़वी ही साबित होगी। क्योंकि भारत में आज भी सरकारें पचास रुपये किलो प्याज और सौ रुपये की थाली पर गिर जाती है।
बैकों में जमा धन के कमजोर होने भर से अराजकता आ जाती है। सोने का भाव गिरता है तो लोग सोना खरीद कर जमा कर लेते हैं लेकिन यह और सस्ता हो जाये तो फिर सस्ते हालात भी महंगे लगने लगते हैं। यानी समाज में निचले तबके की जरुरतों में सुधार लाये बगैर ऊपरी तबकों के अनुकुल बजट राहत भी दे सकता है और यह रास्ता समाज के ऊपरी वर्ग की जरुरत हो सकती है और मध्यम वर्ग को ललचा सकती है। लेकिन दुनिया में यह तबका सबसे बडा होते हुये भी भारत में सबसे छोटा है। क्योंकि भारत में तीस-पैतिस करोड़ बनाम अस्सी करोड़ की असमान रेखा तो जारी है।
इसे अगर रक्षा क्षेत्र से ही समझ लें तो मोदी सरकार ने आते ही हथियारो के लिये विदेशी निवेश का निर्णय लिया। और उससे पहले सेना के तीनो अंगों ने अंतराष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर 130 बिलियन डॉलर के सामानों की जरुरत बतायी। यानी आंतरिक सुरक्षा के लिये और भी हथियार चाहिये। जाहिर है मोदी सरकार अगर यह कहती है कि 130 बिलियन डालर देकर हथियार खरीदने का कोई मतलब नहीं है। इसके उलट रक्षा क्षेत्र में
लगी बहुराष्ट्रीय कंपनिया भारत में ही उद्योग लगाये । जिससे भारत में कारखाने भी लगेंगे। रोजगार भी मिलेगा और रुपया मजबूत भी होगा । साथ ही हथियारों को लेकर भारत स्वावलंबी भी होगा। और हथियारो की खरीद के दौरान सरकार की कमीशनखोरी भी बंद होगी। साथ ही देश के भीतर हथियार बनाने वाली कंपनियों के निजी मुनाफे भी खत्म होंगे। तो बात सही है ऐसा होना ही चाहिये। लेकिन इसके लिये समझना यह भी होगा कि दुनिया के पांच सबसे बड़े देश जो हथियार बनाते हैं, वह संयुक्त राष्ट्र के पांचों स्थायी सदस्य ही हैं। और पांचों देश यानी अमेरिका, इग्लैड, रुस, फ्रांस और चीन हमेशा चाहते हैं कि दुनिया में कही ना कही युद्द वाले हालात बने रहे। जिससे हथियार उघोग की जरुरत बरकरार रहे। भारत भी इन पांच देशों के अलावा जर्मनी और स्वीडन से ही हथियार खरीदता है। तो पहला सवाल है हथियारो के उत्पादन का नया केन्द्र भारत बनेगा तो सवाल सिर्फ रोजगार और इन्फ्रास्ट्रक्चर का होगा या बात आगे बढेगी। दूसरा सवाल मनमोहन सिंह के दौर में निवेश के रास्ते तो अपनो के लिये ही बंद हो गये । यानी हर किसी ने अंटी में पैसा दबा लिया क्योकि आर्थिक माहौल बिगड़ चुका था। तो पहले भारतीय पैसे वालो की अंटी को भरोसा दिलाने की जगह बाहर का रास्ता पकड़ना कितना सही है । और तीसरा सबसे बड़ा सवाल है कि सरकार की प्रथामिकता है। क्योंकि किसान , मजदूर , खेती , सिंचाई, फसल, खेतीहर जमीन , खेती अनुसंधान जैसे न्यूनतम प्रथामिकता को मोदी सरकार के बजट में पहली बार उभारा तो गया लेकिन गांव को शहरों में तब्दील कर डिब्बा बंद खाना खिलाने की सोच कही ज्यादा भारी नजर आयी। छोटी - छोटी योजनाओं के जरीये देश के विकास को कैसे पाटा जा सकता है। देश की भौगोलिक परिस्थितियों में कैसे पर्यावरण को बचा कर विकास का रास्ता नापा जा सकता है। कैसे देश में असमान समाज को सोशल इंडेक्स के दायरे में समेटा जा सकता है। कैसे दिल्ली के रायसीना हिल्स से पंचायत स्तर तक को एक धागे में पिरोया जा सकता है। कैसे हिन्दू शब्द को सांप्रदायिकता के कटघरे से बाहर कर मुस्लिम के साथ जोड़ा जा सकता है। कैसे मुस्लिम तुष्टिकरण को देश के ८० करोड़ हाशिए पर पड़े तबके के साथ घुलाया मिलाया जा सकता है। कैसे शिशु मंदिर और मदरसों के पाठ में भारतीय राष्ट्रवाद एक सरीखा दिखाया जा सकता है। कैसे आधुनिक अस्पतालो की कतार में प्राथामिक स्वास्थ्य केन्द्रों का अंबार लगाया जा सकता है । कैसे उच्च शिक्षा को सम्मान देकर देश के भीतर ही राजनीतिक सत्ता से ज्यादा तरजीह दी जा सकती है । कैसे भारत का नाम आते ही मस्तक उंचा उठ सकता है । कोई नीति । कोई फैसला तो कभी इस दिशा में लिया नहीं गया। तो फिर बजट सरकार के लिये चाहे कमाई का बाजार हो लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता के लिये बजट बेजार है क्या इसे आने वाले ५८ महीनो में मोदी सरकार समझ लेगी।
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