सोमवार, 1 दिसंबर 2014

मीडिया “प्रहरी ” की भूमिका में

आलोक कुमारबिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

“मीडिया जब ‘ प्रहरी ‘ की भूमिका में होता है तब ही वो जनता के हितों का रक्षक होता है”

 हाल में  बिहार के चंद अखबारों ने “नौ  सालों के कथित सुशासनी सरकार के  रिपोर्ट -कार्ड ” को जिस तरीके से परोसा और जिस तरह से वो नीतीश जी के चुनावी –अभियान की मुहिम ‘सम्पर्क-यात्रा’ को परोस रहे हैं वो अपने आप ही नीतीश जी की सरपरस्ती वाले सुशासन के मीडिया -मैनेजमेंट की सच्चाई को बयाँ करता है l पढ़ने के बाद यही लगता है कि मीडिया अपनी आलोचक और प्रहरी की भूमिका को पूर्णरूप से भूलकर “दरबारी ” की भूमिका बखूबी निभा रहा है l मीडिया को “चाटुकारिता”कीमीडिया “प्रहरी ” की भूमिका में भूमिका का परित्याग कर अपने “सचेतक” की भूमिका पर मंथन करने की आवश्यकता है और अगर संभव हो तो आम जनता को भटकाकर भुलावे में रखने की बजाए अपनी नीति में बदलाव कर शासन और व्यवस्था की सच्चाई भी उजागर करने की कोशिश होनी चाहिए l मीडिया जब “प्रहरी ” की भूमिका में होता है तब ही वो जनता के हितों का रक्षक होता है l आज मीडिया को यथार्थ के उल्ट स्थितियों को शब्दों से चमकीला -भड़कीला बनाकर जनता के सामने परोसने से परहेज करना होगा नहीं तो मीडिया की विश्वसनीयता (जो आज“प्रश्न-चिह्न ” के घेरों में है ) का विनाश तय है । वर्त्तमान बिहार के पिछ्ले नौ सालों की बात करूँ तो यहाँ मीडिया नेता विशेष , शासन और शासक को “प्रोडक्ट”के रूप में बेच रहा है।

बिहार के संदर्भ में विशेष कर अखबारों को अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझना और बखूबी निभाना भी होगा । नेता विशेष  , शासन व् सत्ता के “गुण-गान ” का परित्याग कर खबरों के साथ मानवीय पहलुओं को भी उठाना होगा । सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण और जिम्मेवारी वाला  कार्य है कुव्यवस्था की पोल खोलना। इतिहास गवाह है कि जब-जब पोल खुली है , सुधार हुआ है । मजबूरन शासन को आम आदमी के साथ खड़ा होना पड़ा है । अखबार केवल सत्ता के गलियारों तक ही नहीं सिमटा है , इसके सामाजिक सरोकारों के दायरे व्यापक हैं l जब आम आदमी किसी अखबार के साथ अपनेपन के साथ जुड़ता है, तो उस अखबार की जवाबदेही बढ़ जाती है और सबसे बड़ी बात यह है कि अखबारों को इस कसौटी पर खरा उतरना होता है । इसके अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि अखबार की ओर से चलाए गए अनेकों अभियानों का असर भी हुआ है । जब-जब अखबारों ने प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और खामियों को जनता और सरकार के सामने निष्पक्ष और निर्भय होकर रखा, सुधार के प्रयास शुरू हुए हैं । जब ऎसा होता है तो जनता की नजरें अखबारों पर जा टिकती हैं और अखबार उनके लिए उम्मीद की किरण बन जाता है।
 ये जरूरी नहीं है कि अखबार शासन-प्रशासन के प्रति सदैव आलोचनात्मक रवैया ही रखे ; जरूरत के हिसाब से शासन के साथ आम आदमी के हितार्थ सहयोग की भूमिका का निर्वहन भी करता रहे lअखबार और उससे जुड़े लोगों को ये ध्यान रखने की जरूरत है कि वे जनता के सेवक हैं, लोकतंत्र के प्रहरी हैं। पत्रकारिता अपने आप में एक “सेवा” है l सामाजिक सरोकारों, सौहार्द व खबरों की प्रमाणिकता को बनाए रखना परम दायित्व है अखबार और उससे जुड़े लोगों का l जनता का मददगार और आवाज बने रहना ही समाचार – माध्यमों ध्येय होना चाहिए । जनता के साथ जुड़कर जिस अखबार ने भी अपनी पहचान बनाई का, वही अपनी पहचान बरकरार रख पाया है l “सतत सकारात्मक प्रयास ” ही अखबारों की दुनिया का मूल-मंत्र होना चाहिए l
 पत्रकारिता के क्षेत्र में जिस प्रकार से पेड न्यूज के नाम से भ्रष्टाचार के पांव फैलाने की जो भनक सुनाई दे रही है। वह चिंताजनक है l लगता है कि इस से मुक्ति के लिए देश को एक और लड़ाई लड़नी होगी, जिसमें मीडिया ही सर्वाधिक प्रभावशाली हथियार होगा । इसे अपनी भूमिका पूरी निष्पक्षता, निर्भयता और नैतिकता के साथ निभानी होगी।
 अगर बिहार की ही बात की जाए तो आज बिहार के वर्त्तमान अखबार सुदूर अंचलों तक तो पहुंचने लगे हैं, लेकिन उन अंचलों के दुख-दर्द को पूरी तरह वाणी नहीं दे पा रहे हैं , उन अंचलों की समस्याओं के निदान में अखबार अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं। अधिकांश अखबार राजनीतिक खबरों व राजधानी के समाचारों में ही अधिक उलझे रहते हैं। आज स्थिति यह है कि बड़े अखबारों के जिला संस्करणों की तो बाढ़ आई हुई है, जिनमें जिलों के समाचार तो स्थान पा लेते हैं, लेकिन राजधानी के पाठक उस जानकारी से वंचित रहते हैं। स्थिति यह है कि जिलों के समाचार जिलों में ही दफन हो जाते हैं। समाचार के जरिए उठने वाली समस्या निदान तक नहीं पहुंच पाती है। जैसे किसी कस्बे में बिजली की समस्या को लेकर लोगों ने आंदोलन किया, तो उस आंदोलन की खबर भी केवल उन्हीं लोगों को पढ़ने को मिलेगी, तो उनकी आवाज को कौन सुनेगा और शासन-प्रशासन पर उस समस्या के निराकरण के लिए दबाव किस प्रकार पड़ेगा ? प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों के अभावों और समस्याओं का उपचार तो राजधानी में है, जबकि राजधानी व शासन के शीर्ष तक समस्या अखबार पहुँचा ही नहीं पा रहे हैं। किसी भी अखबार को प्रदेश का अखबार कैसे कहा जा सकता है, जब तक कि उसमें सभी क्षेत्रों के समाचारों का समावेश नहीं हो !! ईमानदारी, पेशेवर कुशलता, तेजी, आक्रामकता और सृजनशीलता की स्वतंत्रता ही अखबारों को नए आयाम प्रदान कर सकती ना की “चाटुकारिता” l टेढ़ी खीर को सीधा करने का माद्दा ही अखबारों की धूमिल पड़ती छवि को सँवार सकती है l

संस्कृत का संरक्षण सरकार का काम है: गुलाम

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का... निर्मलता ... सहजता... सुन्दरता... प्रवाह... पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा... और ऐसी ही हूं मैं भी।
pandit-gulam‘देश की सभी शास्त्रीय भाषाओं, विशेषकर संस्कृत का संरक्षण सरकार का काम है और सरकार को इसके लिए मजबूर कर देना हमारा’ यह कहना है पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार का। संस्कृत के प्रकांड विद्वान, एक प्राचीन मुस्लिम दरगाह के मुतवल्ली गुलाम साहब शान से खुद को ‘संस्कृत का गुलाम’ कहा करते हैं। इस दुर्लभ व्यक्तित्व से परिचय कराती विमल मिश्र की रिपोर्ट।

पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार – नाम सुनकर आपको आश्चर्य होगा, पर असली आश्चर्य तो वर्ली स्थित उनके घर पर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। छोटे से कमरे में कुरान और मुस्लिम मजहबी किताबों के साथ रामायण, महाभारत, वेद, पुराण और उपनिषदों से भरे ताखे और आलमारियां, मुख से धाराप्रवाह झरते मंत्र व हिंदू धार्मिक आख्यान और उनका ‘संस्कृतमय’ बायोडाटा। ‘बेटा और दोनों बेटियां शादी-विवाह करके बाहर नहीं गए होते तो आपको इस परिवार के बीच शुद्ध संस्कृत संभाषण भी सुनने को मिलता।’ यह कहना है पत्रकार मोहम्मद वजीहुद्दीन का, जिन्होंने हमारी जानकारी में वृद्धि की और बताया कि गुलाम साहब ने तीनों बच्चों के विवाह की पत्रिका भी संस्कृत में ही छपवाई थी।

हिंदी, मराठी, कन्नड, उर्दू, अरबी और अंग्रेजी के विद्वान, ‘विश्व भाषा’ पत्रिका के संपादक, ‘कुरान’ व अमर चित्र कथा के संस्कृत रूपांतरकार – पं. गुलाम दस्तगीर बिराजदार नाम का उनके धर्म से कोई वास्ता नहीं। वे नाम से नहीं, काम से पंडित हैं। संस्कृत उनका प्रेम है, आदत है, जुनून है और शायद उनकी जिंदगी भी। वे जैसे माहिर हैं हदीस, कुरान और इस्लामी तहजीब के, संस्कृत पुराणों और कर्मकांड के भी वैसे ही उद्भट् विद्वान हैं।

पं. गुलाम दस्तगीर बिराजदार हिंदू कर्मकांडों का ज्ञान भी हिंदू धर्मशास्त्रों के ज्ञान से कम नहीं रखते। लिहाजा, उन्हें शादी-विवाह, जैसे शुभ संस्कार और अंत्यक्रिया कराने के आग्रह भी मिलते रहते हैं, पर यह उन्हें मंजूर नहीं। वजह? ‘क्योंकि ये शुद्ध धार्मिक संस्कार हैं’, अपने घर के पास सूफी संत सैयद अहमद बदवी की सैकड़ों साल पुरानी दरगाह के मुतवल्ली (प्रमुख) ने हमें समझाया।

80 वर्षीय पं. गुलाम दस्तगीर आज भी बचपन के वे दिन भूले नहीं हैं, जब सोलापुर के अपने गांव में खेतिहर मजदूर के रूप में दिन भर खेतों में खटने के बाद वे रात्रिशाला में पढ़ने जाते समय पास की संस्कृत शाला के बाहर बैठे घंटों संस्कृत के मंत्र व श्लोक सुनने में बिता देते। उनकी लगन देखकर शाला के ब्राह्मण शिक्षक ने आखिरकार उन्हें कक्षा में बैठने की अनुमति दी। फिर जो हुआ वह अब इतिहास है।
उनकी संस्कृत सेवाओं का ही पुण्यप्रताप था, जो वर्षों महाराष्ट्र राज्य संस्कृत संगठन का मानद राजदूत रखने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने देवभाषा की देख-रेख करने वाली अपनी संस्कृत स्थायी समिति का सदस्य बनाया और काशी के विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान ने अपना महासचिव। आज भी काशी उनका दूसरे घर जैसा है। काशी नरेश जब भी मुंबई में होते हैं, उनके घर जरूर आया करते हैं।

पंडितजी खुद को संस्कृत के मामूली प्रचारक से ज्यादा नहीं मानते और मराठा मंदिर स्कूल के संस्कृत विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद देश भर घूम-घूमकर सभा-सेमिनारों को संबोधित कर संस्कृत और सर्वधर्म समभाव का प्रचार किया करते हैं। उनकी संस्कृत विरासत अभी कायम है। उनके नवासे दानिश ने देवभाषा में संभाषण की कला सीखी है और बेटी गयासुन्निसा ने संस्कृत में ‘शास्त्री’ कर इस्लाम और हिंदू धर्मों में तुलनात्मक शोधकार्य किया।

संस्कृत को लेकर मौजूदा विवाद से खिन्न पंडितजी कहते है, ‘संस्कृत बहुत ही सरल और ज्ञान की भाषा है। संस्कृत को सीखने के लिए जरूरत है सिर्फ इच्छा एवं उत्कंठा की। सरकार को उसे प्रश्रय देना चाहिए। नहीं तो यह हमारा काम है कि हम उसे उसके लिए मजबूर कर दें।’ पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार कहते हैं, ‘वेदों और कुरान का एक ही जैसा संदेश है – मानवता का कल्याण। केवल उसे हासिल करने के तरीके अलग-अलग हैं।’

शहरी माहौल में संस्कार के पांच सूत्र

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

शहरी माहौल में संस्कार के पांच सूत्र

किसी भी बालक को शिक्षा भले ही विद्यालय से मिलती हो; पर उसकी संस्कारशाला तो घर ही है। महान लोगों के व्यक्तित्व निर्माण में उनके परिवार, और उसमें भी विशेषकर मां की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही है। छत्रपति शिवाजी का वह चित्र बहुत लोकप्रिय है, जिसमें वे जीजामाता की गोद में बैठे कोई कथा सुन रहे हैं। लव और कुश का वह चित्र भी बहुत आकर्षक है, जिसमें सीता माता उन्हें धनुष चलाना सिखा रही हैं। श्रीकृष्ण और मां यशोदा के तो सैकड़ों चित्र पुस्तकों में मिलते हैं।    इन चित्रों और उनसे जुड़ी कथाओं द्वारा बच्चों के मन में देश और धर्म के प्रति अनुराग और आदर का भाव जाग्रत होता है। जैसे कुम्हार गीली मिट्टी को मनचाहा आकार देकर फिर उसे पकाता है, तब ही वह बर्तन या खिलौना बाजार में पहुंचता है। ऐसे ही मां और अन्य परिजन बच्चों के मन पर जो संस्कार डालते हैं, समय और अनुभव की भट्टी में वे ही परिपक्व होते हैं; और फिर उसी से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। गांव या छोटे कस्बों में संस्कार देने के लिए परिवार के साथ-साथ विद्यालय तथा आसपास के लोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने पर भी बच्चे उन्हें चाचा, काका, ताऊ, बाबा या चाची, काकी, दादी आदि कहते हैं। ये लोग भी उन बच्चों को अपना समझते हैं। इसलिए बच्चे घर के बाहर कहीं भी खेल रहे हों, अभिभावक उन्हें सुरक्षित समझते हैं। इतना ही नहीं, इन बड़े लोगों के सामने कोई गलत काम करते हुए बच्चे डरते भी हैं। उन्हें लगता है कि इसकी खबर घर तक पहुंच जाएगी। मेरे विद्यालय के एक अध्यापक अपने घर आते-जाते समय हमारे घर के सामने से गुजरते थे। प्रायः बाबा जी से उनकी राम-राम भी हो जाती थी। कभी-कभी वे उनके पास बैठ भी जाते थे। इस कारण विद्यालय में यदि मुझे कोई शरारत करनी हो, तो उनसे आंख बचाकर ही करता था। कभी वे ऐसा करते देखते, तो कह भी देते थे, ‘‘तुम्हारे घर के सामने से दिन में कई बार निकलता हूं। अगर तुम्हारे बाबा जी से कह दिया, तो कान खिंचाई हो जाएगी।’’ पर अब यह वातावरण धीरे-धीरे बदल रहा है। लोगों की आर्थिक दशा सुधरने तथा यातायात के साधनों की वृद्धि से गांव के बच्चे पढ़ने के लिए कस्बे में, और कस्बे के बच्चे निकटवर्ती शहरों में जाने लगे हैं। बच्चे कहीं के हैं और अध्यापक कहीं के। अतः उनके बीच जैसा पारिवारिक संबंध पहले था, वह अब नहीं है। अब शिक्षण कार्य भी पैसा कमाने का एक माध्यम मात्र है। ऐसे में संस्कार देने के जिम्मेदारी पूरी तरह परिवार पर ही आ गयी है।  पर परिवार का वातावरण भी अब बदल गया है। घरेलू आवश्यकताएं तथा पैसे का महत्व बढ़ जाने से अब महिलाएं भी काम कर रही हैं। पुरुष काम के लिए घर से काफी दूर जाने लगे हैं। उन्हें कार्यस्थल तक पहुंचने में ही डेढ़-दो घंटे लग जाते हैं। ऐेसे में परिवार और विशेषकर बच्चों की उपेक्षा हो रही है। इस कमी को दूरदर्शन, कम्प्यूटर और मोबाइल पूरा कर रहा है। इन उपकरणों ने भौतिक दूरियां तो मिटा दी हैं; पर परिवार में दूरी और कलह बढ़ रहे हैं।  आज के समय में कोई इन उपकरणों का विरोध नहीं कर सकता। कोई चाहे, तो इन्हें आवश्यक बुराई मान सकता है; पर परिवार में प्रेम और संस्कार का वातावरण बना रहे, इसके लिए कुछ घरेलू उपाय सोचने होंगे। इस दिशा में बड़ों को ही पहल करनी और नयी पीढ़ी से तालमेल बनाते हुए आगे बढ़ना होगा। इसके लिए एक समाजशास्त्री ने पांच सूत्र बताये हैं। उनका दावा है कि इन ‘पंचसूत्रों’ से उन्होंने हजारों परिवारों का वातावरण सुधारा है। ये सूत्र निम्न हैं –
दैनिक भोजन – परिवार के सब सदस्य रात का भोजन एक साथ करें। घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति को चाहे एक कप दूध पीना हो, और सबसे छोटे बच्चे को चाहे खेलते हुए सबके हाथ से एक-एक कौर लेना हो; पर सब बैठें एक साथ। इस समय सबके फोन और टी.वी. अनिवार्य रूप से बंद हो तथा केवल घरेलू गप-शप ही हो।
साप्ताहिक पूजा – सप्ताह में किसी भी दिन सुविधाजनक समय पर सब मिलकर पूजा या यज्ञ आदि करें। इसमें किसी पंडित या बाहरी व्यक्ति को बुलाने की आवश्यकता नहीं है। घर के लोग जैसा और जितना जानते हैं, उतना ही करें। आरती और प्रसाद वितरण बच्चों से करायें।
मासिक भ्रमण – महीने में एक बार सब लोग कहीं घूमने जायें। इसमें सिनेमा, पिकनिक आदि कुछ भी हो सकता है। खानपान की कुछ सामग्री घर में बना लें, बाकी बाहर से ले लें। बुजुर्ग साथ में हों, तो उनकी सुविधा के लिए कुर्सी, चटाई, तकिया आदि भी रख लें। किसी पार्क या पिकनिक स्थल पर भोजन के बाद वहां गंदगी न छूटे, इसका ध्यान रखने से बच्चों पर सफाई के संस्कार पड़ेंगे।
वार्षिक तीर्थयात्रा – वर्ष में एक बार चार-छह दिन के लिए पूरा परिवार तीर्थयात्रा पर जाए। बहुत से सम्पन्न लोग विदेश यात्रा की ढींग हांकते हैं; पर अपने देश में भ्रमण सस्ता, सुविधाजनक, कम समय लेने वाला तथा देश और समाज को जानने का सबसे अच्छा मार्ग है। इससे प्राप्त अनुभव सदा जीवन में काम आते हैं।
जन्मदिन – बच्चों के जन्मदिन पर सम्बन्धियों और मित्रों को बुलाकर घर में पूजा-यज्ञ आदि करें। यह आयोजन एक-दो दिन आगे-पीछे छुट्टी वाले दिन करने से सबको सुविधा हो जाएगी। लेने की बजाय देने का संस्कार डालने के लिए बच्चे के हाथ से दान-पुण्य कराएं। किसी गोशाला, कुष्ठ आश्रम, निर्धन बस्ती आदि में जाकर उनकी आवश्यकता की कोई वस्तु भेंट करें। फिर उस बच्चे की इच्छानुसार घर से बाहर भ्रमण, भोजन आदि करें।
इसे मासिक भ्रमण वाले कार्यक्रम से जोड़ने पर ‘एक पंथ दो काज’ हो जाएंगे। इन दिनों शहरीकरण तेजी से हो रहा है। इसे रोका भी नहीं जा सकता। अतः इसके बीच से ही कोई मार्ग निकालना होगा। परिवार पालन के लिए पैसा भी आवश्यक है और संस्कार भी। इन ‘पंचसूत्रों’ से दोनों में संतुलन बनेगा और परिवार का वातावरण खिल उठेगा।

योग को मिलेगी अंतरराष्ट्रिय मान्यता

प्रमोद भार्गव
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

योग को मिलेगी अंतरराष्ट्रिय मान्यता


संदर्भः- संयुक्त राष्ट्र में योग दिवस मनाए जाने पर 130 देशों का समर्थन।
प्रमोद भार्गव
शायद आने वाले 10 दिसंबर को योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिल जाएगी और हरेक साल 21 जून को योग दिवस मनाए जाने का अंतरराष्ट्रिय स्तर पर सिलसिला शुरु हो जाएगा। अंतरराष्ट्रिय योग दिवस मनाए जाने के बावत इसी साल सिंतबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र में दिए अपने पहले भाषण में योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव की पुरजोर पैरवी करते हुए कहा था कि योग जीवनशैली को बदलकर और मस्तिष्क की चेतना को जगाकर जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है। याद रहे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक रिपोर्ट में कहा भी गया है कि लोगों में जो गुस्सा देखा जा रहा है और जिस तेजी से दुनिया में आत्महत्याएं बढ़ रही हैं उनका एक कारण जलवायु में हो रहा बदलाव भी है। शायद इसीलिए मोदी के इस प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में से 130 देशों ने समर्थन दे दिया है। इस समर्थन में सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य देश रूस, चीन, फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन तो शामिल है ही ईराक, ईरान, मिश्र और बांग्लादेश जैसे इस्लामिक देश भी शामिल हैं।
योग शब्द अपने भावार्थ में आज अपनी सार्थकता पूरी दुनिया में सिद्ध कर रहा है। योग का अर्थ है जोड़ना। वह चाहे किसी भी धर्म जाति अथवा सम्प्रदाय के लोग हों,योग का प्रयोग सभी को शारीरिक रूप से स्वास्थ्य और मानसिक रूप से सकारात्मक सोच विकसित करता है। योग भारत के किसी ऐसे धर्म ग्रन्थ का हिस्सा भी नहीं है, जो बाइबिल और कुरान की तरह पवित्र आस्था का प्रतीक हो। योग की आसनें प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथ पतंजली योग सूत्र के प्रयोग हैं। जो हिंदु अथवा अन्य भारतीय धर्मों में धर्म ग्रन्थों की तरह पूज्य नहीं है। पतंजली योग सूत्र का सार इस एक वाक्य ‘‘योगष्तिवृत्ति निरोधः‘‘ में निहित है। इसका भावार्थ है चित्त अथवा मन की चंचलता को स्थिर करना अथवा रखना। जिससे मन भटके नहीं और इन्द्र्रियों के साथ वासनाएं भी नियंत्रित हों। लेकिन योग केवल वासनाओं को नियंत्रित करने तक ही सीमित नहीं है। योग के नियमित प्रयोग से मधुमेह, रक्तचाप तो नियंत्रित होते ही हंै,कमोवेश मोटापा भी दूर होता है। यदि बाबा रामदेव की बात पर विश्वास करें तो कैंसर और एड्स जैसे असाध्य रोगों को भी योग नियंत्रित करता है। शायद इसीलिए मोदी ने योग को जीवन की चेतना का मंत्र बताया है।
हालांकि योग शिक्षा को लेकर एक समय अमेरिका और ब्रिटेन के धर्मगुरुओं में भय व्याप्त हो चुका है क्योंकि वे योग को धार्मिक शिक्षा के रुप में देखते हैं। उन्हें आशंका है कि यदि योग की शिक्षा दी जाती रही तो उनके बच्चे भारतीय धर्म की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसी शंका के चलते केलिर्फोनिया नगर में तो विद्यालयों में योग की शिक्षा से जुड़े पाठों को हटाने की मांग भी की जा चुकी हैं। अकेले इस शहर की पाठशालाओं में पांच हजार से भी ज्यादा बच्चे योग सीखकर स्वास्थ्य व आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे है।
धार्मिक पूर्वाग्रह के चलते ही योग के पाठ पर इग्ंलैण्ड की दो चर्चों ने पाबंदी लगा दी थी, जबकि योग के रहस्यों को स्वास्थ लाभ से जोड़कर बाबा रामदेव ने जबसे सार्वजानिक करना शुरू किया है,तभी से योग की महत्ता को पूरे विश्व ने स्वीकारा, न कि किसी धार्मिक प्रचार प्रसार के चलते ? योग ध्यान,और प्राणायाम मस्तिष्क को एकाग्र कर शरीर को चुस्त – दुरूस्त व निरोग बनाए रखने की धर्मनिरपेक्ष वैज्ञानिक आसनें हैं, न कि हिंदु धर्म के विस्तार के उपाय।
दरअसल भारत अथवा पूर्वी देशों से जो भी ज्ञान यूरोपीय देशों में पहुंचता है, तो इन देशों की ईसाइयत पर सकंट के बादल मंडराने लगते हैं। इसी तरह भगवान रजनिश ने जब अमेरिका में गीता और उपनिषदों को बाइबिल से तथा राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर को जीसस से श्रेष्ठ घोषित करना शुरू किया और धर्म तथा अधर्म की अपनी विशिष्ट शैली में व्याख्या की तो रजनिश के आश्रमों में अमेरिकी लेखक ,कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, वैज्ञानिक और प्राध्यापकों के साथ आमजनों की भीड़ उमड़ने लगी थी। उनमें यह जिज्ञासा भी पैदा हुई कि पूरब के जिन लोगों को हम हजारों ईसाई मिशननरियों के जरिए शिक्षित करने में लगे हैं उनके ज्ञान का आकाश तो कहीं बहुंत ऊंचा है। यही नहीं जब रजनिश ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन जो, ईसाई धर्म को ही एक मात्र धर्म मानते थे और वेटीकन सिटी में पोप को धर्म पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी तो ईसाइयत पर संकट छा गया और देखते ही देखते रजनिश को उनके तामझाम समेत अमेरिका से बेदखल कर दिया गया।
लेकिन अब लगता है मोदी के प्रभाव के चलते दुनिया में सद्भाव और सहिष्णुता का वातावरण नये ढंग से निर्मित हो रहा है। वरना महज दो माह के भीतर योग दिवस के प्रस्ताव पर 130 देशों का समर्थन मिलना मुश्किल था। सह प्रायोजक के रुप में इतने देशों का समर्थन मिलना आश्चर्य है। इस मसौदे को एल डाक्यूमेंट का नाम दिया गया है। यदि इस प्रस्ताव को 10 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा की बैठक में मान्यता मिल जाती है तो इसे स्वास्थ्य एवं कल्याण के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण मुहैया कराने वाला प्रस्ताव माना जाएगा।

रविवार, 16 नवंबर 2014

….जहाँ सभ्यता नंगी खड़ी है

कतरा-कतरा आबरू

भंवर मेघवंशी
 ‘‘दोपहर होते-होते नीचे हथाई पर पंच और गाँव के मर्द लोग इकट्ठा होने लगे। उनकी आक्रोशित आवाजें ऊपर मेरे कमरे तक पहुँच रही थी, सबक सिखाने की बातें हो रही थी। आज सुबह से ही हमारे परिवार को हत्यारा समझकर गाँव से भाग जाने की अफवाह जान-बूझकर फैला दी गयी थी, जबकि हम निकटवर्ती नाथेला उप स्वास्थ्य केन्द्र पर अपनी गर्भवती बेटी लीला को प्रसव पीड़ा उठने पर नर्स के पास लेकर गये थे। जब अफवाहों की खबर हमें लगी तो बेटी को वहीं छोड़कर घर लौटे। तब तक 50-60 लोग आ चुके थे। धीरे-धीरे और लोग भी आ रहे थे। हम अपने घर में ही थे। नीचे आवाजें तेज होने लगी। ‘बुलाओ नीचे’ की एक साथ कई आवाजें। तब धड़धड़ाते हुए कई नौजवान मर्द सीढि़याँ चढ़कर मेरे घर में घुस आए। पहले मुझे चोटी से पकड़ा, फिर पाँवों की ओर से पकड़कर घसीटते हुए नीचे ले गये, जहाँ पर सैंकड़ों पंच, ग्रामीण अन्य तमाशबीन खड़े थे। मैं सोच रही थी ये मर्द भी अजीब होते हैं, कभी ‘कालीमाई’ कहकर पाँव पड़ते है तो कभी ‘कलमुँही’ कहकर पैर पकड़ कर घसीटते है। मर्द कभी औरत को महज इंसान के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। उसे या तो पूजनीय देवी बना देते है या दासी, या तो अतिमानवीय मान कर सिर पर बिठाल देते हैं या अमानवीय बनाकर पाँव की जूती समझते हैं।
वे मुझे घसीटकर नीचे हथाई पर ले आए। उन्होंने मेरे दोनों हाथों में तीन-तीन ईंटें रखी और सिर पर भारी वजन का पत्थर रख दिया। मेरा सिर बोझ सहने की स्थिति में नहीं था। पत्थर नीचे गिर पड़ा, हाथों में भी दर्द हो रहा था, उन्होंने मेरी कोहनियों में लकड़ी के वार किए, वे मुझसे पूछ रहे थे- सच बता। मैं क्या सच बताती? जाने कौन सा सच वे जानना चाहते थे। मैंने कहा-‘‘म्है नहीं जाणूं (मैं नहीं जानती), म्हूं कठऊं कहूँ (मैं कहाँ से कहूँ)।’’
एक अकेली औरत और वह भी हत्या जैसे संगीन आरोप के शक में पंचों की आसान शिकार बनी हुई, अगर निर्भीकता से बोले तो पुरुषों का संसार चुनौती महसूस करने लगता है। लोगों को उसका निडर होकर बोलना पसंद नहीं आया। आखिर तो वह अभी तक औरत ही थी ना। क्या वह अरावली की इन पहाड़ियों के बीच बसे इलाके के प्राचीन कायदों को नहीं जानती थी? क्या वह भूल गयी थी, पिछले ही साल तो राजस्थान के राजसमंद जिले के इसी चारभुजा थाना क्षेत्र में बुरे चाल-चलन के सवाल पर एक बाप ने अपनी ही बेटी का सर तलवार से कलम कर डाला था और फिर लहू झरते उस सिर को बालों से पकड़े, बाप उसे थाने में लेकर पहुँच गया था।
इज्जत के नाम पर, ऐसा तालिबानी कृत्य करते हुए यहाँ के मर्द तनिक भी नहीं झिझकते हैं तो भी इसकी यह बिसात, अरे यह तो सिर्फ औरत जात है यहाँ तो किसी मर्द पर भी हत्या का शक मात्र हो जाए तो उसे गधे पर बिठाकर घुमाते है पंच। फिर यह औरत है ही क्या?
बस फिर देर किस बात की थी। इस छिनाल को नंगा करो…। एक साथ सैकड़ों आवाजें! एक महिला को निर्वस्त्र देखने को लपलपाती आँखों वाले कथित सभ्य मर्द चिल्ला पड़े। ‘उसे नंगा करो।’ उसके कपड़े जबरन उतार लिए गये। वह जो आज तक रिवाजों से, कायदों से, संस्कृति और कथित संस्कारों के वशीभूत हुई मुँह से घूँघट तक नहीं उघाड़ती थी। आज उसकी इज्जत तार-तार हो रही थी, इस बीच 2 नवम्बर 2014 को आत्महत्या करने वाले वरदी सिंह की बेवा सुंदर बाई चप्पलों से उसे मारने लगी। एक महिला पर दूसरी महिला का प्रहार, मर्द आनंद ले रहे थे।
जमाने भर की नफरत की शिकार अपनी पत्नी की हालत उसके पति उदयसिंह से देखी नहीं गयी। वह अपने बेटों पृथ्वी और भैरों के साथ बचाव के लिए आगे आया। उसके दुस्साहस को जाति पंचायत ने बर्दाश्त नहीं किया। सब उस पर टूट पड़े। मार-मार कर अधमरा कर डाला तीनों बाप-बेटों को और उनको उनके ही घर में बंद कर दिया गया। ‘‘अब तुझे कौन बचाएगा छिनाल। बोल, अब भी वक्त है, सच बोल जा, तेरी जान बख्श देंगे। स्वीकार कर ले कि तेने ही मारा है वरदी सिंह को, तू उसकी बेवा सुंदर को नाते देना चाहती है, तेरा कोई स्वार्थ जरूर है, तूने ही मारा है उसे।’’
पीड़िता ने मन ही मन सोचा, यह कैसा गाँव है, अभी जिस दिन वरदी सिंह ने आत्महत्या की तो पुलिस को इत्तला देने की बात आई थीं तब सारा गाँव एकजुट हो गया कि पुलिस को बताने की कोई जरूरत नहीं है। फिर बिना एफआईआर करवाए, बिना पोस्टमार्टम करवाए ही चुपचाप मृतक वरदी सिंह की लाश को इन्हीं लोगों ने जला दिया था तथा उसकी आत्महत्या को सामान्य मौत बना डाला था… और आज उसकी हत्या का आरोप उस पर लगाकर उसकी जान के दुश्मन बन गये हैं।
‘‘अच्छा… ये ऐसे नहीं बोलेगी। इसके मुँह पर कालिख पोतो, बाल काटो इस रण्… के! और गधे पर बिठाओ कलमुँही को।’’ जाति पंचायत का फरमान जारी हुआ। फिर यह सब अकल्पनीय घटा- शर्म के मारे नग्न अवस्था में गठरी सी बनी हुई पीड़िता का काला मुँह किया गया, बाल काटे गये, जूतों की माला पहनाई गयी और गधे पर बिठा कर उसे पूरे गाँव में घुमाया गया। इतना ही नहीं उसे 2 किलोमीटर दूर स्थित थुरावड़ के मुख्य चौराहे तक ले गये। यह कथा पौराणिक नहीं है और ना ही सदियों पुरानी। यह घटना 9 नवम्बर 2014 को घटी।
पीड़िता रो रही थी, मदद के लिए चिल्ला रही थी, उसके आँसू चेहरे पर पुती कालिख में छिप गये थे और रुदन मर्दों के ठहाकों में। औरतें भी देख रही थी, वे भी मदद के लिए आगे नहीं आई। थुरावड़ चौराहे पर तो एक औरत ने उसके सिर पर किसी ठोस वस्तु का वार भी किया था। पढ़े-लिखे, अनपढ़, नौजवान, प्रौढ़, बुजुर्ग तमाम मर्द इंसान नहीं हैवान बन गये थे। लगभग पाँच घंटे तक हैवानियत और दरिंदगी का एक खौफनाक खेल खेला गया मगर किसी की इंसानियत नहीं जागी। जो लोग इस शर्मनाक तमाशे में शरीक थे, उनके मोबाइल तो पंचों ने पहले ही रखवा लिए थे ताकि कोई फोटो या विडियो क्लिपिंग नहीं बनाई जा सके, मगर राहगीरों व थुरावड़ के लोगों ने भी इसका विरोध नहीं किया।
थुरावड़ पंचायत मुख्यालय है। वहाँ पर पटवारी, सचिव, प्रधानाध्यापक, आशा सहयोगिनी, रोजगार सहायक, सरपंच, वार्ड पंच, नर्स, कृषि पर्यवेक्षक इत्यादि सरकारी कर्मचारियों का अमला विराजता है। इनमें से भी किसी ने भी घटना के बारे में अपने उच्चाधिकारियों को सूचित नहीं किया और ना ही विरोध किया। वह अभागिन उत्पीड़ित होती रही। अपनी गरिमा, लाज, इज्जत के लिए रोती रही। चीखती-चिल्लाती, रोती-कलपती जब उसकी आंखें पथरा गयीं और निरंतर मार सहना उसके वश की बात नहीं रही तो वह गधे पर ही बेहोश होकर धरती पर गिरने लगी। मगर दरिंदे अभी उसको कहाँ छोड़ने वाले थे। वे उसे जीप में डालकर वापस उसके गाँव थाली का तालाब की ओर ले चले, रास्ते में जब होश आया तो फिर वही सवाल-‘सांच बोल, कुणी मारियो’ (सच बोल, किसने मारा)। उसने कहा ‘‘मेरा कोई दोष नहीं, मुझे कुछ भी मालूम नहीं, मैं कुछ नहीं जानती, मैं क्या बोलूं।’’ तब उसकी फिर पिटाई की गयी, तभी अचानक रिछेड़ चौकी और चारभुजा थाना पुलिस की गाड़ियाँ वहाँ पहुँच गयी। बकौल पीड़िता-‘‘पुलिस उसके लिए भगवान बनकर आई, उन दरिंदों से पुलिस ने ही छुड़वाया वरना वे मुझे मार कर ही छोड़ते।’’
बाद में पुलिस पीड़िता, उसके पति व बच्चों सहित पूरे परिवार को चारभुजा थाने में ले गयी, ढाढ़स बंधाया और मामला दर्ज किया, उसे अस्पताल ले गये, डॉक्टरों को दिखाया, इलाज करवाया और रात में वहीं रखा।
अब पुलिस के सामने चुनौती थी, आरोपियों की गिरफ्तारी की। सुबह पुलिस ने गाँव में शिकंजा कसा, जो पंच मिले उन्हें पकड़ा और थाने में ले गयी। थाने तक पहुँचने तक भी इन पंचों को अपने किए पर कोई शर्मिन्दगी नहीं थी। वे कह रहे थे-‘‘इसमें क्या हो गया? वो औरत गलत है, उसने गलती की, जिसकी सजा दी गयी।’’ वे कानून-वानून पर भरोसा नहीं करते, अपने हाथों से तुरंत न्याय और फटाफट सजा देने में यकीन करते है। उनका मानना है कि- ‘‘हमने कुछ भी गलत नहीं किया, हम निर्दोष है।’’ यहाँ इसी प्रकार के पाषाणयुगीन न्याय किए जाते हैं, जो कि अक्सर औरतों तथा गरीबों व कमजारों के विरुद्ध होते हैं। यहाँ खाप पंचायत के पंचों का शासन है, वे कुछ भी कर सकते हैं, इसलिए यह शर्मनाक कृत्य उन्होंने बेधड़क किया।
पंचों को घटना की गंभीरता का अहसास ही तब हुआ, जब उन्हें शाम को घर के बजाय जेल जाना पड़ा और पिछले कई दिनों से करीब 30 लोग जेल में पड़े हैं, अब उन्हें अहसास हो रहा है कि – शायद उनसे कहीं कोई छोटी-मोटी गलती हो गयी है।
घटना के दूसरे दिन जिला कलक्टर राजसमंद कैलाश चंद्र वर्मा तथा पुलिस अधीक्षक श्वेता धनखड़ मौके पर पहुँचे, महिला आयोग की अध्यक्ष लाडकुमारी जैन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के प्रवक्ता फरहान हक एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन व स्कूल फॉर डेमोक्रेसी और महिला मंच के दलों ने भी पीड़िता से मुलाकात की है। मगर आश्चर्य की बात यह है कि इसी समुदाय के एक पूर्व जनप्रतिनिधि गणेश सिंह परमार यहाँ नहीं पहुँचे, ना कोई वार्ड पंच आया और ना ही सरपंच, स्थानीय विधायक एवं पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह राठौड़ भी नहीं आए, इसी जिले की कद्दावर नेता और सूबे की काबीना मंत्री किरण माहेश्वरी भी घटना के पांच दिन बाद आई और मुख्यमंत्री की ओर से राहत राशि देकर वापस चली गयीं।
गृहमंत्री हो अथवा मुख्यमंत्री किसी के पास इस पीड़िता के आंसू पोछने का वक्त नहीं है। कुछ मानवाधिकार संगठन, मीडिया और पुलिस के अलावा सबने इस शर्मनाक घटना से दूरी बना ली है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं पर तो आरोपियों को बचाने के प्रयास के आरोप भी लग रहे है, वहीं राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित इस कांड के विरूद्ध मुख्य विपक्षी दल ने तो बोलने की जहमत तक नहीं उठाई है।
जब मामला मीडिया के मार्फत थाली का तालाब गाँव से निकलकर देश, प्रदेश और विदेश तक पहुँचा और चारों ओर थू-थू होने लगी, तब राज्य की नौकरशाही चेती और पटवारी, स्थानीय थानेदार, नर्स, प्रधानाध्यापक, वार्ड पंच, उप सरपंच और सरपंच आदि को निलंबित किया। राशन डीलर तो इस जघन्य कांड में खुद ही शामिल हो गया था। उसका प्राधिकार पत्र खत्म करने की कार्यवाही भी अमल में लाई गयी है, मगर प्रश्न यह है कि सांप के निकल जाने पर ही लकीर क्यों पीटता है प्रशासन? क्या उसे नहीं मालूम कुंभलगढ़ का यह क्षेत्र महिला उत्पीड़न की नरकगाह है, यहाँ ‘डायन’ बताकर कई औरतें मारी गयी हैं। हत्या, जादू-टोने के शक में महिलाओं पर अत्याचार आम बात है, आज भी इस इलाके में जाति के नाम पर खौफनाक खाप पंचायतों के तालिबानी फरमान लागू होते है, सरकारी धन से बने सार्वजनिक चबूतरों पर बैठकर खाप पंच औरतों तथा गाँव के कमजोर वर्गों के विरुद्ध खुले आम फैसले करते है, सही ही कहा था संविधान निर्माता अंबेडकर ने कि गाँव अन्याय, अत्याचार तथा भेदभाव के मलकुण्ड है।
सबसे ज्वलंत सवाल अभी भी पीड़िता व उसके परिवार की सुरक्षा का है, उसके पुनर्वास तथा इलाज का है। न्याय देने और उसे क्षतिपूर्ति देने का है। सरकार से किसी प्रकार की मदद के सवाल पर पीड़िता ने कहा-‘‘ पुलिस ने मुझे बचाकर मदद की है, बाकी मेरे हाथों की पाँचों अंगुलियाँ सलामत है तो मैं मेहनत मजदूरी करके जी लूँगी।’’
मुझे पीड़ितों की इस बात को सुनकर पंजाब के संघर्षशील दलित कवि और गायक कामरेड बंत सिंह की याद हो आई, जिनको अपनी बेटी के साथ दबंगों द्वारा किए गये बलात्कार का विरोध करने की सजा उनके हाथ-पाँव काट कर दी गयी। जब बंत सिंह होश में आए तब उन्होंने कहा-‘‘जालिमों ने भले ही मेरे दोनों हाथ व दोनों पाँव काट डाले है मगर मेरी जबान अभी भी सलामत है और मैं अत्याचार के खिलाफ बोलूँगा।’’
सही है, इस पीड़िता ने भी अपनी अंगुलियों की सलामती और बाजुओं की ताकत पर भरोसा किया है तथा उसे लगता है कि उसकी अंगुलियाँ सलामत है तो वह संघर्ष करते हुए मेहनत-मजूरी से जीवन जी लेगी।पीड़िता की तो अंगुलियाँ सलामत है मगर हमारे इस पितृसत्तात्मक घटिया समाज का क्या सलामत है, जो उसे जिंदा रखेगा? पीड़िता के पास तो अपना सच है और पीड़ा की यादें है, ये यादें उसके जीने के संघर्ष का मकसद बनेगी, मगर हम निरे मृतप्रायः लोगों के पास अब क्या है जो सलामत है ? अगर अब भी हम सड़कों पर नहीं उतरते हैं, अन्याय और अत्याचार की खिलाफत नहीं करते है तो हमारा कुछ भी सलामत नहीं है। हम पर लाख-लाख लानतें और करोड़ों-करोड़ धिक्कार!

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- भंवर मेघवंशी, 
लेखक राजस्थान में कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।

लापता पिता की खोज में एक कैमरा तोपची का करिश्मा

पलाश विश्वास
मैंने लिखा है कि दस साल पहले एक दिन अचानक हमारे मित्र  कमल जोशी के कोटद्वार के घर से उनके पिता गायब हो गये। फिर वे लौटकर घर आये नहीं। हिमालय के उत्तुंग शिखरों और ग्लेशियरों में कही हमेशा के लिए खो गये विस्मृति के शिकार पिता और कमल की एक अनंत यात्रा जारी है उस खोये हुए पिता की तलाश में जो दरअसल उसकी फोटोग्राफी है।
कमल हो सकता है कि ऐसा न सोचता हो, लेकिन मेरा मानना यही है। उसकी यायावर जीवन यात्रा को मैं इसी तरह देखता हूँ जिसमें उनके पिता, मेरे पिता और सुंदरलाल बहुगुणा एकाकार हो गये हैं। इसमें एकाकर हैं इसे देश के सारे जनपद और हर वह आदमी और औरत जिसकी धड़कनें प्रकृति और पर्यावरण में रची बसी हों।
नई पीढ़ी के लोग जिनके लिए पिता एक अमूर्त पहेली हो, उनके लिए यह वक्तव्य समझ में भले न आये, लेकिन हमारी पीढ़ी के लिए समझना उतना मुश्किल भी नहीं, अगर पिता की कोई तस्वीर उनकी आंखों में बसती हो जो मुक्त बाजार में बेदखल हैं जैसी हमारी नई पीढ़ियाँ और हमारे पुरखों की सारी विरासत और यह सारी कायनात।
मुझे फोटोग्राफी आती नहीं है और बेहद खूबसूरत अंतरंग पलों को हमेशा के लिए खो देने का अपराधी भी मैं हूँ। जैसे इस बार सुंदरलाल बहुगुणा जी की कोई तस्वीर मैं न निकाल सका और न उनसे हुई बातचीत रिकॉर्ड कर सका। यह जो आलाप प्रलाप का सिलसिला है, वह दरअसल उन खोये हुए पलो को जीने का अभ्यास ही है।
कमल की तस्वीरें देखते हुए मैं खूबसूरती और फोकस के सौंदर्यबोध से मंत्रमुग्ध होता हूँ लेकिन बारीकियाँ समझ नहीं पाता। जैसे चित्रकला के बारे में या संगीत के बारे में मैं निरा गधा हूँ।
वैसे भाषा, विधाओं, माध्यमों, साहित्य,  संस्कृति के संदर्भ में जिनमें मेरी रुचि ज्यादा है, जिन्हें साधने में मैंने पूरी की पूरी एक जिंदगी बिना मोल खर्च कर दी है, मेरा गधापन कितना कम बेशी है, उसका भी मुझे कोई अंदाजा नहीं है।
कमल के हर फ्रेम में मुझे एक तड़प महसूस होती है, जो सत्यजीत रे के कैमरे में महसूस नहीं करता,लेकिन ऋत्विक घटक की हर फिल्म के फ्रेम दर फ्रेम महसूस करता हूँ।
फ्रेम दर फ्रेम जिंदगी से लबालब यह कला है, जिसे मैं विश्लेषित तो कर नहीं सकता, लेकिन महसूस कर सकता हूँ। जैस कत्थक का तोड़।
जैसे संगीत को कोई पाथर यकीनन नहीं समझ सकता, लेकिन सारी कायनात संगीतबद्ध है और सुर ताल लय में छंदबद्ध है मसलन जैसे दिन रात, धूप छांव, पहाड़ समुंदर अरण्य और रेगिस्तान, रण,  तमाम नदियाँ और जलस्रोत तमाम, जलवायु, मौसम, सूर्योदय सूर्यास्त, वगैरह वगैरह। संगीत प्रेमी होने के लिए सुर ताल लय की विशेषज्ञता लता मंगेशकर, गिरिजा देवी, कुमार गंधर्व या भीमसेन जोशी की तरह हो, ऐसा भी नहीं है।
कमल की खींची तस्वीरें और उसकी अथक यायावरी को देखकर मुझे पता नहीं हर वक्त क्यों लगता है लगता है कि प्यासी लेंस एक पिता की खोज में है और उस खोज में इस पृथ्वी और पर्यावरण की भारी चिंता है। सरोकार भी है। दृष्टि तो है ही।
उसकी यायावरी से तो कभी कभी उसके चेहरे पर मेरे पिता का चेहरा भी चस्पां हो जाता है, लेकिन मेरे पिता कमल की तरह इतने खूबसूरत कभी न थे। लेकिन मेरे पिता और उसके लापता पिता हर बिंदु पर जब एकाकार हो जाते हैं।
इसलिए इस महाविध्वंस के मध्य अब भी मुझे लगता है कि इस कायनात में नवनाजी महाविनाश के कारपोरेट उपक्रमों के बावजूद अभी मनुष्यता बची रहनी है जब तक कि हमारे रगों में खून बहना है और दिलों में धड़कनों का होना है।
मैं कमल के कैमरे को गिरदा के मशहूर हुड़के से जोड़कर देखता हूँ तो सारे हिमालय का भूगोल हमारे सामने होता है, जहाँ से कमल और हमारी दोनों की यात्रा शुरु होती है और खत्म भी वहीं होनी चाहिए। जिसके कितने आसार हैं, हैं भी नहीं, कह नहीं सकते।
 खासकर तब जब महानगर कोलकाता में बैठकर भी मैं उसी तरह भूस्खलन के मध्य हूँ जैसे हम पहाड़ों में होते हैं। पहाड़ जैसे खिसकते हैं, टूटते बगते गायब होते हैं, वैसे ही सारे महानगर, नगर और जनपद गायब होने को हैं। अनंत भूस्खलन है अनंत भूमिगत आग की तरह अनवरत, अविराम और हमें अहसास तलक नहीं।
जैसे सुंदर लाल बहुगुणा बार-बार कहते हैं कि कृषि केंद्रित भूमि इस्तेमाल के बदले कारपोरेट भूमि उपयोग उपाय मनुष्यता के सर्वनाश का चाक चौबंद इंतजाम है। यह विकास के नाम पर चप्पे चप्पे पर अंधाधुंध निर्माण विनर्माण, यह सर्वग्रासी हीरक चतुर्भुज मनुष्यता, सभ्यता, प्रकृति पर्यावरण मौसम और जलवायु के विरुद्ध है।
रोज इस महानगर कोलकाता के अंतःस्थल से तमाम जलस्रोतों के अपहरण और अनंत माफिया बिल्डर सिंडिकेट राज के तहत जमीन नीचे खिसक रही है।  जलस्तर सूख रहा है। रोज-रोज। पल-छिन पल-छिन। उत्सवों महोत्सवों कार्निवाल के मध्य।
रोज महानगर के सीने में राजमार्ग में जमील धंसने से सारा महामनगर स्तब्ध सा हो रहा है, लेकिन होश किसी को नहीं है।
सियालदह तक फैला मैंग्रोव फारेस्ट अब अभयारण्य में भी कब तक बचा रहेगा, कहना मुश्किल है क्योंकि कोलकाता और उपनगरों की क्या कहें नगरों, गांवो, कस्बों तक में विकास के नाम पर प्रोमोटरी की ऐसी गवर्नेंस है, जहाँ खेती सिरे से खत्म है और जमीन में पेयजल के अलावा किसी को किसी जलाशय, नदी, झील, पोखर की सेहत की कोई फिक्र ही नहीं है। न सेहत की परवाह है, न मनुष्यता की, न प्रकृति और पर्यावरण की।
यह फिक्र भी नहीं कि खरीदे जाने वाला मिनरल वाटर और शीतल पेय भी आखिर किसी न किसी जलस्रोत से निकलना है।
पहाड़ों में तो इंच दर इंच जमीन बेदखल है और कृषि कहीं है ही नहीं।
कारपोरेट कारोबार है।
कारपोरेट धर्म है।
कारपोरेट राजनीति है।
नतीजा फिर वही केदार जलप्रलय है।
नतीजा फिर वहीं भूंकप, बाढ़ और भूस्खलन है।
नतीजा फिर वही ग्लेशियरों का मरुस्थल बन जाना है।
खतरे की बात तो यह है कि ऐसा सिर्फ हिमालय में नहीं हो रहा है।
समुंदरों और बादलों में भी, पाताल में भी घनघोर जलसंकट के आसार है इस कारपोरेट केसरिया दुस्समय में जहाँ धर्म के नाम पर अधर्म ही राष्ट्रीयता का जनविरोधी,  प्रकृति विरोधी, पर्यावरण विरोधीआफसा है, सलवाजुड़ुम है, गृहयुद्ध है, आतंक के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के साथ ग्लोबल हिंदुत्व का महायुद्ध है। जनविरुद्धे कुरुक्षेत्र है।
इसीलिए कमल जोशी जैसे कैमरातोपचियों की जरूरत है। ऐसे माध्यमों की जरुरत है जिनके जरिये हम विचारों, सपनों और विमर्श संवाद का सिलिसिला जारी रख सकें।
यही कमल जोशी होने का मतलब भी है।
हमारे जानेजिगर खासमखास दोस्त कमल जोशी का कैमरा कमाल पेश करते हुए भाई शिरीष अनुनाद ने क्या खूब लिखा हैः
तस्वीर खींचना तकनीकी कुशलता से ज़्यादा एक कलाकार मन का काम है – वह मन अपने जन पहचानता है,  अपनी प्रकृति जानता है,  उसे मालूम है कि दृश्य किस पल में सबसे ज़्यादा अर्थवान होगा – कब उसके आशय चमकेंगे।  मेरे लिए कोई भी कला अपने जन-सरोकारों में निवास करती है,  वही उसका उजाला होते हैं। फोटोग्राफी में बरसों से यह उजाला हमारे आसपास Kamal Joshi के रूप में मौजूद है – जब हम बच्चे थे तब से अब प्रौढ़ेपन की कगार पर खड़े होने तक कमल दा उसी ऊर्जा से हमारे साथ बने हुए हैं – हमें हमारा संसार दिखाते।  2008 मैं मैंने ख़ुद देखा है हिंदी के ज़िद भरे मद भरे अदबी चेहरों के बीच हाथ में कैमरा संभाले एक मनुष्य इस तरह हड़बड़ाता हुआ गुज़रता है कि उस बज़्म में उस क्षण मनुष्यता के नाम पर वही भर दिपता है।
वो जो दुनिया की हर कमीनगी को शर्मिन्दा करता अच्छाई और भोलेपन का महान आख्यान हैं आज भी – दिल उनके लिए सलामो-आदाब से हमेशा भरा है।

About The Author

पलाश विश्वास । लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

सिर्फ विचारों पर पहरा है | सपनों की हत्या सबसे जरूरी है

पलाश विश्वास
गूगल ने फिर मेरा एक एकाउंट डीएक्टीवेट कर दिया है।
मैंने रिइंस्टाल करने का आवेदन किया तो जवाब आया कि चूंकि आपने शर्तों का उल्लंघन किया है और हम ऐसी स्थिति में कभी भी किसी भी एकाउंट को खत्म कर सकते हैं, इस खाते को फिर खोला नहीं जा सकता।
मैंने फिर आवेदन किया कि अगर हमने शर्तों का उल्लंघन किया है तो कृपया आप हमें चेतावनी देते जैसा कानूनन किया जाता है। तब हम नहीं मानते तो आप बाशौक बंद कर देते हमारा खाता। हमारा सरोकार प्रकृति पर्यावरण और मनुष्यता से है। हम पेशेवर पत्रकार हैं कोई स्पैमर हैं नहीं। हम शुरु से गुगल के यूजर हैं और गूगल की महिमा से ही विश्वव्यापी मेरा नेटवर्क  है। और निवेदन किया कि फिर मेरा खाता चालू कर दिया जाये। इसका कोई जवाब नहीं आया।
मजबूरन मुझे कल रात एक और नया खाता खोलना पड़ा है।
ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते कि ऐसा क्यों हो रहा है।
फेसबुक या ट्विटर पर फर्जी एकाउंट के मार्फते जो जबर्दस्त धर्मोन्माद, कारपोरेट ईटेलिंग,  पोर्नोग्राफी और नस्ली दुश्मनी फैलायी जा रहीं है, कानून उस पर कोई अंकुश नहीं लगाता। उसे बल्कि प्रोमोट किया जाता है रसीले अंदाज में। वीडियो बेरोकटोक।
डिजिटल देश के फ्री सेनस्कसी मुक्त बाजार में सार्वजनिक स्थानों पर प्रेम, चुंबन और सहवास के अधिकार, रोटी, कपड़ा, रोजगार, सिंचाई, खाद्य सूचना, स्त्री मुक्ति, बचपन बचाओ, प्रकृति पर्यावरण बचाओ, जल जंगल बचाओ मुद्दों के बजाय खास मुद्दे हैं और मीडिया में उन्हीं की धमक गरज है।
हो न हो, गूगल एक प्लेटफार्म ऐसा है जहाँ विविध भाषाओं में विमर्श का, मुद्दों को संबोधित करने का और सारी दुनिया से संवाद का सबसे बेहतरीन इंतजाम है। 
बाकी भारतीय सर्वरों में तो संवाद का कोई इंतजाम है ही नहीं। याहू में तो अब मेलिंग भी असंभव है।
इसलिए हम गूगल के भरोसे हैं लेकिन उसे चुनिंदे खाते क्लोज करने के जो राजकीय आदेश भारत में कारोबार चलाने के लिए मानने होते हैं, उसके पीछे धर्मांध कारपोरेट वर्चस्ववाद है जो अभिव्यक्ति की आजादी देता नहीं है, छीनने का चाक चौबंद इतंजाम करता है। यही न्यूनतम राजकाज है। 
पोर्नोग्राफी मीडिया पेज का राजस्व है ईटेलिंग है और जो तेजी से जनांदोलन भी बनती जा रही है,मुक्तबाजारी संस्कृति तो वह है ही। अनंत बाजार है और सर्वशक्तिमान बाजार। बाकी सबकुछ नमित्तमात्र है। देश निमित्त है तो सरकारे, राजनीति भी निमित्तमात्र। निमित्तमात्र।
सिर्फ विचारों पर पहरा है।
कोई विचार वाइरल बनकर कारपोरेट राज की सेहत खराब न करें, इसकी फिक्र में सूचना प्रसारण और मानवसंसाधन मंत्रालय हैं, भारत की सरकार है और अमेरिका की सरकार भी है।
सपनों पर पहरा है कि कोई सपना न देखें। सपनों की हत्या सबसे जरूरी है क्योंकि आखिरकार सपनों से भी जनमती है बदलाव की आग। पाश बहुत पहले लिख गये हैं, सबसे खतरनाक है सपनों का मर जाना।
हमारे न विचार हैं और न हमारे सपने हैं और न हमारी कोई स्मृति है और न हमारी कोई मातृभाषा है। हर हाथ में विकास कामसूत्र और हर कोई डिजिटल बायोमेट्रिक रोबोट नियंत्रित नागरिक।
पाठ से शायद हम ज्यादा दिनों तक शब्दों को जिंदा करने का खेल रच नहीं सकते। अब छपे हुए शब्दों से हम पूरी तरह बेदखल हो गये हैं और इलेक्ट्रानिक दुनिया तो बाजार के निमित्त, बाजार के लिॆए, बाजार द्वारा सर्वशक्तिमान सबसे बड़ा मुक्तबाजार है। बाकी जो इंटरनेट है, जो माइक्रोसाप्ट फ्री भी कर रहा है, जनता के पक्ष में उसके इस्तेमाल की इजाजत है नहीं। यही है हमारा डिजिटल देश महान केसरिया। 

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।