सोमवार, 5 मई 2014

बहुत हुआ नारी पे वार कभी न आयेगी मोदी सरकार

संजीव कुमार “अंतिम”
दिल्ली में बीते वर्ष हुए बलात्कार और हत्या का नाम ले लेकर महिलाओं को सम्मान देने की दुहाई देने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी ने कभी अपने खुद के गिरेबान को झांक कर देखने की कोशिश ही नहीं की। गुजरात में वर्ष 2001 में लिंग अनुपात 920 (प्रति 1000) था जो कि 2011 में घटकर 918 हो गया है (सामाजिक आर्थिक समीक्षागुजरात सरकार 2012-13, पृ.स.4)। जबकि इसी दौरान कुल भारत का लिंग अनुपात 933 से बढ़कर 940 हो गया था(20 जुलाई 2013 एशियन ऐज)। गुजरात में 0 से 6 वर्ष के बच्चों में लिंग अनुपात इसी काल के दौरान मामूली तौर पर 883 से बढ़कर 886 हुआ है (सामाजिक आर्थिक समीक्षागुजरात सरकार 2012-13, पृ.स. N-VII )।
गुजरात में भारत के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक कुपोषित महिलाएं हैं। गुजरात में 55 प्रतिशत महिलाएं रक्तहीनता की शिकार हैं (फ्रंट लाइन 23 फरवरी 2013)। गुजरात में वर्ष 1991 से 2001 के दौरान प्रजनन के दौरान माताओं की मृत्यु में 48% की गिरावट दिखी थी जबकि अगले दस वर्षों अर्थात वर्ष 2001 से 2011 के दौरान ये गिरावट मात्र 26% की हुई थी (सामाजिक आर्थिक समीक्षागुजरात सरकार 2012-13, पृ.स. 50)। हाल ही में जारी गुजरात के मानव विकास रिपोर्ट में महिला साक्षरता के मामले में गुजरात को पूरे भारत में 19वां स्थान मिला है। वर्ष 2001 से 2011 के दौरान गुजरात में स्त्री साक्षरता में 3% से भी कम की सुधार देखने को मिली है जबकि इसी दौरान पुरुषों में ये सुधार 7% से भी अधिक दिखी है (20 जुलाई एशियन ऐज)। शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक असमानता गुजरात में राष्ट्रीय औसत से लगभग 20% अधिक है जबकि 11 से 14 वर्ष के आयु वाले बच्चों में ये विभेद राष्ट्रीय औसत से ढाई गुना अधिक है(अतुल सूद तालिका 9.3, पृ.स. 269)।
अगर हम गुजरात में शिक्षा में लैंगिक असमानता के धार्मिक पक्ष को देखें तो पता चलता है कि इस क्षेत्र में गुजरात का मुस्लिम समुदाय हिन्दुओं से कहीं आगे है और यहाँ तक लिंग अनुपात के मामले में भी मुसलमानों की स्थिति हिन्दुओं से बेहतर है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 287-89)।
अब जाहिर है कि जब इस तरह के आंकड़े मोदीजी के पास दिखाए जायेंगे तो या तो वो सर खुजायेंगे या आंकड़े इक्कठा करने वालों को पाकिस्तान, अमेरिका और ना जाने कहाँ कहाँ का एजेंट संबोधित कर उन्हें पाकिस्तान भागने की धमकी दे डालेंगे और भविष्य में सच्चर समिति के जैसे धर्म के आधार पर किसी प्रकार का कोई समिति बनाने पर रोक लगा देंगे। पर क्या मोदीजी कैग पर भी प्रतिबन्ध लगाएँगे?
मनरेगा पर कैग की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात ने मनरेगा को लागू करने में बहुत ही उदासीनता दिखाई है। इस सम्बन्ध में मनरेगा के तहत महिला मजदूरों को फायदा पहुंचाने के सन्दर्भ में गुजरात का प्रदर्शन, राष्ट्रीय प्रदर्शन की तुलना में बिलकुल आधा है। मनरेगा के मजदूरों में उनके द्वारा किये गए कार्यों और मजदूरी के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के मामले में तो गुजरात का प्रदर्शन बिहार और ओड़िसा से भी ख़राब है 2004-05 से 2009-10 के दौरान गुजरात में विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि की दर 9.6% थी जबकि इस क्षेत्र में महिलाओं के लिए रोजगार की दर -22.18% रही) (अतुल सूद, तालिका  8.1)।
वैसे भी मोदीजी तो उस विचारधारा में विश्वास करने वाले शख्स हैं जो महिलाओ को सिर्फ सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उन्हें घर के अन्दर सम्मान का नुमायन्दा बनाकर रहने देना चाहते हैं।
(This article is part of my report on Gujarat’s model of development. I prepared this report for a student forum (Jagriti Natya Manch) which consist students from JNU, DU, IIMC. I am one of the founding members of this forum)
About The Authorसंजीव कुमार, लेखक रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता हैं व छात्रों के मंच “भई भोर” व “जागृति नाट्य मंच” के संस्थापक सदस्य हैं।

आओ, पत्रकार का ई-मेल हैक करें!

क़मर वहीद नक़वी
सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह है कि यह सवाल आज कोई नहीं पूछ रहा है कि अवैध ढंग से एक पत्रकार का ई-मेल किसने और क्यों हैक किया? और कौन जानता है कि गिरोह कितने और पत्रकारों के ई-मेल हैक कर चुका है, कर रहा है और करने की तैयारी में है? ख़ासकर तब, जब गुजरात में एक महिला की अवैध ख़ुफ़िया निगरानी और फ़ोन टैपिंग का मामला सामने आ चुका हो. कौन जाने, गुजरात में ऐसे और कितने मामले हो चुके हों? कौन जाने गुजरात के कितने पत्रकारों के ई-मेल की ऐसे ही अवैध निगरानी और पड़ताल होती हो? और कौन जाने विकास के बहुत-से भोंपुओं के पीछे की असलियत क्या यही तो नहीं है?
गटर गटर खेलो! गटर गटर डूबो! न मेरी शरम, न तेरी शरम! यह लम्पट राजनीति का नया मंत्र है! होड़ है! कौन कितना गहरे गटराता है और कितनी बड़ी गन्दगी बेचता है! इतना गटरीला, इतना ज़हरीला चुनाव पहली बार देखा! और मज़े की बात है कि लोग उम्मीद से हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं!
झूठ बम, ज़हर बाण और गटर मिसाइलें. चुनावी चक्रव्यूह में ऐसे मारक हथियारों का आविष्कार पहली बार हुआ है! क्यों? सोचने वाली बात यही है! जिस चुनाव में विकास को सबसे बड़ा मुद्दा बना कर मौजूदा सरकार पर हमला बोला गया, जिस चुनाव में ‘गुड गवर्नेन्स’ यानी सुशासन के बड़े-बड़े दावे लेकर दिल्ली पर चढ़ाई की गयी, जिस चुनाव में हज़ारों करोड़ रुपये एक नेता की पैकेजिंग पर फूँक दिये गये, उस चुनाव में आख़िर झूठ, ज़हर और गटर का सहारा क्यों लिया जा रहा है, आख़िर क्यों? अगर जवाब जानना ही चाहते हैं तो सोचिए और अपने आप से ही पूछिए!
पप्पू’ और ‘फेंकू’ से जो ‘राजनीतिक विमर्श’ शुरू हुआ था, वह हिन्दू-मुसलिम ध्रुवीकरण से होते हुए अब किसी के विवाह और किसी के प्रेम तक पहुँच गया है! और यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ, ग़लती से नहीं हो गया, बल्कि सोच-समझ कर साज़िशें रच कर किया गया! झूठ के पुलिंदे उछाले गये, फ़र्ज़ी कहानियाँ फैलायी गयीं, किसी की फ़र्ज़ी चिट्ठी बना कर फ़र्ज़ी ख़बरें बनवायी गयीं, फिर किसी इमरान मसूद ने अपने पुराने भड़काऊ भाषण के टेप ख़ुद लीक करा दिये, तो ‘साहेब’ के सबसे चहेते सेनापति हिन्दुओं को ‘अपमान का बदला ले लेने’ के लिए भड़का आये, गाली-गलौज के तीर चले और फिर जैसा कि हर युद्ध में होता हैइस युद्ध में भी अन्ततः महिला को ही तार-तार किया गया!
इन चुनावों का जसोदा बेन से क्या लेना-देना थाकोई बतायेगा भला? और इन चुनावों का किसी महिला पत्रकार के एक विधुर काँग्रेसी नेता से प्रेम सम्बन्धों से भी क्या लेना-देना? ख़ास बात यह कि ये दोनों ही मामले आज के नहीं,कुछ बरस पुराने हैं। मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से जसोदा बेन के मामले को तो गुजरात विधानसभा के पिछले क़रीब-क़रीब हर चुनाव में कुछ लोग उछालने की कोशिशें करते रहे हैं। इक्का-दुक्का जगह यह छपता-छपाता भी रहा, लेकिन न तो कभी किसी ने इस पर ध्यान दिया और न कभी यह कोई चुनावी मुद्दा बना! लेकिन इस बार अब बड़े ज़ोर-शोर से सवाल दाग़े जा रहे हैं कि जो व्यक्ति अपनी पत्नी को न सम्भाल पाया, वह देश को क्या सम्भालेगा? मतलब क्या हुआ इसका? पत्नी को न सम्भाल पाया? मतलब? पत्नी कोई सामान है? सम्पत्ति है? पति मालिक है उसका? पत्नी उसकी जायदाद है? आसानी से समझा जा सकता है कि जो लोग ऐसे सवाल उठा रहे हैं, वह महिलाओं को क्या समझते है और उन्हें लेकर क्या सोच रखते हैं?
मोदी देश सम्भाल पायेंगे या नहीं, उनकी क्षमताओं पर सन्देह करने के लिए बहुत-सी बातें हैं और कही जा सकती हैं। सबसे बड़ी बात यही कि मोदी का करिश्मा रचने के लिए जितने झूठे दावे किये गये, जितनी झूठे क़िस्से गढ़े गये, उन सबकी असलियत सामने आ चुकी है। मोदी जिन बातों का विरोध किया करते थे, जिन बातों की खिल्ली उड़ाया करते थे, आज वह मानते हैं कि वे सारी बातें करना ज़रूरी है। वह मान चुके हैं कि विपक्ष में रहना और बात है और सरकार चलाना और बात है। संघ के एजेंडे को चलायेंगे या नहींइस पर वह ख़ुद जवाब दे चुके हैं कि देश संविधान से चलता है। इसका क्या अर्थ निकाला जाये? यानी संघ का प्रचारक होने के बावजूद क्या अब वह मानते हैं कि संघ का एजेंडा संविधान की भावनाओं के प्रतिकूल है? इन बातों को लेकर सवाल उठाइए और जवाब तलाशिए कि मोदी देश सम्भाल पायेंगे या नहीं, न कि जसोदा बेन से हुई शादी को लेकर, जो किन कारणों से नहीं चल सकी, किसी को नहीं मालूम. और वह कारण किसी को मालूम भी क्यों होने चाहिए, जब तक वह क़ानूनी तौर पर किसी अपराध के दायरे में नहीं आते और जसोदा बेन ख़ुद उसके लिए क़ानून का दरवाज़ा नही खटखटातीं!
इसी तरह एक महिला पत्रकार के प्रेम सम्बन्धों को लेकर चुनावी चटख़ारे लगाने का मतलब? उसकी तसवीरें और ई-मेल पर हुए उसके संवादों को सोशल मीडिया पर बँटवाने और उन पर भद्दी, फूहड़ टिप्पणियाँ करने के पीछे की असली मानसिकता क्या है? जो लोग इस साज़िश के पीछे हैं, वे कौन हैं? उस पत्रकार का ई-मेल किसने हैक किया? ज़ाहिर-सी बात है कि किसी ने पूरी तैयारी से और सोच-समझ कर यह साज़िश रची, ताकि दिग्विजय सिंह के चरित्र-हनन के बहाने काँग्रेस को घेरा जाये। यह षड्यंत्र किसका हैइसका अनुमान तो कोई बच्चा भी लगा सकता है! एक नितान्त निजी मामले को एक राजनीतिक हथकंडा बनाने की यह घिनौनी हरकत यह बताती है कि ऐसे गिरोह की मानसिकता कितनी महिला-विरोधी है?
यही नहीं, सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह है कि यह सवाल आज कोई नहीं पूछ रहा है कि अवैध ढंग से एक पत्रकार का ई-मेल किसने और क्यों हैक किया? और कौन जानता है कि गिरोह कितने और पत्रकारों के ई-मेल हैक कर चुका है, कर रहा है और करने की तैयारी में है? ख़ासकर तब, जब गुजरात में एक महिला की अवैध ख़ुफ़िया निगरानी और फ़ोन टैपिंग का मामला सामने आ चुका हो। कौन जाने, गुजरात में ऐसे और कितने मामले हो चुके हों? कौन जाने गुजरात के कितने पत्रकारों के ई-मेल की ऐसे ही अवैध निगरानी और पड़ताल होती हो? और कौन जाने विकास के बहुत-से भोंपुओं के पीछे की असलियत क्या यही तो नहीं है?
इस चुनाव में नेताओं की भाषा हिंसक हुई, रैलियों, सभाओं और चुनाव-प्रचार में गाली-गलौज आम बात हो गयी, हिन्दू-मुसलिम ध्रुवीकरण को बाक़ायदा योजना बना कर कराया गया, राजनीति घटियापन के निम्नतम स्तर पर जा कर हुई, नेताओं और पार्टियों का महिला-विरोधी पुरुषवादी चरित्र एक बार फिर बेनक़ाब हुआ (और अब महिलाओं को समझ में आ जाना चाहिए कि संसद और विधानसभाओं में उन्हें आरक्षण देने का मामला क्यों इसी तरह अटका रहेगा), राजनीति के कुछ षड्यंत्रकारी गिरोहों की साज़िशें एक के बाद एक सामने आयीं, मीडिया की भूमिका पर लगातार सवाल उठे और अन्ततः अब यह ख़तरा वास्तविक और भयावह नज़र आ रहा है कि पत्रकार किस प्रकार शायद किसी अवैध गिरोह की निगरानी में होंगे। और चुनाव के बाद, अगर ‘अच्छे दिनों’ वाले लोग आ ही गये, तो अनुमान लगा लीजिए कि वे दिन कितने अच्छे होंगे!
About The Author
क़मर वहीद नक़वी। वरिष्ठ पत्रकार व हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के जनक में से एक हैं। हिंदी को गढ़ने में अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सही अर्थों में कहा जाए तो आधुनिक हिंदी को अखबारों ने ही गढ़ा (यह दीगर बात है कि वही अखबार अब हिंदी की चिंदियां बिखेर रहे हैं), और यह भी उतना ही सत्य है कि हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को भाषा की तमीज़ सिखाने का काम क़मर वहीद नक़वी ने किया है। उनका दिया गया वाक्य – यह थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक – निजी टीवी पत्रकारिता का सर्वाधिक पसंदीदा नारा रहा। रविवार, चौथी दुनिया, नवभारत टाइम्स और आज तक जैसे संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे नक़वी साहब इंडिया टीवी में भी संपादकीय निदेशक रहे हैं। नागपुर से प्रकाशित लोकमत समाचार में हर हफ्ते उनका साप्ताहिक कॉलम राग देश प्रकाशित होता है।

कांग्रेस की नीतियों से पैदा हुए गुस्से में मोदी को मसीहा के रूप में पेश कर रहे कारपोरेट घराने- कपूर

दारापुरी के समर्थन में अखिलेन्द्र कल से शुरू करेंगे आमसभाएं

दारापुरी का प्रचार अभियान हुआ तेज, विधानसभाओं में हो रही सभाएं

राबर्ट्सगंज, 04 मई 2014, आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राबर्ट्सगंज लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी पूर्व आईजी एस. आर. दारापुरी के चुनाव प्रचार के लिए कल से आइपीएफ के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह इसी लोकसभा क्षेत्र में कैम्प करेंगे। वह चकिया से आमसभाओं की शुरूवात करेंगे और इसके बाद नौगढ़, धोरावल, ओबरा, दुद्धी और अनपरा में आमसभाओं को सम्बोधित करेंगे। वहीं दारापुरी का चुनाव प्रचार अभियान तेज हो गया है। हर विधानसभा में आइपीएफ प्रत्याशी के समर्थन में आमसभाएं, नुक्कड़ सभाएं और गांव-गांव बैठकें हो रही हैं।
आज राजपुर बाजार में हुई सभा को सम्बोधित करते हुए आइपीएफ के प्रदेश संगठन प्रभारी दिनकर कपूर ने कहा कि मोदी सरकार के सुशासन का मतलब अच्छे दिन अम्बानी, अडानी और टाटा, बिरला के और बुरे दिन आदिवासियों, दलितों और असंगठित मजदूरों के आने वाले है। देश के कारपोरेट घराने कांग्रेस की नीतियों से पैदा हुए गुस्से में मोदी को मसीहा के रूप में पेश कर रहे हैं। जबकि गुजरात के मोदी राज में दो लाख से भी ज्यादा वनाधिकार कानून के तहत दाखिल दावें खारिज कर दिए गए। गुजरात में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है और गर्भवती महिलाओं की सबसे ज्यादा मौतें वहां होती है। उन्होंने कहा कि सपा-बसपा के शासनकाल में प्राकृतिक व औद्योगिक लिहाज से समृद्ध इस जिले को लूट की चारागाह में बदल दिया गया। मायावती जी के राज में जिले में आदिवासियों, दलितों और अन्य वनाश्रित जातियों के 65 हजार में 53 हजार दावे खरिज कर दिये गए जिसके खिलाफ हमारे द्वारा हाईकोर्ट से आदेश कराया बाबजूद इसके अखिलेश सरकार ने इसे लागू नहीं किया। उन्होंने कहा कि जहां बसपा से लेकर अठावले और अन्य दलित नेताओं ने दलित हितों के साथ धोखा किया वहीं पूरे उत्तर भारत में दारापुरी ने डॉ. अम्बेडकर की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए दलित आंदोलन को देश के प्रगतिशील आंदोलन के साथ जोड़ने का काम किया है। इसलिए इस चुनाव में कैमरावाला बटन दबाकर उन्होंने मत देने की अपील की।
सभा को आइपीएफ शहर अध्यक्ष मो0 हनीफ, श्रीकांत सिंह, अनंत बैगा, मनोज भारती, राम दुलारे प्रजापति, विनोद बैगा, रामनारायण भारती, रामेश्वर प्रसाद, परमेश्वर कोल आदि लोगों ने सम्बोधित किया।

कम से कम यूपीए और कांग्रेस से तो देश को मुक्त होने ही दिया जाये !

भाजपा और कांग्रेस से ज्यादा सीटें तो गैर भाजपा और गैर कांग्रेस की होंगी

भाजपा को 200 सीटें भी मिल गईं (!) तब तो समझो वह रिकार्ड तोड़ देगी।

श्रीराम तिवारी

 अधिकांश राजनैतिक विश्लेषकों का अभिमत है कि 16 मई को जो परिणाम आयेंगे उसमें भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना तय है। लेकिन यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि भाजपा अकेले ही 276  सीटें तो कतई नहीं जीत पाएगी। भाजपा को 200 सीटें भी मिल गईं तब तो समझो वह रिकार्ड तोड़ देगी। फिर भी एनडीए की सरकार बनाने के लिये उसे 72 सांसद और चाहिए। अभी तो तमाम संभावनाओं के बावजूद स्वयं मोदीजी भी आश्वस्त नहीं हैं कि उनका पथ निरापद है, तभी तो दो-दो जगहों से लड़ रहे हैं।

 कांग्रेस का भी पाटिया उलाल तय है। 100 सीटों के आसपास सीमित होना तय है। ये भी अनुमान है कि  बाकी 250 सीटें-सपा, बसपा, जदयू, राजद, तृणमूल, नवीन, जयललिता तथा वाम दलों की होंगी। यानी भाजपा  और कांग्रेस से ज्यादा सीटें तो गैर भाजपा और गैर कांग्रेस की होंगी। चूँकि जनादेश यूपीए के खिलाफ आने वाला है इसलिए भाजपा नीत एनडीए बेसब्री से सत्ता की प्रतीक्षा में हैं, उसके नेता नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत परफार्मेंस भी अन्य दलों ओर नेताओं से कुछ ज्यादा ही रेखांकित किया गया है। हालाँकि उन पर लगे आरोपों का जबाब भी देश और दुनिया को अब तक तो नहीं मिला है किन्तु फिर भी वे पूरी शिद्दत से पीएम इन वेटिंग तो  हैं  ही। अतएव बहुत सम्भव है की 72 सीटें भी वे अवश्य ही जुगाड़ लेंगे। तब केबल वाम मोर्चा ही है  जिसने कभी भी कहीं भी मोदी और संघ परिवार को घास नहीं डाली। किन्तु जब वाम के बिना ही भाजपा नीत -एनडीए ने 1999 से 2004 तक सरकार बनाकर दिखा ही दिया है। ये तो हो नहीं सकता कि सारे के सारे दल तो कभी यूपीए और कभी एनडीए के साथ हो लेंसत्ता सुख भोगें तथा जब फासीवाद, पूँजीवाद और साम्प्रदायिकता से लड़ने का सवाल आये तो केवल वामपंथ ही संघर्ष के मैदान में अकेला लड़ता हुआ नजर आये !  क्या सत्ता की कुर्बानी का ठेका  केवल वामपंथ ने ले रखा है ?  बनारस में नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा हो जाने से केजरीवाल और अमेठी में राहुल के खिलाफ कुमार विश्वाश के चुनाव लड़ने मात्र से ‘आप’ का स्टैंड  कांग्रेस और भाजपा से पृथक् नहीं कहा जा सकता। ‘आप’   के नेता या कार्यकर्ता भ्रष्टाचार से लड़ने की बात तो  खूब करते हैं किन्तु भ्रष्ट मुख्तार अंसारी का समर्थन पाने के लिए बड़े उतावले रहते हैं।

स्वाभाविक है कि एनडीए या मोदी को वामपंथ का सहयोग तो नहीं मिलेगा। लेकिन मोदी यदि ममता का समर्थन नहीं लेते और फिर भी सत्ता सीन हो जाते हैं तब ‘वामपंथ’ को क्या स्टेण्ड लेना चाहिए ? क्या एनडीए के साथ किसी तरह के पुनर्विचार या कामन मिनिमम प्रोग्राम की फिर भी कोई गुंजाइश नहीं है ? क्या यह सच नहीं की भाजपा के भीतर अभी तक नरेन्द्र मोदी एकमात्र नेता हैं जिन्होंने देश के तमाम उन दलों और नेताओं को धो डाला है जिन्होंने एनडीए या मोदी का बहिष्कार कर रखा है। मोदी ने केवल वामपंथ के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने त्रिपुरा में भी सीपीएम की सरकार के खिलाफ कुछ नहीं कहा। वे कुछ-कुछ अटल जी की तरह ही वामपंथ का लिहाज करते प्रतीत हो रहे हैं। इसके उलट वामपंथ की कतारों में ‘नमो’ हमेशा सर्वथा त्याज्य और निंदनीय रहे हैं। वैसे भी वामपंथ के द्वारा कांग्रेस और भाजपा को एक समान निशाने पर लेने की नीति के वाबजूद कांग्रेस और यूपीए को वाम की ओर से सदाशयता मिलती ही रही है। जबकि एनडीए, भाजपा और मोदी केवल ‘महाछूत’ ही रहे हैं। इन्हीं कारणों से देश में कई जगहों पर वाम कार्यकर्ता या तो निष्क्रिय हो चले हैं या ‘आप’ के साथ हो लिये हैं।

इन हालात में जबकि माया, ममता, जय ललिता जैसी स्वयंभू नेत्रियां देश की नहीं अपने अहम की चिंता में ‘दुबली’ हो रही हों, देवेगौड़ा, नीतीश, मुलायम कालातीत होने जा रहे हों, नवीन पटनायक, चन्द्र बाबू नायडू और अगप ने एनडीए का हाथ थाम लिया हो तब ‘वामपंथ ‘ को क्या स्टेण्ड लेना चाहिए ?  वाम मोर्चे के द्वारा 2004 में जब यूपीए- प्रथम को बाहर से ‘मुद्दों पर आधारित’ समर्थन दिया जा सकता है और वक्त आने पर 2008 में [1, 2, 3 एटमी करार पर असहमति स्वरूप] वापिस भी लिया जा सकता है तो 2014 में एनडीए को बाहर से समर्थन क्यों नहीं दिया सकता ? यदि भाजपा 200 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आती है तो स्वाभाविक है कि अन्य क्षेत्रीय दल भी उसके साथ जुड़ेंगे ही। तब तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने का प्रयास  केवल एक औपचारिक राजनैतिक रस्म अदायगी ही रह जायेगी। बेशक भारत में केवल वामपंथ ही है जो जनआकांक्षी, न्याय आधारित, शोषण मुक्त समाज व्यवस्था के लिए सर्वजनहितकरी नीतियों पर अडिग रहा है, उसके संसदीय प्रजातंत्र के हस्तक्षेप की डगर में कुछ खुशनुमा दौर आये हैं तो मैदानी जन संघर्षों में भी मेहनत कशों  ने खून पसीना एक किया है। वामपंथ कोइ छुई -मुई नहीं कि कोई मोदी छू ले, कोई भाजपा छू ले,या ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ पर आधारित एनडीए छू ले तो वो कुम्हला जायेगा। बेशक जब एक बार यूपीए-प्रथम को समर्थन देकर वामपंथ ने डॉ मनमोहन सिंह के उदार पूंजीवाद से ‘मनरेगा,आर टी आई और कमजोरों -दलितों आदिवासियों के हितार्थ अनेक सार्थक  फैसले लागु करवाये हैं तो एनडीए के उग्र पूँजीवाद से नाउम्मीद क्यों ?जहां तक संघ पोषित बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का सवाल है वो तो देश की जनता के जनादेश से ही परिभाषित हो जाएगा। यदि यूपीए के कुकर्मो से एनडीए की साम्प्रदायिकता बड़ी है तो उस पर देश को समवेत फैसला लेना चाहिए। कुर्बानी का, देशभक्ति का और धर्मनिरपेक्षता का ठेका क्या अकेले वामपंथ ने ले रखा है ? क्या वामपंथ ने ओमान चांडी या ममता से कुछ कम धर्मनिरपेक्षता का आचरण किया था ? जो  केरल और  बंगाल में हार का मुँह  देखना पड़ा ? क्या संसदीय प्रजातंत्र में आदर्शों की बलिबेदी केवल भारत के उस संगठित पक्ष के लिए ही बनी है? मेहनतकश जनता के हरावल दस्तों का यूं ही चूक पर चूक करते हुए अप्रसांगिक होते जाना क्या साबित करता है? कौन सा वर्ग संघर्ष होने जा रहा है?

किसी भी पक्ष की ओर से मोदी का व्यक्तिगत अंध विरोध उन पर अनैतिक आचरण के आरोप किसी भी तरह से जायज नहीं है। उनकी नीतियों पर असहमति हो सकती है, उनसे बेहतर नेता भी भारत में ढेरों हो सकते हैं,  यह भी जाहिर है कि मोदी की नीतियां- कार्यक्रम व सोच भी उतनी वैज्ञानिक और प्रेक्टिकल नहीं है जितनी की वे बताते हुये नहीं थक रहे हैं। बेशक जिस तरह मुंबई, कोलकाता नहीं हो सकता,जिस तरह जयपुर, झुमरी तलैया नहीं हो सकता और जिस तरह जापान फिलिस्तीन नहीं हो सकता उसी तरह समग्र भारत गुजरात नहीं हो सकता। लेकिन सकारात्मक सोच और तरक्की के सपने देखने वाले मोदी कम से कम उस धूर्त-स्वार्थी, लालची मजदूर विरोधी ममता से तो बेहतर ही हैं जो सत्ता लिप्सा के लिए नक्सलवादियों, माओवादियों से लेकर बांग्लादेशी घुसपैठियों ओर घोर वाम विरोधी कठमुल्लाओं की गोद में जा बैठी है।

जो लोग कांग्रेस और भाजपा को भारत के विकास, सुरक्षा और समृद्धि के लिए रोड़ा मानते हैं, मैं उनसे सहमत हूँ जो लोग भाजपा और संघ परिवार में ‘फासिज्म’ के बीज देखते हैं। मैं उनसे भी सहमत हूँ जो लोग कांग्रेस को राजनीति की भ्रष्ट ‘गन्दलाई’ हुई असहनीय गटर गंगा समझते हैं। मैं उनसे भी कुछ-कुछ सहमत हूँ। लेकिन जो लोग पूरी की पूरी कांग्रेस और पूरी की पूरी भाजपा को ‘अधम-अपावन’ समझते हैं मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। मेरा मन्तव्य यह है कि जब कांग्रेस में, भाजपा में वामपंथ या अन्य राजनैतिक दलों में कोई व्यक्ति गलत बात कहता है तो उसका विरोध स्वाभाविक और जायज है किन्तु जब वह व्यक्ति राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सही और देश हित की बात करता है तो उसका स्वागत भी किया जाना चाहिए।

गुजरात के मुख्य मंत्री और भाजपा के ‘पी एम् इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी बंगाल में जाकर ममता की वास्तविकता जनता के सामने रखते हैं, उसकी पोल’ खोलते हैं, सत्ता में आने पर बँगलादेश के घुसपैठियों को भारत से निकाल बाहर करने की बात करते हैं और ममता को कठघरे में खड़ा करते हैं तो वे केवल भाजपा का ही हित देखते हुए नहीं लगते। बल्कि वे भारत की सुरक्षा और ममता की राष्ट्र विरोधी असल तस्वीर भी पेश कर रहे होते हैं। ममता ओर मोदी दोनों मेरे पसंदीदा नेता नहीं हैं। किन्तु इस प्रसंग में मोदी को मैं ममता से बेहतर मानने को बाध्य हूँ क्योंकि ममता ने केवल वोट की गन्दी राजनीति के लिए और वामपंथ की वापिसी रोकने के लिए बंगाल में तो मोदी का विरोध कर रखा है जबकि राजनीतिक क्षितिज पर उसकी नजरें एनडीए और  भाजपा से  मिली हुई हैं। उसके प्रवक्ता ‘डेरेक ओ ब्राइन का बयान उसी गुप्त कड़ी का एक हिस्सा है। श्री रामपुर [बंगाल] की आम सभा में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ममता को सराहते हैं, उन्हें वामपंथ और कांग्रेस से लड़ने और भाजपा से प्यार की पींगे बढ़ाने को फुसलाते हैं तो मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि राजनाथसिंह झूठे और कपटी हैं। जबकि नरेंद्र मोदी उनसे कहीं ज्यादा साफ़गोई के प्रतीक हैं। उन्हें वाम की ओर  से समर्थन न सही लेकिन जनता का बहुमत यदि मिलता है तो कम से कम यूपीए और कांग्रेस से तो देश को मुक्त होने ही दिया जाये !

About The Author- श्रीराम तिवारी, लेखक जनवादी कवि और चिन्तक हैं. जनता के सवालों पर धारदार लेखन करते हैं

मिडिया के चरित्र पर उठते गंभीर सवाल

2014-03-12 09:58 PM को रवि नाईक उवाच पर प्रकाशित

मिडिया के चरित्र पर उठते  सवालो का जवाब भी उस जनता को जानने का अधिकार है जो चेनलो की टीआरपी और प्रिंट मिडिया के पाठको की संख्या बढ़ाती  है |


 अपनी हर रिपोर्ट में दुसरो परसवाल  उठाने वाला मिडिया आज खुद  सवालो के घेरे में है आम जनता मिडिया कि भूमिका पर सवाल करने लगी है वैसे तो हमेशा से ही मिडिया पर सवाल उठते रहे है लेकिन हाल के कुछ वर्षो  में इनमे तेजी आई है , अब सवाल यह उठता है की आखिर मिडिया की निष्पक्षता संदेह के घेरे में क्यों है जब तक एक पत्रकार प्रोफेशनल रूप से

पत्रकारिता करता तब तक उसकी रिपोर्टिंग धारदार होती है लेकिन अक्सर देखा गया है की  तेज तर्राट पत्रकार धीरे धीरे राजनीती की और कदम बड़ा देते है और यही से मिडिया की निष्पक्षता समाप्त होने लगती है देश में कई ऐसे उधाहरण है जिन्होंने ने पत्रकारिता से करियर प्रारंभ  किया और बाद में विधायक सांसद यहातक की मंत्री भी बने पत्रकारो  की इस धरा ने मिडिया को बदनाम भी किया हालाँकि आज भी हमारे देश में मिडिया को बहुत स्वतंत्रता है और बड़ी संख्या में रिपोर्टर  से लगाकर    संपादक तक ईमानदारी से अपन काम कर रहे है जैसा की कहा जाता है एक मछली सरे तलब को गन्दा करती है वैसे ही कुछ महत्वकांशी पत्रकार प्रेस को बदनाम कर देते है सोशल मिडिया पर वायरल हो चुके  पुण्यप्रसून और अरविन्द की बातचीत  ने  इस बहस को  हवा दे दी है | स्व्तंत्र प्रेस किसी भी राष्ट्र के लिए आवस्यक है लेकिन प्रेस में गड़बड़ी उतनी ही घटक साबित हो सकती है इसलिए मिडिया के चरित्र पर उध रहे सवालो का जवाब भी उस जनता को जानने का अधिकार है जो चेनलो की टीआरपी और प्रिंट मिडिया के पाठको की संख्या बढ़ाती  है |

ताजा  मामला आज तक चेनल के एंकर पुण्यप्रसून  वाजपेयी और आम आदमी के नेता अरविन्द केजरीवाल के बिच हुई बातचीत का है इस एक मिनिट की बात चित के विडियो ने सोशल मिडिया  के माध्यम से फिर एक बार मिडिया की विश्वसनीयता को चुनौती दी  है .

पुष्पेंद्र आल्बे

लेखक/रचनाकार: पुष्पेंद्र आल्बे

मोबाइल: 098269 10022 पढ़ाई में अव्वल, खूब कीर्तिमान बनाएं, तोड़े, रसायन शास्त्र से स्नातकोत्तर भी किया, लेकिन युवावस्था में कदम रखने के साथ ही लग गया कि ग्यारह से पांच की सरकारी नौकरी करना अपने बस की बात नहीं। श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के बचपन से ही प्रषंसक, सो क्रिकेट के ऊपर लिखना हमेषा ही दिल को भाया। क्रिकेट के साथ ही बॉलीवुड के क्लासिक दिग्गजों-संजीव कुमार, गुलजार साहब जैसो की फिल्में देख-देखकर इसकी भी समझ आ गई। दैनिक जागरण से टेªनी रिपोर्टर के तौर पर काम शुरू किया, फिर गृहनगर छोड़कर मप्र की व्यावसायिक राजधानी इन्दौर में किस्मत आजमाने आ गए। प्रिंट मीडिया से अलग हटकर कुछ करने की चाह हुई, तो खबर इंडिया की नींव रखी। कुछ ही समय में खबर इंडिया इंटरनेट बिरादरी की कुछेक चुनिंदा पोर्टलों में शामिल हो गई है....लेकिन यह तो बस शुरूआत भर है....अभी आगे बहूत दूर जाना है....

इस काली कैद से इनकी मुक्ति सबसे जरूरी


तस्वीर कम अच्छी इसलिए आई कि मैं महिला,
उसके साथी पुरुष की शक्ल नहीं दिखाना चाहता था
इस बार के चुनावों में धारा 370, समान नागरिक संहिता पर भी खूब बात हुई है। बात क्या हुई है। बहस हुई है वो भी कुछ इस अंदाज में कि तुम करोगे तो देख लेना कि क्या होता है। मैं कल बिग बाजार में बिलिंग काउंटर की लाइन में था। मेरे बगल के बिलिंग काउंटर की लाइन में एक मुस्लिम परिवार था। परिवार की चार-पांच महिलाएं थीं। वो सब अलग से इसलिए भी दिख रहीं थीं कि ऊपर से नीचे तक वो काले कपड़े में ढंकी हुईं थीं। एयरकंडीशंड रिटेल दुकान होने के बावजूद जितने लोग एक समय में वहां खरीदारी के लिए थे। उसकी वजह से जगह में पूरी गर्मी थी। लेकिन, वो महिलाएं पूरी तरह खुद को दूसरों से पूरी तरह सुरक्षित किए हुए थीं। कमाल की बात ये कि उसी मुस्लिम परिवार का जो पुरुष सदस्य था। वो बढ़िया जींस, टीशर्ट में था। ठीक है जिन मुस्लिम परिवारों के पुरुष अभी भी पुराने विचारों के हैं। लंबी दाढ़ी बढ़ाकर रहते हैं धार्मिक रिवाज का हिस्सा मानकर कई अव्यवहारिक काम भी करते हैं तो उनसे मुझे शिकायत कम होती है। लेकिन, ऐसे मुस्लिम नौजवान जो खुद तो अति आधुनिक परिधानों में जीवन का आनंद ले रहे हैं उनका अपने परिवार की महिलाओं के प्रति ऐसा व्यवहार दुखद है। समान नागरिक संहिता वगैरह तो बाद में पहले इन मुस्लिम महिलाओं को अपने ही परिवार के मुस्लिम पुरुषों के बराबर कपड़े पहनने का अधिकार मिले।

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

क्षमा मित्रों… मैंने “नोटा” दबाया

अभिरंजन कुमार
सस्ती, फूहड़, सतही, घटिया, घिनौनी, वंशवादी, जातिवादी, सांप्रदायिक, ध्रुवीकरण वाली, समाज को बांटने वाली, गुमराह करने वाली, मुद्दों से भटकाने वाली, धनबल और बाहुबल के असर वाली, दोगली, भ्रष्ट, प्रतिगामी राजनीति के विरोध में मैंने “नोटा” दबाया।
इस चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल और उम्मीदवार ने मुझे प्रभावित नहीं किया। मुझे बेहद दुख और अफ़सोस के साथ दर्ज कराना पड़ रहा है कि इस चुनाव में राजनीति मुझे बीमार, कुंठित, अवसादग्रस्त और अब तक के निम्नतम स्तर पर दिखी। ज़्यादातर नेताओं के बारे में मेरी राय यह बनी कि उन्हें संसद में नहीं, बल्कि जनता के ख़र्च पर किसी अच्छे सर्वसुविधा-संपन्न उच्च टेक्नोलॉजी-युक्त अस्पताल में भेजा जाना चाहिए।
मैंने “नोटा” दबाया… देश के तमाम राजनीतिक दलोंनेताओं और उम्मीदवारों की उपरोक्त किस्म की राजनीति के ख़िलाफ़ अपना विरोध जताने के लिए।
मैंने “नोटा” दबाया… भारत के सुप्रीम कोर्ट के प्रति अपना सम्मान जताने के लिए, जिसने पिछले कुछ समय में अपनी छोटी-छोटी कोशिशों के ज़रिए ही सही, राजनीति को साफ़ करने की देश की जनता की बेचैनी को प्रतीकात्मक शक्ल देने की कोशिश की है।
मैंने “नोटा” दबाया… उन छोटे-छोटे आंदोलनों को अपनी “श्रद्धांजलि” देने के लिएजो चंद महत्वाकांक्षीस्वार्थलोलुपधोखेबाज़नौटंकीबाज़ लोगों की वजह से रास्ता भटककर अकाल-मृत्यु को शिकार हो गए।
और सबसे बड़ी बात यह कि मैंने “नोटा” दबाया… यह दर्ज कराने के लिए कि मुझे अपने बेगूसराय में, अपने बिहार में, अपने देश में… बेहतर राजनीति, बेहतर उम्मीदवार और बेहतर माहौल चाहिए। किसी ग़लत को चुनने और ग़लत किस्म की राजनीति को आगे बढ़ाने में कम से कम मैं भागीदार नहीं बन सकता, इसलिए मैंने “नोटा” दबाया।
जय बेगूसराय। जय बिहार। जय भारत।
जय हिन्दू। जय मुसलमान। जय सिख। जय ईसाई।
जय बहन। जय भाई।
जय बच्चे। जय बूढ़े। जय नौजवान।
जय अगड़े। जय पिछड़े। जय दलित। जय आदिवासी। जय मज़दूर। जय किसान।
जब सभी की जय होगी
तभी विजयी होगा हमारा हिन्दुस्तान।
About The Authorअभिरंजन कुमारलेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं, आर्यन टीवी में कार्यकारी संपादक रहे हैं।