सोमवार, 7 अप्रैल 2014

रुकी हुई अयोध्या और मीडिया

बेशक पिछले कुछ दिनों में अयोध्या के फैसले का इंतज़ार कर रहे मीडिया ने एक संयम दिखाया है. इस दौरान जब भी इस फैसले की कोई ख़बर आई तो अख़बार और चैनलों में यह सचेत कोशिश दिखी की उनकी ख़बर अतिरिक्त उत्तेजना पैदा न करे. किताब के लेख ‘रुकी हुई अयोध्या और मीडिया’ नाम के शीर्षक में लेखक की यह टिप्पणी पहली नज़र में इस संवेदनशील मुद्दे पर मीडिया की भूमिका की सराहना करते हुए दिखता है, लेकिन जैसे ही आगे लेखक कहता है कि दोनों (राजनीति और मीडिया) को शायद यह मजबूरी का अहसास है कि उनका भारतीय समाज पुरानी मध्यवर्गीय चिंताओं से आगे जाकर भूमंडलीकरण के उपभोक्तावादी रुझानों का ज़्यादा मुरीद है. उसे फालतू का तनाव नहीं चाहिए-वह मंदिर मस्जिद से जुड़ा हो या फिर किसी और आंदोलन से. साफ़ हो जाता है कि लेखक में क्या हो रहा है, जानने के अलावा क्यों हो रहा है, यह जानने और समझने की न केवल क्षमता, बल्कि उत्सुकता भी है. इसी किताब के दूसरे लेख फिर हार गया मीडिया में चुनावों के दौरान अख़बारों और चैनलों में ज़ल्दबाज़ी में होने वाली भविष्यवाणियों पर न केवल चोट की है, बल्कि यह भी बताने की कोशिश की है कि आख़िर चूक कहां होती है. इसी लेख में दर्ज यह टिप्पणी ख़बर पहले कमज़ो आदमी की आवाज़ होती थी अब मजबूत आदमी का बयान बन गई है. इस चूक के कारणों को तलाशने और इसे ठीक करने के लिए की गई कोशिश को दर्शाती है. आगे जितना बढ़ा ढोल उतनी बढ़ी पोल लेख में चुनावी भविष्यवाणियों से उलट 2004 और 2009 में आए चुनावी नतीज़ों का हवाला देते हुए 1984 में राजीव गांधी को मिले भारी जनादेश के बाद राजस्थान पत्रिका द्वारा माफी मांगने की बात भी दर्ज की है, क्योंकि पत्रिका ने इसके उलट जनादेश न मिलने की बात कही थी. इस बात को दर्ज करके बेहद शालीन और तथ्यपरक ढंग से लेखक ने मीडिया में लोगों में शालीनता लाने की सलाह भी दे डाली है. मराठी की तलवार, हिंदी की ढाल नाम के शीर्षक से लिखे गए लेख में राज ठाकरे और अबू आज़मी के बीच मराठी बनाम हिंदी को लेकर उठे विवाद का जिक्र इस सवाल के साथ किया है कि क्या यह मराठी बनाम हिंदी विवाद था या फिर दो नेताओं के अतिवादी रुख़ और तेवर थे, इस लेख के जरिए मीडिया द्वारा ख़बरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की प्रवृत्ति को भी उजागर किया है. इसके अगले ही लेख हिंदी पत्रकारिता में जड़ जमा चुके अनुवाद धर्म के बारे भी चर्चा की है. हिंदी भाषा के पक्ष में दलीलें देने से कई कदम आगे इस लेख में यह बताया गया है कि भाषाओं के लेन-देन को ग़लत न ठहराते हुए बस यह बताने की कोशिश की गई है कि हर भाषा की अपनी प्रकृति होती है. शब्द दूसरी भाषा के भले हों, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने से पहले उसे अपनी भाषा में ढालना ज़रूरी है. पर इन दिनों अंग्रेजी के शब्दों को ज्यों का त्यों हिंदी भाषा के बीच पैबंद लगाकर ज्यों का त्यों परोसा जा रहा है. जो कि चिंताजनक है. कहां चलीं गईं महिलाएं नाम के शीर्षक से लिखे गए लेख में जहां एक तरफ तथाकथित प्रगतिवादी समझे जाने वाले मीडिया के भीतर भी महिलाओं को दिखावटी गुड़िया का दर्जा दिए जाने जैसे चिंताजनक रवैए की तरफ भी ध्यान खींचा है. मीडिया के बदलते सरोकारों और चौतरफा हो रही आलोचना के बीच भी किताब में शामिल लेख संतुलन बनाते दिखते हैं. पहले ही लेख-सावधान, उनके हाथ में नश्तर नहीं, खंजर है में लेखक ने मार्कंडेय काटजू की मीडिया के रवैये पर की गई आलोचनात्मक टिप्पणी को सही ठहराते हुए यह भी बताया की दरअसल मीडिया के रवैये में सुधार लाने के लिए क़ानूनी चाबुक चलाने से ज़्यादा उसके समाजशास्त्रीय संदर्भ को समझने की ज़रूरत है. लेखक काटजू की टिपप्णी की गंभीरता और उनकी चिंता से तो इत्तेफाक़ रखता है, लेकिन बिना लाग लपेट यह भी जानकारी दे देते हैं कि मीडिया में पहले पूरी तरह बेलगाम नहीं है. बल्कि पहले कढ़े क़ानून जैसे मानहानि से लेकर अपशब्द कहने के ख़िलाफ़ और अश्‍लीलता विरोधी कई क़ानून बने हैं. सरकारी गोपनीयता क़ानून भी इसी मीडिया पर नियंत्रण का एक एक हिस्सा है. साथ ही यह भी बताते हैं कि मीडिया के बदलते चरित्र के कारण क्या हैं और कैसे इसे रोका जा सकता है. पत्रकारिता पर लिखी गई यह पुस्तक लेखक प्रियदर्शन की दृष्टि के कई आयाम खोलती है. - See more at: http://www.chauthiduniya.com/2014/03/ruki-hui-ayodhya-or-media.html#sthash.Vq3stjst.dpuf

खुफिया एजेंसियों ने विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर भारतीय लोकतंत्र का अपहरण कर लिया

  • खुफिया एजेंसियों की संसद के प्रति तय हो जवाबदेही- रिहाई मंच
  • रिहाई मंच ने जारी किया 2014 लोकसभा चुनाव माँग पत्र
  • कानून निर्माण व संविधान संशोधन के बगैर कमजोरों के अधिकारों को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता
  • माँग पत्र के जरिए रिहाई मंच अवाम को करेगा जागरूक
लखनऊ 24 मार्च 2014। 2014 लोकसभा चुनावों के मद्देनजर रिहाई मंच कार्यकारी समिति ने खुफिया एजेंसियों की संसद के प्रति जवाब देही को अपना केन्द्रीय मुद्दा बनाते हुये सभी राजनीतिक दलों को संबोधित पच्चीस सूत्रीय माँग व सुझाव पत्र जारी किया है।
माँग पत्र जारी करते हुये रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि समाज के बड़े हिस्से की समस्याओं का निदान कानून निर्माण व संविधान में संशोधन किए बिना संभव नहीं है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह मजबूत तबकों के पक्ष में खड़ी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का मतलब हर पांच साल पर सिर्फ चुनाव कराना नहीं बल्कि समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के उत्थान और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। जिसमें हमारी संसद और सरकारें पूरी तरह विफल साबित हुयीं हैं। रिहाई मंच का मानना है कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिये जरूरी है कि जनता के सर्वोच्च सदन संसद जनता के प्रति अपनी खोती हुई निष्ठा को पुर्नबहाल करे तथा खुफिया एजेंसियों को संसद के प्रति जवाहदेह बनाया जाये ताकि गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जनता के एक बड़े हिस्से का मानवाधिकार हनन रोका जा सके।
नागरिक परिषद के रामकृष्ण ने कहा कि खुफिया एजेंसियों ने विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर भारतीय लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की जाँच के लिये गठित जैन कमीशन की रिपोर्ट में जिस मोसाद, सीआईए तथा भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी व रॉ के कुछ अधिकारियों की संलिप्तता उजागर हो चुकी है, उन बाहरी एजेंसियों से अपने संबन्ध तोड़ने व भारतीय एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाने के बजाय उन्हें बेलगाम छोड़ दिया जाना हमारी राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के लिये खतरा बन गया है।
सामाजिक संगठन अवामी काउंसिल के महासचिव असद हयात ने कहा कि सामाजिक संगठन सिर्फ माँगों को राजनीतिक दलों के समक्ष रख सकते हैं परन्तु उन विषयों पर कानून बनाने का काम राजनीतिक दलों को ही करना होता है। आतंकी घटनाओं में निर्दोषों को फँसाए जाने के मामले हों अथवा सांप्रदायिक हिंसा के मामले हों, दोनों में ही मुसलमानों को लक्ष्य बना कर हिंसा की जा रही है। जो लोग निर्दोषों को झूठी गवाही और आरोप पत्र तैयार करके फँसा रहे हैं वह भी सांप्रदायिकता है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि इन मामलों में सरकारी अधिकारी और एजेंसियां सांप्रदायिक भावना से कार्य कर रही हैं जबकि दंगों के मामलों में यह कार्य सांप्रदायिक संगठन और दल करते हैं और इन दोनों को ही रोकने के लिये सांप्रदायिक हिंसा निरोधक बिल जैसा सशक्त कानून जो संविधान में परिकल्पित संघीय ढाँचे के तहत हो, को लागू किया जाये।
सामाजिक न्याय मंच के अध्यक्ष राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि आज जिस तरह से पूरे देश में चुनाव के माहौल में आतंकी सांजिशों के खतरे को मीडिया बता रही है और लगातार मुस्लिम युवकों को उठाया जा रहा है। ठीक ऐसे ही 2002 गुजरात चुनावों के दौरान भी हुआ था, कि मोदी को मारने के नाम पर मुस्लिमों को मुठभेड़ों के नाम पर मारा गया। आज हकीकत सबके सामने है कि जो मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर मारे गये उनकी हत्या के जुर्म में दर्जनों आईपीएस जेल की सीखचों के पीछे हैं। ऐसे में आज जो आईबी और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी मोदी को मारने के षडयंत्र के नाम पर मुस्लिमों को निशाना बनाए हुये हैं उन्हें जेल में सड़ रहे वंजारा, नरेन्दर अमीन जैसे लोगों से सबक लेना चाहिए।
रिहाई मंच कार्यकारिणी सदस्य अनिल आजमी, मोहम्मद आरिफ और हरे राम मिश्र ने कहा कि लोकसभा चुनावों के मद्देनजर इस माँग पत्र में सुझाव भी दिए गये हैं। हम सभी राजनीतिक दलों से अपेक्षा करते हैं कि वो इस पर गंभीरता से विचार करेंगे। इस माँग पत्र को लेकर हम जनता के बीच में भी अभियान चलाएंगे जिससे जनता चुनावों में इन मुद्दों पर प्रत्याशियों से सवाल पूछ सके।
रिहाई मंच द्वारा जारी माँग पत्र के अयोजन में, केके शुक्ल, रफीक सुल्तान, मो0 फहीम सिद्दीकी, एहसानुल हक मलिक, फैजान मुसन्ना, जैद अहमद फारुकी, शिव नारायण कुशवाहा, रियाज अल्वी, शान ए इलाही, एएम सिद्दीकी, एसएम वरी, फरीद खान, इरफान शेख, वासिफ शेख, अजीजुल हसन, केके शुक्ला, शहजाद अहमद, शिब्ली बेग समेत बड़ी संख्या में लोग शामिल रहे।

सोलहवीं लोकसभा चुनाव हेतु रिहाई मंच का राजनीतिक दलों को मांग पत्र व सुझाव

प्रति,
राष्ट्रीय अध्यक्ष/महासचिव
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प्रिय अध्यक्ष जी/महासचिव जी,
हमारे देश में कई धर्मों, जातियों, समुदायों के लोग रहते आ रहे हैं। मुल्क तभी नहीं बंटता है जब उसके दो तीन नाम हो जाएं। हम पिछले साठ सालों से देख रहे हैं कि हमारे बीच भाई चारे में कमी आई है। एक दूसरे के दुश्मन के रूप में धर्म और जातियों के लोग समझे जाने लगे हैं। नीचा दिखाने और दबाकर रखने की विचारधारा को धर्म और जाति के बहाने बढ़ाया जा रहा है। दूसरी भाषा में, इस बात को इस तरह कह सकते हैं कि हमने विभिन्न समुदायों एवं वर्गो की सामाजिक एंव राजनीतिक समस्याओं का राष्ट्रीय अखण्डता, लोकतंत्र के भविष्य और सामाजिक समरसता पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन अध्ययन किया। हमने पाया कि देश के कई भागों में होने वाले साम्प्रदायिक दंगों में प्रशासन की भूमिका और सरकारों की संवेदनहीनता के कारण निराशा और आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। साम्प्रदायिक तत्वों के हौसले बढ़े हैं। साम्प्रदायिक हिंसा में लगातार बढ़ोत्तरी इसके प्रमाण हैं। आतंकवाद, देश के खिलाफ युद्व, गैर कानूनी गतिविधियों में संलिप्तता आदि के नाम पर बेगुनाह नौजवानों  को जेल में डाला गया है। खासतौर से, वंचित वर्गों के नौजवानों को निशाना बनाया गया है। मुसलमान युवकों का तो कई वर्षों से मनोबल तोड़ने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं। कई बड़ी आतंकवादी घटनाओं की पुनर्विवेचना में यह बात सिद्ध भी हो चुकी है कि मुसलमान युवकों को जान बूझकर फंसाया गया है।
सामाजिक ताने-बाने और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा दिख रहा है, जिससे नीतिगत स्तर पर निपटा जाना आवश्यक हो गया है। देश की संप्रभुता व स्वायत्ता को चुनौती बाहरी ताकतों से नही, बल्कि अंदरूनी ताकतों से ज्यादा दिखती है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए अब जरूरी है कि खुफिया एजेंसियों की जनता के सर्वोच्च सदन, संसद के प्रति जवाबदेही तय की जाए।
हम देश में बन रहे हालात में सुधार के लिए अपनी भूमिका इस रूप में देख रहे है कि हम राजनीतिक पार्टियों के सामने एक सुझाव और सहमति पत्र पेश करें। देश के बहुसंख्यक वंचित तबके से जुड़ी समस्याओं का निदान बहुत हद तक संसद द्वारा कानूनी प्रावधानों और संविधान संशोधन के जरिए ही संभव है। जिसकी तरफ कोई सार्थक पहल करने में हमारी संसद विफल रही है। रिहाई मंच द्वारा ये मांग पत्र के रूप में आपको भेजा जा रहा है। आपसे आग्रह है कि आगामी लोकसभा चुनावों में इन मांगों को आप अपने घोषणा पत्र में शामिल करें ताकि यह स्पष्ट हो कि आप केवल चुनाव कराने को ही लोकतंत्र नहीं समझते हैं, बल्कि जिंदा कौम के लिए लोकतांत्रिक वसूलों व सिद्धातों के प्रति भी निष्ठा रखते हैं।
1- आतंकवाद की तमाम घटनाओं का सच जानने के लिए जांच की जानी चाहिए।
2- आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को विवेचना के दौरान जमानत पर रिहा किया जाए।
3- बेगुनाह व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति अदा की जाए और उनके सम्मान की बहाली के लिए नीति तैयार की जाए।
4- जिन व्यक्तियों को निर्दोष पाया जाए उनके विरुद्ध सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के साथ आपराधिक भूमिका निभाने वाले पुलिस कर्मियों तथा खुफिया एजेंसियों के कर्मिर्यों के खिलाफ दंण्डात्मक कार्यवाई हेतु कानून बनाया जाए।
5. आतंकवाद से संबन्धित मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों का गठन कर जेल परिसर से बाहर दिन प्रतिदिन सुनवाई की व्यवस्था की जाए तथा प्रत्येक स्थिति में मुकदमें की सुनवाई एक साल के अन्दर पूरी की जाए।
6- आतंकवाद के नाम पर कायम मुकदमों में पारित फैसलों की समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग बनाया जाए।
7- देश में आतंकवाद से संबन्धित अनेक मामलों में खुफिया एजेसियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है तथा यह भी पाया गया है कि उनकी कार्य प्रणाली और स्वायत्ता हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए, संसद की संप्रभुता के लिए और आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बन गई है। आवश्यक हो गया है कि खुफिया एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए तथा इंडियन मुजाहिदीन, जिसे समाज का बड़ा हिस्सा आईबी द्वारा निर्मित/संचालित कागजी संगठन मानता है के आईबी के साथ संबन्धों पर श्वेत पत्र संसद में लाया जाए।
8- उत्तर प्रदेश के कचहरी धमाकों के आरोपी तारिक कासमी व मरहूम मौलाना खालिद मुजाहिद की संदेहास्पद गिरफ्तारी पर गठित एकल सदस्यीय आरडी निमेष जांच कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकारते हुए 16 सितंबर 2013 को विधानसभा पटल पर रखा जा चुका है। उस पर कार्रवाई सुनिश्चित कराई जाए।
9- उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, फैजाबाद, बरेली, कोसी कलां, अस्थान, महाराष्ट्र के धुले, अकोला, असम, समेत देश भर में हुए सभी सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों की सुप्रिम कोर्ट की देखरेख में जांच कराई जाए। पूर्व में हुए जिन सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर जांच आयोगों का गठन किया गया उनकी रिपोर्टों को सार्वजनिक किया जाए। सांप्रदायिक हिंसा निरोधक बिल को संविधान में परिकल्पित संघीय ढांचे के तहत लागू किया जाए।
10- आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (आफ्सपा) और गैर कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (यूएपीए) व संगठित अपराध रोकथाम अधिनियम (कोका) जैसे दमनकारी कानूनों से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, इसे तत्काल समाप्त किया जाए। आतंकवाद से निपटने के नाम पर संघीय ढांचे के खिलाफ एनसीटीसी के गठन को रोका जाए। इन कानूनों के तहत पत्रकारों एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के मामलों की न्यायिक जांच कराई जाए जिससे अभिव्यक्ति की आजादी, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित हो सके।
11. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग व अल्पसंख्यक आयोग को और अधिक स्वायत्त और सशक्त बनाते हुए कानूनी अधिकारों से लैस किया जाए।
12- देश में आतंकवाद के नाम पर कथित मुठभेड़ों और न्यायिक/पुलिस हिरासत में हुई मौतों/हत्याओं की जांच एक विशेष न्यायिक आयोग द्वारा कराई जाए।
13. सच्चर और रंगनाथ मिश्रा कमेटियों की रिपोर्ट को अक्षरशः लागू किया जाए।
14- आपराधिक विवेचना की जांच के लिए पुलिस प्रशासन से अलग पुलिस सुधार आयोग की सिफारिश के अनुसार एक अलग विवेचना ईकाई का गठन किया जाए।
15- सरकारी गोपनियता अधिनियम 1923 में संशोधन करते हुए गोपनीय दस्तावेजों को एक निश्चित समय सीमा के बाद सार्वजनिक करने का प्रावधान किया जाए।
16- संविधान सम्मत सामाजिक व राजनीतिक संगठनों की गतिविधियों पर खुफिया एजेंसियों द्वारा की जा रही ब्रीफिंग को आरटीआई दायरे मे लाया जाए।
17. संविधान के अनुच्छेद 341 के अन्तर्गत जारी आदेश जिसके द्वारा मुस्लिम, ईसाई तथा पारसी दलितों को अनुसूचित जाति के लाभ से वंचित किया गया है से धर्म सूचक शब्द (हिंदू) सिख, बौद्ध को हटाया जाए व देश की सभी धर्मों के दलित जातियों को समान रुप से अनुसूचित जाति का लाभ दिया जाए।
18- सच्चर और रंगनाथ मिश्र कमेटी के सिफारिशों के अनुरूप संसद और विधान सभाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में चक्रानुक्रम व्यवस्था लागू की जाए।
19- अल्पसंख्यक वर्गों के जो नाम मतदाता सूची में छूटे हुए हैं, उन्हें जोड़ने की निश्चित व्यवस्था की जाए।
20- इसराइल व अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसियां जो अपने हितों को साधने के लिए दुनिया भर में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समाजों के बीच युद्धोन्माद फैलाकर उन देशों की आतंरिक सुरक्षा को संकट में डालकर उन देशों के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने के लिए बदनाम हैं, से सैन्य व सामरिक सम्बन्ध तत्काल खत्म किया जाएं।
21- समाज के कमजोर तबकों को आत्म रक्षा हेतु हथियारों लाइसेंस आवंटित किए जाएं।
22- सरकारी/निजी नई बसाहटों में आरक्षण की व्यवस्था लागू की जाए।
23- सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों को आरक्षण दिया जाए।
24- पासपोर्ट बनवाने तथा बैंकिंग की सुविधाएं प्राप्त करने में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं का निदान किया जाए।
25-पुलिस बल में मुसलमानों के उचित प्रतिनिधित्व की गारंटी की जाए।
द्वारा जारी- रिहाई मंच कार्यकारी समिति

अम्बेडकरनगर- मोदी लहर में गुटबाजी के भँवर जाल में उलझी भाजपा

रीता विश्वकर्मा
मुरझाये कमल की शिरा और धमनियों में रवानी भरने में जुटी भाजपा एवं पार्टी के 272 प्लस के मिशन को उम्मीदवारों के खिलाफ अपनों की हो रही बगावत ने कमल खिलने से पहले ही मुरझाने के संकेत देने शुरू कर दिये हैं। नख से लेकर सिर तक गुटबाजी के भँवर जाल में उलझी भाजपा का अर्न्तकलह प्रत्याशियों के नामों के एलान के साथ सड़कों पर सामने आ रहा है। कार्यकर्ता पार्टी का अनुशासन तार-तार करने एवं मर्यादा की सीमाएं लांघने से लोग गुरेज नहीं कर रहे हैं। जिसके कारण कीचड़ में खिलने वाला कमल यहाँ कलह में डूबता नजर आ रहा है।
अविभाजित फैजाबाद का हिस्सा रहे अम्बेडकरनगर संसदीय सीट से भाजपा ने डॉ. हरिओम पाण्डेय को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। लेकिन हरिओम पाण्डेय को टिकट के दावेदारों में शुमार रहे लोग पचा नहीं पा रहे हैं। एक धड़ा तो मुखर होकर सड़क पर उतरकर हरिओम की मुखालिफत कर रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने अम्बेडकरनगर संसदीय क्षेत्र से फायर ब्रांड नेता राज्यसभा सदस्य विनय कटियार को मैदान में उतारा था। विनय कटियार को चुनाव में कामयाबी तो नहीं मिल पायी लेकिन उन्होंने कार्यकर्ताओं को एकजुट कर चुनावी समां भी बाँध दिया था। इस बार भी कार्यकर्ता विनय कटियार को प्रत्याशी बनाये जाने की मांग कर रहे थे लेकिन स्वयं कटियार फैजाबाद से चुनावी समर में उतरना चाह रहे थे। फैजाबाद से पार्टी ने पूर्व मंत्री लल्लू सिंह को तीसरी बार मैदान में उतार दिया। लिहाजा कटियार की फैजाबाद से उम्मीदवारी पर विराम लग गया फिर उनके अम्बेडकरनगर से उतरने के कयास लगने लगे। लेकिन पार्टी ने जब अम्बेडकरनगर सीट पर प्रत्याशी का एलान किया तो कार्यकर्ता हतप्रभ रह गये। पार्टी ने हरिओम पाण्डेय को उम्मीदवार घोषित कर दिया। जिनका मुखर विरोध भी शुरू हो गया।
पिछले दो वर्षों से जिले की राजनीति में खासा सक्रिय श्री राम जन्मभूमि न्यास समिति के वरिष्ठ सदस्य एवं पूर्व सांसद राम बिलास वेदान्ती, पूर्व मंत्री अनिल तिवारी, भाजपा जिलाध्यक्ष राम प्रकाश यादव, पूर्व जिलाध्यक्ष डॉ. राजितराम त्रिपाठी, रमाशंकर सिंह, भारती सिंह, अमरनाथ सिंह, इन्द्रमणि शुक्ल, शिवनायक वर्मा, भीम निषाद, हिन्दू युवा वाहिनी जिलाध्यक्ष सूर्यमणि यादव सहित कई अन्य प्रमुख नेताओं एवं भाजपा प्रदेश कार्य समिति सदस्य राम सूरत मौर्य आदि की दावेदारी को दरकिनार कर दिया गया जिसके कारण असंतोष मुखर होना ही है।
टिकट नहीं मिलने से नाराजराम बिलास वेदान्ती तो इस कदर आग बबूला हो उठे हैं कि वह भाजपा को अलविदा कहने का भी मन बना चुके हैं। सूत्रों की माने तो पूर्व सांसद राम बिलास वेदान्ती सपा में शामिल हो सकते हैं। ज्यादातर कार्यकर्ताओं का मानना है कि पार्टी को अम्बेडकरनगर से किसी बड़े कद के नेता को मैदान में उतारना चाहिए। जिले के आलापुर सु0 विधानसभा क्षेत्र को अपने आप में समेटने वाली संत कबीर नगर संसदीय सीट पर तो दावेदारों की लम्बी फेहरिस्त के कारण भाजपा नेतृत्व अभी तक प्रत्याशी के नाम का एलान नहीं कर पाया है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. रमापति राम त्रिपाठी के पुत्र शरद त्रिपाठी को मैदान में उतारा था। लेकिन शरद त्रिपाठी को कामयाबी नहीं मिल पायी। शरद त्रिपाठी को दूसरे स्थान पर रहकर ही संतोष करना पडा था। लिहाजा इस बार भी शरद त्रिपाठी का दावा काफी मजबूत है लेकिन पूर्व सांसद इन्द्रजीत मिश्र, अष्टभुजा शुक्ला एवं पूर्व मंत्री शिव प्रताप शुक्ला जैसे कद्दावर नेताओं की दावेदारी ने पार्टी नेतृत्व को उलझन में डाल दिया है। अभी तक पार्टी कोई निर्णय नहीं कर पायी है।

About The Author

रीता विश्वकर्मा, लेखिका अंबेडकरनगर (फैजाबाद) स्थित पत्रकार हैं।

तहलका कार्टूनिस्ट तन्मय को माया कामथ अवार्ड-2013

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्टूनिंग के द्वारा  माया कामथ मेमोरियल अवार्ड-२०१३ की घोषणा कर दी गयी है. राजनैतिक कार्टून की क्षेणी में प्रथम पुरूस्कार के लिए तहलका दिल्ली के सीनियर कार्टूनिस्टतन्मय त्यागी को चुना गया है. इस अवार्ड के लिए 95 एंट्री में से प्रथम रू० 25000 का पुरूस्कार वर्तमान राजनैतिक घटनाचक्र पर बनाये गये एक चप्पल कार्टून के लिए तन्मय त्यागी को दिया जाएगा.  इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्टूनिंग के द्वारा जारी नोट में बताया गया है कि ये अवार्ड 100 वीं कार्टून प्रदर्शनी में जून 2014 में प्रदान किये जायेंगें. उनके अलावा मनोज चोपड़ा पंजाब केसरी (जम्मू-तवी ) को दूसरा और आलोक निरंतर (सकल टाइम्स) को तीसरा स्थान मिला है. सर्वश्रेष्ठ फॉरेन कार्टूनिस्ट का अवार्ड बुल्गारिया के वलेंतिन को दिया गया है.

मोदी की पराजय में निर्णायक भूमिका होगी वामदलों की

वाम विरोधी लोग अपने दिलों में बैठे कम्युनिज्म के प्रेत से आतंकित हैं

वाम दलों की कतारें इतनी पुख्ता हैं कि वे न तो नेहरु से हिलीं और न इंदिरा-अटल से हिलीं

जगदीश्वर चतुर्वेदी
देश के सामने केरल का विकास आदर्श विकास रहा है। हर क्षेत्र में केरल ने तरक्की की है। क्या मोदीपंथी केरल का कोई विकल्प दे सकते हैं ?
केरल में भाजपा क्यों सफल नहीं रही ? क्योंकि यह जनविरोधी दल है। देश को विकास के लिए केरल मॉडल चाहिए, गुजरात मॉडल नहीं।
तमाम दोस्त कम्युनिस्टों को मीडिया प्रचार में सक्रिय देखना चाहते हैं। मित्रो, इन दिनों मीडिया में जो जगह खरीद सकता है वह दिखेगा। कम्युनिस्टों की औकात के बाहर है टीवी में लगातार दिखना।
कम्युनिस्टों ने कभी मीडिया पर निर्भर होकर काम नहीं किया, प्रचार नहीं किया। वे फेस टु फेस मिलने और बात करने में विश्वास करते हैं और यह काम वे पश्चिम बंगाल में बेहतर ढंग से कर रहे हैं। यहां पर टीवी चैनलों में उनकी उपस्थिति भी है। क्योंकि वे भी चैनल चलाते हैं। आप भी चाहें तो बांग्ला चैनलों में देख सकते हैं।
कम्युनिस्टों की चिन्ताएं जनता के दिलों में चलती हैं टीवी में नहीं। कम्युनिस्टों से मोदी डरा हुआ है। जिस तरह हिटलर और उसकी फासिस्ट सेना को बोल्शेविक सेना ने हराया था, इस बार के चुनाव में वामदलों की मोदी की पराजय में निर्णायक भूमिका होगी। थोड़ा इंतजार करें। मोदी बाबू नींद की गोली लेकर सोने जा रहे हैं।
देश के मीडिया में कम्युनिस्ट या वामदल गायब हैं। लेकिन फेसबुक पर कम्युनिस्टों को गरियाने वालों की फौज सनसनाती घूम रही है।
अरे भाईयो, जाओ सो जाओ। कम्युनिस्ट तो नहीं आएंगे। वाम विरोधी लोग अपने दिलों में बैठे कम्युनिज्म के प्रेत से आतंकित हैं। कारपोरेट घरानों से लेकर मोदीपंथियों तक वामदलों का भय बैठा हुआ है। यह भय जायज है। वे आ रहे हैं। इसीलिए मोदीपंथी बार-बार कह रहे कम्युनिस्टों का नाश होगा। वे नहीं आएंगे।
लेकिन मुश्किल यह है कि वामदल अच्छी खासी संख्या में लोकसभा में चुनकर आने वाले हैं। कांग्रेस-भाजपा के बाद तीसरे नम्बर पर वाममोर्चा होगा और यह तथ्य है यह भविष्यवाणी नहीं है।
मीडिया और फेसबुक के कम्युनिस्ट विरोधी, कम्युनिस्ट रहित भारतीय संसद का सपना देखना बंद कर दें।
वामदलों की शक्ति मजदूरों-किसानों-छात्रों-युवाओं और महिलाओं के संगठनों में है। उनकी कतारें इतनी पुख्ता हैं कि वे न तो नेहरु से हिलीं और न इंदिरा-अटल से हिलीं। संसद में कम्युनिस्टों की मौजूदगी हमेशा देश के लिए गौरव की बात रही है।
मोदी की तरह किसी भी कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री का शासन कलंकित नहीं रहा।कोई मंत्री करप्ट नहीं था।किसी मंत्री को सजा नहीं हुई। कोई मंत्री दंगाई नहीं हुआ। देश की जनता कम्युनिस्टों पर इसीलिए गर्व करती है। वे जो कहते हैं उसे जीवन में ढालते हैं।

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जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक प्रगतिशील चिंतक, आलोचक व मीडिया क्रिटिक हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चतुर्वेदी जी आजकल कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

2002 तो हम भूलने को तैयार हैं पर हम इन आंकड़ो को कैसे भूलें? मोदी जी !

संजीव कुमार
अगर हम 2002 के गुजरात जनसंहार को भूल भी जायें तो भी आतंकवाद के दमन के नाम पर सिलसिलेवार ढंग से हो रही फर्जी मुठभेड़ो में मुसलमानों की हत्या को हम कैसे भुला पाएंगे। कुछ देर के लिए अगर हम इन क़ानूनी हत्यारों को भी भूल जाएँ और प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के दौरान मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक विकास पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि मोदी सरकार ने गुजरात के मुसलमानों के साथ किस प्रकार की भेदभाव की नीति को सुविचारित ढंग से आपनाया है।
गुजरात में मुसलमानों की जनसंख्या गुजरात की कुल जनसंख्या का 9.7% है पर वर्तमान सरकार द्वारा पिछले एक दशक में चलाये गए SJSRY और NSAP योजना को छोड़कर ज्यादातर योजनाओं में मुसलमानों की भागीदारी उनके जनसंख्या के अनुपात से कम ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 178)। उदहारण के तौर पर कृषि बीमा योजना मेंमुसलमानों की भागीदारी मात्र 3.5% है, जबकि पॉवर टिलर आवंटन के मामले में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 1.4% और ट्रेक्टर के मामले में 4.1% है। गुजरात में मोदी के शासन काल में सहकारी बैंक या ग्रामीण विकास बैंक से वहां के मुसलमानों को किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं मिला है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-75)।
बचत और क्रेडिट सोसाइटी बनाने और छोटे उद्योग लगाने के मामले में गुजरात के मुस्लिम वहां के हिन्दुओं से दोगुने आगे हैं लेकिन इस सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता और प्रशिक्षण का लाभ देने में हिन्दुओं को कहीं अधिक महत्व दिया जाता है। गुजरात में दिए गए कुल प्रशिक्षण का लाभ उठाने में वहां के मुसलमानों की भागीदारी मात्र 5.5% ही है जबकि उद्योग लगाने के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले भवनों में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 4.5% ही है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 373-5)। गुजरात के विभिन्न बैंक में खुले कुल खातो में से मुसलमानों की हिस्सेदारी 12% है जबकि प्रदेश में बैंक द्वारा वितरित किये गए कुल कर्जो में मुसलमानों की हिस्सेदारी मात्र 2.6% है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 127)। गुजरात का प्रत्येक मुसलमान वहां के बैंक में प्रति हिन्दू द्वारा जमा किये गए धन से 20% अधिक पैसे जमा करता है और इसके बावजूद कर्ज देने के मामले में मुसलमानों को हिन्दुओं की तुलना में कम महत्व दिया जाता है।
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) योजना के तहत 2000-01 और 2005-06 के दौरान गुजरात सरकार द्वारा दिए गए कुल 3133.77 करोड़ के कर्जो में से मुसलमानों को मात्र 0.44 करोड़ दिया गया। इसी प्रकार नाबार्ड द्वारा कर्जों की पुनर्वित्त में मुसलमानों को 1.76% ही हिस्सा दिया गया (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 351-53)।
2004-05 में गुजरात में 41% मुसलमान सेवा क्षेत्र में नौकरी करते थे जो कि 2009-10 में घटकर 31.7% रह गया। उसी प्रकार 2004-05 में 59% मुसलमान स्वरोज़गार करते थे जो कि 2009-10 घटकर 53%रह गया। इसी काल के दौरान मुसलमानों कि वेतनभोगी नौकरियों में भागीदारी 17.5%से घटकर 14% हो गई। यह भी गौर करने वाली बात है कि गुजरात में अनियमित मजदूरी कि कुल भागीदारी में मुसलमानों का हिस्सा इसी कालावधि के दौरान 23% से बढ़कर 32% हो गया है। इसका मतलब तो यही है कि मोदी के शासनकाल के दौरान गुजरात में मुसलमानों को निम्न दर्जे के रोजगारों की ओर धकेला जा रहा है। 2001 में जब गुजरात कि कुल साक्षरता दर 69.1% थी तब वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 73.5% थी जबकि 2007-08 में जब गुजरात की कुल साक्षरता दर 74.9% हो गई तब भी वहाँ के मुसलमानों में साक्षरता दर 74.3% है। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों द्वारा किसी प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित होने के मामले में गुजरात के हिन्दू और मुस्लिम समाज में औसत अंतर राष्ट्रीय औसत से कम है (अतुल सूद, पृ.स. 270, तालिका  9.9)। क्या इन सब के पीछे गुजरात सरकार के द्वारा मुसलमानों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की नीति जिम्मेदार नहीं है?
 मोदी जी गुजरात में मुसलमानों में शिक्षा के प्रति रुझान में आई कमी के लिए मदरसा को भी दोषी नहीं ठहरा सकते है क्योंकि पूरे भारत में गुजरात ही एक ऐसा प्रदेश है जहाँ मदरसा सबसे कम प्रचलित है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 293)।
 गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी जी मुसलमानों की इस हालत के लिए उनके तीव्र जनसंख्या वृद्धि को भी जिम्मेदार ठहराते हैं, पर सवाल यह उठता है की क्या मोदी जी के मुख्यमंत्री बनने से पहले गुजरात के मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर कम थी? अगर हम मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर को भी देखें तो ये पता चलता है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर गुजरात के मुसलमानों की वृद्धि दर से कहीं अधिक है। केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या वृद्धि दर हिन्दुओं से कहीं अधिक है पर जीवन स्तर के मामले में दोनों समुदायों में कोई खास अंतर नहीं है। गुजरात में गर्भ निरोधकों का उपयोग करने के मामले में वहां के मुस्लिम हिन्दुओं से मात्र 1% ही पीछे है (सच्चर समिति रिपोर्ट,  पृ.स. 284-85)। जबकि नसबंदी और अंत-र्गर्भाशयी उपकरणों के प्रयोग के मामले में तो वो हिन्दुओं से भी एक कदम आगे है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 374)।
मोदी जी और उनके समर्थक सच्चर समिति की रिपोर्ट में गुजरात के मुसलमानों की अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति को स्वीकारने को भी बड़े जोर-शोर से फैलाते हैं लेकिन अगर हम सच्चर समिति की रिपोर्ट का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो पता चलता है कि गुजरात के मुसलमानों की स्थिति अन्य राज्य के मुसलमानों से बेहतर है लेकिन पिछले 10 वर्षों में उनकी स्थिति गुजरात राज्य में पहले से बद्दतर हुई है। सच्चर समिति की रिपोर्ट को ही माने तो गुजरात उन राज्यों में से है जहाँ मुसलमानों का रोजगार में प्रतिभागिता अनुपात अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम है। गुजरात को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में मुसलमानों की विनिर्माण, व्यापार, और स्वरोजगार में प्रतिभागिता का अनुपात अन्य धर्म समूहों की तुलना में अधिक है {सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 102 (App 5.5) और  105-6)। हालाँकि गुजरात के मुसलमानों की यह स्थिति हमेशा ऐसी ही नहीं थी। 1999-2000 में गुजरात में मुसलमानों में स्वरोजगार गुजरात के हिन्दू समुदाय से अधिक थी लेकिन 2009-10 आते-आते स्थिति बिलकुल ही विपरीत हो गई है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 343)। दूसरी तरफ यदि हम ग्रामीण मजदूरों में मुसलमानों की भागीदारी को देखें तो ये पता चलता है कि 1999-2000 में मुसलमानों की इस क्षेत्र में भागीदारी हिन्दुओं से कम थी जो की आज बिलकुल उल्टा हो गया है। निष्कर्ष साफ़ है, गुजरात के मुसलमानों को मजबूरन रोजगार के लिए स्वरोजगार, व्यापर और विनिर्माण जैसे अच्छे रोजगारों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी का काम करने के लिए पलायन करना पड़ रहा है। आज गुजरात में हिन्दू और मुस्लिम दोनों में स्वरोजगार का अनुपात राष्ट्रीय औसत से कम है जबकि कम से कम 1999-2000 में गुजरात के मुसलमानों की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर थी (NSSO, 55th दौर, पृ.स. 43 और  66th दौर, पृ.स. 59)।
मोदी जी और उनके समर्थक जगह-जगह ये कहते फिरते हैं कि सच्चर समिति की रिपोर्ट में गुजरात के मुसलमानों की स्थति बंगाल और राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। राष्ट्र संघ ने भी ये माना है कि गुजरात के मुसलमानों में गरीबी भारत के मात्र तीन राज्यों से ही बेहतर है जिसमे असम, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल आते हैं। जब हम गुजरात के मुसलमानों और बंगाल के मुसलमानों के जीवन स्तर की तुलना करते हैं तो हमें उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखना चाहिए। हम ये भूल जाते हैं कि यह वही गुजरात है जहाँ के बोहरा और मेनन आदि जैसे मुसलमान व्यापारी वर्ग मध्यकाल में पूरे संसार में भारत के व्यापारी वर्ग का नेतृत्व करते थे और मध्यकाल से ही देश के अन्य भाग के मुसलमानों से कहीं अधिक धनी थे लेकिन इसके विपरीत बंगाल के ज्यादातर मुसलमान मध्य काल से ही बंधुआ कृषक मजदूर का जीवन व्यतीत करते आ रहे थे और ये बात रिचेर्ड ईटन की किताब में भी सिद्ध हो चुकी है। हिंदुत्व समर्थक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि बंगाल के गरीब दलितों और हिन्दुओं ने अपनी गरीबी के कारण ही इस्लाम धर्म को अपनाया था इसलिए वे अब रिचेर्ड ईटन की खोज को विदेशी कह कर ठुकरा भी नहीं सकते हैं। अगर बंगाल के ज्यादातर मुस्लिम पहले गरीब दलित और आदिवासी थे तो आप ये कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि बंगाल के मुसलमान देश के अन्य क्षेत्रों के दलित और आदिवासियों से बेहतर जीवन व्यतीत कर सकते हैं। बंगाल के दलित और गरीब ये सोच कर इस्लाम में परवर्तित हो गए थे कि धर्म बदलने से उनका जीवन स्तर सुधर जायेगा लेकिन इस्लाम के रहनुमा क्या गरीबों पर कम जुल्मों सितम करते है? वो क्या जात-पात का अंतर और भेद-भाव कम करते हैं? ऐसे में गुजरात और बंगाल के मुसलमानों के जीवन स्तर का तुलनात्मक अध्ययन तर्क संगत ना होगा। और यदि हम तुलना ही करना चाहते हैं तो मोदी जी के शासन संभालने और उनके शासन संभालने के पूर्व के समय में गुजरात के मुसलमानों के जीवन स्तर की तुलना करनी चाहिए जिससे ये पता चल सकेगा कि मोदी जी ने गुजरात के मुसलमानों के साथ क्या किया है। गुजरात के मुसलमानों की पिछले 10 वर्षों में क्या हालत हुई है मोदी जी सिर्फ उसके लिए जिम्मेदार है न की मुख्यमंत्री बनने से पहले मुसलमानों की स्थिति के लिए भी।
जो लोग गुजरात में मुसलमानों की बेहतर स्थिति का दावा कर रहे हैं वो मुख्यतः राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) की 2011-12 में आई नवीनतम रिपोर्ट को भी अपना आधार बना रहे हैं जिसमें ये कहा गया है कि गुजरात के मुसलमानों में गत दो वर्षों में 26% गरीबी कम हुई है (गरीबी पर योजना आयोग की रिपोर्ट 2009-10, मार्च 2012, पृ.स. 3) (इंडियन एक्सप्रेस 06 नवम्बर 2013)। अगर हम NSSO के 1999-2000 और 2009-2010 के आंकड़ो का तुलनात्मक अध्यन करें तो पता चलता है कि इस कालांतर में गुजरात के मुसलमानों की गरीबी स्तर में कोई खास अंतर नहीं आया है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया 16 मई  2012)।
प्रति व्यक्ति मासिक खर्च के मामले में गुजरात के मुसलमानों की स्थिति वहां के दलित और आदिवासियों से बेहतर नहीं है और न ही बिहार, बंगाल, राजस्थान, और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से बेहतर है। कुछ ऐसी ही हालत है गुजरात के शहरी मुसलमानों की भी। हालाँकि ऐसा नहीं है कि गुजरात में सभी अल्पसंख्यक वर्ग की यही हालत है। उदाहरण के तौर पर सच्चर समिति के अनुसार गुजरात में ईसाई और पारसी वर्ग में गरीबी नगण्य है (सच्चर समिति रिपोर्ट, पृ.स. 155 और  158-9)।
(यह लेख संजीव कुमार द्वारा गुजरात के विकास के मॉडल पर लिखे गए रिपोर्ट (थरकता गुजरात?) पर आधारित है.

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संजीव कुमार, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं व छात्रों के मंच “भई भोर” व “जागृति नाट्य मंच” के सदस्य हैं।