हमारे देश में हर चीज के साथ ही असंगत दृष्टिकोण अपनाया जाता है। हम मुकम्मल तस्वीर देखने के आदी हैं। हम एक बड़ी तस्वीर में बहुत सारा खालीपन छोड़ देते हैं , जिसका नतीजा यह होता है कि करदाताओं का बहुत सारा धन बेकार बर्बाद कर देते हैं। हमें दुश्मनों के खतरे का किस तरह से जवाब देना है, किस तरह से अपने देश में रक्षा उद्योग को विकसित करना है; इसके लिए दीर्घकालिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हमें ठोस-मुकम्मल रणनीति बनानी होगी
भरत वर्मा रक्षा विशेषज्ञ
|
भारत की एक अजीबोगरीब कहानी है। एकतरफ हम आधुनिकतम तकनीकयुक्त मंगल यान भेजा तो दूसरी ओर, हम अपनी सेनाओं के लिए आधुनिक राइफल, पिस्टल, कार्बाइन जैसे छोटे हथियार तक विकसित कर पाने या बना पाने में आजादी के 66 सालों बाद भी नाकाम रहे। भारत का दूसरा पहलू यह है कि हमारी सीमा, खासतौर पर जमीन से जुड़ी सीमा पर हमेशा हलचल मची रहती है। जो दुश्मन हैं या प्रतिद्वंद्वी हैं, चाहे चीन हो या पाकिस्तान, वे सभी हमारी जमीन हथियाना चाहते हैं। दुश्मनों के इस बने रहने वाले जबरदस्त दबावों ओैर चुनौती के मुकाबले के मद्देनजर अपनी सेनाओं का जिस ढंग से आधुनिकीकरण करना था, हमने नहीं किया। यह काम हमने पिछले तीन-चार दशकों से नहीं किया है।
खतरे की दिशाएं 2014 की जो सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने होगी, वह चीन से आ रही है। चीन हमारा मुख्य प्रतिद्वंद्वी है और उसी से हमें सबसे ज्यादा खतरा भी है। चीन के साथ हमारा कोई बार्डर नहीं था। लेकिन जब चीन ने स्वतंत्र देश तिब्बत को हड़प लिया, उसने हमारे देश के साथ अतिरिक्त 90,000 वर्ग किलोमीटर की जमीन को विवादित बनाने में जुटा है, जिसमें लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाके आते हैं। चीन पिछले कई दशकों से तैयारी कर रहा है कि उसकी सेना तिब्बत के अंदर बहुत प्रबल तरीके से हमारे ऊपर आक्रामक हो सके। दूसरी तरफ, पाकिस्तान हमसे कश्मीर मांग रहा है और चाह रहा है कि भारत के अंदर साम्प्रदायिक वैमनस्य फैले। उसकी इंटेलीजेंस एजेंसी, आर्मी और उसकी पूरी सरकार इस लक्ष्य के मद्देनजर भारत के खिलाफ गुप्त रूप से कई सारे ऑपरेशन चला रहे हैं। साथ ही खुले रूप में सीमाओं पर तनाव बढ़ा रहे हैं तो भारत के लिए 2014 की सबसे बड़ी चुनौती अपनी राष्ट्रीय अखंडता को बरकरार रखना है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमाओं की अखंडता बरकरार रहे और हमारी सेनाएं देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा डटकर कर सकें। इसके लिए अपने रक्षा उद्योग को भी उन्नत और आधुनिक बनाना होगा। रक्षा क्षेत्र संबंधी सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों में करदाताओं का पैसा देने के बावजूद वहां सिर्फ अक्षमता और भ्रष्टाचार ही बढ़ा है। वह कुछ भी ढंग का बना पाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। अगर हम वायुसेना की तरफ देखें तो हिन्दुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (एचयूएल) लड़ाकू विमान सुखोई-30 के पुर्जे भी नहीं बना पाता है। जब वह उसमें अपने पुर्जे लगाता है तो इस विमान की असेंबली लाइन खराब हो जाती है जबकि एचयूएल बहुत सारे विमान विकसित करने की होड़ में है। इस कम्पनी की नाकामी का एकमात्र कारण यही है कि चूंकि यह सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी है और करदाताओं के पैसे से चल रही है तो इसमें अक्षमता और अपव्यय बहुत अधिक है और नतीजा कुछ नहीं निकल पा रहा है।
हिफाजत का नया खाका खींचिये इसलिए हमें 2014 में एक नया मॉडल ढूंढने की जरूरत है जिसमें निजी क्षेत्र की भूमिका होनी चाहिए। मिसाल के तौर पर दुनिया की सबसे बड़ी दो कम्पनियां जो राइफल, कार्बाइन और पिस्तौल समेत जमीनी सेनाओं के इस्तेमाल की दूसरी चीजें बनाती हैं, उनसे हमें समझौता करके अपने देश की कम से कम दो निजी कम्पनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करना जरूरी है। विदेशी कम्पनियों के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है क्योंकि हमारी तीनों सेना समेत अर्धसैनिक बलों और राज्यों की पुलिस बल का आधुनिकीकरण किया जाना है। इनमें हर जगह राइफल, पिस्टल जैसे छोटे हथियारों की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। विदेशी कम्पनियां अपनी तकनीक का हस्तांतरण हमें तभी करेंगी जब हम उन्हें भारतीय संयुक्त उद्यम के अधीन कम से कम 49 प्रतिशत की भागीदारी दें। उसके बाद भारत सरकार को देश की चुनिंदा निजी रक्षा कम्पनियों और प्रस्तावित संयुक्त उद्यमों में अपना पैसा निवेश करना चाहिए ताकि अनुसंधान और विकास हो सके। बहुत तेजी से बदलती रक्षा तकनीक की रफ्तार से कदम मिलाने के लिए हमें भी पारम्परिक तरीकों के बजाय सतत अनुसंधान एवं विकास पर जोर देना होगा। इसी प्रकार, हमें एचएएल जैसी कम्पनियां निजी क्षेत्र के साथ मिलकर बनानी चाहिए। देश में ‘पिपाव’ जैसी निजी शिपयार्ड कम्पनी सफलतापूर्वक काम कर रही है, जो विश्वस्तरीय जहाज बनाती है। ऐसा ही मॉडल हमें सेनाओं के लिए हथियार समेत दूसरे जरूरी सामान बनाने के लिए लाना होगा। हमें सबसे अधिक जोर आधुनिक तकनीक पर देना होगा। दुनिया भर के सैनिक सामान और हथियार बनाने वाली कम्पनियों को भारत का बाजार चाहिए और हमें उनकी आधुनिक तकनीक चाहिए। इसलिए सरकार को उनके साथ सांठगांठ कर तकनीक पाने पर जोर देना चाहिए। इसमें दोनों ही पक्षों के लिए फायदेमंद फार्मूला निकलता है। इसलिए कोई अड़चन भी नहीं है। सिवाय इच्छाशक्ति और पहल करने के। अगर इसकी शुरुआत 2014 में हो जाती है तो अगले पांच से दस साल के अंदर हम रक्षा सामग्री दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक बन जाएंगे। इससे जो मुनाफा हमें होगा, उससे हम आगे के अनुसंधान एवं विकास में बहुत आसानी से निवेश कर पाएंगे।
समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा की चुनौती और क्षमताएं हमारी तीनों सेना में तालमेल की कमी है। इसे लेकर करगिल समीक्षा आयोग ने बहुत ही स्पष्ट रोडमैप बनाया था। तीनों सेनाओं का पहले आपस में, फिर इनका सेना मुख्यालयों के साथ समन्वय का होना बेहद जरूरी है। उसमें एक चीफ ऑफ डिफेंस की नियुक्ति जरूरी है लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने अपने बाबुओं के दबाव में नहीं होने दिया। इस देश के बाबू जो ज्यादातर अनपढ़ हैं और उन्हें मिलिट्री के बारे में ज्यादा पता नहीं है। वे इस 21वीं सदी में हमारे देश की मिलिट्री के स्ट्रकचर के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं, जिससे देश की सुरक्षा को आने वाले समय में बहुत बड़ी सेंध लग सकती है। इसलिए करगिल समीक्षा आयोग ने जो भी अनुमोदन किया है, उसे जमीनी स्तर पर लागू होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो 21वीं सदी में अगर हमारी हर सेना अलग-अलग युद्ध लड़ेगी और वह जरूरी हथियारों के बिना लड़ेगी, साथ ही अगर देश के कर्ता-धर्ता मिलिट्री एडवाइस को राष्ट्रीय सुरक्षा में इनपुट के तौर पर नहीं लेंगे,तो देश को बहुत बड़ा धक्का लगेगा। जल क्षेत्र में भी हमें लगातार चीन से चुनौती मिल रही है। चीन तेजी से अपने नौसैनिक बेड़े को उन्नत करने में जुटा है। इसीलिए हमने रूस से ‘गोर्शकोव’ जैसा विमानवाहक पोत खरीदा है। यह विमानवाहक पोत नवीनीकरण के बाद ‘विक्रमादित्य’ बनकर आ रहा है। लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी समस्या हैन वीनीकरण की। चार-पांच साल की इस प्रक्रिया के बावजूद आज तक यह तय नहीं हो पाया है कि उस पोत को किन-किन हथियारों से सुसज्जित करना है। उसमें अभी तक हवाई सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। यह सरकार की नाकामी और काहिली को दर्शाता है। अब हमें अगले चार-पांच साल उसके डिफेंस सिस्टम को सुज्जित करने में लगाने होंगे, जिसकी सरकारी खरीद की रफ्तार बेहद सुस्त है। हमारे देश में जहां भ्रष्टाचार और अन्य कारणों से निविदाएं बार-बार रद्द होती रहती हैं, उन्हें देखते हुए लगता है कि इस पोत को काम लायक बनाने में अभी पांच साल और लगेंगे। तब तक तो यह पोत तकनीकी तौर पर और भी पुराना पड़ जाएगा। हमने नेवी के लिए विमानवाहक पोत ‘विक्रमादित्य’ की खरीद कर ली लेकिन उसे हथियारों से सुसज्जित नहीं किया। साथ ही विमानवाहक पोत के लिए पनडुब्बी के बेड़े की मदद की भी जरूरत पड़ती है लेकिन हमने नेवी के लिए पनडुब्बियों का मुकम्मल बेड़ा तैयार नहीं किया है। हमने स्कार्पियन पनडुब्बियां बड़ी मुश्किल से खरीदी हैं। उस समय हमने पूरी दुनिया से पनडुब्बी बनाने वालों से निविदाएं मंगाई थीं लेकिन बहुत पहले ही नौसेना ने सरकार से कहा था कि 2012 तक उनकी सभी पनडुब्बियां पुरानी पड़ जाएंगी और उन्हें हटा दिया जाएगा। फिर भी हमने केवल 6 स्कार्पियन पनडुब्बी की खरीद की जबकि कम से कम 12 की खरीद करनी चाहिए थी। उस वक्त हमें इस हिसाब से पनडुब्बी की खरीद करनी थी कि 2014 से हमें पनडुब्बियां मिलनी शुरू हो जातीं और हमारे बेड़े में कम से कम 24 से 30 पनडुब्बियां होतीं। यह इसलिए जरूरी है कि आज पाकिस्तान के पास हमसे कहीं ज्यादा आधुनिक और ज्यादा संख्या में पनडुब्बियां हैं। चीन जिससे हमारा मुख्य खतरा है, उसके पास 60 से
70 पारम्परिक तथा 3 से 4 न्यूक्लियर पनडुब्बियां हैं। अगर हम भविष्य की सुरक्षा की योजना पहले से नहीं करेंगे तो हमें उसका खमियाजा आगे चलकर भुगतना होगा।
पुराने पंखों से उड़ान में खतरे ही खतरे वायु सेना की तरफ देखें तो हमारी शक्ति में इजाफा हुआ है, लॉकहिड मार्टनि और हरक्युलस के आने से। साथ ही, सी-70 ग्लोबमास्टर के आने से हमारी एयर लिफ्ट की क्षमता बढ़ी है लेकिन हमने जो डील एमएमआरसीए से की है, वह आज तक पूरी नहीं हुई है। नतीजतन, 2016 से हमारे वायु सेना की हमलावर क्षमता जबरदस्त गिरावट आएगी क्योंकि पुराने एयरक्रॉफ्ट रिटायर हो रहे हैं। जैसे अभी हाल में मिग-21 को किया गया। जो हमारे 42 लड़ाकू विमानों की क्षमता है कि वह गिर कर 24-25 तक पहुंच जाएगी जबकि हमें चीन के सीमाओं के साथ-साथ पाकिस्तान की सीमाओं पर वायुसेना की सुरक्षा की जबरदस्त जरूरत होगी। इसलिए 2014 में बहुत जरूरी है कि 126 फायटर एयरक्रॉफ्ट की खरीद जल्द से जल्द की जाए।
सबसे कड़ी मार तो जमीन पर इसी तरह, थल सेना की तरफ देखें तो सबसे ज्यादा दबाव हमारी भारतीय थल सेना के ऊपर है क्योंकि एक तरफ चीन हमारी जमीन को हड़पता जा रहा है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान ने बहुत सारे आतंकवादी समूहों को कश्मीर में घुसपैठ करा रखी है। फिर भी भारतीय सेना ने सीमाओं को संभाला है। देश के अंदर विद्रोह को भी संभाला हुआ है। वह दो लड़ाइयां लड़ रही हैं। हालांकि वायुसेना और नौसेना का तो कुछ हद आधुनिकीकरण हुआ है लेकिन भारतीय थलसेना का आधुनिकीकरण बिल्कुल ठप पड़ा है। आज न भारतीय सेना के पास आधुनिक राइफलें हैं और न ही कार्बाइन। हमारी सेना अभी तक द्वितीय विश्व युद्ध के समय के कार्बाइन ही इस्तेमाल कर रही है। न ही उनके पास 155 मिलीमीटर की तोपें हैं। हमारा तोपखाना खाली पड़ा है और 60 और 70 के दशक की आउटडेटेट तोपें लेकर भारतीय सेना देश की सुरक्षा में जुटी है। हमारी पैदल सेना की 355 बटालियन हैं, जो दुनिया भर में लोहा ले चुकी हैं। इनमें कई सारी बटालियन 200 साल से ज्यादा पुरानी हैं। उन्होंने बिना आधुनिक हथियार के हमारी सीमाओं को संभाला हुआ है लेकिन आज उनकी क्षमता बहुत ज्यादा गिर गई है। उनको हमें अमेरिकन बटालियन के हमलावर तकनीक के स्तर तक लाना बहुत जरूरी है। इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी आर्मी का आधुनिकीकरण करना है, क्योंकि उसे सामान्य लड़ाई में भले न उतरना पड़ रहा हो, वह स्थानीय स्तर पर छिटपुट लड़ाई का रोज सामना करती है। सीमा के पार से होने वाली गोलीबारी और चीनी सेनाओं की घुसपैठ का उन्हें रोज सामना करना पड़ता है। इसलिए पैदल सेना का आधुनिकीकरण हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें इस कमजोरी को भी 2014 में निकाल बाहर करना होगा। इलस्ट्रेशन जे.पी. त्रिपाठी
विदेश नीति में मिलिट्री का इनपुट लिया जाए हमारी जो विदेश नीति है, वह बिल्कुल नाकाम साबित हो चुकी है। छोटा-सा देश श्रीलंका और मालदीव से लेकर बड़ा-सा देश अमेरिका को संभाल नहीं पा रही है। उसका कारण यह है कि हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन की पिछली दस साल से जारी सरकार ने चीन और पाकिस्तान की हरकतों पर बहुत ही कमजोर सिग्नल दिया है। इससे दुश्मनों के हौसले बुलंद हो चुके हैं और वे हमारे सैनिकों के सिर काट रहे हैं, तो कोई सरजमीन पर अपना तंबू गाड़ रहा है। सबसे बड़ी सामरिक चुनौती यह है कि चीन और पाकिस्तान भारत के खिलाफ एक हो गए हैं। इनके साथ लगी सीमाओं पर बहुत ज्यादा तनाव है। अंतरराष्ट्रीय फोरम में ये दोनों ही देश मिलकर भारत के खिलाफ अभियान चलाते हैं। हमारी डिप्लोमैटिक कोर उससे पूरी तरह निपटने में नाकाम है क्योंकि जो प्रोफेशनल मिलिट्री है, उससे राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में इनपुट नहीं लिया जाता। विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री सोचते हैं कि सिर्फ बातचीत से बड़ी कामयाबी हासिल हो जाएगी। लेकिन किसी भी देश की विदेश नीति की सफलता के लिए उसके दो पैर होने चाहिए। एक, आर्थिक शक्ति, जिसे भारत धीरे-धीरे हासिल करता जा रहा है। दूसरा है-सैन्य क्षमता और शक्ति जो दिन ब दिन गिरती जा रही है। अगर सैन्य क्षमता को विदेश नीति के साथ जोड़ दिया जाए तथा सैन्य क्षमता में इजाफा किया जाए तो दूसरे देशों बहुत सोच समझ कर हमारे साथ बातचीत करेंगे। इस देश में कहा गया था कि अगर कोई एक गाल पर मारता है तो दूसरा गाल आगे बढ़ा देना चाहिए। लेकिन ऐसी बातें केवल सिविल समाज में बहुत अच्छी और बहुत रोमांटिक लगती हैं। हमारी विदेश नीति का सबसे बड़ा बिन्दु यह होना चाहिए कि पहला तमाचा तो मारने वाले की गलती है जबकि उसका दूसरा तमाचा अगर हम पर पड़ा तो हमारी गलती है।
सुरक्षा के सार तत्व सीमा पर हलचलें और उस दबाव से निबटने लायक सेना का आधुनिकीकरण नहीं। यह काम तीन-चार दशकों से अटका पड़ा 2014 की पहली सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने चीन से आ रही है। चीन हमारा मु ख्य प्रतिद्वंद्वी है और वह निरंतर अपने को ताकतवर कर रहा है पाकिस्तान की इंटेलीजेंस एजेंसी, आर्मी और उसकी पूरी सरकार इस लक्ष्य के मद्देनजर भारत के खिलाफ गुप्त रूप से कई सारे ऑपरेशन चला रहीं सीमाओं की अखंडता बरकरार रहे और हमारी सेनाएं देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा डटकर कर सकें; इसके लिए अपने रक्षा उद्योग को भी उन्नत और आधुनिक बनाना होगा रक्षा क्षेत्र संबंधी सार्वजनिक क्षेत्र के निकाय कुछ भी ढंग का बना पाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। इसलिए हमें 2014 में एक नया मॉडल ढूंढने की जरूरत है जिसमें निजी क्षेत्र की भूमिका हो सैनिक सामान और हथियार बनाने वाली कम्पनियों के साथ सांठगांठ कर उनसे तकनीक पाने पर जोर देना चाहिए। इसमें दोनों ही पक्षों के लिए फायदेमंद फार्मूला निकलता है अगर सैन्य क्षमता को विदेश नीति के साथ जोड़ दिया जाए तथा सैन्य क्षमता में इजाफा किया जाए तो दूसरे देश बहुत संभल कर हमारे साथ बातचीत करेंगे
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें