शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

कॉरपोरेट है भ्रष्टाचार की गंगोत्री-कॉमरेड वर्धन

  • वैकल्पिक नीतियों पर संघर्ष वक्त की जरूरत- करात
  • मुजफ्फरनगर में उ0 प्र0 की समाजवादी सरकार की भूमिका शर्मनाक-जस्टिस सच्चर
  • कॉरपोरेट घरानों को लोकपाल के दायरे में लाए बिना महाधोटालों को रोकना असम्भव – अखिलेन्द्र
  • आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने जंतर मंतर पर शुरू किया दस दिवसीय उपवास
नई दिल्ली, 7 फरवरी 2014, वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के पूर्व महासचिव कॉमरेड ए बी वर्धन ने कहा है कि कॉरपोरेट घराने देश में भ्रष्टाचार की गंगोत्री हैं और इनकी राजनीति और अर्थनीति के खिलाफ जनता की राजनीति के लिये अखिलेन्द्र के इस उपवास का हम समर्थन करते हैं।

कॉरपोरेट घरानों को लोकपाल कानून के दायरे में लाने, रोजगार के अधिकार को नीति निर्देशक तत्व की जगह संविधान के मूल अधिकार में शामिल करने, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक बिल को संसद से पारित कराने, कृषि योग्य भूमि के कॉरपोरेट खरीद पर रोक लगाने, कृषि लागत मूल्य आयोग को वैधानिक दर्जा देने, राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति व सर्वागीण जनपक्षीय खनन नीति बनाने, कॉरपोरेट पर टैक्स बढ़ाने, शिक्षा-स्वास्थ्य-कृषि समेत जनहित के मदों पर खर्च बढ़ाने, राष्ट्रीय वेतन नीति बनाने, महंगाई रोकने के लिये वायदा कारोबार पर रोक लगाने, ठेका व दिहाड़ी श्रमिकों को नियमित करने, अति पिछड़ों, पिछड़े-दलित मुसलमानों, आदिवासियों के सामाजिक न्याय के अधिकार, हिफाजत, इंसाफ, जम्हूरियत और कानून का राज स्थापित करने समेत आम नागरिक की ज़िन्दगी के लिये महत्वपूर्ण सवालों पर आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने जंतर-मंतर पर आज से अपना दस दिवसीय उपवास शुरू कर दिया।

अखिलेन्द्र के उपवास का समर्थन करने आए सीपीआई (एम) के महासचिव कॉमरेड प्रकाश करात ने कहा कि जिन मुद्दों को इस उपवास के माध्यम से उठाया जा रहा है वह देश में आर्थिक, सामाजिक, लोकतान्त्रिक व राजनीतिक अधिकारों के लिये वैकल्पिक नीतियों के सवाल है और इन पर आन्दोलन आज वक्त की जरूरत है। इन मुद्दों पर जारी इस आन्दोलन को सीपीआई (एम) हर तरह से मजबूत करने में योगदान करेगी।

सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर ने कहा कि यह दुखद है किन्तु सच है कि उ0 प्र0 की समाजवादी सरकार के राज में अल्पसंख्यक शरणार्थी शिवरों में रहने को मजबूर हैं और इस पूरे मामले में उसकी भूमिका बेहद शर्मनाक है।

उपवास से बैठने के पूर्व अखिलेन्द्र ने सभा को सम्बोधित करते हुये कहा कि कॉरपोरेट घरानों ने पूरे राजनीतिक तन्त्र को भ्रष्ट कर दिया है। राजनीतिक व नौकरशाही तन्त्र से गठजोड़ कायम कर वह हमारे प्राकृतिक संसाधनों व सरकारी खजाने समेत बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदा की लूट में लिप्त है। इसी तरह फोर्ड फांउडेशन जैसी साम्राज्यवादी एजेंसियों के फण्ड से संचालित एनजीओ हमारे राष्ट्रीय जीवन में भ्रष्टाचार के खतरनाक स्रोत हैं। उनकी बढ़ती घुसपैठ के हमारे स्वतंत्र नीति निर्णयों तथा सुरक्षा के लिये गम्भीर निहितार्थ हैं। लेकिनएनजीओ कारोबार भी लोकपाल के दायरे के बाहर है। इसलिये उन्होंने कॉरपोरेट और एनजीओं को लोकपाल के दायरे में लाने की माँग उठायी। उन्होंने कहा कि बगैर जनपक्षिय नीतियों को लागू किए और लोकतान्त्रिक अधिकारों वसामाजिक न्याय की गारंटी के सुशासन की बात महज दिखावा है।

अखिलेन्द्र ने बताया कि इस उपवास को जिस तरह से देश की तमाम लोकतान्त्रिक, प्रगतिशील व इंसाफपसंद ताकतों का समर्थन हासिल हुआ है उससे यह विश्वास पुख्ता हुआ है कि इस देश में कॉरपोरेट राजनीति को शिकस्त मिलेगी और जनता की राजनीति की जीत होगी। इस उपवास कार्यक्रम में उ0 प्र0, बिहार, झारखण्ड़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखण्ड़, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, कर्नाटक समेत विभिन्न राज्यों से प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे है।

उपवास कार्यक्रम को गांधी इंस्टीटयूट के निदेशक व अर्थशास्त्री प्रो दीपक मलिक, सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रेम सिंह, सीपीआई(एमएल) न्यू पोलितरेट के महासचिव शिवमंगल सिद्धान्तकर, पूर्व आईजी व दलित चितंक एस आर दारापुरी, प्रो0 निहालुद्दीन अहमद, सलाउद्दीन खां, लाल देवेन्द्र सिंह चौहान, लाल बहादुर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, सामाजिक न्याय मोर्चा के चौधरी यशवंत सिंह, दिनकर कपूर, बुनकर वाहनी के इकबाल अहमद अंसारी, जोखू सिद्दकी, विवेक यादव आदि ने सम्बोधित किया और सभा का संचालन अजीत सिंह यादव ने किया।

लोकसभा चुनाव 2014 में दखल देंगे हजारे

लखनऊ 7 फरवरी। अन्ना हजारे भी लोकसभा चुनाव में दखल देंगे। यह जानकारी आज हजारे की जनतंत्र यात्रा के सहयोगी किसान नेता विनोद सिंह ने दी
अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, हजारे के ही जन लोकपाल आन्दोलन के कोख से निकली है और वह देश में एक अलग ताकत बनती नजर आ रही है। ऐसे में हजारे के मैदान में आ जाने से माहौल गर्म हो सकता है। फिलहाल हजारे कोई पार्टी नहीं बनाने जा रहे है पर वे मुद्दों के आधार पर देश के विभिन्न राज्यों में दलों और उम्मीदवारों का समर्थन कर सकते हैं।
विनोद सिंह के मुताबिक हजारे ने लोकसभा चुनाव के लिये एक आर्थिक एजेण्डा बना कर सभी दलों को भेजा था पर सिर्फ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। हजारे ने इसी वजह से ममता के नेतृत्व में नए गठजोड़ की उम्मीद जताई है।
गौरतलब है कि किसान संगठन इस चुनाव के लिये एक किसान एजेण्डा बनाने की तैयारी में है जिसकी बैठक ग्यारह फरवरी को वाराणसी में सामाजिक कार्यकर्त्ता सुनील सहस्त्रबुद्धे के लोक विद्या आन्दोलन की तरफ से बुलाई गयी है।मध्य प्रदेश किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष और हजारे की मध्य प्रदेश में हुयी जनतंत्र यात्रा के संयोजक डॉ. सुनीलमइस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका में रहेंगे और लोकसभा चुनाव के दौरान वे चार राज्यों महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उतराखंड में किसान एजेण्डा को लेकर मुहिम छेड़ेंगे। इस अभियान में हरित स्वराज भी शामिल हो रहा है। इन सभी अभियान के बीच अन्ना हजारे का लोकसभा चुनाव में दखल देना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दरअसल दिल्ली छोड़ देश के विभिन्न हिस्सों में आम आदमी पार्टी और अन्ना हजारे के समर्थक काफी हद तक एक ही धारा के माने जाते हैं जो कांग्रेस के खिलाफ हैं पर भाजपा और मोदी को लेकर बँटे हुये हैं। ऐसे में हजारे और आप के बीच अगर कोई तालमेल नहीं हुआ तो वे एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचा सकते हैं। विनोद सिंह के मुताबिक दिल्ली में हजारे ने इस अभियान की शुरुआत कर दी है और दफ्तर में काफी प्रतिभाशाली नौजवान मोर्चा सम्भालेंगे ।

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अंबरीश कुमार, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। छात्र राजनीति के दौर से ही जनसरोकारों के पक्षधर रहे हैं। मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

फेडरल फ्रंट को हवा दे रहे मुलायम


नेशनल फेडरल फ्रंट यानी राष्ट्रीय संघीय मोर्चा को मुलायम हवा दे रहे है। मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी,जनता दल परिवार के पुराने घटकों को एक मंच पर आने की पक्षधर है और यह पार्टी सार्वजनिक कर चुकी है। कांग्रेस अगर सौ सीटों के आसपास रही तो वह भी इस तरह की कवायद का समर्थन कर भाजपा को रोकने का प्रयास करेगी। उधर बिहार में नीतीश कुमार भी इसके पक्षधर हैं। तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव में वाम दलों के जयललिता के साथ आने के बाद इस फ्रंट को और ताकत मिली है और बिहार में नितीश वाम दलों के व्यापक मोर्चे की बात कर रहे हैं। हालाँकि उत्तर प्रदेश के राजनैतिक हालात बिलकुल अलग है और यहाँ वाम दलों की चुनावी ताकत ऐसी नहीं है कि वे मुख्यधारा के किसी दल के साथ जा सकें। मुलायम सिंह साफ़ कर चुके हैं कि वे चुनाव से पहले किसी भी दल के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। यह बात अलग है कि राष्ट्रीय फलक पर वाम दल मुलायम के साथ खड़े हैं।
इस सबके बावजूद उत्तर प्रदेश में वाम दल अगर लोकसभा चुनाव में साथ आए और कम सीटों पर ज्यादा ताकत लगाए तो माहौल बन सकता है। उत्तर प्रदेश में वीपी सिंह के दादरी आंदोलन के समय लोकतांत्रिक वाम ताकतों की एकजुटता सामने आई थी पर छोटे-छोटे दलों ने टिकट को लेकर इस मोर्चे को तोड़ दिया और इसके मुख्य चेहरे राजबब्बर कांग्रेस में चले गए जिससे इस कवायद को बड़ा झटका लगा। वर्ना पिछले विधान सभा चुनाव में ही यह मोर्चा अपनी ताकत दिखा सकता था। फिलहाल उत्तर प्रदेश में दो वाम दलों के बीच फिर से संवाद शुरू हो रहा है। वैसे प्रदेश में भाकपा, माकपा, फॉरवर्ड ब्लाक और आरएसआई का मोर्चा बन चुका है पर इसमें जमीनी ताकत सिर्फ भाकपा और माकपा की ही रही है और वे बहुत सी सीटों पर चुनाव लड़के इस ताकत को और कम कर देते हैं। भाकपा माले को इस मोर्चे से अब तक अलग रखा गया था पर इस बार संवाद शुरू हो रहा है। यदि ऐसा मोर्चा बनता है तो बाद में संघीय मोर्चा का रास्ता आसान हो जायेगा। समाजवादी पार्टी चाहती है कि धर्म निरपेक्ष क्षेत्रीय ताकते एक मंच पर आएं औए वाम दलों के समर्थन के साथ यह व्यापक मोर्चा बने। तभी कांग्रेस का भी मुद्दों के साथ समर्थन मिल सकता है। मुलायम सिंह इसके लिये लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीट लेकर जाना चाहते हैं और वे लगातार बड़ी-बड़ी रैलियाँ भी कर रहे हैं जो संख्या के हिसाब से मोदी की रैलियों से भी बड़ी हैं। यह बात अलग है कि राष्ट्रीय फलक पर मुलायम की इन बड़ी रैलियों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा है मोदी के मुकाबले।
मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के बाद समाजवादी पार्टी मुसलमानों को लेकर चिंतित हुयी और उसी के बाद रैलियों का सिलसिला शुरू हुआ जिसमें आजम खान ज्यादातर रैलियों में रहते हैं। विधान सभा चुनाव के प्रचार के समय समूचे पूर्वांचल में आजम खान सिर्फ एक रैली में मुलायम के साथ थे। इससे समाजवादी पार्टी की चिन्ता को समझा जा सकता है। दूसरे पिछड़ों और अति पिछड़ों को लेकर पार्टी ज्यादा जोर लगा लगा रही है और गायत्री प्रसाद प्रजापति का कद और पद इसी वजह से बढ़ाया जा चुका है। इस सब के बावजूद विधान सभा जैसी जीत की सम्भावना किसी को नहीं है। आप पार्टी के उदय से भी कुछ नुक्सान शहरी क्षेत्रों में हो सकता है पर आप की वजह से भाजपा और कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होगा जिससे समाजवादी पार्टी को राहत मिलने की उम्मीद है। मुलायम अगर पच्चीस तीस सीट लाने में कामयाब हुये तो फेडरल फ्रंट में उनकी ज्यादा चलेगी और फ्रंट की भी ताकत बढ़ेगी। चुनाव में अभी दो महीने का वक्त है और मुलायम सिंह अगर लगातार होने वाली रैलियों से मुस्लिम और पिछड़ों को साथ रख पाए तो समाजवादी पार्टी की भूमिका बसपा के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण बन जायेगी। हालाँकि उत्तर प्रदेश में माहौल बनाने में मोदी बहुत आगे हैं और हिंदुत्ववादी ताकते बमबम हैं पर जमीन पर यह स्थिति फिलहाल तो नजर नहीं आ रही है

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अंबरीश कुमार, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। छात्र राजनीति के दौर से ही जनसरोकारों के पक्षधर रहे हैं। मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं।

बिजली शुल्क वृद्धि वापस कर वायदे को पूरा करें माननीय केजरीवाल

नयी दिल्ली, 4 फरवरी: गहराते बिजली संकट का सामना कर रहे दिल्ली राज्य के लिए ग्रीनपीस इंडिया ने आज मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से विनयपूर्वक मांग की है कि वे डीइआरसी से बिजली शुल्क में बढ़ोतरी को वापस लेने को कहें और दिल्ली के आम आदमी पर बिजली लागत से निजात दिलाने के लिए अपने सरकार के सोलर विजन कार्ययोजना पर तेजी से काम करें।

ग्रीनपीस इंडिया के सीनियर कैंपेनर अभिषेक प्रताप ने बताया कि ‘सब्सिडी प्रदान करने की नीति नाकाम सिद्ध हुयी है, इसके परिणामस्वरूप दिल्ली के कई इलाकों में इलेक्ट्रिसिटी आउटएज की खबरें आती रही हैं। हालाँकि दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीइआरसी) ने बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) के दबाव में कैग की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के पहले ही बिजली टैरिफ में बढ़ोतरी कर दी, ऐसे में दिल्ली सरकार द्वारा डिस्कॉम्स के लाइसेंस रद्द करने की धमकी बेमानी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री को होशियारी से काम लेना चाहिए और तुरन्त अपने चुनावी घोषणापत्र को अमली जामा पहनाने के लिए नीतिगत कदमों की घोषणा करनी चाहिए, जिसके तहत दिल्ली में बिजली जरूरतों का 20 फीसदी सौर बिजली से आने वायदा किया गया है।’
दिल्ली ‘कैग की ऑडिट रिपोर्ट के जाहिर होने के बावजूद बिजली टैरिफ में वृद्धि नहीं थमेगी और न ही बिजली कटौती खत्म होगी, जब तक कि बिजली के उत्पादन व वितरण को विविधीकृत नहीं किया जाता और दिल्ली को रूफटॉप सोलर जैसे नये व संभावनाशील तरीकों से आत्मनिर्भर नहीं बनाया जाता.’
डीइआरसी द्वारा टैरिफ में 6-8 प्रतिशत की वृद्धि से दिल्लीवासियों को जोरदार झटका लगा है और वे ब्लैकआउट के मुहाने पर हैं, क्योंकि केंद्रीय विद्युत आपूर्तिकर्ता एनटीपीसी ने बीएसइएस राजधानी और बीएसइएस यमुना जैसी डिफॉल्टिंग डिस्कॉम्स को केवल 10 दिनों के डेडलाइन देने की रजामंदी दी है, ताकि वे अपने बकाया का भुगतान कर सकें।
श्री अभिषेक प्रताप ने आगे बताया कि ‘बीते सप्ताह में घोषित टैरिफ दर में वृद्धि के अनुसार दिल्ली में औसतन एक परिवार को अब अपने समूचे बिल पर 8 फीसदी अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा। करीब 2 से 3 केडब्ल्यू क्षमता के औसतन एक सोलर रूफटॉप से माहवार 350-650 यूनिट बिजली पैदा होगी, जिससे करीब 3000 रुपये की बचत या कमाई एक परिवार को होगी। इस प्रकार इस्तेमाल के आधार पर देखा जाये तो यह सीधे 30 फीसदी तक की बचत करा सकती है, साथ ही परिवार को बिजली कटौती के अलावा डिस्कॉम्स द्वारा शुल्क वृद्धि की धमकी से निजात भी मिल सकती है।’
गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में सोलर एनर्जी को प्रोत्साहित करने के लिए इनसेंटिव और सब्सिडी देने का वायदा किया था और आगामी 2022 में2 दिल्ली की बिजली जरूरतों का 20 प्रतिशत सौर ऊर्जा से पूरा करने की बात कही थी। ग्रीनपीस ने बीते 3 जनवरी को इसी प्रकार का एक पत्र दिल्ली सरकार को लिखा था और मांग की थी कि वह सोलर एनर्जी के अपने वायदे पर काम शुरू करे। अभिषेक प्रताप ने कहा कि ‘हम अब भी उनके जवाब के इतंजार में हैं। यह देखना वाकई दुर्भाग्यजनक है कि नयी सरकार ने अब तक राजधानी में गहराते बिजली संकट से निबटने के समाधान के लिए इसे प्राथमिकता नहीं दी है।’
 नोट्स/संदर्भ:
ग्रीनपीस द्वारा दिनांक 3 जनवरी और 3 फरवरी 2014 को दिल्ली के मुख्यमंत्री को प्रेषित किया गया पत्र
आम आदमी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में सौर ऊर्जा से जुड़ी चर्चा/वायदा
  1. दिल्ली में बिजली संकट परिदृश्य और सौर ऊर्जा के मुकाबले बिजली शुल्क में वृद्धि के तुलनात्मक विवरण के लिए नीचे दिये गये वेबलिंक को देखें: http://www.greenpeace.org/india/en/Press/Roll-back-tariff-hikes-and-fulfill-poll-promise-on-solar-energy-Greenpeace-tells-Kejriwal/

अब्दुल या विक्टर को क्यों नहीं भारत रत्न ?

अब्दुल या विक्टर को क्यों नहीं भारत रत्न ?

डॉ. सीएनआर राव (चिंमामणि नागेश रामचंद्र राव) व सचिन तेंदुलकर भारत रत्न देकर सम्मानित किया गया है। डॉ. सीएनआर राव इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी, एचडी देवगौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल और डॉ. मनमोहन सिंह के वैज्ञानिक सलाहाकर परिषद के अध्यक्ष रहे हैं। कुछ समाचार पत्रों में राव को मंगल अभियान का जनक भी कहा जाता रहा है।

सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान मानते हुये भारत रत्न दिया गया है। कहा जाता है कि सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट को महान बनाया है और देश को खास पहचान दिलायी है। सचिन कभी भारत के लिये नहीं खेले। वह जिस टीम में थे वह क्रिकेट टीम बीसीसीआई के अधीन होती है और बीसीसीआई एक स्वायत सेवी संस्था है। बीसीसीआई,तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड है इस पर सरकार के कोई भी नियम कानून लागू नहीं होते हैं। भारतीय क्रिकेट टीम, 2013 तक जो टी शर्ट पहनती थी वह सहारा इंडिया कम्पनी का है जो कि देश के ‘सर्वोच्च न्यायलय’ के बार-बार कहने के बाद भी निवेशकों के 24 हजार करोड़ रु. अभी तक नहीं लौटा रही है। इसी तरह सचिन हमेशा ही कम्पनियों के मुनाफे के लिये विज्ञापन करते रहे हैं। कभी भी उन्होंने इस पर विचार नहीं किया कि जो वे विज्ञापन कर रहे हैं वे उनके फैन के लिये लाभकारी है या हानिकारक। पेप्सी जैसे हानिकार पेय का प्रचार करते हुये सचिन कहते हैं कि दिल मांगे मोर
सीएनआर राव का मंगल अभियान हो या सचिन को क्रिकेट यह भारत के आम आदमी को कहाँ पहुँचायेगा? क्या इससे सच में आम आदमी और भारत को कुछ फायदा हुआ है? जिसके लिये इनको भारत रत्न दिया जा रहा है? या यह एक वर्ग की सेवा का परिणाम है?
केरल के छोटे से गाँव के रहने वाले गणित के अध्यापक अब्दुल मलिक 20 साल से कादालुंदी नदी को रबड़ टायर के सहारे तैर कर पढ़ाने के लिये जाते हैं और आज तक कभी वे स्कूल में देर से नहीं पहुँचे। उनका मानना है कि शिक्षक बनने से एक अच्छे नागरिक बनाने में मदद मिलती है। उनके गाँव से स्कूल की दूरी सात कि.मी. है। सड़क मार्ग से स्कूल जाने पर 3 बस बदलनी पड़ती थी और उनको 2 घंटे लग जाते थे। कभी कभी बस के इंतजार में वे देर से स्कूल पहुँचते थे। अब्दुल को एक अध्यापक ने प्रेरित किया नदी तैर कर स्कूल आने के लिये इससे उनकी स्कूल की दूरी मात्र एक कि.मी. ही होती है। मलिक कहते हैं कि ‘‘नदी के किनारे पहुँचने के बाद मैं अपने कपड़े उतार, तौलिया लपेट कर छाता, लंच और कुछ किताबों को बैग में रख कर नदी मैं तैरने के लिये उतर जाते हैं। तैरने के दौरान अपने समान से भरा बैग को सर पर रखते हैं और दूसरे छोर पर पहँचने के बाद अपने कपड़े को पहन कर स्कूल में जाते हैं।’’ यह पूछने पर कि क्या उनको कभी तैर कर स्कूल जाने में दिक्कत नहीं होती है? इस पर मलिक कहते हैं ‘‘कादालुंदी नदी लगभग 70 मीटर चौड़ी है। तैरते हुये पेड़, कीड़े-मकोड़े, नारियल, कूड़ा भी होते हैं लेकिन मैं इन सबसे नहीं डरता। ये चीजें मुझे मेरे लक्ष्य से भटका नहीं सकती। बरसात के मौसम में वे पानी में 20 फुट नीचे तैरते हैं क्योंकि ऊपर पानी गंदा होता है। गर्मियों में तैर कर जाने के बाद तरोताजा महसूस करते हैं।’’ उनके गाँव के सभी लोगों को पता है कि वे 9.30 बजे वो नदी मैं तैरते हुये मिल जायेंगे।
सचिन विज्ञापन कम्पनियों में जहाँ पैसा लेकर वे देश के बच्चों को पेप्सी पीना सिखाना चाहते हैं वहीं यह अध्यापक बच्चों को अच्छा नागरिक बनना चाहता है। पैसे लेकर विज्ञापन करने वाले को भारत का सर्वोच्च सम्मान देकर सम्मानित किया गया है वहीं बच्चों को अच्छे नागरिक बनाने का सपना देखने वालों के लिये एक पुल तक नहीं बनाती सरकार।
श्रीलंका में गिरफ्तार लगभग 400 मछुआरे व नौकाओं की रिहाई के लिये अनशन कर रहे वेलमुरूगन विक्टर (42) की अनशन स्थल पर ही मौत हो गई। इन मछुआरों को गुनाह यह था कि वे पेट पालने के लिये समुद्र में मछली पकड़ा करते थे। समुद्र में सीमा का ज्ञान न होने के कारण उनको पकड़ लिया जाता है। इसी तरह वेलमुरूगन के नाव को भी श्रीलंका की नौसेना ने अक्टूबर माह में जब्त कर लिया था तब से वह जबर्दस्त मानसिक दबाव में थे। वेलमुरूगन ने अपने परिवार और मछुआरों के परिवार को न्याय दिलाने के लिये अनशन का सहारा लिया जिससे कि विदेशों में बंद अपने नागरिकों को छुड़ाया जा सके। वेलमुरूगन ने अपनी लड़ाई लड़ते हुये अनशन स्थल पर ही मौत को गले लगाया।
डॉ. सीएनआर राव की रसायन शास्त्र या मंगल ग्रह में उपलब्धि एक विशेष वर्ग के लिये हैं। वहीं वेलमुरूगन का आन्दोलन आम आदमी और भारत की जनता के स्वाभिमान की लड़ाई थी।
अब्दुल व वेलुरूगन देश के भविष्य को अच्छे नागरिक बनाने के लिये काम कर रहे हैं वहीं वेलमुरूगन ने भारत के स्वाभिमान के लिये अपनी जान की आहुति दी। तो क्या इनको भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए? डॉ. सीएनआर राव व सचिन के योगदान से क्या भारत के आम जनता को लाभ पहुँचा हैक्या भारत रत्न उसी को मिलता है जो एक खास वर्ग के लिये काम करते हैं?

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सुनील कुमार, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

बंधे हुए हथियार और आजाद हमलावर

Posted by Astrologer Sidharth Jagannath 

Joshi on बुधवार, फ़रवरी 05, 2014 with

एक दूसरे ग्रह का प्राणी विमान से छिटककर दूर जा गिरा और हमारे यहां बीकानेर में आ फंसा। आधी रात का समय था (अब उड़नतश्‍तरियां तो उसी समय घूमती है ना) एलियन भाई गिरते पड़ते किसी प्रकार दूर धोरे पर पहुंचना चाह रहे थे कि कुत्‍तों की नजर उन पर पड़ गई। एक ने भौंका और बाकियों ने सुर में सुर मिलाकर भौंक का भूकम्‍प ला दिया। कुछ हरावल दस्‍ते के कुत्‍ते को एलियन बाबू पर झपट भी पड़े।

एक बार तो वे कूद फांदकर बच गए। इतने में देखा कि एक आदमी जो दूर से निकल रहा था। (हमारे यहां ऐसे पराई पीड़ा को जानने वालों की भरमार है) उसने एक पत्‍थर उठाया और भद्दी गालियां निकालते हुए कुत्‍तों पर फेंका। कुत्‍ते दूर हट गए। आदम की परछाई हटी नहीं कि कुत्‍ते फिर मैदान में आ डटे। एलियन ने उस आदमी की दोनों गतिविधियों को गौर से देखा। गालियां जो उसने अपने एडवांस ब्रेन में रिकॉर्ड कर ली थी और एक्‍शन हथियार (पत्‍थर) उठाकर मारना। उसने गौर से जमीन की ओर देखा तो उसे बड़ी संख्‍या में हथियार फैले दिखाई दिए। वह बहुत खुश हुआ। 

रिकॉर्ड की हुई आवाज को ज्‍यों का त्‍यों उच्‍चारित करते हुए वह झुका और हथियार को उठाने के लिए जोर लगाया, लेकिन हथियार जमीन में जोर से गड़ा हुआ था। पहले प्रयास में निकला नहीं। उसने और जोर लगाया, लेकिन हथियार निकला नहीं। इस बीच मुंह से ठीक वही आवाज निकालता रहा। कुत्‍ते एक बारगी तो पीछे हट गए, लेकिन जब उन्‍होंने देखा कि इतना अधिक घामड़ आदमी है कि सही पत्‍थर का भी चुनाव नहीं कर पा रहा है और गड़े हुए पत्‍थर पर अपनी अधिक शक्ति जाया कर रहा है तो वे और जोर से भौंकने लगे। काटने वाला कुत्‍ता गश्‍ती पर था नहीं, वरना काट पीट भी शुरू हो सकती थी। 

काफी देर तक कुत्‍तों के भौंकने और एलियन के पत्‍थर निकालने के प्रयास जारी रहे। आखिर एलियन ने आखिरी हथियार अपनाया और छोटी स्टिक निकाली जो झाड़ू में बदल गई। उस पर बैठकर वहां से रवाना हो गया। इस बीच उसने कहा 

"यह ग्रह बहुत खतरनाक है। 
यहां हमलावर आजाद हैं 
और हथियार बांधकर रखे गए हैं।"

कहानी यहां आकर खत्‍म नहीं हो जाती। दरअसल हमारे बाजार की भी कमोबेश यही स्थिति है। मैंने सुना है राज्‍य की अवधारणा कृषि के बाद शुरू हुई। कृषि में इतना उगता था कि खा पी लेने के बाद भी अधिशेष रह जाता था। इस अधिशेष पर कब्‍जे की कोशिश के मद्देनजर ही कुछ लोगों ने सुरक्षा, व्‍यवस्‍था और न्‍याय के लिए राज्‍य का गठन किया गया। अब राज्‍य के मूलभूत कार्यों में यह शामिल है कि राज्‍य का हर व्‍यक्ति इन चीजों के प्रति सहज रहे। आखिर राज्‍य बनाया ही इसीलिए गया कि इन आधारभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो जाए, इसके बाद इंसान आगे बढ़ने का प्रयास करे। लेकिन हो इससे उल्‍टा ही रहा है। हर इंसान इन आधारभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए अपना पूरा जीवन व्‍यतीत कर रहा है। 

अब बात करते हैं सट्टे की। सट्टे की मनोवृत्ति को एक सटोरिए ने बहुत शानदार तरीके समझाया। सुपर बाउल खेल में से कुछ जुआरियों को पकड़कर पुलिस ले जा रही थी। कार्रवाई के दौरान ही बारिश शुरू हो गई। इसी बीच कार में बैठे एक जुआरी ने पुलिस वाले से पूछा कि क्‍या तुम बता सकते हो कि कार की दोनों खिड़कियों की सिरे पर जो बूंदें लटक रही हैं, उनमें से कौनसी बूंद पहले नीचे आ गिरेगी। पुलिसवाला सोचने लगा। इतने में जुआरी हंसा, उसने कहा तुम हमें रोक नहीं सकते। हम कभी भी, कहीं भी, कैसे भी सट्टा कर सकते हैं। 

यही सटोरिए एक दिन हमारे मुक्‍त बाजार के हिमायती सिस्‍टम में वहां घुस गए, जहां आम आदमी भी बुरी तरह प्रभावित होता है। अनाज में। देश के 95 प्रतिशत लोग अन्‍न पर निर्भर हैं। कुछ समुद्री किनारों वाले लोग भले ही मांस मच्‍छी नियमित खाने में खाते होंगे, लेकिन शेष लोग गेहूं, बाजरी, चावल, जौ, मक्‍का और दालों पर ही जिंदा हैं। इन लोगों को यह रोजाना न मिले तो व्‍यवस्‍था बिगड़ सकती है, लेकिन वर्ष इक्‍कीसवी सदी के पहले ही दशक में हमारे सामने बड़े सट्टा बाजार आ चुके थे। इन्‍हें नाम दिया गया कमोडिटी एक्‍सचेंज। एक है नेशनल कमोडिटी एस्‍कचेंज और दूसरा है मल्‍टी कमोडिटी एक्‍सचेंज। इनके अलावा भी कई हैं, लेकिन भारत में ये सबसे बड़े हैं। 

अपने शुरूआती दौर में इन एक्‍सचेंज में ग्‍वार और उड़द जैसी वस्‍तुओं पर अधिक सट्टा हो रहा था, लेकिन बाद में हर चीज को शामिल करते गए। आखिर एक दिन यह स्थिति आई कि किसान भले ही पहले की तरह भूखा मर रहा हो, लेकिन हैजर्स (यह कुलीन सटोरिए होते हैं), सटोरिए और जुआरी भावों को तय कर माल लूटने लगे। नतीजा यह हुआ कि आम उपभोक्‍ता तक पहुंच रही वस्‍तुएं इतनी महंगी हुई कि हाहाकर होने लगा। 

जब किसानों ने देखा कि उन्‍हें बीज मिल रहा है दोगुने दाम में और फसल बिक रही है आधे दाम में तो उन्‍होंने बगावत कर दी। बाजार की स्थिति सामने दिख रही थी। सरकार झुक गई। सरकारी नियंत्रण के तहत फसलों का मूल्‍य तय करने के लिए एक आधारभूत राशि तय करने का प्रयास किया जाता है। जिसे सरकार समर्थन मूल्‍य कहती है। यानी किसानों से कहा जाता है आप तो फसल उगाओ, अगर नहीं बिकी तो कम से कम इस कीमत में तो हम ले ही लेंगे। 

नतीजा यह हुआ कि हर साल समर्थन मूल्‍य में बढ़ोतरी होने लगी। इस तेज बढ़ोतरी के बाद हर बार सट्ट बाजार और अधिक सक्रिय होकर फसलों के दाम और बढ़ाने लगा। नतीजा यह हुआ कि अन्‍न और दूसरे खाद्य पदार्थ और महंगे हुए।

मुक्‍त और नियंत्रित बाजार में ऊपर बताई गई कुत्‍ते और पत्‍थर वाली समस्‍या ही है। यहां कुत्‍ते आजाद हैं और पत्‍थर बंधे हुए हैं। सरकारी नियंत्रण समर्थन मूल्‍य को बढ़ाने के इतर और कुछ कर नहीं पाता और बाजार सरकारी नियंत्रण की इस बेबसी का जमकर फायदा उठाता है। 

दूसरे देशों को देखें तो वहां या तो पूर्णतया सरकारी नियंत्रण है या पूर्णतया मुक्‍त बाजार है। भारत में दोनों व्‍यवस्‍थाएं होने से आखिर में केवल ट्रेडर और सटोरिया ही फायदे में नजर आ रहा है। या‍ फिर सरकार पर दबाव बनाकर समर्थन मूल्‍य बढ़वाकर अपना माल बेचने वाले बड़े किसान (जो आमतौर पर रसूखदार लोग होते हैं) ही फायदा उठा रहे हैं। 

अगर सरकार नियंत्रण रखती है तो उसे इस प्रकार का नियंत्रण रखना चाहिए कि किसान की जरूरत के मुताबिक उसे फसल का सही दाम मिल जाए और उपभोक्‍ता पर बिचौलियों की कसरतों का दबाव न आए। ऐसे में सरकारी नियंत्रण को सफल कह सकते हैं। वरना बिचौलिए अपना पेट भरते और बढ़ाते रहेंगे, किसान और उपभोक्‍ता अधिक पिसते और मरते रहेंगे। 

या फिर बाजार को ही मुक्‍त कर दिया जाए। जिसे जिस भाव में जो सामान जहां मिल रहा है, वहीं खरीदे। इस खुले बाजार में जो शेर होगा वही चरेगा, न सरकार की जरूरत न नियंत्रण का दबाव। बाजार खुद ब खुद नियंत्रित हो जाएगा। 

वरना पत्‍थर बंधे रहेंगे और कुत्‍ते भौंकते रहेंगे... 

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

राहुल का निर्णायक समय

Posted: 01 Feb 2014 04:47 PM PST
राहुल गांधी के पास यह बेहतरीन मौका था जब वे अपनी बात को अपने तरीके से देश की जनता के सामने रख सकते थे। कांग्रेस और राहुल ने अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए 500 करोड़ रुपए खर्च किए है। पर उसका असर दिखाई नहीं पड़ रहा है। राहुल की सरलता को लेकर सवाल नहीं है। पार्टी की व्यवस्था को रास्ते पर लाने की उनकी मनोकामना को लेकर भी संशय नहीं है। पर वे अभी तक जो भी कह रहे हैं या कर रहे हैं, उसका बेहतर संदेश जनता तक नहीं जा रहा है। अर्णब गोस्वामी के साथ बातचीत में भी उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला किया और उल्टे 1984 की सिख विरोधी हिंसा का विवाद उनके गले पड़ गया।

सन 1984 और 2002 की हिंसाएं आज भी हमारी राजनीति पर हावी हैं। बेशक इन दोनों घटनाओं के साथ महत्वपूर्ण बातें जुड़ीं हैं। पर राजनीति सिर्फ इतने तक सीमित नहीं रह जाएगी। हमें भविष्य की ओर भी देखना चाहिए। लगता है कि राहुल गांधी कांग्रेस को घेरने वाले जटिल सवालों की गम्भीरता से या तो वे वाकिफ नहीं हैं, वाकिफ होना नहीं चाहते या पार्टी और सरकार ने उन्हें वाकिफ होने नहीं दिया है। पिछले महीने ही कांग्रेस पार्टी ने अंतरराष्ट्रीय पब्लिक रिलेशंस कम्पनी बर्सन-मार्सटैलर और जापानी मूल की विज्ञापन कम्पनी डेंत्सु इंडिया को पार्टी की छवि सुधारने का काम सौंपा है। लगभग 500 करोड़ के बजट के इस काम का परिणाम कुछ समय में देखने को मिलेगा, पर राहुल का पहला इंटरव्यू कोई सकारात्मक संदेश देकर नहीं गया।


राहुल से उतने तीखे सवाल नहीं पूछे गए, जितने पूछे जा सकते थे। राहुल के खिलाफ व्यक्तिगत तो नहीं, पर रॉबर्ट वाड्रा को लेकर कुछ आरोप हैं। पर अर्णब ने वे बातें नहीं उठाईं। उनका इरादा उन्हें परेशान करने का नहीं था, बल्कि उनकी ही बात को सामने लाने का था। टाइम्स नाउ को इस इंटरव्यू के लिए जान-बूझकर चुना गया होगा। इसके पहले वे एक हिंदी अख़बार को भी इंटरव्यू दे चुके थे। अख़बार में बेहद मामूली सवाल पूछे गए थे। पर वे प्रिंट में थे। टीवी में व्यक्ति की मुखमुद्रा भी काफी कुछ कहती है। राहुल गांधी इस इंटरव्यू के मार्फत इस धारणा को नहीं तोड़ पाए कि वे नरेंद्र मोदी का सामना करने से घबराते हैं। उनसे सीधे पूछा गया कि क्या आप नरेंद्र मोदी का सीधा आमना सामना करने से बच रहे हैं। इसका सीधा जवाब देने के बजाय उन्होंने कहा, इसे समझने के लिए आपको यह भी समझना होगा कि राहुल गांधी कौन है और राहुल गांधी के हालात क्या रहे हैं।

जब उनसे जन सम्पर्क में देरी और राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होने की अनिच्छा के बाबत पूछा गया तो उन्होंने पूछने वाले से उल्टा सवाल किया, आप एक पत्रकार हैं। जब आप छोटे रहे होंगे तो आपने सोचा होगा कि मैं कुछ करना चाहता हूंकिसी एक पॉइंट पर आपने जर्नलिस्ट बनने का फैसला किया होगाआपने ऐसा क्यों किया? इसपर अर्णब गोस्वामी ने कहा, आप मेरे सवाल का जवाब देने से बच रहे हैं। राहुल का जवाब था कि मुझे केवल एक चीज दिखाई देती है कि सिस्टम को बदलना है।

सिस्टम को बदलने की उनकी मनोकामना उनसे पूछे गए हर सवाल का जवाब थी। तीखे सवालों के तीखे जवाब देने के बजाय वे सवालों को टालते नजर आए। उनसे पूछा गया कि वे टूजी के मामले में कुछ क्यों नहीं बोले, कोलगेट मामले में चुप क्यों रहे? पवन बंसल और अश्विनी कुमार के मामले में संसद में छह दिन तक गतिरोध रहा, आपको नहीं लगता कि उस समय बोलना चाहिए था? महंगाई पर नहीं बोलना चाहिए था? दर असल ये वे सवाल हैं, जिनका जवाब जनता चाहती है। पार्टी के संगठन को लेकर उसकी जिज्ञासा उतनी नहीं है। ऐसे सवालों के जवाब में उन्होंने देश की बुनियादी समस्याओं का हवाला देना शुरू कर दिया। पर ऐसी कोई ठोस योजना पेश नहीं की, जो आश्वस्त करती हो।

उनके इस इंटरव्यू से भाजपा को फायदा हुआ या नहीं, पर इससे कांग्रेस कुछ खास फायदा नहीं ले पाई। इसका मतलब क्या यह है कि कांग्रेस ने हार मान ली है और वह 2014 के बाद के चुनाव के बारे में सोचने लगी है, जो अनिश्चितता के कारण दो-एक साल बाद भी हो सकते हैं? क्या राहुल गांधी लम्बी रेस के घोड़े के रूप में विकसित हो रहे हैं? ऐसा है तो 500 करोड़ के मेक ओवर की अभी जरूरत क्या है? कांग्रेस क्यों नहीं अपना जनाधार तैयार करती?गाँवों और मोहल्लों में रहने वाले मुफ्त के कार्यकर्ता सिर्फ माइक्रोफोन और दरी के सहारे चार पूड़ी खाकर अच्छा प्रचार कर सकते हैं। पर क्या कांग्रेस वही पुरानी कांग्रेस है, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन चलाया था? क्या नेहरू-गांधी परिवार पर अतिशय-अवलम्बन कांग्रेस के पराभव का कारण नहीं है? क्या पार्टी को परिवार से बाहर निकल कर नहीं सोचना चाहिए? कांग्रेस पराजित हुई तो ये बातें लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद उठेंगी।

राहुल गांधी के समर्थकों का कहना है कि आगामी आम चुनावों में कांग्रेस की हार हुई तो उसका कारण राहुल गांधी नहीं बल्कि केंद्र सरकार होगी जो भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा सकी। दूसरी ओर कहा जा रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार स्वतंत्र नहीं थी। वास्तविक सत्ता पार्टी अध्यक्ष के पास थी। पार्टी के भीतर का एक सोच यह है कि चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं। इस बीच हालात बदल सकते हैं। केवल एक इंटरव्यू से नतीजे तय नहीं होते। करन थापर के कार्यक्रम में तीखे सवालों से परेशान होकर नरेंद्र मोदी बीच से ही उठ कर चले गए थे। मोदी भी राहुल की जगह एक घंटे तक सवालों का सामना करते तो लड़खड़ा जाते। पार्टी की योजना लगातार कई बड़े इंटरव्यू देने की है। हो सकता है कि अगले इंटरव्यू में उनका प्रदर्शन इससे बेहतर हो। राष्ट्रपति ओबामा भी 2012 में राष्ट्रपति पद के चुनाव से पहले हुई तीन टेलीविजन डिबेटों में से पहली में अपने प्रतिद्वंद्वी से पिछड़ गए थे। बाद में उनका प्रदर्शन बेहतर हुआ। दूसरी और उनके क़रीबी नेता यह भी कहते हैं कि पार्टी अगर चुनाव हारेगी तो यह खराब होगा, लेकिन हार के बहाने से राहुल उन नेताओं को पार्टी से अलग करने में कामयाब होंगे जो बोझ बने हुए हैं।

फिलहाल राहुल गांधी चाहें या न चाहें लोकसभा चुनाव दो नेताओं के इर्द-गिर्द ही लड़ा जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों के दो चेहरे सामने हैं। शायद अरविंद केजरीवाल भी तीसरे चेहरे के रूप में सामने आएं। इनमें सबसे ज्यादा दबाव राहुल पर ही है। अगले दो-तीन महीने में वे मीडिया में अपनी छवि सुधार लें तब भी आसार अच्छे नहीं हैं। सन 1977 और 2014 की परिस्थितियों में बुनियादी फर्क है। इस चुनाव में आंधियों का अंदेशा है।