व्यक्ति को जीने, स्वतंत्रता का उपभोग करने तथा खुद को निरापद बनाने का अधिकार है। किसी व्यक्ति को दास बनाकर नहीं रखा जा सकता। साथ ही, दासता और दासों की खरीद-फरोख्त पर कानूनी रूप से मनाही भी है। किसी व्यक्ति को शारीरिक यंतण्रा नहीं दी जा सकती और न क्रूरतापूर्ण तथा अमानवीय बर्ताव ही किया जाएगा। उसका न तो अपमान किया जाएगा और न उसे अपमानजनक दंड ही दिया जाए। कानून की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं और बिना किसी भेदभाव के उन्हें कानून का समान संरक्षण पाने का अधिकार है। इस घोषणापत्र का उल्लंघन होने और भेदभाव किए जाने पर प्रत्येक व्यक्ति को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाए। किसी व्यक्ति को मनमाने ढंग से गिरफ्तार और नजरबंद न किया जाए, न ही उसको निष्कासित किया जाए। खुली अदालत में मुकदमा चलाकर सजा मिले बिना, जिसमें उसे अपने बचाव की सभी आवश्यक सुविधाएं दी गई हों, प्रत्येक व्यक्ति निर्दोषसमझा जाए। किसी के एकांत जीवन, परिवार, घर या पत्र व्यवहार के मामले में अनुचित हस्तक्षेप न किया जाए और न उसके सम्मान और प्रतिष्ठा पर किसी प्रकार का आघात किया जाए। साथ ही, उसे अनु चित दखल के विरुद्ध कानूनी संरक्षण का हम रहेगा। हर व्यक्ति को अपने राज्य की सीमा के अं दर स्वेच्छापूर्वक आने-जाने और मनचाहे स्थान पर बसने का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश को छोड़कर दूसरे देश जाने और वहां से लौटने का अधिकार है। प्रत्येक स्त्री और पुरुष को राष्ट्र, राष्ट्रीयता और धर्म के प्रतिबंध के बिना विवाह करने और परिवार बनाने का अधिकार है। प्रत्येक पुरुष और स्त्री को विवाह करने, वैवाहिक जीवन में और संबंध-विच्छेद के मामलों में समान अधिकार हैं। परिवार को समान और राज्य संरक्षण प्राप्त होगा। हरेक को विचार, अंत:करण, धर्मोपासना को स्वतंत्रता का अधिकार है। इसमें धर्म परिवर्तन, धर्मोपदेश, व्यवहार, पूजा और अनुष्ठान की स्वतंत्रता सम्मिलित है। प्रत्येक व्यक्ति को शांतिपूर्ण सभा करने और संगठन बनाने का अधिकार है। शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भी मानव के मूलभूत अधिकारों में है। बच्चों को किस प्रकार की शिक्षा दी जाए, इसका अधिकार उनके माता-पिता को है। वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलाकृति से मिलने वाली ख्याति तथा उसके भौतिक लाभ की रक्षा का भी उसे अधिकार है (27)। कुल मिलाकर, 30 धाराएं मानवाधिकार प्रपत्र में शामिल की गई हैं। भारत में मानवाधिकार रक्षा के प्रयास भारत शुरू से ही मानव और मानवता का सम्मान करनेवाला देश रहा है। मानवाधिकारों के लिए यहां 1829 में ही राजा राममोहन राय द्वारा चलाए गए हिन्दू सुधार आंदोलन के बाद भारत में सती प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। इसी साल नाबालिगों को शादी से बचाने के लिए बाल विवाह निरोधक कानून पारित हुआ। 1955 में भारतीय परिवार कानून में सुधार हुआ और हिन्दू महिलाओं को ज्यादा अधिकार मिले, जबकि 1973 में केशवानंद भारती केस में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान संशोधन द्वारा संविधान द्वारा प्रदत्त कई मूल अधिकार को हटाया नहीं जा सकता। यही नहीं, 1989 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों से सुरक्षा) एक्ट 1989 पारित हुआ और 1992 में संविधान में संशोधन के जरिए पंचायत राज की स्थापना में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू हुआ। 1993 में ‘प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट’ के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना हुई तो 2001 में खाद्य अधिकारों को लागू करने के लिए आदेश पारित किया गया। 2005 में सूचना का अधिकार कानून आया तो 2005 में रोजगार की समस्या हल करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट पारित किया गया और भारतीय पुलिस के कमजोर मानवाधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए। पर मानवाधिकार प्रपत्र पर हस्ताक्षर करने वाला हमारा देश आज मानवाधिकारों के उल्लंघनों का एक गढ़ भी है। यहां करोड़ों लोग बहुत गरीबी में रहते हैं जो साफ-सफाई, बिजली, स्वास्थ्य व शिक्षा-संबंधी सुविधाओं के साथ रोटी, कपड़ा, मकान और पेय जल जैसी जीवन की आवश्यक वस्तुओं से भी वंचित हैं। संकट में आमजन और महिलाएं आम आदमी रोज पुलिस प्रशासन तथा अपराधियों के अत्याचारों को सहने को विवश है। आतंकवाद को रोकने के नाम पर मानवाधिकारों का अतिक्रमण और हनन हो रहा है तो आदिवासी इलाकों में गरीबों और बेघरों को भी बर्बर व्यवहार सहना पड़ता है। महिलाएं घरेलू हिंसा, यौन शोषण, बलात्कार जैसे बर्बर शोषण और दमन की शिकार बन रही हैं। नामी और शक्तिशाली लोग मनमानी करने से बाज नहीं आते। बच्चे भी शिकार आज बड़ी संख्या में बच्चों का शोषण किया जा रहा है। वे मजदूरी कर रहे हैं, परिवार से दूर अकेले इस शोषण का शिकार हो रहे हैं। उनसे जबर्दस्ती काम करवाया जा रहा है। उनके साथ बुरा व्यवहार तो बहुत आम बात है। दुनिया के कई देशों में आज भी बच्चों को बचपन नसीब नहीं है। हालांकि 1992 में भारत में बाल मजदूरी हटाने का लक्ष्य तय किया गया और कहा गया कि यह काम रोक दिया जाएगा पर दुख की बात यह है कि आज 21 साल बाद भी हम बाल मजदूरी खत्म नहीं कर पाए हैं। आज करीब पांच करोड़ बच्चे बालश्रमिक के रूप में कार्य करने को विवश हैं। इनमें से 50 फीसद लड़कियां हैं। क्यों नहीं हटता बालश्रम हालांकि चाइल्ड लेबर एक्ट में 14 साल से कम उम्र के बच्चे को काम पर रखना गैरकानूनी है, जबकि होटलों, ढाबों, कारखानों में खुले तौर पर छोटे-छोटे बच्चों को मजदूरी करते देखा जा सकता है। दूसरे मां-बाप अभिभावकों की अज्ञानता और गरीबी भी इसका बड़ा कारण है क्योंकि बच्चों की कमाई से इनका परिवार आसानी से चल जाता है। अशिक्षा तथा अज्ञानता का लाभ चालाक किस्म के लोग उठा रहे हैं। आशा की एक किरण इतना होने पर भी मानवाधिकार संरक्षण आयोग, महिला आयोग, बाल सुरक्षा व संरक्षण, आदिवासी तथा अनुसूचित जाति व जनजाति के हितैषी कुछ संगठन व्यक्ति बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा के संघर्ष में जुटे हैं। इस बढ़ती धारा के दबाव में सरकार ने बड़े अभियान भी चलाये हैं। केवल कानूनी रूप से ही सही, पर ‘शिक्षा, भोजन, रोजगार के अधिकार उन्हें मिले भी हैं पर अब भी उन्हें अमलीजामा पहनाने के लिए काफी कुछ किया जाना शेष है।
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रविवार, 8 दिसंबर 2013
संकट में मानवाधिकार
नया इतिहास रचतीं उषा
मिसाल
काम के प्रति बहुत ही समर्पित भाव रखने वाली उषा के समय का एक बड़ा हिस्सा इस बात में बीतता है कि कैसे किसी काम को नए तरीके से किया जाए
महिलाओं को कम ब्याज दर पर कर्ज देकर उन्हें स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से देश भर में महिला बैंक की शाखाएं खोलने की तैयारी चल रही है। उषा अनंत सुब्रमण्यम इस भारतीय महिला बैंक की पहली चेयरपर्स न और मैने जिंग डार्योक्टर चुनी गई हैं। उषा वुमेन पावर के लिए नया इतिहास रचने वाली हैं। उनकी जुझारू प्रवृत्ति और क्षमता को देखकर ही उन्हें यह पद दिया गया है। 31 साल के अपने करियर में उन्होंने कई बुलंदियां छुई हैं। कई चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। उषा का गृह नगर चेन्नई है। उन्होंने सांख्यिकी और भारतीय संस्कृति में मास्टर्स डिग्री ली। सांख्यिकी ने उन्हें गणनाओं और आंकड़ों की दुनिया का सिरमौर बनाया और भारतीय संस्कृति ने कर्म के महत्व को समझाया। वे कहती हैं कि भारतीय संस्कृति पढ़ने का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि इसने जोखिम के प्रबंधन में मुझे माहिर बनाया। इससे उषा ने यह सीखा कि विकट परिस्थितियों में कैसे सामान्य रहा जाए। हालांकि परंपरा को वे अपनाने में आगे हैं लेकिन नई चीजों को लेकर भी उनमें जुनून है। काम के प्रति बहुत ही समर्पित भाव रखने वाली उषा के समय का एक बड़ा हिस्सा इस बात में बीतता है कि कैसे किसी काम को नए तरीके से किया जाए। उषा 55 साल की हैं, लेकिन हैं जवानों-सी चुस्त-दुरुस्त। पिता अध्यापक रहे हैं और मां गृहिणी। पिता ने शुरू से उनकी शिक्षा को जीवन की पहली प्राथमिकता दी। उषा ने बताया कि पिता ने उनसे एक बार कहा था कि मैं तुम्हें जो सबसे अच्छी गिफ्ट दे सकता हूं, वह है अच्छी शिक्षा। वह खुश किस्मत थीं कि उन्हें यह गिफ्ट मिला और इसके मान के तौर पर उन्होंने हमेशा पिता का सिर गर्व से ऊंचा रखा। उन्होंने सांख्यिकी की उच्च शिक्षा मद्रास यूनिवर्सिटी से हासिल की और भारतीय संस्कृति की पढ़ाई बंबई यूनिवर्सिटी से। पहली नौकरी एलआईसी में असिस्टेंट मैनेजर के तौर पर की। बैंकिंग के क्षेत्र में 1982 में आई और तब बैंक ऑफ बड़ौदा में बतौर प्लानिंग असिस्टेंट ऑफीसर ज्वाइन किया। 29 साल बैंक ऑफ बड़ौदा में ही बिताये और इसके बाद 2011 में एग्जीक्यूटिव डार्योक्टर बनकर पंजाब नेशनल बैंक आ गई। बैंक ऑफ बड़ौदा में उन्होंने कई शानदार काम किये। वहां उन्होंने लाइफ इंश्योरेंस ज्वाइंट वेंचर की शुरुआत की। साथ ही, ट्रां सफॉम्रेशन प्रोजेक्ट्स चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्र सरकार ने जब महिला बैंक की स्थापना और उससे जुड़े मुद्दों पर ब्लूप्रिंट तैयार करने के लिए एक समिति बनाई, तो सदस्य के तौर पर उषा को भी शामिल किया गया। समिति की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद वित्त मंत्रालय ने बैंक के लिए एक कोर मैनेजमेंट टीम बनाई जिसकी कमान उषा को सौंपी गई। उन्हों ने जिस तरह से अब तक अपना दायित्व निभाया, उससे यही उम्मीद की जा रही है कि राष्ट्रीय महिला बैंक को वे सफलता की बुलंदियों पर पहुंचा देंगी। इस बैंक का उद्देश्य महिलाओं की वित्तीय जागरूकता और उन्हें बैंकिंग फ्रेंडली बनाना है। वे कहती हैं कि मैंने अपने अनुभवों से पाया है कि महिलाओं में कारोबार को लेकर काफी अच्छी समझ होती है। समस्या यह है कि उन्हें मौके नहीं मिलते। जिन्हें मौके मिलते भी हैं उनकी राह में पैसे की किल्लत का एक बड़ा बैरियर होता है। वह उम्मीद जताती हैं कि महिला बैंक उन्हें पैसे भी देगा और अवसर भी। उन्होंने इस बैंक की शाखा अभी केवल सात शहरों में खोली है लेकिन इस वित्त वर्ष के खत्म होने तक उन्हें उम्मीद है कि देश के 25 जगहों पर शाखाएं खोली जाएंगी। हालांकि उन्हें एक-दो बरसों के भीतर देश के हर जिले में बैंक खोलने हैं। रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार, 25 प्रतिशत बैंक ग्रामीण इलाकों में खोले जाने हैं। जाहिर है कि उनकी राह आसान नहीं, लेकिन उन्हें चुनौतियों से प्यार है।
प्र. पूजा कुमारी
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पितृसत्ता की प्रतीक महिलाओं की ‘हाई हील’ जूतियां
आधी बात पूरी बात डॉ. कुमुदिनी पति
हाई हील की वजह से पंजे का पैर की हड्डियों के साथ बनने वाला कोण 90 डिग्री नहीं रह जाता और पैर की हरकत 60 डिग्री नहीं होती। यानी चाल ही बदल जाती है, जिसके कारण बाद में बिना एड़ी वाले जूतों को पहनना भी संभव नहीं रह जाता
अगर आप समझती हैं कि आपकी जूती आपको लंबाई देती है और मर्दो के बराबर खड़ा कर देती है तो यह गलतफहमी है। ऊंची एड़ी के जूते या सैंडल्स महिलाओं के लिए ‘फैशन स्टेटमेंट’ जरूर हैं पर आधुनिक शोध के अनुसार, यह स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। अमेरिका और ब्रिटेन के अस्थि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जूतों को लगातार पहनने से रीढ़, एड़ियों, पैर और उंगलियों की हड्डियों पर पूरे शरीर का भार पड़ता है, जिससे उनके आकार स्थायी रूप से प्रभावित होते हैं यानी उनका आकार हमेशा के लिए बदल जाता है। रीढ़ के मनकों के बीच की जगह कम हो जाती है, मनके बाहर को खिसक जाते हैं और उनके बीच से गुजरने वाले तंत्रिकाओं पर दबाव पड़ता है। कभी-कभी घुटनों में ऑस्टियोपोरोसिस जल्द पैदा हो जाती है या फिर पुरानी ऑस्टियोपोरोसिस गंभीर रूप धारण कर लेती है। बताया जाता है कि ऑस्टियोपोरोसिस 26 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। महिलाओं का अंग-विन्यास भी गड़बड़ा जाता है और उन्हें चलने में दिक्कत होती है तथा पैरों और पीठ में भयानक दर्द होने लगता है। फैशन उद्योग के सलाहकार बताते हैं कि दर्द कम करने के लिए मरहम लगाए जा सकते हैं, सुई लगाई जा सकती है, पैरों की सिकाई की जा सकती है, कमर सीधी करने के लिए व्यायाम किये जा सकते हैं, रात को सोने से पूर्व पैरों की मालिश की जा सकती है और पैरों को बीच-बीच में आराम दिया जा सकता है। कैटवॉक करने से पहले हील वाली जूतियों को पहनकर अभ्यास किया जा सकता है, यह मॉडलों के लिए हिदायत रहती है। पर कोई यह नहीं बताता कि ऊंची एड़ी वाली जूतियां पहनकर रैम्प पर मॉडल गिर चुकी हैं और उनके पैर में फ्रैक्चर भी हुए हैं। हो सकती है अपू रणीय क्षति यह भी छिपाया जाता है कि ऐसे जूतों से शरीर को जो हानि पहुंचती है वह अपूरणीय होती है। यहां तक कि एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड के बाद भी पता चलता है कि मांसपेशियों पर बल पड़ने के कारण उनका आकार बदल जाता है, पिंडलियां सूज जाती हैं, पैर मुड़ जाते हैं और पैर का पिंड काम करना बंद कर देता है। इसकी वजह से पंजे का पैर की हड्डियों के साथ बनने वाला कोण 90 डिग्री नहीं रह जाता और पैर की हरकत 60 डिग्री नहीं होती। यानी चाल ही बदल जाती है और इसके कारण बाद में बिना एड़ी वाले जूतों को पहनना भी संभव नहीं रह जाता। इसलिए हम देखते हैं कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को दोगुना अधिक घुटनों के जोड़ की ‘रिप्लेसमेंट सर्जरी’ करानी पड़ती है। जूतों की प्राचीन परंपरा प्राचीन काल में लोग अधिकतर नंगे पांव चलते थे और उच्च वर्ग के लोग ही पैरों को बचाने के लिए चमड़ा, कपड़ा, काष्ठ या पत्तों का प्रयोग करते थे। महिलाओं के बारे में धारणा थी कि उनके पैरों का बंधा होना इस बात का संकेत था कि उनकी यौनिकता जाग चुकी है। आखिर इसके क्या मायने हो सकते हैं? यही न कि यदि लड़की यौन रूप से सक्रिय हो गई है तो उसको यहां- वहां भागने और भटकने से रोका जाना अनिवार्य है। ईसा-पूर्व ग्रीस में वेश्याएं ऐसे जूते पहनती थीं जिनके तल्लों पर उभरे हुए अक्षरों में कुछ लिखा होता था।
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पहले करियर फिर शादी
करियर में ऊंची छलांग और आर्थिक तौर पर स्वावलंबी होने की जद्दो जहद में लड़कियों की शादी में जहां एक ओर देरी हो रही है, वहीं कुछ लड़कियां ऐसी भी हैं जो मनमाफिक लड़के की तलाश में शादी के बंधन में बंधने में देरी कर रही हैं। लड़कियों की शादी में देरी में आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक मामले कितने जिम्मेदार हैं, ये अहम है क्योंकि जब शादी की परिभाषा ही बदल जाए और इसे सिर्फ समझौता माना जाने लगे तो शादी को लेकर दोबारा से सोचना जरूरी हो जाता है
डॉ. मोनिका शर्मा
तीस साल की निधि मुंबई में एक अच्छे ओहदे पर काम कर रही हैं। उन्होंने पिछले पांच बरसों में अपना फोकस सिर्फ करियर पर ही कर रखा था और शादी के बारे में सोचा तक नहीं। अब निधि विवाह के बंधन में बंधकर घर बसाना चाहती हैं लेकिन शादी का निर्णय करने के लिए उन्हें और उनके परिजनों को कई ऐसे बिंदुओं पर भी विचार करना पड़ रहा है जो आज से कुछ साल पहले तक लड़की और उसके परिवारवालों के लिए विचारणीय नहीं थे। ऐसी ही कहानी संचिता की भी है जो फिलहाल अपना ध्यान अपने करियर पर लगा रही हैं। वह पूरे आत्मविश्वास से स्वीकारती है, ‘मैं सिंगल और खुश हूं। मुझे शादी की कोई जल्दी नहीं। जब तक मुझे सही मायने में समझने वाला जीवन- साथी नहीं मिलता, मैं इंतजार करना चाहूंगी। कभी भी ऐसे रिश्ते के लिए ‘हां’ नहीं कहूंगी जो मुझे पूर्णता न देकर बस एक बंधन में बांध दे।’
गौरतलब है कि बीते कुछ बरसों में हमारे समाज के भीतर करियर में सफल और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व की धनी निधि और संचिता जैसी लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो देरी से शादी करती हैं। उनके लिए शादी को प्राथमिकता देने की सोच वैसी नहीं है जैसी पहले हुआ करती थी। बड़ी उम्र में घर बसाना आजकल आम बात है या यूं कहें कि यह एक ट्रेंड बनता जा रहा है।
मौजूदा मंत्र पहले करियर फिर शादी, यही है मौजूदा दौर का मंत्र। पहले खुद को, अपने जीवन को स्थापित करो और फिर करो परफेक्ट पार्टनर की तलाश। यही है देरी से शादी करने की सबसे बड़ी वजह। आज की लड़कियां विवाह से ज्यादा अपने करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। आजकल न केवल लड़कियां बल्कि उनके परिवार भी चाहते हैं कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद ही बेटी शादी के बंधन में बंधे। इसलिए बड़ी उम्र तक सिंगल रहना अब कोई हैरान करने वाली बात नहीं है। कई सव्रे भी बताते हैं कि न केवल भारत बल्कि अधिकतर एशियाई देशों में शादी करने की उम्र बढ़ी है। इसका सबसे अहम कारण शिक्षित और कामकाजी लड़कियों की संख्या बढ़ना है। अब तो हमारे परिवारों में यह सोच घर कर गई है कि चाहे जितनी देरी हो जाए, शादी करियर में स्थापित होने के बाद ही की जाए। शादी को अब पारंपरिक मान्यता मानकर स्वीकार कर लेने का भाव कम हुआ है। स्वयं को स्वावलंबी बनाकर घर बसाने की सोच को बढ़ावा मिला है। अब औरों की खुशी के लिए नहीं बल्कि अपनी सोच और समझ को ध्यान में रखते हुए जीवनसाथी तलाशे जा रहे हैं।
बदली है शादी की परिभाषा शादी की पारंपरिक परिभाषा बदल चुकी है। पहले पढ़ाई के दौरान ही अभिभावक बेटी की शादी के लिए चिंतित हो उठते थे। लड़कियों के लिए करियर के विकल्प भी बहुत सीमित थे। पारंपरिक हिसाब से देखें तो भारतीय परिवारों में 20 से 25 साल की उम्र को शादी के लिए सही समझा जाता है। पर अब शादी के लिए उम्र का पैमाना कुछ और ही हो गया है। भागती-दौड़ती जिंदगी और करियर की आपाधापी में तीस साल की उम्र तो प्रोफेशनल फ्रंट पर सेटल होते-होते ही निकल जाती है। करियर के लिहाज से ही नहीं, शादी को लेकर हमारी पारिवारिक सोच में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां शादी का निर्णय पूरी तरह परिवार और रिश्तेदारों पर निर्भर करता था, अब खुद लड़कियां यह तय करने लगी हैं कि उन्हें क ब और किससे शादी करनी है। पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर लड़कियां यह फैसला अब वैचारिक और व्यावहारिक सोच को परखते हुए करती हैं। इसमें उन्हें अपनी बढ़ती उम्र की कोई चिंता नहीं। फिक्र है तो बस इतनी कि शादी के बाद वे पूरे सम्मान और सुरक्षा के साथ इस संबंध को जी सकें। अब शादी का निर्णय व्यावहारिक बातों को समझकर किया जा रहा है ताकि आगे चलकर शादी के रिश्ते में न तो अत्यधिक अपे क्षाएं हावी हों और न ही जन्मों का यह साथ घुटन और उपेक्षा का शिकार बने ।
जुड़े हैं विमर्श के नये विषय आज के दौर में शादी का बंधन केवल सात फेरों की रस्मअदायगी भर नहीं है बल्कि दो स्वतंत्र विचार और व्यक्तित्व वाले इंसानों द्वारा जीवन भर साथ निभाने के लिए जोड़ा जाने वाला गठबंधन है। इसलिए इस रिश्ते में बंधने से पहले लड़का और लड़की दोनों अपने मन की हर शंका, हर सवाल का जवाब पहले ही ले लेना चाहते हैं, ताकि शादी के बंधन की मिठास और रिश्तों का सोंधापन सदा कायम रहे। शादी का निर्णय करते समय करियर, पैरेंटिंग, स्वास्थ्य और वित्तीय मसलों पर खुलकर राय देने और लेने का सामाजिक माहौल पहले नहीं था। ऐसे में, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर लड़कियां और उनका परिवार शादी के लिए सोच-समझकर ही ‘हां ’ कहता है। अपनी पसंद, अपनी टाइप का लड़का, जो हर तरह से परिवार और भावी दुल्हन को पसंद आए तो ही शादी का फैसला किया जाता है। जाहिर है कि ये प्रक्रिया भी समय लेती है, जिसके चलते शादी में देरी होती जाती है।
समझौता नहीं साथी चाहिए आमतौर पर देखने में आता है कि करियर के फ्रंट पर आज की शिक्षित और आत्मनिर्भर लड़कियां समझौता नहीं करना चाहतीं और न ही वे अपनी आजादी खोना चाहती हैं। ऐसे में अब वधू पक्ष वाले परिवार भी अपनी बेटी की ख्वाहिशों और तमन्नाओं को लेकर समझौते नहीं करते। आज की कमाती-खाती बेटियों के घर वाले जानते-समझते हैं कि आगे चलकर ऐसे समझौ ते जीवन को तनाव और अपराधबोध से भर देते हैं। इसीलिए रिश्ता तय करने में देरी हो इसकी चिंता न करते हुए सहमति-असहमति के हर बिंदु पर विचार करने के बाद ही शादी के लिए ‘हां’ कहा जाता है। पहले हमारे परिवारों में लड़की की शादी की जल्दी इसलिए होती थी क्योंकि उन्हें वित्तीय और भावनात्मक सुरक्षा शादी के बाद ही मिलती थी। आज स्थिति बिल्कुल उलट है। बेटियां स्वावलंबी हैं और उनकी भी अपनी पहचान है। ऐसे में शादी में जल्दबाजी क्यों करें?
सामाजिक-पारिवारिक दबाव में कमी आज के समय में शादी कर लेने के लिए भाई-बहनों की शादी या सहेलियों की विदाई हो जाने के मामले जैसे तर्क कोई स्थान नहीं रखते। अब शादी एक व्यक्तिगत या पारिवारिक मामला है। विवाह से जुड़े निर्णय में देरी या जल्दबाजी के मसले पर समाज और परिवार का दबाव पहले की तरह नहीं है। इसीलिए बढ़ती उम्र भी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा। सिंगल रहकर अपने करियर को आगे बढ़ाने और अपने मनमुताबिक जीवनसाथी तलाशने के बदले मिलने वाला अकेलापन अब मजबूरी नहीं, स्वयं का चुना हुआ मार्ग है। बीते कुछ बरसों में शादी के बंधन में भी असुरक्षा और अलगाव के मामले बढ़े हैं, जिसे देखते हुए आज के दौर की युवतियों में कुछ और साल सिंगल रहकर, देख- परखकर शादी करने की सोच को बढ़ावा मिला है। शादी को लेकर जो निर्णय किया जाए वह सही हो, इस बात को इतनी अहमियत दी जा रही है कि अब नाते-रिश्तेदारों द्वारा भी कोई दबाव नहीं बनाया जाता है। घर हो या बाहर, अब लड़कियों का देरी से शादी करना बेचारगी या सहानुभूति का मुद्दा नहीं है।
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अनुच्छेद 370-एक विशेष व्यवस्था
यह जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करता है, जिसका आशय है :-
रक्षा, विदेशी मामले, वित्त और संचार क्षेत्र को छोड़कर तमाम अन्य कानूनों, जिन्हें भारत की संसद पारित करती है, को राज्य में लागू किए जाने से पूर्व जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा उनकी पुष्टि किया जाना जरूरी है। यह व्यवस्था 1947में जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान के बजाय भारत में विलय के बाबत हुई थी। इसके लिए जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच सहमति के बाद हुई थी। संधि पर महाराजा हरि सिंह ने दस्तखत किये थे। इसके परिणामस्वरूप जम्मू-कश्मीर के नागरिक शेष भारत में लागू कानूनों के बजाय जम्मू-कश्मीर के संविधान के तहत लागू कानून विशेष की जद में आते हैं। खासकर नागरिकता, सम्पत्ति और अन्य कुछ मूलभूत अधिकारों के मामले में यह व्यवस्था लागू होती है। जम्मू-कश्मीर के संविधान का पहला ही अनुच्छेद कहता है कि राज्य भारत का अभिन्न अंग है और अभिन्न अंग रहेगा। यह अनुच्छेद और इसके साथ ही अनुच्छेद-पांच, जिसके तहत राज्य के लिए कानून बनाने को लेकर भारत की संसद के अधिकार क्षेत्र को परिभाषित किया गया है, को संशोधित नहीं किया जा सकता। इस विशेष व्यवस्था की 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री (हरि सिंह द्वारा नियुक्त) शेख अब्दुल्ला के बीच हुई सहमति से भी पुष्टि हुई। 1952 में दिल्ली एग्रीमेंट में भी विशेष रूप से उल्लेख था कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ ही जम्मू-कश्मीर का अपना ध्वज होना चाहिए और दोनों का दर्जा भी एक समान होना चाहिए। इस बात पर सहमति बनी थी कि राज्य का मुखिया, जिसे सदर- ए-रियासत (या प्रधानमंत्री) कहा गया, का चुनाव राज्य के विधायक करेंगे। इस एग्रीमेंट में राज्य में सामान्य आपातकाल घोषित करने के लिए राष्ट्रपति को अधिकार सम्पन्न करने वाले अनुच्छेद-352 का विरोध किया गया था। राज्य विधानसभा का कार्यकाल पांच के बजाय छह वर्ष का होता है जबकि अन्य निर्वाचित निकायों और संसद का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। अनुच्छेद-370 को लेकर सबसे हालिया विवाद उस समय छिड़ गया जब नरेन्द्र मोदी ने बयान दिया कि यह विशेष व्यवस्था महिलाओं के साथ भेदभाव करती है। मोदी ने कहा कि राज्य की कोई महिला यदि राज्य से बाहर किसी व्यक्ति से विवाह कर लेती है, तो वह राज्य में सम्पत्ति पर अपना अधिकार खो बैठती है। हालांकि ऐसा कहा जाना सही नहीं है। पहली बात तो यह कि इस बाबत अधिसूचना को राज्य के उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। उसके बाद पीडीपी ने एक कानून का मसौदा प्रस्ताव (जिसे नेशनल कान्फ्रेंस ने भी समर्थन दिया था) पेश किया ताकि अदालत के फैसले को निष्प्रभावी किया जा सके लेकिन वह प्रस्ताव पारित ही नहीं हो सका।
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सूबे का अवाम अभी नहीं चाहता बहस
जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष प्रो. सैफुद्दीन सोज से अजय तिवारी की बातचीत
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अनुच्छेद-370 के बारे में बहस की बात कर रहे हैं, कांग्रेस इस पर क्या सोचती है? भाजपा की यही तो परेशानी है कि वह राजनीति करने के लिए कभी भी कुछ भी कहने लग जाती है। जब भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 6 साल केंद्र में हुकूमत थी तब भाजपा को अनुच्छेद-370 की याद क्यों नहीं आई? दरअसल, वाजपेयी भी जानते थे कि ऐसा नहीं किया जा सकता, यह बात भाजपा के भी कई नेता जानते हैं। मोदी के बारे में क्या कहें वो तो कुछ भी न जानते हैं और न समझते हैं। जब नरेन्द्र मोदी ने अनुच्छेद-370 की समीक्षा की बात कही है तो उसके पीछे भी तो कोई गहरी सोच हो सकती है। शायद वह देश की एकता के लिए ऐसा कह रहे हों? वह सालों से गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता है कि वे कुछ जानते नहीं हैं? नरेन्द्र मोदी कन्फ्यूज हैं। वह संविधान के इतिहास को नहीं जानते। जब वह जम्मू- कश्मीर की पृष्ठभूमि को समझते ही नहीं हैं तो फिर उनसे इस विषय पर क्या बहस करना। मोदी भी इस विषय पर क्या खाक बहस करेंगे। बहस या र्चचा उससे की जाती है, जिसे कुछ ज्ञान हो। मोदी को हम इस काबिल ही नहीं समझते तो फिर उनकी बात पर गौर ही क्यों करें। वैसे भी वह बेसिर पैर की बात कर रहे हैं। आप किस आधार पर कह रहे हैं कि अनुच्छेद-370 को हिला या डिगा नहीं सकते? या उसे बदल नहीं सकते? अनुच्छेद-370 संविधान का हिस्सा है, उसे बदला नहीं जा सकता। यह अनुच्छेद ही केंद्र और राज्य (जम्मू-कश्मीर) के बीच पुल का काम करता है। अगर केंद्र सरकार अपना कोई कानून जम्मू-कश्मीर में लागू करती है तो इस पुल के जरिए ही लागू करती है। अब तक केंद्र के 32 विधेयक जम्मू-कश्मीर में इसी तरह से लागू किए गए हैं। अगर जम्मू-कश्मीर की जनता खुद चाहे तो क्या तब भी अनुच्छेद-370 की समीक्षा नहीं हो सकती? क्या राजनीतिक दल तब भी इसकी इजाजत न देंगे? जम्मू-कश्मीर के लोग अगर इस तरह की ख्वाहिश का इजहार करें तो अवश्य समीक्षा हो सकती है। अभी राज्य के लोग नहीं चाहते कि ऐसा कुछ हो। अनुच्छेद-370 के जरिए ही बाहर के लोगों से जम्मू-कश्मीर के लोगों का रिश्ता बना हुआ है। भाजपा और मोदी ने अनुच्छेद-370 का शिगूफा इसलिए छोड़ा ताकि फसाद और झगड़े कराए जा सकें। राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए भाजपा हमेशा से यही सब हथकंडे तो अपनाती आई है। यह भी कहा जा रहा है कि महिलाओं को बाहर शादी करने पर जम्मू-कश्मीर में कोई अधिकार नहीं रह जाते हैं, उस पर आपको क्या कहना है? यह भी झूठा प्रचार है। महिलाओं को कुछ नुकसान नहीं होता है, उन्हें सम्पत्ति में हिस्सा भी मिलता है। राज्य में महिलाओं के लिए अलग कानून हैं। मोदी सारा कुछ झूठ ही कहते हैं; इसलिए महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी वह कह रहे हैं।
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बदले सुर का समय
पुष्प सराफ राजनीतिक विमर्शकार
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में लागू संविधान के अनुच्छेद-370 पर संवाद की नरेन्द्र मोदी की पेशकश विवादित हो गई है। यह सही है कि जनसं घ-अवतार से लेकर भाजपा के रूप में अपने कायाकल्प तक; देश की इस मुख्य विपक्षी पार्टी का रुख कठोर रहा है। हालांकि राजग शासन को साकार करने के लिए भाजपा ने तब इसे स्थगित कर दिया था। अब मोदी ने‘संतुलित और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण’ रखते हुए इस अनुच्छेद की राज्य के संदर्भ में उपयोगिता की समीक्षा किये जाने की बात की है। इसके बावजूद यह बात सियासी हलकों के हलक में आसानी से नहीं उतर रही है तो इसलिए कि संवाद के आह्वान का समय गलत है। दूसरे, वह राजनीतिक लाभ पाने की मंशा से सर्वथा अछूती नहीं है। जम्मू-कश्मीर भारतीय गणराज्य में विलय के समय से ही अतिसंवेदनशील मसला रहा है। फिर वह अलगाववादी और अब आतंकवादी समस्या से ग्रस्त है। जम्हूरियत की जड़ें मजबूत होने के समानांतर ये स्थितियां भी बनी हुई हैं। इसलिए यह सूरतेहाल अनुच्छेद-370 को शिथिल या उन्मूलन करने या इस पर र्चचा करने के मुफीद नहीं हैं। यही वजह है कि न केवल धर्मनिरपेक्ष या मध्यमार्गी दल बल्कि अवाम का एक बड़ा हिस्सा अनुच्छेद -370 को छेड़ने को ‘आ बैल मुझे मार‘ जैसा मानता है। हालांकि इसके साथ यह भी देखना चाहिए कि क्या बिगाड़ के डर से कोई बात न शुरू की जाए ही न? किसी भी मसले पर संवाद लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है। लिहाजा, र्चचा से बचना नहीं चाहिए और व्यापक सहमति-असहमति के आधार पर कोई फैसला लिया जाना चाहिए। हालांकि मोदी ने इस अनुच्छेद पर र्चचा की आड़ में कुछ गलत भी तथ्य दिये हैं-यह कि गैर कश्मीरी से शादी करने पर महिलाओं के हक खत्म हो जाता है या उद्योग-धंधों के फैलाव में 370 आड़े आता है। महिलाओं का हक खत्म करने की कोशिश सफल नहीं हुई है। दूसरे यह कि उद्योगों को फैलाव न देने के लिए अनुच्छेद नहीं भौगोलिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। हस्तक्षेप का यह अंक अनुच्छेद-370 पर र्चचा की भाजपा की मंशा, उसकी टाइमिंग, प्रावधान के सही मतलब और महिलाओं के हालात पर वस्तुपरक विचार करता है-
भारत संघ में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा सुनिश्चित करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को लेकर पिछली एक दिसम्बर को भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने जो कहा उससे बीते साठ से ज्यादा साल से उनकी पार्टी जो कुछ कह-सुन रही थी, वह एकदम से बदल गया है। जम्मू-कश्मीर के सीमांत नगर जम्मू में अब तक की सबसे बड़ी सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने मार्के वाली तार्किक बात कही। यह कि इस बात पर र्चचा होनी चाहिए कि अनुच्छेद 370 की व्यवस्था से क्या राज्य की जनता को फायदा हुआ है या नहीं? उनका यह मत भाजपा द्वारा दशकों से इस अनुच्छेद को हटाए जाने की मांग के कतई उलट है। भाजपा कहती रही है कि भारत संघ और जम्मू-कश्मीर राज्य के बीच वही सम्बन्ध होना चाहिए जो संघीय सरकार का अन्य राज्य सरकारों के साथ है। भाजपा जानबूझकर अभी तक अपनी आंखें मूंदे हुए थी। भाजपा ही नहीं बल्कि उसके जनसंघ और प्रजा परिषद सरीखे अवतार भी देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य की जमीनी हकीकतों से बेखबर रहे। वे इस बात से भी गाफिल रहे कि भारत और पाकिस्तान के वजूद में आने के दो माह बाद ही 27 अक्टूबर, 1947 को भारत पर चढ़ाई किए जाने की पृष्ठभूमि क्या थी? पार्टी ने जोर-शोर से यह नारा बुलंद किए रखा, ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे’। यानी एक देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो ध्वजों की खिलाफ पार्टी करती रही। जम्मू-कश्मीर का पृथक संविधान रहा है। उसका पृथक ध्वज भी रहा। और उसके लोकप्रिय नेता को 30 मार्च, 1965 तक ‘प्रधानमंत्री’ भी कहा जाता रहा था। तीस मार्च, 1965 को इस पदनाम में बदलाव लाया गया और मुख्यमंत्री का नाम दिया गया। साथ ही, राज्य में संवैधानिक मुखिया, जिसे सदर-ए-रियासत कहा जाता था, का नाम भी बदल कर गवर्नर कर दिया गया।
भाजपा के रुख में संजीदा बदलाव यह कोई साधारण बात नहीं है कि नरेन्द्र मोदी ने अपने मूल विचार को ही बदल दिया है। लेकिन इतना साफ है कि उन्होंने अपने तई यह बात जतला दी है कि उनकी पार्टी के लिए जो मुद्दा सर्वाधिक संजीदा रहा है, उस पर वह र्चचा करने को तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह उन तमाम गंभीर मुद्दों पर खुले मन से बात करने को तैयार हैं, जिन्हें लेकर उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता जज्बाती होकर जूझते रहे हैं। दरअसल, यह बदलाव दर्शाता है कि वह अपनी पार्टी द्वारा तय किए गए लक्ष्य को हासिल करने को तत्पर हैं। मोदी इस बात को लेकर जागरूक लगते हैं कि उन्हें अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए अड़ियल रुख छोड़कर संतुलन बनाए रखना होगा। जम्मू-कश्मीर में भाजपा को इस प्रकार के प्रयास से बेहद फायदा होने की उम्मीद उन्हें है। इस संवेदनशील राज्य के जम्मू क्षेत्र में भाजपा का कांग्रेस की भांति ही अपना जनाधार है। अलबत्ता, कांग्रेस के विपरीत इसका जनाधार हिंदू बहुल चुनाव क्षेत्रों तक ही सीमित है। इसके मुकाबले कांग्रेस का कहीं ज्यादा बड़े क्षेत्र में जनाधार है। इसके साथ ही उसे कश्मीर घाटी के कुछ हिस्सों में भी समर्थन मिल जाता है। लद्दाख क्षेत्र की चार विधान सभा सीटों पर भी कांग्रेस को पारम्परिक तौर पर समर्थन मिल रहा है। इस कारण से गठबंधन में सरकार बनाने के मौके पर नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी दोनों को ही कांग्रेस के सहयोग की जरूरत पड़ती है। भले ही घाटी में नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी कट्टर विरोधी पार्टियां हों लेकिन दोनों ही समान रूप से भाजपा को नापसंद करती हैं। भाजपा का घोषित हिंदुत्व भला उन्हें कैसे रास आ सकता है! इसी के साथ भाजपा अनुच्छेद 370 को हटाने की बात भी जोर-शोर से कहती रही है। इस मांग से दोनों पार्टियों के घाटी और जम्मू क्षेत्र की पहाड़ियों में मौजूद मुस्लिम वोट बैंक में खीज पैदा होती है। लेकिन इसी के साथ नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी अपने राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ी सच्चाई को भी अनदेखा नहीं कर सकतीं। अब तक का उनका रवैया बताता है कि वे भाजपा के नेतृत्त्व में जाने तक को भी तैयार रहती हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला केंद्र में भाजपा नीत राजग सरकार में मंत्री थे। बहुत पहले नेशनल कान्फ्रेंस और भाजपा (तब की जनसंघ) एक बार जम्मू के निर्वाचित नगर निगम में सत्ता सहयोगी थे। कौन भूल सकता है कि दोनों पार्टियां प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की घोर प्रशंसक रही थीं।
सुर बदल लेंगी सूबे की पार्टियां मोदी की अभी जो भी और जैसी भी आलोचना नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी कर रही हैं लेकिन अगले साल यदि मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो दोनों ही अपना सुर बदल भी सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अनुच्छेद- 370 को लेकर उनका स्टैंड बदल जाएगा। वे घाटी में अपने जनाधार को खो देने के भय से अपना विरोध जारी रखेंगी। लेकिन वे इस अनुच्छेद को लेकर र्चचा-औपचारिक या अनौपचारिक-के विचार की हामी हो सकती हैं। इसलिए अनुच्छेद-370 पर र्चचा की बात कहा जाना भाजपा के लिए इस अनुच्छेद के खात्मे की बात कहने के मुकाबले एक बेहतर रणनीति है। इससे आगामी असेंबली चुनाव 2014 में पर्याप्त सीटें जीतने की स्थिति में भाजपा को नेशनल कान्फ्रेंस या पीडीपी के साथ सरकार बनाने में कांग्रेस को पछाड़ने में सहायता मिल सकती है। इससे मोदी को जम्मू क्षेत्र में पार्टी के पारम्परिक समर्थन को भी अपने साथ बनाए रखने में मदद मिलेगी। लम्बे समय से खास तौर पर जम्मू शहर और समूचा प्रांत आरएसएस का उत्तर भारत में अच्छा प्रभाव क्षेत्र रहा है। (जम्मू-कश्मीर के दो प्रशासनिक प्रभागों में से यह एक प्रभाग जबकि दूसरा कश्मीर प्रभाग है)। एक दिसम्बर को मोदी का जो स्वागत हुआ, वह आंखें खोल देने वाला रहा। ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया कि यहां के लोगों ने आरएसएस या भाजपा के किसी नेता के लिए इस प्रकार पलक-पांवड़े बिछाएं हों। यहां तक कि 1983 में फारूक अब्दुल्ला से जोरदार मुकाबला कर रहीं इंदिरा गांधी का भी इस कदर स्वागत नहीं हुआ। शहर के मौलाना आजाद मेमोरियल स्टेडियम पर उमड़ी भीड़ ने हर किसी को चकित कर दिया। कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि यह लोगों की स्वत: स्फूर्त भीड़ थी। ऐसी नहीं कि जिसे पार्टी ने कोशिश करके जुटाया हो। यह केवल पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं थी। भाजपा के लिए जम्मू-कश्मीर में तो यह स्थिति खुशी मनाने का सबब कही जा सकती है। यह बात इससे भी पता चलती है कि जम्मू तथा ऊधमपुर लोक सभा सीटों (राज्य में छह लोक सभा सीटें हैं) के लिए पार्टी टिकट के तलबगारों की संख्या बढ़ गई है
जो वास्तविकता है लेकिन यह भी स्पष्ट है कि मोदी को अपना होमवर्क और भी गंभीरता से करना होगा। अपनी पार्टी के ज्यादातर नेताओं की तरह ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर से संबद्ध संवैधानिक प्रावधानों या विशेष व्यवस्थाओं के प्रति पूरा सम्मान नहीं दिखाया है। जैसे कि उनके यह कहे जाने पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई है कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को जो फायदे मिल रहे हैं, वे उनकी बहन सारा पायलट (केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट की पत्नी) को नहीं मिल पा रहे। मोदी कहना चाह रहे थे कि राज्य का स्थायी निवासी (स्टेट सब्जेक्ट) यदि कहीं बाहर की महिला से शादी करता है, तो उसका विशेष दर्जा बरकरार रहता है, जबकि राज्य की कोई महिला बाहर के किसी पुरुष से विवाह कर लेती है, तो उसका दर्जा कायम नहीं रह जाता। यह बात सच नहीं है। ऐसा पहले जरूर होता था लेकिन अब नहीं। करीब एक दशक पहले न्यायिक हस्तक्षेप के चलते बाहरी व्यक्ति से विवाह करने वाली महिला का अब राज्य में विशेष दर्जा समाप्त नहीं हो जाता। अदालत का यह फैसला नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी के कानून बनाकर इसे बदलने के तमाम प्रयासों के बावजूद बरकरार शेष पृष्ठ दो पर..
बीते वर्षो में अनेक केंद्रीय लाभकारी कानून जम्मू-कश्मीर में लागू किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट, भारत निर्वाचन आयोग तथा कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के अधिकार क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर तक बढ़ाया गया है। इससे पहले के पदनाम बदलते हुए मु ख्यमंत्री और गवर्नर नए पदनाम लागू किए जा चुके थे । ऐसा जम्मू-कश्मीर के सहयोग और सहमति से किया गया जिससे इस राज्य के शेष देश के साथ सम्बन्धों में मजबूती आई। राज्य से बाहर के उद्यो गपतियों को पीर पंजाल के दोनों तरफ अपनी यूनिटें लगाने के लिए प्रोत्साहन दिए गए जिनमें लीज एग्रीमेंट भी शामिल थे। भारत संघ से जुड़ने के बाद से जम्मू-कश्मीर ने एक लम्बा रास्ता तय किया है। यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया और तकाजों को ठेस पहुंचाने के प्रयास नहीं किए गए होते तो यह सिलसिला खासा गतिवान हो सकता था। बहरहाल, यह एक अलग विषय है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 370 में भी कुछ सुदृढ़ प्रावधान किए गए हैं।
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