रविवार, 8 दिसंबर 2013

भाजपा का रुख नहीं बदला

अरुण जेटली राज्य सभा सांसद, भाजपा

नरेन्द्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में एक-एक हरफ अनुच्छेद-370 को बनाए जाने की पृष्ठभूमि को लेकर कहा। पं. जवाहरलाल नेहरू के इससे खुद को अलग कर लेने संबंधी आश्वासन का जिक्र किया। अनुच्छेद-370 की इसके पृथक दज्रे से शुरू हुई भारत को पृथकतावाद की तरफ धकेलने तक की यात्रा का उल्लेख करने के साथ लोगों से इस पर र्चचा का आह्वान किया। इस बात के लिए कि इसके फायदे और नुकसान को लेकर क्यों न र्चचा कर ली जाए। हमारे मीडिया के कुछ विद्वतज्जनों ने उनके कहे पहले वाक्यों को भुलाते हुए केवल आखिरी वाक्य उठाया और कह दिया कि यह भाजपा का अपने पूर्व के स्टैंड से हट जाना हुआ। हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि हमारी पार्टी का इस पर पहले जैसा रुख है और वह टस से मस नहीं हुई है। सच तो यह है कि अनुच्छेद-370 खुद अपने ही नागरिकों को दबाने या उनके साथ भेदभाव करने का हथियार बन सकता है। यह कहना भी गलत है कि इस अनुच्छेद के जरिये राज्य को धर्मनिरपेक्ष रखा जा सका है। मेरा निजी अध्ययन तो यह कहता है कि कैसे यह अनुच्छेद लोगों को सताने और उनके साथ ऊंच-नीच करने में वहां की सरकार का साधन बन गया है। अनुच्छेद 370 की तरह अनुच्छेद 35 अ भी ऐसा ही है, जो विभिन्न अनुच्छेदों; अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद- 15 (धर्म जाति, समुदाय या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव न करने), अनुच्छेद- 16 (सरकारी संस्थानों में रोजगार के समान अवसर और आरक्षण), अनुच्छेद - 19 के तहत मिले मौलिक अधिकार समेत बोलने की आजादी, जीने का हक और अनुच्छेद-21 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार को खारिज करता है। मुझे लगता है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का ही इस भेदभावकारी कानून से कुछ लेना-देना है, जो राज्य से बाहर विवाह करने वाली बेटियों से भेदभाव करने की बात कहता है। बेशक, राज्य में ऐसा प्रावधान रहा है। यह 2002 में खत्म कर दिया गया था। यह सच है कि नेशनल कान्फ्रेंस सरकार, जो उमर अब्दुल्ला की पार्टी की सरकार है, ने यह बात जोरदार ढंग से कही है कि राज्य से बाहर शादी करने वाली बेटियों को राज्य में विरासत में कोई संपत्ति नहीं मिलनी चाहिए। इस विचार से घबराई युवतियों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। और उसके बाद 2004 से ही दोनों पार्टियां, पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस, पुत्री-विरोधी इस कानून को फिर से लाए जाने को लेकर तमाम कोशिशें करती रही हैं। चूंकि उमर अब्दुल्ला के बात कहने का अंदाज ही इस प्रकार का रहा है, सो तमाम तथ्यों की तह में न जाते हुए हम बस इतना ही कहना चाहेंगे कि वह इतिहास नहीं बदल सकते।

महिलाओं के हक पर राजनीति

जम्मू-कश्मीर राज्य की कोई महिला राज्य या देश से बाहर रहने वाले पुरुष से विवाह कर लेती है तो उसके पति या संतानों को राज्य की नागरिकता का अधिकार नहीं मिलता है। इसी परिवार की बेटी सारा अब्दुल्ला ने केंद्रीय मंत्री और भारत के नागरिक सचिन पायलट से विवाह किया तो सचिन पायलट एवं उनके बच्चों को जम्मू-कश्मीर में सम्पत्ति खरीदने या शिक्षा लेने का अधिकार नहीं मिल पाया है। इन बच्चों को ब्रिटिश नागरिक श्रीमती मौली के बच्चों की तरह जम्मू-कश्मीर में न तो मतदाता बनने का अधिकार है और न ही चुनाव लड़ कर मुख्यमंत्री बनने का

हेमंत कुमार बिश्नोई उपाध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली

नरेन्द्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर की धरती पर जाकर वहां महिलाओं को सामान अधिकार न दिए जाने का मुद्दा अपने भाषण में उठाया। उनका कहना था कि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर से बाहर रहने वाली महिला से शादी करे तो स्थानीय नागरिक के तौर पर उनके अधिकार कायम रहते हैं। इसके विपरीत उनकी बहन ने राज्य के बाहर रहने वाले पुरुष से विवाह किया तो वह जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिक के तौर पर मिले अधिकार खो देती हैं। मोदी ने दावा किया कि जम्मू- कश्मीर राज्य की महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा रहा है और उन्होंने राज्य के बेटियों के प्रति सौतेला व्यवहार किए जाने को समाप्त करने की मांग उठाई। जब देश में सभी राजनीतिक दलों और अन्य स्वयंसेवी संगठन महिला सशक्तिकरण का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं; तब यह विषय निश्चित तौर पर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। महिलाओं के साथ भेदभाव और उनकी कमजोर स्थिति का लाभ उठाने की प्रवृत्ति को लेकर देश के हर कोने में महिला संगठन पनपते और आंदोलन करते दिखाई देते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि जम्मू-कश्मीर राज्य में महिलाओं के साथ भेदभाव का मोदी का यह नारा देश की जनता को गुमराह करने के लिए है अथवा इसमें कोई सच्चाई भी है। यह बात देश में सभी जागरूक नागरिकों के मन में भी छाई हुई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मोदी के भाषण के तत्काल बाद इसका खंडन कर दिया। ट्वीट किए अपने बयान में अब्दुल्ला ने कहा कि भाषण में प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की या तो जानकारी कम है अथवा यह जान-बूझकर देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास है।

शेख परिवार से जानें असमानताओं को कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में महिलाओं के अधिकारों के मामले में दोनों तरफ से बयानों में स्पष्टता का अभाव है। इसके कानूनी पहलुओं को समझना हो तो जम्मू-कश्मीर के उस परिवार के उदाहरण से समझा जा सकता था; जिसकी तीन पीढ़ियों ने बारी-बारी यहां मुख्यमंत्री का पद सम्भाला। इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला के पुत्र डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने ब्रिटेन की महिला के साथ विवाह किया, विवाह करते ही वह जम्मू-कश्मीर राज्य की स्वाभाविक नागरिक बन गई। वह न केवल यहां के शिक्षा संस्थानों में मेडिकल या इंजीनियरिंग की शिक्षा लेने या कोई सरकारी नौकरी करने तथा राज्य में अपने नाम में सम्पत्ति खरीदने की वैध अधिकारी हो गई। इतना ही नहीं, उन्हें वोट डालने और चुनाव लड़ने का भी अधिकार प्राप्त हो जाता है। इसी तरह उनकी सभी संतानों को भी राज्य में शिक्षा प्राप्त करने या संपत्ति खरीदने और सरकारी नौकरी करने का अधिकार मिल गया। इसी तरह, इनके पुत्र उमर अब्दुल्ला ने भी जम्मू-कश्मीर राज्य से बाहर की रहने वाली महिला से विवाह किया और उनको को भी जम्मू-कश्मीर में अन्य नागरिकों की तरह सभी अधिकार प्राप्त हो गए। इनकी संतान को भी सभी अधिकार कानूनी दृष्टि से पूरे मिलते हैं। इन दो उदाहरणों से इस बात को स्पष्ट करने का प्रयास है कि जम्मू-कश्मीर का कोई भी पुरुष राज्य या देश से बाहर रहने वाली महिला से शादी करता है तो उस महिला और उनकी संतानों को राज्य में सभी नागरिक अधिकार मिल जाते हैं।
मुद्दा यह है कि इसके विपरीत, जम्मू-कश्मीर राज्य की कोई महिला राज्य या देश से बाहर रहने वाले पुरुष से विवाह कर लेती है तो उसके पति या संतानों को राज्य की नागरिकता का अधिकार नहीं मिलता है। इसी परिवार की बेटी सारा अब्दुल्ला ने केंद्रीय मंत्री और भारत के नागरिक सचिन पायलट से विवाह किया तो सचिन पायलट एवं उनके बच्चों को जम्मू-कश्मीर में सम्पत्ति खरीदने या शिक्षा लेने का अधिकार नहीं मिल पाया है। इन बच्चों को ब्रिटिश नागरिक श्रीमती मौली के बच्चों की तरह जम्मू-कश्मीर में न तो मतदाता बनने का अधिकार है और न ही चुनाव लड़ कर मुख्यमंत्री बनने का।

पुरुषों को मिले हुए हैं अधिकार एक ही परिवार के बेटे और बेटी के राज्य से बाहर के नागरिक से शादी कर लेने के कारण, उनकी संतानों के अधिकारों में इतना बड़ा अंतर स्पष्ट करता है कि जम्मू-कश्मीर में स्त्रियों एवं पुरुषों को सामान अधिकार प्राप्त नहीं है। जम्मू कश्मीर के पुरुषों को यह अधिकार मिला हुआ है कि किसी भी विदेशी महिला से विवाह करके उसे राज्य के अन्य नागरिकों के समान सभी अधिकार दिलवा दें लेकिन इसी राज्य में लाखों की संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं; जो भारत के बंटवारे के समय पाकिस्तान से यहां चले आये थे लेकिन उन्हें आज तक राज्य कि नागरिकता के अधिकार नहीं मिले। ये नागरिक लोक सभा में अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए तो मतदान करते हैं और चुनाव लड़ भी सकते हैं लेकिन राज्य की विधानसभा सदस्यों को चुनने का या चुनाव लड़ने का अधिकार इन्हें प्राप्त नहीं है। इनमें प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के परिवार के अनेक पूर्व पड़ोसी भी है; जो पंजाब या देश के अन्य राज्यों में जाने के स्थान पर, बंटवारे के दौरान इस राज्य में बस गए थे। डा. मनमोहन सिंह भी पंजाब के स्थान पर जम्मू- कश्मीर में चले गए होते उन्हीं लोगों में अपने को पाते जिन्हें न तो मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला मिल सकता है और न ही सम्पत्ति खरीदने का हक़ होता।

वह तो विधान परिषद ने रोका वरना.. जहां तक सवाल मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की पार्टी और पीडीपी का महिलाओं के अधिकारों को संरक्षण देने की नीति का है। वह तो ‘जम्मू-कश्मीर स्थायी निवासी ( डिसकवालीफिकेशन) अधिनियम-2004’ को विधान सभा में पारित कराने के ढंग से पता चल जाता है। इस विधेयक को केवल छह मिनट में इन दोनों पार्टयिों में पारित कर दिया था। किस्सा यह था कि जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने सात अक्टूबर 2002 को दिए अपने निर्णय में स्पष्ट कर दिया था कि जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी की बेटी के बाहर रहने वाले व्यक्ति से विवाह करने पर नागरिक अधिकार समाप्त नहीं किये जा सकते। मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार ने उच्च न्यायालय के इस आदेश को रद्द करने के लिए मार्च 2004 में यह विधेयक सदन में पेश किया। इसमें कहा गया था कि राज्य की किसी भी लड़की के बाहर के पुरुष से विवाह करने पर उसके राज्य के नागरिकता के अधिकार समाप्त हो जायेगी। उमर अब्दुल्ला की पार्टी ने इस विधेयक का समर्थन किया और केवल छह मिनट में इसे पारित भी कर दिया गया। लेकिन विधेयक को विधान परिषद् ने पास नहीं किया और इस कारण यह कानून नहीं बन पाया। इसी स्थिति में नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयानों की सच्चाई आसानी से समझी जा सकती है।

दरकार : विषम संघवाद पर विवेकपूर्ण बहस की

भारत का विषम संघवाद केवल जम्मू- कश्मीर पर ही लागू नहीं होता और जम्मू- कश्मीर का मामला ही विशेष मामला नहीं है। और अनुच्छेद-370 ही केवल विषमता को परिभाषित नहीं करता। अनुच्छेद-371 पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर विषम संघवाद के आधार पर इसी तरह लागू होता है। विभिन्न मामलों में अनुच्छेद- 371 संसद की शक्तियों को नगालैंड तक सीमित करता है। यदि अनुच्छेद-370 में राज्य-केंद्र सम्बन्ध का प्रावधान है और उसका सम्प्रभुता और राष्ट्रवाद के मामले से कोई लेनादेना नहीं है तो राष्ट्रीय अखंडता के मुद्दे पर कोई भी बहस फालतू हो जाती है।

प्रो. रेखा चौधरी राजनीति संकाय, जम्मू विश्वविद्यालय

जम्मू में मोदी की ललकार रैली के बाद देश में अनुच्छेद-370 पर ताजा बहस शुरू हो गई है। रैली में अपने भाषण के दौरान उन्होंने इस अनुच्छेद की सार्थकता पर सवाल किया और यह दिखाया कि यह लोगों के विकास और अधिकारों में बाधा बन रहा है। हालांकि मोदी ने इसे समाप्त करने की मांग नहीं की और हमेशा की तरह केवल इस पर विवेकपूर्ण बहस की मांग की। इसके बाद से इसके समर्थकों और विरोधियों के बीच कटु संवाद शुरू हो गया है। अनुच्छेद-370 और विवेकपूर्ण बहस दो असत्य से शब्द हैं। शुरू से ही यह अनुच्छेद दोनों पक्षों में ऐसा जोश पैदा करता रहा है कि इस पर विवेकपूर्ण बहस कभी देखने को नहीं मिली। इसके समर्थकों के लिए यह विश्वास का अनुच्छेद रहा है और इसके विरोधियों के लिए इसका विरोध विश्वास का मुद्दा रहा है। दोनों पक्षों के लिए यह अनुच्छेद बहुत सारी भावनाएं पैदा करता है। यही कारण है कि इस अनुच्छेद के बारे में बहुत सारी गलत धारणाएं हैं। इनमें से कुछ पर र्चचा करना रोचक हो सकता है। स्थायी आवास प्रमाणपत्र को लेकर अनुच्छेद-370 के बारे में भ्रम है। सच्चाई यह है कि राज्य के स्थायी निवासियों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इन विशेषाधिकारों को राज्य के गैर निवासियों को इजाजत नहीं है। गैर निवासियों को अधिकारों से अनुच्छेद-370 की वजह से वंचित नहीं किया गया है बल्कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद-370 को शामिल किए जाने से पहले एक कानून के शामिल किए जाने के कारण किया गया है। यह कानून वर्ष 1927 में बनाया गया था तथा उस समय इसे स्टेट सब्जेक्ट लॉ के नाम से जाना जाता था। यह राज्य से बाहर के लोगों को राज्य में संपत्ति खरीदने और रोजगार करने से रोकता था। इन दोनों पर केवल राज्य के लोगों का अधिकार था। अनुच्छेद-370 का स्टेट सब्जेक्ट लॉ या स्थायी निवासी कानून से कोई सम्बन्ध नहीं है।

सम्प्रभु ता कानून लागू है यहां अनुच्छेद-370 के बारे में इस अनुच्छेद की वजह से ही एक और गलत धारणा यह है कि भारत की सम्प्रभुता जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती। इस अनुच्छेद के समर्थकों और विरोधियों ने इस तर्क का अपने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया है। इसके विरोधी कहते रहे हैं कि भारत की सम्प्रभुता इस राज्य पर अधूरी है क्योंकि इस राज्य पर भारतीय संविधान लागू नहीं होता। इस अनुच्छेद के समर्थकों का तर्क है कि इसके बावजूद राज्य भारत में शामिल है लेकिन इसका भारत के साथ विलय नहीं हुआ है और इस तरह राज्य की अपनी कु छ सम्प्रभुता है। जबकि कानूनी स्थिति बिल्कुल अलग है। सम्प्रभुता का मुद्दा तब ही तय हो गया था, जब राज्य ने भारत में शामिल होने के कागजात पर हस्ताक्षर किए थे। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर भारत की सम्प्रभुता के तहत आता है। अन्य शाही राज्यों की तरह, जो भारत का हिस्सा बन गए थे, जम्मू-कश्मीर भी भारत का हिस्सा बन गया था। सम्प्रभुता के मामले में इस राज्य को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। राज्य पर भारतीय सम्प्रभुता पहले दिन से ही पूरी तरह है। असल में अनुच्छेद-370 इस बात की पुष्टि करता है कि राज्य पर भारतीय सम्प्रभुता है। अनुच्छेद-370 के प्रावधानों के अनुसार केवल दो अनुच्छेद राज्य पर सीधे लागू होते हैं। एक तो स्वयं अनुच्छेद-370 और दूसरा अनुच्छेद-एक। अनुच्छेद-370 में यह परिभाषित किया गया है कि राज्य भारत गणतंत्र का एक हिस्सा है।

तो क्या हुआ अगर अनुच्छेद सम्प्रभुता के बारे में कार्य नहीं करता है। यह मुख्य रूप से राज्य और केंद्र के संबंधों के बारे में बात करता है। राजनीति शास्त्र की शब्दावली में अनुच्छेद-370 को विषम संघवाद के रूप में परिभाषित किया गया है। इसका मतलब यह है कि भारतीय संघ में स्थिति के मामले में जम्मू-कश्मीर अन्य राज्यों के बराबर है लेकिन अन्य राज्यों की तुलना में इसका केंद्र के साथ अलग सम्बन्ध है। इस अनुच्छेद के कारण भारतीय संविधान और संसद के कानून राज्य पर उसकी सहमति से ही लागू हो सकते हैं। जिन मामलों में राज्य पर भारत का संविधान लागू नहीं होता, उन मामलों में राज्य का अपना संविधान होगा। तीन सूचियों में बताई गई शक्तियों का विभाजन राज्य पर लागू नहीं होता है। बाकी शक्तियों में उसे विशेषाधिकार प्राप्त है। ये सभी प्रावधान विषय संघवाद की विशेषताओं के बारे में बताते हैं।

पूर्वोत्तर में भी है यह प्रावधान भारत का विषम संघवाद केवल जम्मू-कश्मीर पर ही लागू नहीं होता और जम्मू-कश्मीर का मामला ही विशेष मामला नहीं है। और अनुच्छेद-370 ही केवल विषमता को परिभाषित नहीं करता। अनुच्छेद-371 पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर विषम संघवाद के आधार पर इसी तरह लागू होता है। विभिन्न मामलों में अनुच्छेद-371 संसद की शक्तियों को नगालैंड पर सीमित करता है। यदि अनुच्छेद-370 में राज्य-केंद्र सम्बन्ध का प्रावधान है और उसका सम्प्रभुता और राष्ट्रवाद के मामले से कोई लेना-देना नहीं है तो राष्ट्रीय अखंडता के मुद्दे पर कोई भी बहस फालतू हो जाती है। रोचक बात यह है कि मोदी ने राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में अनुच्छेद- 370 का मामला नहीं उठाया। इसके विपरीत उन्होंने अधिकारों की भाषा का इस्तेमाल किया। यह राज्य के नागरिकों और उनके अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में है और उन्होंने अनुच्छेद- 370 की समीक्षा पेश की। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-370 की प्रकृति के कारण संसद द्वारा पास किए गए कानूनों का लाभ राज्य के लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में मोदी ने जम्मू की रैली में निश्चित रूप से भाजपा के पारम्परिक रुख से दूरी बनाकर रखी। भारतीय जनसंघ के अस्तित्व के शुरुआती दिनों से ही राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य में भाजपा अनुच्छेद-370 का विरोध करती रही है। इसके पक्ष में इसका यह तर्क रहा है कि इस अनुच्छेद के कारण ही राज्य पूरी तरह भारत के साथ नहीं जुड़ पाया है। मोदी ने जिस संदर्भ में यह बात कही है, इसका परिणाम आने वाले दिनों में क्या दिखाई देगा, यह कहना मुश्किल है। हालांकि इसका भावनात्मक परिणाम दिखाई दे रहा है।

अनुच्छेद अड़ंगा नहीं विकास में

कश्मीर एक बार फिर र्चचाओं में है। इस बार र्चचा के बिंदु का केंद्र यहां की खूबसूरत वादियां, बुनियादी विकास या फिर आतंकवाद नहीं बल्कि अनुच्छेद 370 है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने इस अनुच्छेद पर पुनर्विचार की मांग करके इस मुद्दे को फिर से गरमा दिया है। भाजपा इसको प्रचारित कर रही है कि अनुच्छेद 370 लागू होने के कारण जम्मू-कश्मीर में औद्योगिक गतिविधियां नहीं पनप पा रही हैं। इसलिए यह विकास के मामले में अपने पड़ोसी राज्यों के साथ कदमताल नहीं कर पा रहा है। असली तस्वीर पेश करने के लिए हस्तक्षेप की तरफ से देवेन्द्र शर्मा ने उद्योग मंडल पीएचडी चैम्बर आफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष सु मन ज्योति खेतान से बातचीत की। श्री खेतान ने जम्मू-कश्मीर के औद्योगिक परिदृश्य पर एक रिपोर्ट भी तैयार की है। यहां पेश है बातचीत के संक्षिप्त अंश

अनुच्छेद 370 को लेकर जम्मू-कश्मीर फिर से र्चचाओं में है। इस अनुच्छेद के कारण राज्य के औद्योगिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? किसी भी राज्य में औद्योगिक विकास के लिए कानून और व्यवस्था का मजबूत होना बहुत जरूरी है। यदि उद्यमियों को अनुकूल माहौल मिलेगा तो वह निश्चित तौर पर निवेश करेंगे। पर जम्मू-कश्मीर को लेकर उछाला गया अनुच्छेद 370 मुद्दा सिर्फ राजनीतिक है। इसका औद्योगिक विकास से कोई लेना-देना नहीं है। यदि ऐसा होता तो यहां कोई भी उद्योग नहीं लग पाता। फिलहाल यहां कई उद्योग अच्छा-खासा कारोबार कर रहे हैं। इसके अलावा, कई बड़ी सरकारी और निजी क्षेत्र की परियोजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। इसलिए तथ्यों के आधार पर मेरा मानना है कि अनुच्छेद 370 का मुद्दा सिर्फ राजनीतिक है। क्या इस अनुच्छेद के कारण यहां उद्योग लगाने में कोई बाधा नहीं है? इसमें कोई दोराय नहीं कि यहां कोई भी उद्योगपति सीधे जमीन खरीदकर अपनी यूनिट नहीं लगा सकता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह उद्योग लगा ही नहीं सकता। अन्य राज्यों की तुलना में यहां उद्योग लगाने की प्रक्रिया थोड़ी अलग है। यदि आप यहां कोई संयंत्र स्थापित करना चाहते हैं तो सबसे पहले सरकार से मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद सरकार लीज पर जमीन देगी जिसकी अवधि 90 साल तक की हो सकती है। उद्योग लगाने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए किसी स्थानीय नागरिक को साझीदार बनाया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर में फिलहाल उद्योग-धंधों की क्या स्थिति है? राज्य की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां पड़ोसी राज्य पंजाब की तरह उद्योग धंधे विकसित नहीं हो सकते। पहाड़ी क्षेत्र और बड़े भू-भाग के बर्फ से ढंके रहने के कारण यहां सभी तरह के उद्योग-धंधे विकसित नहीं किए जा सकते। टूरिज्म यहां का सबसे आर्कषक और विशाल सेक्टर है। फिलहाल राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका अहम योगदान है। इस क्षेत्र में विस्तार की व्यापक सम्भावनाएं हैं। इसके लिए राज्य सरकार को पर्यटकों के मन से सुरक्षा सम्बन्धी भय को निकालना होगा। यदि सरकार इस दिशा में कामयाब हो जाती है तो यह पहाड़ी राज्य तेजी के साथ विकास कर सकता है। मौजूदा स्थिति में राज्य की अर्थव्यवस्था में किनकिन क्षेत्रों का विशेष योगदान है? फिलहाल यहां की अर्थव्यवस्था पारंपरिक व्यवसाय खेती, पशुपालन, हैंडलूम, हस्तशिल्प और बागवानी पर केंद्रित है। यहां की 65 फीसद से ज्यादा आबादी खेतीबाड़ी पर ही निर्भर है। देश में सेब की कुल पैदावार में राज्य का करीब 77 फीसद का योगदान है। यहां अखरोट का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इन दोनों जिंसों के निर्यात से राज्य की अर्थव्यवस्था को अच्छी मजबूती मिलती है। इसी के दृष्टिगत जम्मू-कश्मीर को सेब और अखरोट के लिए ‘एग्री एक्सपोर्ट जोन’ घोषित किया गया है। राज्य की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहां और किस तरह उद्योग-धंधे सफल हो सकते हैं? राज्य में निवेश को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2004 में नई उद्योग नीति लागू की गई थी। इसका नीति का उद्देश्य राज्य में उद्योगों के अनुकल ढांचा विकसित करने और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना था। इसके तहत राज्य में नए उद्योगों के लिए प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है। राज्य की यह योजना किसी हद तक सफल भी होती दिख रही है। राज्य में नदियों का जाल बिछा हुआ है। जाहिर तौर पर यहां हाइड्रो पावर के क्षेत्र में व्यापक सम्भावनाएं हैं। इस क्षेत्र में यहां कई बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। यदि सूबे में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का सुनियोजित तरीके से दोहन जाए तो जम्मू-कश्मीर जल्द ही एक समृद्ध राज्य बन सकता है। आपकी नजर में राज्य में औद्योगिक विकास के लिए किस सरकार ने बेहतर काम किया? पीएचडी चैम्बर का उद्देश्य देश में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है। ऐसे में हम किसी भी राजनीतिक पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। राज्य के विकास का दायित्व राज्य सरकार और केंद्रीय एजेंसियों का है। फिलहाल आरोप-प्रत्यारोपों के बजाय यहां मजबूत आधारभूत ढांचा विकसित करने की जरूरत जिससे यहां ज्यादा से ज्यादा निवेश आकर्षित हो सके। यदि यहां के लोगों को भरपूर रोजगार मिलेंगे तो राज्य की ज्यादातर समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।

370 कोई गीता, कुरान तो नहीं कि बदला न जाए

प्रो. हरिओम राजनीतिक विमर्शकार
यह अनुच्छेद हर मामले में जम्मू-कश्मीर और संघ के अन्य राज्यों के बीच अनुचित और अपमानजनक भेद बनाता है, वह केवल लोगों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को कश्मीर में सत्तारूढ़ कुलीन असाधारण विधायी और कार्यकारी शक्तियों में निहित करता है और यह सिवाय नफरत की दीवार के और कुछ भी नहीं है। इसने कश्मीर में सभी वर्ग के नेताओं और साम्प्रदायिक कांग्रेसियों को प्रतिक्रिया के लिए उकसाया जिससे मौलिक तौर पर एक अप्रिय और बुरे कानून की वकालत की चाहत बढ़ी। इसे तत्काल खत्म किये जाने की जरूरत है या फिर इस अनुच्छेद को दुरु स्त करने की जरूरत है क्योंकि कश्मीरी नेतृत्व महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को सम्मानजनक जीवन व्यतीत करने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित करने के रूप में इसका दुरु पयोग किया है

जम्मू की ‘ललकार रैली’ में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के उत्तेजक सुझाव ‘यह पता लगाने के लिए इस पर बहस होनी ही चाहिए कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर और इसके लोगों के लिए फायदेमंद रहा है या इसने उन्हें दारु ण कष्ट दिया है। लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को अवरु द्ध किया है, जिसने समूचे कश्मीर के नेताओं को औंधा दिया है; ने एक सार्थक बहस का आगाज किया है। मोदी ने कहा कि अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर से सिर्फ 50 परिवारों को फायदा हुआ है और शेष लोगों के लिए यह ‘बंधन का चार्टर’ साबित हुआ है। यही वजह कई कि भारतीय जनता पार्टी साठ से अधिक सालों से इस प्रावधान को खत्म किये जाने की मांग करती रही है। यदि यह अनुयायियों द्वारा साबित हो जाता है कि अनुच्छेद- 370 राज्य के लोगों के लिए लाभकारी रहा है और इसने राज्य सरकार को देश के सामरिक दृष्टि से इस महत्त्वपूर्ण राज्य में राज-व्यवस्था लोकतांत्रिक बनाने में मदद दी है तो इसे बनाये रहा जा सकता है। दरअसल, यह अनुच्छेद- 370 की उपयोगिता पर बहस किये जाने का प्रासंगिक व अहम आग्रह है जिसने महत्त्वपूर्ण दौर में बहस का आगाज किया है। यह होनी ही चाहिए ताकि संविधान के इस सर्वाधिक विवादास्पद और विशिष्ट प्रावधान से जम्मू- कश्मीर को हुए नफा-नुकसान का आकलन किया जा सके। प्रतिगामी राजनीति के शून्य शब्दकोष मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कान्फ्रेंस (नेकां) के कार्यवाहक अध्यक्ष और उनके पिता केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला, जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सैफुद्दीन सोज, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, भारत की मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्य सचिव मोहम्मद यूसुफ तारीगामी और उनके जैसे ही अन्य लोगों ने मोदी के सुझाव को रौंदने के लिए हाथ मिलाया है। वस्तुत: वे राज्य की असल आकांक्षाओं पर वज्र प्रहार करते रहे हैं और उन्होंने सदा से इसे नजरअंदाज किया है। अलबत्ता, उन्हें कामयाबी मिलने के आसार नहीं हैं। एक राज्य, एक व्यक्ति और एक राष्ट्र के सिद्धांत की वकालत करनेवाली बीजेपी और मोदी के खिलाफ उनके तेज़ होते हुए हमले, हर बीतते हुए घंटे के साथ तीखे होते जा रहे हैं। बजाय तथ्यों के आधार पर वैध और तर्कसंगत तर्क करने की जगह वे तीन बार मुख्यमंत्री चुने गये शख्स के खिलाफ असंसदीय भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। मोदी पर उनके हमले केवल उनकी अपनी निराशा और हताशा का संकेत है, और साथ ही अनुच्छेद-370 पर बहस में शामिल होने के लिए उनका इनकार भी। यह इस बात को दशर्ता है कि अनुच्छेद-370 पर अपने रु ख का बचाव करने के लिए उनके प्रतिगामी राजनीतिक शब्दकोश में कुछ भी नहीं है। छलपूर्ण तर्क सभी का एक सूत्रीय एजेंडा राज्य को राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग रखने का है, जिससे कि घाटी का सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग और उनके एजेंट राजनीति और अर्थव्यवस्था पर उनका बोलबाला बनाये रख सकें और कश्मीर को भारत से तोड़ने के उनकी सदियों पुरानी घोषणा पत्र को पूरा कर एक स्थानीय कुलीन तंत्र को स्थापित कर सकें। यह कहना उचित होगा कि उनका यह सारा काम भारत और सभी भारतीयों के उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो कि घृणा और अवमानना का है और वे छल, भावनात्मक ब्लैकमेल और इनमे भी सबसे बुरी साम्प्रदायिकता के बल पर राजनीति में पनपे और जन्मे हैं।और तर्क है कि वे कांग्रेस, जदयू, सपा और वाम दलों, विशेष रूप से भाकपा और माकपा जैसे अल्ट्रा सांप्रदायिक पार्टयिां जो भारत को लगभग दो दर्जन देशों का समूह मानती हैं और जिसमें कि हर समूह को होने का अधिकार है, वे अपने रु ख का बचाव करने के हताश प्रयास में आगे बढ़ रही हैं। यह कह रही हैं कि अनुच्छेद-370 ‘जम्मू- कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक पुल की तरह है। इसके विध्वंस से राज्य का भारत से अपने आप ही अलगाव हो जाएगा। यह एक फर्जी तर्क है। अनुच्छेद-370 का राज्य के भारत में विलय के साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह एक अस्थायी प्रावधान है। इसे भारतीय संसद द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 को लागू करके संशोधित या निरस्त भी किया जा सकता है। याद रखें, यह लेख भारत के संविधान के भाग 21 के अंतर्गत ‘अस्थायी संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान शीर्षक’ में आता है। अत: संसद इसे अनुच्छेद-379 से 391 की तरह निराकृत कर इसे निरस्त करने में पूरी तरह सक्षम है क्योंकि यह भी भारत कि कानूनी किताब के भाग 21 का ही एक हिस्सा है। यहां तक कि भारत के राष्ट्रपति भी अनुच्छेद 370 के अंतर्गत उसको दी गई शक्तियों के तहत कुछ ही समय में इस अनुच्छेद को स्क्रैप कर सकते हैं। इस अनुच्छेद के तहत, संघ के अध्यक्ष को असीमित कार्यकारी शक्तियां प्राप्त है। आवश्यकता है राजनीतिक इच्छा शक्ति की; जिसकी कमी है। खुद शेख ने इसे निर्थक होना बताया था तथ्य यह है कि इस मामले में मोदी को गलत साबित करने के लिए जो तर्क आगे बढ़ाये गए हैं; वे हास्यापद और बेकार हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने देश के खिलाफ 1949 में कश्मीर को अलग करने की साजिश की थी और ‘स्विट्जरलैंड की तरह आजाद कश्मीर’ के कथाकार शेख मुहम्मद अब्दुल्ला जो कि उमर अब्दुल्ला के दादा और फारूक अब्दुल्ला के पिता थे, ने 1963 में संसद को यह बताया था कि अनुच्छेद-370 ने अपनी चमक खो दी है और आने वाले समय में यह निर्थक हो जाएगा। उन्होंने कहा था-‘अनुच्छेद-370 घिस चुका है और क्रमिक क्षरण की प्रक्रिया चल रही है, और हमें उसे ऐसे ही चलने देना चाहिए। अम्बेडकर ने कहाथा विश्वासघाती प्रावधान अनुच्छेद-370 नेहरू और शेख के दिमाग की उपज था और इसे 17 अक्टूबर 1949 को भारतीय संविधान द्वारा मौलाना हसरत मोहानी की स्पष्ट चेतावनी को अनदेखा कर कुछ ही समय में अपनाया गया था. मोहानी ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा बाद में उसे ‘स्वतंत्रता ग्रहण करने के लिए’ प्रेरित करेगा। इससे पहले 27 मई 1949 को प्रो केटी शाह, जो कि बिहार से संविधान सभा के सदस्य थे, ने अपने सहयोगियों से शेख अब्दुल्ला की संदिग्ध साख पर विचार करने के आग्रह के साथ एक आदमी (अब्दुल्ला) की चाहतों के लिए समर्पण न करने के लिए कहा था। हालांकि जवाहरलाल नेहरू ने शाह के बयां को एकमुश्त रूप से अस्वीकार कर दिया था और कहा था कि उन्हें एक कश्मीरी के रूप में कश्मीर के बारे में अधिक पता है और शेख अब्दुल्ला की उनके विचार के लिए सराहना की थी। संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर अम्बेडकर ने 1949 में ही शेख अब्दुल्ला से कहा था : आप भारत और भारतीयों से कश्मीर की रक्षा कराना चाहते हैं। आप कश्मीर और कश्मीरियों को पूरे भारत में सभी अधिकारों का प्रयोग कराना चाहते हैं लेकिन आप भारत और भारतीयों को जम्मू-कश्मीर में उन्ही अधिकारों का प्रयोग नहीं करने देना चाहते हैं। मैं भारत का कानून मंत्री हूं और मैं राष्ट्रीय हित के विश्वासघात का एक अधिनियम पारित नहीं कर सकता।’ नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को अपनी मांग पर विशेष ध्यान देंने के लिए डॉ. अम्बेडकर को समझाने के लिए कहा था। दरअसल, अनुच्छेद-370, हर मामले में जम्मू-कश्मीर और संघ के अन्य राज्यों के बीच अनुचित और अपमानजनक भेद बनाता है, वह केवल लोगों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को कश्मीर में सत्तारूढ़ कुलीन असाधारण विधायी और कार्यकारी शक्तियों में निहित करता है और यह सिवाय नफरत की दीवार के और कुछ भी नहीं है। इसने कश्मीर में सभी वर्ग के नेताओं और साम्प्रदायिक कांग्रेसियों को प्रतिक्रिया के लिए उकसाया जिससे मौलिक तौर पर एक अप्रिय और बुरे कानून की वकालत की चाहत बढ़ी। इसे तत्काल खत्म किये जाने की जरूरत है या फिर इस अनुच्छेद को दुरु स्त करने की जरूरत है क्योंकि कश्मीरी नेतृत्व महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को सम्मानजनक जीवन व्यतीत करने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित करने के रूप में इसका दुरु पयोग किया है। वे राज्य की आबादी का 85 फीसद से अधिक हैं और उनका नेतृत्त्व मोदी के इस सुझाव को अयोग्य समर्थन दे रहा है।

अस्थायी अनुच्छेद के दुष्परिणाम

1947 में जम्मू-कश्मीर में पश्चिम पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थी (आज लगभग दो लाख) अब भी नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित हैं, जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने ही खाली पड़ी सीमाओं की रक्षा के लिए उनको यहां बसाया था। इनमें अधिकतर हरिजन और पिछड़ी जातियों के हैं। इनके बच्चों को न छात्रवृत्ति मिलती है और न ही इन्हें व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश का अधिकार है। सरकारी नौकरी, संपत्ति क्रय-विक्रय तथा स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान का भी अधिकार नहीं है। 63 वर्षो के पश्चात भी अपने ही देश में वे गुलामों की तरह जीवन जी रहे हैं। शेष भारत से आकर यहां रहने वाले व कार्य करने वाले प्रशासनिक पुलिस सेवा के अधिकारी भी इन नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित हैं। 30-35 वर्ष इस राज्य में सेवा करने के पश्चात भी इन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए राज्य से बाहर भेजना पड़ता है और सेवानिवृत्ति के बाद वे यहां एक मकान भी बनाकर नहीं रह सकते। 1956 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने जम्मू शहर में सफाई व्यवस्था में सहयोग करने के लिए अमृतसर (पंजाब) से 70 बाल्मीकि परिवारों को निमंत्रित किया। 54 वर्ष की दीर्घ अवधि के पश्चात भी उन्हें राज्य के अन्य नागरिकों के समान अधिकार नहीं मिले। उनके बच्चे चाहे कितनी भी शिक्षा प्राप्त कर लें, वह जम्मू- कश्मीर के संविधान के अनुसार केवल सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिए ही पात्र हैं। आज उनके लगभग 600 परिवार हैं लेकिन उनकी रिहायशी कॉलोनी भी अब तक नियमित नहीं की गयी है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू न होने के कारण यहां पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण नहीं है। 1947 से 2007 तक कश्मीर घाटी में हरिजनों को कोई आरक्षण प्राप्त नहीं हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के 2007 के निर्णय, जिसके अंतर्गत हरिजनों को कश्मीर घाटी में आरक्षण प्राप्त हुआ, को भी सरकार ने विधानसभा में कानून द्वारा बदलने का प्रयास किया, जो जनांदोलन के दबाव में वापस लेना पड़ा। संपत्ति कर, उपहार कर, शहरी संपत्ति हदबंदी कानून आदि लागू नहीं होते। शासन के विकेन्द्रीकरण के 73 एवं 74वें संविधान संशोधन को अब तक लागू नहीं किया गया। गत 67 वर्षो में केवल 4 बार पंचायत के चुनाव हुए। आज भी भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेद में से 260 यहां लागू नहीं हैं। यहां भारतीय दंड विधान के स्थान पर रणवीर पैनल कोड (आर.पी.सी.) लागू है। अनुसूचित जनजाति के समाज को राजनीतिक आरक्षण अब तक प्राप्त नहीं है। कानून की मनमानी व्याख्याओं के कारण जम्मू व लद्दाख को विधानसभा व लोकसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। जम्मू का क्षेत्रफल व वोट अधिक होने के बाद भी लोकसभा व राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम है। लेह जिले में दो विधानसभाओं का कुल क्षेत्रफल 460000 वर्ग किमी. है। सारे देश में लोकसभा क्षेत्रों का 2002 के पश्चात पुनर्गठन हुआ, परन्तु जम्मू-कश्मीर में नहीं हुआ। यहां विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष है जबकि पूरे देश में यह 5 वर्ष है। भारत के राष्ट्रपति में निहित अनेक आपातकालीन अधिकार यहां लागू नहीं होते।

तब तो फुटबॉल का मैदान हो जाएगा कश्मीर

इस विशाल देश को चलाने के लिए तबियत को भी विशाल आयाम देना होगा। यकीनन आप 370 को हटाएंगे तो 371 भी हटाना होगा। लेकिन ऐसा करके आप आदिवासियों के जल,जंगल,जमीन का अधिकार छीन लेंगे। भारत में जम्मू-कश्मीर का विलय ही इस गारंटी पर हुआ। अगर इसे खत्म करेंगे तो हुर्रियत जैसे अलगाववादियों का ही समर्थन करने लगेंगे। इसलिए 370 का विरोध राष्ट्रीय अस्मिता, संवैधानिक मर्यादाओं, संविधान निर्माताओं की विहंगम दृष्टि और देश की एकता-अखंडता को तोड़ने वाला तथा विभिन्न राज्यों के विलय के प्रस्तावों पर बनी सहमति का भी विरोध है
अतुल कुमार अनजान राजनीतिक विमर्शकार

भारतीय जनता पार्टी समय-समय पर जम्मू-कश्मीर को हमेशा विवाद में घसीट कर लाती रही है। पाकिस्तान के हुक्मरान भी इस सूबे को विवादों में घसीटकर वहां की आंतरिक राजनीति में अपनी भूमिका तलाशते रहते हैं। जैसे वहां के राजनैतिक दल, कुछ बुद्धिजीवी, कुछ अमेरिका की निरंतर जुगाली करने वाले राजनीतिक तत्व, कुछ फौज के रिटार्यड अधिकारी और आईएसआई पाकिस्तान में यही करते हैं। ठीक उसी प्रकार, भारत में भाजपा व उनके कुछ सहयोगी तथा विकट खोपड़ी के बुद्धिजीवी, जो अपनी समझ में निरंतरता का अभाव रखते हैं; वह अनुच्छेद-370 को जम्मू-कश्मीर में कहीं न कहीं अपनी आंतरिक राजनीति का हिस्सा बनाने में संलग्न रहते हैं। अचानक जम्मू में सभा करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरएसएस और भाजपा का पुराना राग छेड़ दिया। भाजपा और संघ की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने वाले यह पाएंगे कि जब भी भाजपा का कोई नया राष्ट्रीय अध्यक्ष या फिर संघ का नया संघ प्रमुख चुना जाता है, वह अनुच्छेद 370 का जिक्र जरूर करता है। नरेन्द्र मोदी उसी कड़ी के नये सिपाही हैं। संघ और भाजपा के नेता 370 का जिक्र करते-करते यह कहते नहीं थकते कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थितियों में जेल में मृत्यु हो गई। प्रश्न यह है कि अगर 370 देश विरोधी है, राष्ट्रीय एकता को तोड़ने वाला है, भारत की सार्वभौमिकता को चुनौती दे रहा है तो जब भाजपा को छह वर्ष तक अटल जी के नेतृत्त्व में प्रधानमंत्री रहते हुए सुअवसर मिला था तो क्यों नहीं वह 370 को समाप्त करने के लिए संसद में संविधान संशोधन ले आए? किसने रोका था? सदन के बाहर शाब्दिक जुगाली और सरकार में रह कर अपने कहे से हट जाने की परिपाटी हिटलर की याद दिलाता है। तत्कालीन गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री अपने को लौह पुरुष कहलाने वाले लालकृष्ण आडवाणी जी ने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत को नये सिरे से क्यों नहीं जांच कराई? कौन उन्हें रोक रहा था? जिस डा. फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को आज संघ व भाजपा का एक धड़ा देश द्रोही की परिभाषा में रख रहा है; उनको बाजपेयी जी ने अपने मंत्रिमंडल में क्यों रखा था? उन्हें एनडीए का हिस्सा क्यों बनाया था? आजादी के बाद कोई भी भारतीय नेता जिन्ना की मजार नहीं गया, फिर आडवाणी जी सपरिवार वहां क्यों गए थे? वे वहां फातिहा क्यों पढ़ रहे थे? ये तमाम प्रश्न हैं, जिनके उत्तर 370 पर बहस की शुरु आत करने के साथ संघ और भाजपा को देना होगा।

किन हालातों में 370 यह जानने की जरूरत है कि किन परिस्थितियों में 370 भारत के संविधान का अंग है? जब राजे- रजवाड़े ब्रिटिश साम्राज्य की भारत विरोधी कूटनीति के हिस्सा बन गए और हमारी आजादी को बंटवारे के साथ-साथ गम्भीर चुनौतियों के सामने ढकेल कर लम्बी अवधि तक खेल करना चाहते थे, उसी के तहत जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़, निजाम हैदराबाद का प्रयोग किया गया। अंतत: जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल ने जम्मू-कश्मीर के विलय के लिए अनुच्छेद 370 का प्रावधान किया और जम्मू-कश्मीर की हरि सिंह की सरकार से एक समझौता किया। राजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला दोनों ने समझौते की पुष्टि की। संविधान में 370 का प्रावधान कर जम्मू कश्मीर सदैव के लिए भारत का अविभाज्य अंग बन गया। अगर आज इसको हम हटाते हैं तो भारत का अविभाज्य अंग जम्मू- कश्मीर समझौते के प्रावधानों के आधार पर नहीं रहेगा। और तब फिर विश्व साम्राज्यवाद, अमेरिका, पश्चिम यूरोप के कुछ देश भारत-पाकिस्तान के बीच दंगल भरा फुटबॉल देखने के लिए हर संभव प्रयत्न करेंगे। भारत एक बहुराज्यीय, बहुधार्मिंक, बहुभाषाई, बहुपरम्परावादी और विभिन्न पुरातन व नवीनतम परम्पराओं व सोच के सम्मिश्रणसे पैदा हुआ एक राष्ट्र है। यहां छोटे से छोटे अल्पमत भाषा के हिफाजत की गारंटी हमारा संविधान देता है। सम्भवत: दुनिया में इकलौता यह देश है; जहां कई सारे धर्म हैं। इंग्लैंड में जहां 80 फीसद ईसाई हैं तो अरब में सौ फीसद इस्लाम को मानने वाले हैं, वहीं भारत में शायद ही कोई धर्म होगा जिसके मानने वाले न हों। इसलिए भारत की अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं आवश्यक प्रावधानों का समावेश इसमें किया। इतना ही कहा जा सकता है कि इस विशाल देश को चलाने के लिए तबियत को भी विशाल आयाम देना होगा। यकीनन आप 370 को हटाएंगे तो 371 भी हटाना होगा। लेकिन ऐसा करके आप आदिवासियों के जल,जंगल,जमीन का अधिकार छीन लेंगे। भारत में जम्मू-कश्मीर का विलय ही इसी गारंटी पर हुआ। अगर इसे खत्म करेंगे तो हुर्रियत जैसे अलगाववादियों का ही समर्थन करने लगेंगे और आप आजाद कश्मीर का विस्तार करवाएंगे।

कश्मीर ही नहीं कई राज्यों में लागू यह प्रावधान अनुच्छेद-370 के कई प्रावधानों में सिर्फ जम्मू-कश्मीर ही नहीं है। उत्तर पूर्व के राज्यों, हिमाचल, यहां तक कि कुछ दक्षिण व पश्चिम के राज्य भी कुछ विशिष्ट अधिकार सम्पन्न बनते हैं। अनुच्छेद 371 में बहुत कुछ वर्णित है। यह राज्यों की अपनी-अपनी बनावट की अस्मिता की हिफाजत करता है। बाहरी राज्य का आदमी हिमाचल में जमीन नहीं खरीद सकता। अनुच्छेद 370-371 को यदि बदलना या संविधान से निकालना चाहते हैं तो बहुमत से संशोधन लाना होगा। फिर इसको हटाना होगा। फिर जम्मू-कश्मीर को खोने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवादियों तथा भारत विरोधी शक्तियों को खेलने का मौका देना होगा। शायद ये गम्भीर बातें संघ और भाजपा की समझ में नहीं आतीं। लेकिन भावनात्मक आधार पर कुछ वोटों के लिए यह राग वह समय-समय पर आधी रात के वक्त मल्हार की तरह अलापते रहते हैं। अफसोस यह है कि इन विषयों पर संसद के बाहर तो भाजपा और संघ के लोग शाब्दिक कुलांचें भरते हुए दिखाई और सुनाई पड़ते हैं परंतु इस विषय पर संसद के अंदर मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कभी भी संविधान संशोधन पेश करने की पहल नहीं करते। देश की संसद में अगर इस विषय को उठाएं तो सम्भवत: बेहतर जवाब मिल जाएगा। साथ ही संविधान सभा में चली हुई बहसों को अगर वे पढ़ लेंगे और संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि को वह समझ लेंगे तो उन्हें पता लगेगा कि राष्ट्रीय आजादी की लड़ाई में ‘साझी शहादत से जो साझी विरासत’

पैदा हुई है, उसे तोड़ना देश द्रोहिता से कम नहीं होगा। हमारे भाजपा व संघ की विडम्बना यह है कि वह राष्ट्रीय आजादी के संघर्षो के हिस्सा नहीं रहे हैं। गो कि संघ का गठन 1925 में हो गया था पर उसका कोई नेता आजादी की लड़ाई में जेल नहीं गया। प्रारम्भ की जनसंघ आज की भाजपा और आरएसएस में 50 लोग भी ऐसे नहीं मिलेंगे, जो आजादी की लड़ाई में जेल गए हों, काला पानी की तो बात ही दूर। इसलिए वह विचार मंथन से पैदा हुए राष्ट्रीय आजादी की लड़ाई के विभिन्न आयामों को अपनी सहभागिता के अभाव के कारण समझ सकने में आज तक असफल रहे हैं। राष्ट्रवाद का नारा लगाकर-370 का भावनात्मक विश्लेषण कर वह अपने को 24 कैरेटीय राष्ट्रवादी होने का दावा कर रहे हैं लेकिन पूरी प्रक्रिया में वह विशाल देश के वक्षस्थल पर निरंतर घाव पर घाव कर रहे हैं। इसलिए 370 का विरोध राष्ट्रीय अस्मिता, संवैधानिक मर्यादाओं, संविधान निर्माताओं की विहंगम दृष्टि और देश की एकता-अखंडता को तोड़ने वाला तथा विभिन्न राज्यों के विलय के प्रस्तावों पर बनी सहमति का भी विरोध है। लिहाजा, अनुच्छेद-370 को समाप्त करने के लिए आवाज उठाना वोटों को बटोरने के लिए राजनैतिक अपरिपक्वता का ज्वलंत उदाहरण है।