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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

मैं राजनीति हूँ

बी.पी गौतम 

मैं राजनीति हूं। मेरा नाम सुनते ही जैसे आपने मुंह सिकोड़ लिया, वैसे ही बाक़ी सब भी नाक-भौं सिकोडऩे लगते हैं, पर आपने कभी यह सोचा कि मेरी गलती क्या है?

आप क्यूं सोचेंगे, मेरी गलती के बारे में, क्योंकि आप तो उन्हीं लोगों की संतान हो, जो बलात्कारी से ज्यादा पीड़ित महिला से घृणा करते रहे हैं। है न? कुछ गलत कह दिया क्या? हां, सच्चाई तो सभी को कड़वी ही लगती है। मैं आप लोगों की तरह चेहरे देख कर बात नहीं कर सकती। जो है,वह स्पष्ट ही कहती हूं। हां,यह सही है कि अब तक मेरे साथ हजारों लोग बलात्कार कर चुके हैं,पर इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह आपका बनाया हुआ नियम है कि पिता, भाई और पति के रूप में स्त्री की रक्षा पुरुष ही करता है, आप मेरी रक्षा नहीं कर पाये, तो आपकी नपुंसकता मेरा गुनाह कैसे कही जा सकती है?, साहस और शक्ति खो देने के कारण अपनी नपुंसकता छिपाने के लिए आप बलात्कार की पीड़ित स्त्री से ही घृणा करने लगते हैं, जबकि मैं मन से आज भी सच, न्याय और ईमानदारी की पुजारिन हूं। आप मेरी मानसिक स्थिति नहीं समझ सकते,क्योंकि आप तो उसी समाज के अंग हो, जो रावण के जबरन छूने पर पतिव्रता सीता को घर से निकाल देता है।

आप मेरे बारे में यही सोचते होंगे कि मैं शुरू से ही ऐसी हूँ। . . . नहीं, मेरी प्रकृति तो आज भी वैसी ही है, जैसी शुरू में थी। शुरू में आज की तरह मेरे कपड़ों पर भी दाग नहीं थे, कपड़े भी एक दम झकाझक सफेद थे, बिल्कुल दूध की तरह। मेरे दामन पर आज जो दाग दिखाई दे रहे हैं, वह मेरी इच्छा से नहीं लगे हैं। आपके भाईयों ने ही जबरन लगाये हैं, लेकिन मुझे अपने ऊपर लगे दाग देख कर बिल्कुल भी रोना नहीं आता,क्योंकि बलात्कारी प्रेम या सम्मान थोड़े ही करते हैं। मुझे दु:ख इस बात का है कि आप अपने बलात्कारी भाईयों से घृणा करने की बजाये, मुझ से घृणा करते हो। अगर, आप अपने बलात्कारी भाईयों से घृणा करने लगें,घर-परिवार से निकाल कर उनका सामाजिक बहिष्कार कर दें, तो समय के साथ मेरे कपड़ों पर लगे दाग भी छूट जायेंगे। मुझे पता है कि आप ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि आप अपने बलात्कारी भाईयों से भी अधिक स्वार्थी हैं, तभी उनके छोटे-छोटे प्रलोभनों पर आप आंख बंद कर उन्हें चुन लेते हैं और वह मेरे साथ निश्चिंत होकर लगातार बलात्कार करते रहते हैं। शुरू में मेरी ओर बुरी नजर से देखने वालों की आंखें निकालने के लिए समूचा जनसमूह खड़ा हो जाता था, पर आज वह स्वार्थी नजर आ रहा है, इसीलिए मेरे साथ बारी-बारी से बलात्कार हो रहा है। 

मेरी दीनहीन अवस्था आज आपके कारण है, जबकि मेरा जन्म ऋषि-मुनियों की घनघोर तपस्या के बाद हुआ था,मैं भी रजवाड़ों में पली-बढ़ी हूँ। मेरी रक्षा के लिए लोगों ने अपने बेटों की बलि तक चढ़ा दी थी,पूरे परिवार को त्याग दिया था,अपना ऐश्वर्य और वैभव छोड़ कर अभावग्रस्त जीवन स्वीकार किया था, लेकिन मेरे कपड़ों पर तुम्हारे पूर्वजों ने दाग नहीं लगने दिया। मुझे मिला वरदान मेरा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ऐश्वर्य और वैभव मेरे साथ ही रहते हैं,जिससे उस समय भी बलात्कारियों की मुझ पर नजर रहती थी, पर यह मेरा सौभाग्य ही था कि उस समय के शक्तिशाली बलात्कारियों को जनसमूह कभी भी प्रेम नहीं करता था। मुझ पर बुरा वक्त पहले भी आता रहा है। समय चक्र ने मुझे मुगलों और हूणों की गोद में लाकर बैठा दिया,उन्होंने मेरा हर तरह से शोषण किया,पर मैं फिर भी न बदली। अंग्रेजों ने भी बलात्कार किया,पर मेरी सोच फिर भी न बदली, लेकिन इन बलात्कारियों ने मेरे कपड़े तार-तार कर दिए,जिससे पूरा शरीर दिखने लगा। लगातार और लंबे समय तक बलात्कारियों के चंगुल में रहने के कारण एक बार तो मैंने यह आशा ही छोड़ दी थी, कि अब मैं कभी मुक्त भी हो पाऊंगी,पर अचानक मुझे बचाने की आवाजें सुनाई देने लगीं, जिससे मेरा साहस बढऩे लगा,फिर मैं सोचने लगी कि खोये हुये सम्मान के साथ नये वस्त्र भी धारण करने को मिल सकते हैं . . . और समय के साथ वह दिन भी आ गया, पर जो मेरे सम्मान की आजादी के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे,उन्हीं लोगों ने मेरा फिर सामूहिक बलात्कार किया और मेरे हृदय रूपी आशियाने के दो टुकड़े करा दिये। मैं बुरी तरह टूट गयी, क्योंकि इस बार अपनों ने बलात्कार किया। इस सबके बाद भी 15 अगस्त 1947 को मैं यह सोच कर खुश थी कि अब मेरे कपड़ों की ओर कोई कीचड़ नहीं उछाल पायेगा और इंतजार करने लगी कि मेरे बेटे शीघ्र ही मुझे नये वस्त्र पहनाकर, ऊंचे सिंहासन पर बैठा कर मेरी पूजा-अर्चना करेंगे, लेकिन आज तक किसी ने मेरे बारे में सोचा तक नहीं है। नये वस्त्रों की तो बात ही छोडिय़े,किसी ने वर्षों से फटे हुए कपड़ों में पैबंद लगाने की बात तक नहीं की। उल्टा सभी मुझ से ही घृणा करने लगे हैं। अब तक मैं चुप रही, पर अब मैं और नहीं सह सकती, क्योंकि स्त्री होना मेरा गुनाह नहीं हो सकता। गुनहगार बलात्कार करने वाले हैं और मूक दर्शक बनकर देखने वाले आप सब लोग नपुंसक हो।आप इस दंभ में ही जिये जा रहे हो कि शारीरिक बनावट से पुरुष हो,तो नपुंसक कैसे हो सकते हो। मुझे इसी बात का दु:ख है, कि पुरुषत्व कर्म में दूर-दूर तक नहीं है, फिर भी अपने पुरुषत्व पर इतरा रहे हो। इतराते रहो, लेकिन अपनी सच्चाई आप भी अच्छी तरह जानते हो। मुझे अब विश्वास नहीं है, कि आप मेरे लिए कुछ करोगे, लेकिन मुझे यह अटूट विश्वास अब भी है कि एक दिन फिर कोई गांधी और सुभाष जैसा मेरा चाहने वाला बेटा पैदा होगा,जो बलात्कारियों को मार भगायेगा और मुझे नये वस्त्र पहना कर ऊंचे सिंहासन पर बैठायेगा। तब श्रेय लेने आये, तो मैं भी आप सब नपुंसकों को घर में नहीं घुसने दुंगी . . . पर तुम जानते हो कि मैं ऐसा भी नहीं कर पाऊँगी, क्योंकि मैं स्त्री हूं और स्त्री को किन्नर भी बाकी बच्चों की तरह ही प्रिय होते हैं। खुश रहो मेरे प्रिय किन्नरों।


लेखक
बी.पी गौतम 
स्वतंत्र पत्रकार बी.पी गौतम पत्रिका गौतम संदेश के संपादक हैं।
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हम लड़ेंगे साथी प्रश्न के कंधों पर चढ़कर

जयराम शुक्ल 

ढेर सारी मंगलकामनाओं के शाब्दिक आडंबर ओढ़कर नए वर्ष में प्रवेश करने का अब मन नहीं करता। नर पिशाचों की शिकार हुयी दामिनी को भी नववर्ष की मंगल कामनाएं मिली होंगी पिछले साल। उन किसानों ने भी बड़ी उम्मीदों के साथ शुरू किया होगा नए साल का सफर जो अधबीच में ही आम की डाल पर गमछे का फंदा बनाकर खुद को फांसी दे दी। सुख शांतिमय संसार व देश की कामनाओं पर जब ग्रहण ही लगना है तो फिर ये "शब्द"क्यों खर्च किए जाएं। दुनिया को अपने रफ्तार से चलना है और सत्ताओं को अपनी व्यवस्था के हिसाब से। हम दुनिया की रफ्तार को तो प्रभावित नहीं कर सकते हैं हां सत्ताओं की व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं, लड़ सकते हैं। राजधानी दिल्ली के विजय चौक पर जबड़े भींचे और मुट्ठी ताने युवाओं के आक्रोश का यही संकेत है। यह आक्रोश देश भर के युवाओं में है, जवानों और किसानों में है। हमें लक्ष्य तय करना है और निशाने साधना है। कमी लड़ाई के माद्दे और लड़ने के जज्बे की नहीं है, कमी है सही लक्ष्य पहचानने की और सटीक निशाना साधने की। वह प्रक्रिया अब शुरू हो गई है। सूरज की तपिश ज्यों-ज्यों बढ़ेगी दिन चढ़ेगा तो कुहासा अपने आप ही छंटेगा।

पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह "पाश" की कविता हम लड़ेंगे साथी को बार-बार पढ़ने, पढ़ाने और सुनाने का मन करता है। इस असमंजस के दौर में कवि-कलाकार और सजर्क ही घुप्प अंधेरे में टार्च दिखाता है। पहले पाश की कविता का पाठ करें फिर आगे बढ़ें। "हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए। हम लड़ेंगे साथी गुलाम इच्छाओं के लिए। हथौड़ा अब भी चलता है,उदास निहाई पर। हल अब भी चलता है चीखती धरती पर। प्रश्न नाचता है प्रश्न के कंधो पर चढ़कर। हम लड़ेंगे साथी.. कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर। बुङी हुई नजरों की कसम खाकर। हाथों पर पड़े घट्टों की कसम खाकर। हम लड़ेंगे साथी..। हम लड़ेंगे तब तक,जब तक खिले हुए सरसों के फूल को बोने वाले नहीं सूंघते। कि सूजी आंखों वाली अध्यापिका का पति जब तक युद्ध से लौट नहीं आता। जब तक पुलिस के सिपाही,अपने भाइयों का गला घोटने को मजबूर हैं। कि दफ्तरों के बाबू जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर। हम लड़ेंगे जब तक, दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है। जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी। जब तलवार न हुई लड़ने की लगन होगी। लड़ने का ढंग न हुआ,लड़ने की जरूरत होगी और हम लड़ेंगे साथी। हम लड़ेंगे कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता। हम लड़ेंगे कि अब तक लड़े क्यों नहीं। हम लड़ेंगे अपनी सजा कबूलने के लिए। लड़ते हुए जो मर गए उनकी याद जिन्दा रखने के लिए।"पिछले कुछ वर्षो से हम लड़ना भूल चुके हैं। जब लड़ाई की इतनी जरूरत नहीं थी तब हम हवा में हाथ लहराकर आसमान में नारे उछालते थे.. हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। जुल्म का जोर, अत्याचार की तीव्रता और बढ़ी है। वैश्विक परिदृश्य में साम्राज्यवादी देश छोटे और कमजोर मुल्कों को खा जाना चाहते हैं। वियतनाम से शुरू हुई लड़ाई अफगानिस्तान तक जारी है, समूचा मुल्क कत्लगाह सा बन गया है। नाटो और तालिबान के दो पाटों में अमन पसंद पख्तून काबुलीवालों को पीसा जा रहा है। शिक्षा की अलख जगाने वाली मासूम मलाला यूसुफ जई सिर पर तालिबान और फिकरापरस्त मुल्लों की गोलियां धंस रही हैं। अफ्रीकी देशों में प्राकृतिक संसाधनों की लूटमार मची है। बाजारवादी लुटेरों का दस्ता वेश बदलकर हिन्दुस्तान में भी घुसने की फिराक में है। साढ़े तीन सौ बरस पहले ईस्ट इन्डिया कम्पनी मसालों का व्यापार करने आई थी। अब“वालमार्ट" बनकर हमारे गली मोहल्लों के खुदरा बाजार में घुसना चाहती है।

थैलियां खुली हैं। रिश्वत और लाबईंग के बूते सरकार के फैसले बदले जा रहे हैं। दिवास्वप्न दिखाया जा रहा है कि किसानों की बरक्कत होगी युवाओं को रोजी मिलेगी। अमेरिका के युवा वाल स्ट्रीट में नारे लगा रहे हैं "रोजी रोटी दे न सके वो सरकार निकम्मी है" वहां निन्यानवे बनाम एक के आंदोलन का ज्वालामुखी धधक रहा है। वालमार्ट वहीं से चलकर आ रहा है। अपने देश में विषमता की खाई और चौड़ी है। कुछ हजार धनपतियों के पास देश की तीन चौथाई अर्थव्यवस्था गिरवी है। ये खाई पटने का नाम नहीं ले रही। तीस करोड़ लोग फुटपाथ, रेल्वे स्टेशनों व धर्मशालाओं के बरामदे में सोते हैं। अम्बानी जी के बंगले के बिजली का बिल साठ लाख रुपए महीना आता है। मोन्टेक सिंह अहलूवालिया के बाद शीला दीक्षित ने गरीबी की नई परिभाषा गढ़ी है कि 600 रुपए की मासिक आमदनी वाला परिवार अपना गुजारा कर सकता है। हमारी नियति ऐसे लोग लिख रहे हैं जो पंचसितारा होटलों में छ: सौ रुपए का एक जाम पीते हैं और वेटर को सोलह सौ रुपए की टिप देते हैं। संसद और विधानसभाओं में चुनकर जाने वालों में बाहुबलियों, अपराधियों और धनपशुओं के आंकड़ों में कोई कमी नहीं। चुनाव काम नहीं कलदार की चमक में जीते जाते हैं।सांपनाथ से गुस्सा हैं तो नागनाथ हाजिर हैं। वोट दें या न दें आपकी मर्जी। नहीं देंगे तो भी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ने वाला है। नेता दलील देते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अविश्वास-असम्मान ठीक नहीं है। क्या अविश्वास और असम्मान की दुहाई में देश को लुटने दिया जाए? बुजुर्ग उलाहना देते हैं कि इनसे अच्छा तो अंग्रेजों का जमाना था। आज के युवा कहते हैं, तानाशाही चलेगी पर भ्रष्टाचार नहीं। पार्टी पालटिक्स में लाजर्र दैन लाइफ बनकर उभरे नरेन्द्र मोदी इसीलिए युवाओं के सर्वप्रिय हैं। उन्हें मोदी जैसा नेता चाहिए जो कहे वो करके दिखाए और जैसा दिखे वैसा जिए।

मोदी किसी के लिए राम हो सकते हैं तो किसी के लिए रावण।

उनके स्वरूप व चरित्र की स्पष्ट परिभाषा है। वे कालिनेमि का चरित्र तो नहीं जीते। आज राजनीति में कस्बे से लेकर संसद तक कालिनेमि का चरित्र जीने वाले नेताओं का पलड़ा भारी है।भाषण और आचरण में कोई तालमेल नहीं। दिन में कुछ रात में कुछ। गरीबों की दुहाई देकर जीतने वाले अरबों के घोटालेबाज बनकर प्रकट होते हैं और उसी काली कमाई से उनकी समानांतर सत्ताएं चलती हैं। आज देश मंजिल की तलाश में चौरस्ते पर खड़ा है। जिस पर भी विश्वास करते हैं वही रास्ते में ठगता है। सवालों से घिरी हुई अवाम को सही जबाब चाहिए और सही जबाब हासिल करने के लिए एक और इन्कलाब हो तो वह भी सही। विजय चौक से लेकर पटना के गांधी मैदान तक के युवाओं के आक्रोश की भाषा को समङिाए। ये चिन्गारी शोला बनकर भड़कने को बेताब है। नए साल में ये तपिश और बढ़े। लावा बनकर भ्रष्टतंत्र, विषमतामूलक व्यवस्था और राजनीति के ढोगतंत्र का समूल विनाश करे, इस साल के जाते-जाते बस यही एक कामना है।

लेखक 
स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं।
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फेसबुक जिंदाबाद

विनोद रिंगानिया

कोई अपना हमें कितना ही बुरा कहे,जब पड़ोसी हमें ताना मारता है तो हृदय के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। दिल्ली गैंग रेप कांड की जिस बात ने दिल के टुकड़े कर दिए वह है ग्लोबल टाइम्स में चीन की यह टिप्पणी कि भारत सामाजिक विकास में अभी चीन से 30 साल पीछे चल रहा है। कोई अमरीका, कोई इंग्लैंड, कोई यूरोप हमें पिछड़ा कहे तो चलता है, लेकिन चीन, जिसने 1948 में हमारे साथ ही यात्रा शुरू की थी, उसकी आज यह मजाल कि हमें इस तरह ताना मारे!

पिछले एक दशक से भारत पश्चिम का दुलारा रहा है। हमारी आर्थिक प्रगति की दर को देखकर इसे आशा जगी थी कि चीन के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए भारत का ही उत्साह बढ़ाना होगा। भारत एशिया में नई ताकत बनकर उभरे तो हमारे लिए ज्यादा अच्छा है, भारत हमारी भाषा समझता है, हम भारत की भाषा समझते हैं। चीन तो दुर्बोध्य है। वहां की लिपि एक रहस्य है। लेकिन यह क्या! चीन के इस सच का हम क्या उत्तर दें। 2012के अंतिम दिन इसने यह क्या कह दिया। भारत में 40 सालों में रेप सात गुना बढ़ गए!

रेप जब सात गुना की रफ्तार से बढ़ रहे थे तो भारत के लोग 2012 के दिसंबर महीने तक का क्यों इंतजार कर रहे थे। क्या वे सचमुच उस बेहूदा भविष्यवाणी में विश्वास रखते थे जिसके अनुसार दुनिया 2012के दिसंबर में खत्म होने वाली थी?दरअसल भारत इंतजार कर रहा था एक ऐसे माध्यम का जो सचमुच जनता का माध्यम हो। सोशल मीडिया, यानी फेसबुक, ट्विटर, यू ट्यूब आदि के रूप में वह माध्यम 2012 तक भारत में भी अपनी पूरी रवानी पर आ गया। मध्य वर्ग की युवा पीढ़ी के हाथों में स्मार्टफोन आ गए, 120 करोड़ की आबादी का छोटा सा फीसद ही अभी फेसबुक पर आया है कि इसका प्रभाव हुक्मरानों के लिए दुःस्वप्न बन गया है। यहां तक कि हरियाणा की खाप पंचायतों को फतवा जारी करना पड़ रहा है कि लड़कियां मोबाइल फोन नहीं रख सकतीं। जनता की नब्ज पर हाथ रखने वाली ममता बनर्जी भांप लेती हैं कि इस जिन्न को शुरू में ही बोतल में बंद कर देना जरूरी है। वे फेसबुक पर कार्टून लगाने वाले प्रोफेसर को जेल भेज देती हैं। बाल ठाकरे पर टिप्पणी करने वाली मासूम सी किशोरी दंगे करवा सकती है, सो महाराष्ट्र का एक पुलिस अफसर उसे जेल में डालने में देर नहीं करता।

पाठक जानते होंगे जंतर मंतर पर 25 दिसंबर को जब संभवी सक्सेना नामक एक 19 साल की बाला को गिरफ्तार कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया तो उसने पुलिस की वैन से ही लोगों को अपनी अवैध गिरफ्तारी पर ट्विट करना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में उसके ट्विट को 1700लोगों ने रिट्विट किया। थोड़ी ही देर में यह संदेश दो लाख लोगों तक पहुंच गया। इंटरनेट पर हंगामा मच गया। पार्लियामेंट स्ट्रीट पर वकीलों, कार्यकर्ताओं, मीडिया की भीड़ लग गई। पुलिस को झुकना पड़ा।

गुवाहाटी में एक मित्र ने पूछा- घटनाएं तो बहुत सारी घटती हैं लेकिन जीएस रोड कांड पर देश भर में क्यों हंगामा खड़ा हो गया? उत्तर है यू-ट्यूब। हमारे प्रश्नकर्ता यू-ट्यूब नहीं देखते, सो उन्हें यू-ट्यूब की ताकत का अहसास नहीं। लेकिन कब तक कोई सोशल मीडिया से अछूता रहेगा। दशकों से सैनिकों की संगीनों के साए में महफूज रही मध्य-पूर्व की सल्तनतें एकाएक अवाम के भय से कांपने लगीं। एक के बाद एक तानाशाही हुकूमतें ताश के पत्तों की तरह ढहने लगीं तो भारत तो पहले से लोकतंत्र है। सोशल मीडिया क्या गुल खिला सकता है यह तो भारत में ही पता चलने वाला है। 2012 सिर्फ एक शुरुआत था। इंडिया गेट, जंतर-मंतर, गेट वे आफ इंडिया या गुवाहाटी के लास्ट गेट पर एकाएक मध्य वर्ग के शिक्षित युवाओं की गैर-राजनीतिक भीड़ के एकत्र होने और दशकों से उपेक्षित समस्याओं का समाधान मांगने जैसे और अधिक वाकये देखने के लिए सत्ताधीशों को तैयार रहना चाहिए।

वर्ष 2012 भारतीय गणतंत्र के इतिहास में मध्य वर्ग के आगाज का वर्ष कहलाएगा। जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के भेदों की दीवारों को फांदकर बना यह अखिल भारतीय मध्य वर्ग हर राजनीतिक दल से उपेक्षित रहा है। अभी तक इसका अपना कोई राजनीतिक दल नहीं है। राजनीतिक दल मध्य वर्ग की समस्याओं को उठाना फिजूल का काम समझते हैं। जब दिल्ली गैंग रेप की घटना पर आवाज उठाई जाती है तब कोई काटजू सलाह देता है गांवों में दलित आदिवासी महिलाओं पर इतने अत्याचार होते हैं उन पर आप लोग क्यों नहीं बोलते। गुवाहाटी में दो घंटे की बारिश के बाद नाले में गिरने से मौत हो जाना एक साधारण बात हो गई है। आप आवाज उठाइए तो कहा जाएगा धेमाजी में इतनी भयंकर बाढ़ आती है आप उस पर कुछ क्यों नहीं बोलते?

वर्ष 2012हुक्मरानों को सावधान कर गया है। मध्य वर्ग अब अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने लगा है। अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी और समाजवाद के बड़े-बड़े शब्दों के पीछे की असलियत वह जानता है। उसे इन शब्दों में नहीं उलझना है। उसे आज की अभी की समस्या का हल चाहिए। उसे मुफ्त का राशन और सब्सिडी की यूरिया नहीं चाहिए। उसे शाम के बाद सुरक्षा चाहिए,अच्छे कालेज-संस्थान में एडमिशन चाहिए, रेल में आरक्षण चाहिए, घर में बिजली चाहिए, जलजमाव, भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए। उसके पास सोशल मीडिया है, वह इन्हें हासिल करने के लिए निकल पड़ा है।

लेखक 
गुवाहाटी के दैनिक अख़बार पूर्वोदय में कार्यरत है।
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जिन्हें नाज है हिन्द पर वह कठघरे में है

पुण्य प्रसून बाजपेयी

जिनके खिलाफ आवाज उठी वे ही अंतिम संस्कार में क्यों थे

हमने शीला दीक्षित को जंतर-मंतर आने से रोका। शीला दीक्षित अंतिम संस्कार में चेहरा दिखा आयीं। हमने मनमोहन सिंह की चकाचौंध व्यवस्था में खोते मानवीय मूल्यों के खिलाफ आवाज उठायी। मनमोहन सिंह खुद सिंगापुर से आये कौफिन में बंद लडकी को रिसीव करने पहुंच गये। हमने सोनिया गांधी को अंधी होती व्यवस्था के खिलाफ जगाने की कोशिश की तो हमें 10 जनपथ के बाहर का रास्ता दिखा कर लड़की के शव पर चंद आंसू बहाने सोनिया गांधी ही हवाई अड्डे पहुंच गयीं। हम नेताओं के तौर तरीके, मंत्रियों के सलीके और पुलिस की ताकत के खिलाफ एकजुट हुये तो नेता, मंत्री और पुलिस ही रात के अंधेरे में मानवीयता का गला घोंट कर सरोकार को दरकिनार कर अपनी मौजूदगी में लड़की का अंतिम संस्कार कर शांति बनाये रखने की अपील कर खुश हो गये। हम क्यों शरीक नहीं हो पाये अंतिम संस्कार में। हम क्या करें। हमें लगा इस व्यवस्था में जो जो दोषी हैं, उन्हें आम लोग एकजुट होकर कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। लेकिन जिस तरह कठघरे में खड़ी व्यवस्था चलाने वाले ही जब पीड़ित लड़की को सफदरजंग से सिंगापुर भेजने का निर्णय लेते हैं और सिंगापुर से ताबूत में बंद लडकी के दिल्ली लौटने पर उसे श्रद्यांजलि देकर अपने होने का एहसास हमे ही कराते हैं, जैसे वह ना हो तो देश रुक जायेगा यह कब तक चलेगा।

यह जंतर-मंतर पर बैटरी से चलने वाले माइक से खामोशी में गूंजती ऐसी आवाज है जिन्हें सुनने के बाद करीब पांच से सात सौ लोगों के सामने यह सवाल खुद ब खुद खड़ा हो जाता है कि उनके विरोध का अब तक का तरीका सरकार-व्यवस्था के सामने कितना अपाहिज सा है। जो देश भर में बन रहे इंडियागेट या मुनीरका या जंतरमंतर से आवाज उठती है, वह मीडिया के जरीये समूचा देश देख तो लेता है लेकिन वह सिवाय भीडतंत्र से आगे क्यों निकल नहीं पाती। बड़े-बुजुर्ग ही नहीं बल्कि स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले लड़के लड़कियां भी जिस शिद्दत से अपने गुस्से का इजहार कागजों पर स्लोगन लिखते हुये और बीच बीच में नारे लगाकर करते हैं, वह किसके खिलाफ है। जो पुलिस नाकाबिल निकलती है, वही पुलिस लड़की के शव की सुरक्षा में लगती है। जो पुलिस सड़क पर अपराधियों को पकड़ नहीं सकती, वही पुलिस इंडिया गेट और लुटियन्स की दिल्ली की सुरक्षा में लग जाती है। जो पुलिस आम आदमी के खिलाफ अन्याय को एफआईआर नहीं मानती वही पुलिस अपनी एफआईआर में इंडियागेट से लेकर जंतरमंतर तक खड़े अपने विरोध के स्वर को अन्याय मान लेती है। जो सरकार चकाचौंध दिल्ली में लुटती अस्मत को संयोग मान कर आंकड़ों तले दिल्ली को सुरक्षित और विकासमय होना करार देती है, वही सरकार अपने विरोध को दबाने के लिये विकास के पायदान पर खड़ी मेट्रो को बंद कर देती है। सत्ता की तरफ जाती हर सड़क पर आवाजाही रोकने के लिये रविवार के दिन भी खाकी का आतंक खुले तौर पर तैनात करने से नही कतराती। यह सारे सवाल जंतर मंतर की सड़कों पर सौ-सौ मीटर तक पड़े उन सफेद कैनवास में दर्ज हैं, जिसे अपने आक्रोश से हर बच्चे ने रंग रखा है। सफेद कागज रंगते रंगते हाथ थकते हैं तो खड़ा होकर कुछ ऐसे ही सवालों को हवा में उछालता है और गुस्से में किसी बुजुर्ग से पूछता है कि क्या आजादी इसी का नाम है। क्या इसी भारत पर नाज है। और सवालो के बीच उसी गुस्से में कोई पिता की उम्र का व्यक्ति जवाब भी देता है, करें क्या जो कुछ नहीं कर सकते वही नेता बन कर सरकार चला रहे हैं। नेता को पढ़ाई-लिखाई कर नौकरी के लिये संघर्ष तो करना नही है। जिन्हे जिन्दगी जीने के लिये संघर्ष करना पडता है उनके लिये सरकार का मतलब सिर्फ वोट डालना है। आवाज तो वोट के खिलाफ भी उठानी होगी। नहीं तो हमारा वोट और हमारी सरकार। हमारी सरकार और हमारी पुलिस। हमारी पुलिस और हमारा कानून।

तो फिर अपराधी भी तो हमीं हैं। यह सब बदलेगा कैसे। सवाल सुधार का नहीं है। हर तरीके को बदलने का है। नौवीं कक्षा की छात्रा हो या मिरांडा हाउस में पीजी की छात्रा। वह यह समझने को तैयार नहीं हैं कि जो उनके सवाल है वह सवाल सरकार के मन में क्यों नहीं रेंगते। क्या देश इतना बदल गया है कि दिल्ली में रहते हुये भी मंत्री और जनता की समझ एक नहीं रही। सरकार सड़कों पर खाकी वर्दी का खौफ दिखाकर हमें कानून सिखाना चाहती है। लेकिन कानून देश और समाज की सोच को खत्म कर कैसे चल सकता है। सरकार किस पर राज करना चाहती है। राजनीतिकशास्त्र या समाजशास्त्र नहीं बल्कि कैमिस्ट्री की पढाई कर रही दिल्ली विश्वविघालय की छात्रा के सवाल समाज की जरुरत को लेकर है। माइक हाथ में थामकर वह सीधे सरकारी तंत्र पर अंगुली उठाती है। फांसी से समाधान नहीं होगा। जो बलात्कारी हैं, उन्हें थाने से लेकर अदालत और अदालत से लेकर जेल ले जाने के दौरान चेहरे ढके क्यों गये। क्यों नहीं उनके चेहरे पूरे देश को दिखाये गये। बलात्कारी की बहन, मां, बेटी के सामने यह सवाल आना चाहिये और बलात्कारी के सामने भी यह सवाल आना चाहिये कि बलात्कार करने के बाद उसके अपनो का समाज में जीना मुश्किल होगा। सामाजिक बहिष्कार की स्थिति हर बलात्कारी के सामने होनी चाहिये। फांसी तो अपराध की सजा है । लेकिन जिस दिमाग और माहौल की यह उपज है, उसें समाज की एकजुटता ही रोक सकती है। लेकिन सरकार या नेताओ का नजरिया समाज को महत्व देना ही नहीं चाहता। वह हर अपराध के लिये कानून को देखता है। ऐसे में यह सवाल बार बार आयेगा कि कानून लागू करने वाला और लागू करवाने वाला अगर अपराधी निकलेगा तो फिर समाधान का रास्ता निकलेगा कैसे। तो फिर संसद के विशेष सत्र का भी मजलब क्या है,जिसकी मांग विपक्ष कर रहा है। सही कह रहे हैं। संसद की महत्ता के आगे समाजिक दबाव बेमानी रहे यह हर नेता चाहता है।

कानून तोड़ने पर पुलिस और अदालत काम करती है। लेकिन कानून बरकरार रहे इसके लिये सामाजिक माहौल होना चाहिये। और फिलहाल समाज से कोई सरोकार सरकार का तो नहीं है। सही है सिर्फ सरकार ही नहीं उस राजनीति का भी नहीं है जो सत्ता के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार है। किसी हद तक ना कहिये, संसद के भीतर तो अब अपराध करने वालों की पूरी फेहरिस्त है। 162 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले किसी ना किसी थाने में दर्ज हैं। लेकिन राजनीति में सभी माफ है। क्योंकि राजनीतिक आरोपों की छांव हर अपराधी को बचा देती है। यह सवाल जवाब चकाचौंध तो नहीं लेकिन पेट भरे आधुनिक स्कूल कॉलेजों में पढ़ रहे लड़के लड़कियो के सवाल हैं, जो आपस में संवाद बना रहे हैं । जंतर-मंतर की सड़क के दोनों किनारे पुलिस के जमावडे के बीच गोल घेरा बना कर बैटरी के माइक या बिना माइक ही चिल्ला चिल्ला कर अपने होने का एहसास करा रहे हैं। इन्हें डर लग रहा है कल से लोगों की तादाद भी कम होती जाये। लोग फिर ना भुल जाये। वह मीडिया से गुहार लगाते हैं, आप तो बोलिये जिससे लोग आते रहे। विरोध करते रहें। नहीं तो सरकार फिर कहेगी यह पिकनिक मनाने आये थे और हमें अपने लोकतंत्र पर नाज है।

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लापरवाह नागरिकों से आदर्श राष्ट्र नहीं बनता

बी.पी.गौतम

एक से अधिक व्यक्तियों के जुड़ने से एक परिवार बनता है, परिवारों के मिलने से मोहल्ला, नगर और समाज का निर्माण का होता है। इसी क्रम में कुछ गांवों को मिला कर एक विकास खंड बना है, कुछ विकास क्षेत्रों को मिला कर एक तहसील और कई तहसीलों को मिला कर एक जनपद बना है। उसके बाद कुछ जिलों के समूह को एक मंडल और कई मंडलों को मिला कर एक राज्य का गठन किया गया है और राज्यों को मिला कर राष्ट्र का निर्माण हुआ है। इसी तरह सभी राष्ट्रों को जोड़ कर पूरी दुनिया बनी है। परिवार से लेकर राष्ट्र तक का आधार एक व्यक्ति ही है। अगर व्यक्ति हटा दिया जाये, तो सभी संस्थाओं का अस्तित्व स्वत: ही समाप्त हो जायेगा, इसके बावजूद आज यह धारणा आम हो चुकी है कि समाज का वातावरण दूषित हो गया है,लोकतंत्र के सभी अंग भ्रष्ट और लापरवाह हो गये हैं, देश और समाज की किसी को चिंता नहीं है, सब व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुए हैं, कर्तव्य पालन किसी की प्राथमिकता में नहीं है। इस तरह के अन्य तमाम दु:खद वाक्य किसी न किसी तिराहे-चौराहे, गांव की चौपालों के साथ बस, ट्रेन की यात्रा के दौरान अथवा किसी भी चर्चा के स्थान पर सुनने को आम तौर पर मिल ही जाते हैं। ऐसे दु:खद वाक्यों को सुनने के बाद यही सवाल उठता है कि समाज, विभाग, मंत्रालय, सरकार या राष्ट्र कोई व्यक्ति तो है नहीं, जो उनकी अपनी कोई सोच हो, तो फिर यह सब दूषित क्यूं नजर आ रहे हैं?

जवाब भी एक दम सीधा है कि इन सबका आधार व्यक्ति है और व्यक्ति भी किसी और देश के नहीं, बल्कि इसी देश के हैं, जो परिवार और समाज से लेकर व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता को संभाल रहे हैं। मतलब साफ है कि यदि अधिकांश जगह एक ही जैसा दूषित वातावरण नजर आ रहा है, व्यवस्था संभाल रहे अधिकांश जिम्मेदार भ्रष्ट और लापरवाह नज़र आ रहे हैं, तो कहीं न कहीं व्यक्ति ही खराब है। अर्थात, व्यक्ति की सोच में ही गिरावट आई है, तभी चारों ओर का वातावरण दूषित दिखाई दे रहा है। किसी एक के करने से न सब कुछ सही हो सकता है और न ही सब गलत। 

देश भर में आजकल सरकार और बाक़ी सभी अंगों को पारदर्शी,कर्तव्यपरायण और पूर्ण रूप से ईमानदार बनाने की बात कही जा रही है। लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिए, पर सवाल फिर वही है कि सरकार और बाक़ी सभी अंगों में कार्य करने वाले व्यक्ति जब इसी समाज और इसी देश से लिए जा सकते हैं, तो सरकार चलाने के लिए ईमानदार और कर्तव्यपरायण व्यक्ति कहां से लाये जायें? इस प्रश्र का कोई उत्तर नहीं है,क्योंकि हम सब को ही सब कुछ करना और संभालना है। यह हमारी बनाई हुई व्यवस्था है, जो हम से ही अच्छी या बुरी बनती है, तभी व्यक्ति की सोच में हुए परिवर्तन के घातक परिणाम सामने आ रहे हैं। केवल सरकार और उसके अंगों में कार्य करने वाले लोगों में सेवा भाव जगाने से ही कुछ नहीं बदलेगा। व्यक्ति की सोच बदलेगी, तो परिवार, समाज, जिला और राष्ट्र की सोच स्वतः बदल जायेगी। व्यक्ति की सोच गुणवत्तापरक शिक्षा व अच्छे टीवी कार्यक्रमों के माध्यम से बदली जा सकती है, लेकिन गंभीर होना तो दूर की बात, इस ओर किसी का ध्यान तक नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि किसी पेड़ की जड़ में कीड़े लगे हों और उसकी टहनियों पर कीटनाशकों का छिडक़ाव करने से बीमारी का उपचार कैसे संभव हो पायेगा?

परंपरा और संस्कृति की बात करते ही कुछ लोग धर्म और पाखंड में उलझाकर विषय की गंभीरता को ही समाप्त कर देते हैं, जबकि परंपरा और संस्कृति से आशय इंसान के मूल्यों की बात करना ही है। उन मूल्यों से दूर जाने के कारण ही व्यक्ति का व्यवहार जानवर जैसा हो गया है। आज वह सिर्फ अपने लिए ही जी रहा है। इस बदली हुई सोच के चलते ही व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ पत्रकारिता के दामन पर बड़े-बड़े दाग नजर आ रहे हैं, लेकिन दाग स्वभाविक हैं,क्योंकि इन चारों स्तंभों में काम करने वाले व्यक्ति इसी समाज का हिस्सा हैं। असल में आन्दोलन, सरकारी तंत्र को ठीक करने की बजाये नैतिक शिक्षा और अच्छे टीवी कार्यक्रमों के लिए होने चाहिए। उत्तम शिक्षा से बच्चों में आदर्श नागरिक का अंकुर पैदा किया जा सकता है। टीवी आज अधिकाँश परिवारों का प्रमुख अंग बन गया है,जिससे टीवी का असर बच्चों पर माता-पिता और शिक्षक से कहीं अधिक होता दिख रहा है,इसलिए टीवी के माध्यम से घर-परिवार में मूल्यपरक वातावरण देकर आदर्श नागरिक के उस अंकुर को विशाल वृक्ष बनाया जा सकता है। सब कुछ करने का दायित्व सिर्फ सरकार का ही नहीं है,अभिवावकों को भी अपने बच्चों में राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यपरायणता की भावना जागृत करने की आवश्यकता है। आदर्श नागरिक बनाने की दिशा में बरती जा लापरवाही यहीं नहीं रुकी, तो आने वाला समय और अधिक भयावह हो सकता है, क्योंकि लापरवाह नागरिकों से आदर्श राष्ट्र नहीं बनते।

लेखक
बी.पी.गौतम
स्वतंत्र पत्रकार हैं।
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आखिर इस दर्द की दवा क्या है........

शादाब जफर ‘‘शादाब’’

मिर्जा असदउल्ला खॉ बेग उर्फ मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसम्बर 1797 ई0 को अकबराबाद, आगरा उत्तर प्रदेश में हुआ था। मिर्जा असद जब पॉच बरस के हुए तो सर से बाप का साया उठ गया यतीम मिर्जा की परवरिश की जिम्मेदारी इन के ताया ने अपने कंधो पर ले ली मगर वो भी इस जिम्मेदारी को ज्यादा दिन नही उठा पाये। मिर्जा अभी नौ बरस के हुए ही थे की ताया मियॅा का भी इंतेकाल हो गया। मिर्जा की लडखडाती जिन्दगी सिर्फ तेरह साल की उम्र में उमराव बेगम के हाथो में दे दी गई यानी सिर्फ तेरह साल की कच्ची उम्रं में मिर्जा की शादी कर दी गई। कच्ची उम्र में शादी एक के बाद मिर्जा के घर सात बच्चो की विलादत इुई मगर जिया एक भी नही। षुरू से जिन्दगी के हाथो मात खा रहे मिर्जा ने कब षराब और जुए से दोस्ती कर ली खुद मिर्जा को भी नही पता चला। मिर्जा और जिन्दगी के बीच शह और मात का खेल चलता रहा पर ना तो कभी मिर्जा खुदा की खुदाई ही से मायूस हुए और ना ही जिन्दगी से। मिर्जा ने एक बच्चे जैनुलआबेद्दीन को गोद लिया मगर वो भी मिर्जा को ज्यादा दिन औलाद का सुख नही दे पाया और एक दिन अल्लाह को प्यारा हो गया। 
अल्लाह को शायद कुछ और ही मंजूर था इस लिये मिर्जा गालिब की ज़बान से सिर्फ बारह साल की उम्र में पहला शेर निकला। कुदरत ने मिर्जा को एक ऐसे फन से नवाज दिया जिसे दुनिया वाले शायरी कहते है भले ही मिर्जा को कुदरत ने कोई इन्सानी वारिस नही दिया मगर आज मिर्जा गालिब की पैदायष के दो सौ साल से ज्यादा गुजर जाने के बाद भी मिर्जा का हर एक षेर हर एक गजल मिर्जा की वारिस है और रहती दुनिया तक इन षेरो और इन गजलो से मिर्जा गालिब का नाम कायम रहेगा। यू तो आज मिर्जा गालिब आज ऊर्द्व षायरी के उस्तादो के उस्ताद है आज मिर्जा की शायरी का कोई सानी नही हिन्दुस्तानी शायरी में अलग सब से अलग। अपने अंदाज-ए-बया से और भी नायाब। गालिब वो शख्सीयत थे जिन्हे ना तो ज़बान की कैद में रखा जा सकता ह औा ना ही मजहब या जात पात से बंधा जा सकता है। मिर्जा गालिब ऊर्द्व, फारसी, अरबी ,ज़बान के अच्छे आलिम थे। उन की जिन्दगी यू तो कई उतार चढाव के बीच गुजरी मगर गालिब एक कदम भी नही डगमगाये वो हा हस्सास किस्म के इन्सान जसर थे जिन्दगी की जद्दोजहद और अच्छे बुरे दिनो में जो गालिब ने महसूस किया उसे शायरी में पूरा पूरा ईमानदारी से उतार कर रख दिया। षराब खोर होने के साथ साथ गालिब का खुदा पर पक्का यकीन था और वो खुदा से डरते भी बहुत थे। ‘‘ काबा किस मुंह से जाओगे गालिब, शर्म तुम को मगर नही आती’’ दरअसल गालिब का एक उसूल था ‘‘ इन्सान से मौहब्बत करना’’ जो कुछ भी उनके पास होता वो बिना सोचे बल्कि बेइख्तियार जरूरत मंदो को देने को तैयार हो जाते थे। मिर्जा के दिल में खैर ख्वाही कूट कूट कर भरी थी उन की शरी उन के खतूत इन्सान के दुख दर्द से भरे होते थे । हकीकत में गालिब को लफ्जो में समझना मुष्किल ही नही एक नामुमकिन सा है। हकीकत में गालिब को दिल और दिमाग के अन्दर महसूस कर के ही समझा जा सकता है।

गालिब दुख दर्द करवटे बदल बदल कर राते गुजारने के अपने गम को अपनी शायरी में इतनी खूबसूरती से उतारते थे की ऑखे नम हो जाये। वही फाकेमस्त होकर कही कही अपनी षायरी में बडी ही साफगौई से वो अपनी खिल्ली उडाते खुद नजर आते है। ये ही वजह है की आज दो शताब्दी गुजर जाने के बाद भी गालिब की शायरी लोगो के सिर चढी है गालिब ने दिल्ली को कितनी बार उजडते और बसते देखा ये ही वजह है कि गालिब की गज़लो में समाज, ज़ाति जिन्दगी और इन्सानी दुख दर्द की पीडा कुछ ज्यादा ही नजर आती है एक बार की बात है गालिब के एक दोस्त नवाब हिसामउददौला जो मीर के भी अच्छे दोस्तो में थे उन्होने गालिब के कुछ षेर उस्ताद मीर को सुना दिये षेरो को सुनने के बाद उस्ताद मीर बोले ‘‘अफसोस इस सरफिरे लडके को कोई अच्छा उस्ताद नही मिला वरना यह लडका भी एक महान षायर बन जाता ’’ इस से साफ जाहिर होता है कि गालिब के शेर सुनने के बाद उस्ताद मीर को यह अंदाजा हो गया था कि गालिब महान षायर बनेगे। उस्ताद मीर को अपनी तारीफ सुनने की आदत थी इस लिये वो दूरो की तारीफ कंजूसी से करते थे।

मसनवी और कसीदागौई गालिब ने उस्ताद वली मौहम्मद से सीखी। गालिब से पहले जाने माने मसनवी और कसीदागोई काने वालो में बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद शेख मौहम्मद इब्राहीम जौक का नाम मशहूर था। मगर गालिब के आ जाने के बाद बहादुर षाह ज़फ़र के दरबार में फीके पडने लगे और ये बात उन्हे इतनी चुभी की वो बादशाह की उस्तादी छोड कर हैदराबाद चले गये। गालिब तो इस ताक में थे ही के उन्हे कब मौका मिले और वो बादषाह की नजर में चढे। इस के लिये उस्ताद जौक के जाने के बाद उन्हे ज्यादा इन्तेजार नही करना पडा। बादषाह के कहने पर तैमूर खानदान का शजरा ‘‘दास्तानबो’’ लिखने के बाद वो बहादुर शाह जफर की ऑखो का तारा बन गये। मिर्जा गालिब ने बादषाह के बेटो की षादी के सेहरे भी पूरी आन बान से कहे ‘‘ खुश हो ऐ बख्त के है आज तेरे सर सेहरा,बंधा शहजाद-ए-जवां बख्त के सर पर सेहरा, एक और सेहरे में मिर्जा गालिब कुछ यू कहते है ‘‘ हम सुख्न-फहम है गालिब के तरफदार नही, देखे कह दे कोई इस सेहरे से बढ कर सेहरा’’।

बादषाह बहादुर षाह ज़फ़र ने गालिब को जिन खिताबो से नवाजा वो भी कुछ कम नही थे। ‘‘ नज्म उददौला’’, दबीर-उल-मुल्क,और निजाम-ए-जंग। गालिब ने बादषाह के छोटे बेटे खि़ज्र सुल्तान को ऊर्द्व फारसी व षायरी की तालीम दी। मिर्जा गालिब ने ख्वाजा अल्ताफ हुसैन ‘‘हाली’’ को अपना षागिर्द बनाया। गालिब को पतंगबाजी, कबूतरबाजी का बडा षौक था। गालिब को बहुत अच्छी अच्छी पतंग बनाी आती थी वो अपने हाथ से ही पतंग बना कर उडाते थे। मिर्जा गालिब को करेला, बिरयानी, कवाब, बहुत पसन्द थे। लेकिन इन सब में उन्हे चने की दाल बेहद पसन्द थी वो अपने हर खाने में चने की दाल जरूर डलवाते थे। ओल्डट्राम उन पसंदीदा षराबो में से एक थी।

गालिब के कुल 11802 षेर जमा किये जा सके है उनके खतो की तादाद तकरीबन 800 के करीब थी। मिर्जा गाालिब अमीर खुसरो से काफी मुतासिर थे वो उन्हे फारसी का महान षायर बताते थे। मिर्जा गाालिब पर कुछ षाया किताबो के नाम ‘‘दीवान-ए-गालिब’’, ’’मैखाना-ए-आरजू’’, पंच अहग, मेहरे नीमरोज, कादिरनामा, दस्तंबो, काते बुरहान, कुल्लियात-ए-नजर फारसी व षमषीर तेजतर है। असद मिर्जा गालिब और फिर सिर्फ गालिब कैसे बना अगर हम लोग गालिब को दिल से पढेगे तो ये समझना कोई मुष्किल नही।

लेखक-
शादाब जफर ‘‘शादाब’’
नजीबाबाद (बिजनौर)
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