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बुधवार, 1 जुलाई 2015

खतरे में खबरनवीसों की आजादी

Posted On June 29, 2015 by &filed under मीडिया.

हर लोकतान्त्रिक देश की तरह भारत भी देश के तमाम पत्रकारों के पूर्ण रूप से आजाद होकर ख़बरें लिखने व छापने का दम्भ भरता है। लेकिन बीते कुछेक हफ़्तों से चल रहे भारतीय खबरनवीसों पर हमलों से इस दम्भ पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। विगत एक महीनें में कई भारतीय पत्रकारों पर हुए हमले से पूरे विश्व में भारतीय पत्रकारों की आजादी के साथ-साथ सुरक्षा पर भी चर्चाओं के साथ ऊँगली उठने लगी है। इसके साथ ही भारत के तमाम स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किये जाने लगे हैं।

जून माह की पहली तारीख को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में बतौर स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले जगेंद्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गयी थी। ठीक इसके कुछ दिनों बाद ही ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के स्वतंत्र पत्रकार संदीप कोठारी के साथ भी घटी। स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले दोनों ही पत्रकारों की हत्याओं में दो समानता पहली ही नज़र में दिखाई पड़ती है। जहाँ एक ओर दोनों ही पत्रकारों की हत्याएं प्रदेश के माफियाओं के खिलाफ खबर लिखने व उससे समबन्धित सच को उजागर करने पर हुई थी तो वहीँ संदीप व जगेंद्र दोनों को जला कर बेहद बेदर्दी से से मार डाला।

बेहद बेदर्दी से की गयी दोनों पत्रकारों की हत्याओं के बाद देश के भीतर कई जगह इसका विरोध भी शुरू हो गया है। पत्रकार समूह के साथ-साथ देश के तमाम नेता, आम जनता आदि पत्रकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ कमोबेश खड़े होते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। बहरहाल, संदीप की हत्या पर काफी बवाल मचने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जगेंद्र सिंह के परिवार वालों को तीस लाख रुपये, दोनों बेटों को भविष्य में सरकारी नौकरी के साथ साथ जांच को पूर्णतः निष्पक्षता के साथ कराने का आश्वासन देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। दोनों पत्रकारों के परिवारों को सरकारों की तरफ से मिले आश्वासन के बाद अब भी देश के तमाम पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

अगर हम मौजूदा वक़्त में हो रहे पत्रकारों पर हमले की संख्या के बारे में बात करें तो बीते कुछेक वर्षों में पत्रकारों की हत्याओं के मामले में काफी तेज़ी आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जगेंद्र सिंह व संदीप कोठारी को मिलाकर बीते 22 सालों में 58 भारतीय खबरनवीसों की जान जा चुकी है। सौम्या विश्वनाथन, जे. डे. आदि जैसे कुछेक नाम हैं जिनकी हत्या के बाद भारतीय पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर नए तरीके से बात शुरू हुई लेकिन कई सालों के बीत जाने के बाद भी अभी तक सुरक्षा से सम्बंधित किसी भी प्रकार का कोई निर्णय केंद्र सरकार के द्वारा नहीं लिया गया है।

निष्पक्ष पत्रकारिता के के लिए भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में कई पत्रकारों पर भी हत्याओं के द्वारा रोक लगायी जा चुकी है। पूरे विश्व में हाल ही में हुए पत्रकारों की हत्यों पर एक नज़र डाले तो पाएंगे कि पिछले दो वर्ष में लगभग 150 खबरनवीसों की आजादी पर हत्या के जरिये रोक लगाई गयी है। इस आंकड़े में एक दिलचस्प व् अचंभित करने वाला सच यह है कि मारे गए इन लगभग 150 पत्रकारों में से लगभग 60 के आस पास ऐसे खबरनवीस हैं जिनकी हत्या आतंकी गढ़ में रिपोर्टिंग करते हुए की गयी है। सच को उजागर करने व जनता से सीधे सरोकार की भावना की ही वजह से अब कहीं न कहीं देश, विदेश के तमाम पत्रकारों के ऊपर अपनी जान से हाथ धोने का संकट मंडराता हुआ प्रतीत हो रहा है।

मौजूदा वक़्त में महज सीरिया, इराक, अफगानिस्तान जैसे पश्चिम एशियाई देशों के साथ-साथ सूडान, सोमालिया जैसे अफ्रीकी देश भी युद्ध के दौर से गुजर रहे हैं। इसी कारणवश वहां पत्रकारिता करने गए खबरनवीसों की कई बार हत्या की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त एशिया के प्रमुख देशों में आने वाले पाकिस्तान में भी पत्रकारों के लिए हालात बदतर हैं। ऐसे में मौजूदा दौर में निष्पक्ष एवं विश्वसनीय पत्रकारिता के मूल्यों का निर्वहन करने वाले खबरनवीसों के लिए खतरे पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गए हैं।

निष्पक्षता पत्रकारिता का पहला नियम होने की वजह से तमाम पत्रकारों को न सिर्फ खबरों के प्रति निष्पक्षता बनाए रखनी होती है बल्कि जनता के समक्ष सच को उजागर करने की नीति भी कई बार उनकी जान जोखिम में डाल देती है। इसी कारणवश यह आवश्यक हो गया है कि सभी देशों की सरकारें मिलकर पत्रकारों के हित में ऐसे नियम व् कानून बनाये जिससे खबरनवीसों की जान को किसी प्रकार का कोई जोखिम न हो और वे खुलकर पाठकों तथा जनता के प्रति अपने कर्तव्य का सही रूप से निर्वहन कर सकें।

सवाल देशवासियों के स्वास्थ्य व जान की क़ीमत का ?

लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

Posted On  by & filed under खान-पान, विविधा.

roadside
तनवीर जाफ़री 
गत् 21 जून को राजधानी नई दिल्ली का राजपथ उस समय योगपथ के रूप में परिवर्तित हो गया जबकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित हज़ारों लोगों ने एक साथ योगाभ्यास कर पहली बार अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया। ज़ाहिर है योग जैसी शारीरिक क्रियाओं का सीधा संबंध इंसान के शारीरिक व मानसिक विकास से है। इसलिए इसे नि:संदेह एक सराहनीय कदम ही माना जाएगा। परंतु क्या विश्व को योग की राह दिखाकर मनुष्य के स्वस्थ शरीर की कल्पना करने वाले भारतवर्ष के लोग वास्तव में स्वास्थय के प्रति जागरूक हैं? और इससे भी बड़ी बात यह है कि क्या भारत सरकार अथवा देश की दूसरी सभी राज्य सरकारें अपने नागरिकों के स्वास्थय के प्रति पहले कभी चिंतित रही भी हैं?
जहां तक भारतवासियों को स्वस्थ व निरोगी रखने का प्रश्र है तो दुनिया जानती है तथा स्वयं योग क्रिया के पैरोकार भी भलीभांति इस बात से भलीभांति वािकफ हैं कि भारतवर्ष इस समय एक ऐसा देश बन चुका है जो मिलावटखोरी तथा रासायनिक प्रक्रिया से तैयार की जाने वाली खाद्य सामग्रियों का विश्व का सबसे बड़ा व खतरनाक बाज़ार बन चुका है। फलों व सब्जि़यों को टोक्सिन जैसे ज़हरीले इंजेक्शन देकर महज़ शीघ्र धन अर्जित करने हेतु उसे बाज़ार में बेचने हेतु समय पूर्व तैयार किया जाता है। अप्राकृतिक उपाय अपनाकर इनके वज़न बढ़ाए जा रहे हैं। दूध,खोया,पनीर,देसी घी जैसे खाद्य पदार्थों को यूरिया व अन्य दूसरी कई रासायनिक प्रक्रियाओं से तैयार किया जाता है। कई फलों पर स्प्रे कर तथा उनपर ज़हरीली पॉलिश कर उनकी सुंदरता बढ़ाकर उन्हें बेचा जा रहा है। गंदे व बदबूदार नालों व नालियों के किनारे तमाम खाद्य सामग्रियां व पकवान बनाए व बेचे जा रहे हैं। तमाम खाने-पीने की वस्तुओं को बिना ढके बेचने का तो हमारे देश में आम प्रचलन हो चुका है। मजबूरीवश इस देश में करोड़ों लोग प्रदूषित जल पीने को मजबूर हैं। हद तो यह है कि हमारे देश में जीवन रक्षक दवाईयां तक नकली बेची जा रही हें। ऐसे और भी कई क्षेत्र हैं जो हमारे स्वास्थ्य को सीधे तौर पर दुष्प्रभावित कर रहे हैं। परंतु योग जैसी क्रिया को आम लोगों के जीवन में उतारने जैसी हास्यास्पद कल्पना करने वाले हमारे राजनेता इन सभी बातों की ओर से आंखें मूंदे बैठे हैं।
हमारे देश के लोग दीवाली,दशहरा व होली जैसे त्यौहार पूरी श्रद्धा व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। परंतु हरामखोर व्यवसायिक मानसिकता रखने वाला एक बड़ा तबका हमारे इन त्यौहारों में भी अपने ज़हरीले उत्पाद बेचकर हमारे त्यौहारों के रंग में भंग डालने से बाज़ नहीं आता। कई-कई महीने पहले बनी सड़ी-गली व बदबूदार मिठाईयां जनता को बेची जाती हैं। प्राय: इन्हीं मिठाईयों में नकली व रासायनिक खोए व पनीर का इस्तेमाल किया जाता है। संबद्ध विभागों द्वारा अपनी फजऱ् अदायगी करते हुए इन त्यौहारों से पहले देश में कई स्थानों पर छापामारी किए जाने के समाचार भी सुनाई देते हैं। परंतु अपराधी पकड़े जाने के बावजूद कुछ ही दिनों में वे ज़मानत पर अथवा पूरी तरह से बरी हो जाते हैं और बरी होते ही पुन: मिलावटखोरी व बाज़ार में ज़हर बेचने जैसे अपने अमानवीय कार्य में लग जाते हैं। इन सब बातों के बावजूद हमारी सरकारें अपने इस प्रलाप से बाज़ नहीं आती कि वे जनता के स्वास्थय के प्रति कितनी जागरूक हैं। चीन योग जैसी स्वास्थय संबंधी जागरूकता का हालांकि ढोल नहीं पीटता और इस प्रकार के कोई दूसरे ढोंग करने में अपना समय नष्ट नहीं करता। परंतु दूध जैसी वस्तु में मिलावटखोरी करने वालों को मात्र 6 महीने की कार्रवाई के बाद फांसी के फंदे पर ज़रूर लटका देता है। और ऐसा कर चीन यह संदेश दे देता है कि वह भाषण,राजनीति अथवा लोकलुभावन नाटकबाज़ी करने के बजाए अपनी जनता के स्वास्थय के प्रति वास्तव में कितना गंभीर है।
यहां अभी हमने देश के उन नौनिहालों का जि़क्र तो किया ही नहीं जो ज़हरीले फल और सब्ज़ी तो क्या दो वक्त की पेट भर रोटी खा पाने तक का सामर्थय नहीं रख पाते। ग़रीबी और कुपोषण का शिकार करोड़ों देशवासी आज भी मुश्किल से एक समय का आधा पेट भोजन ग्रहण कर भूखे पेट सो जाते हैं। यहां यह सवाल बेहद ज़रूरी है कि देश के खाते-पीते समृद्ध व संपन्न लोगों की बढ़ती तोंद को कम करने व उन्हें निरोगी रखने की गरज़ से देशवासियों को योग करने हेतु प्रोत्साहित करना ज़रूरी है या बाज़ार में उपलब्ध खाद्य पदार्थों के माध्यम से 24 घंटे बेची जा रही बीमारियों पर नियंत्रण रखना व देश के लोगों को कुपोषण व भुखमरी से बचाना अधिक ज़रूरी है? हमारा देश तो ऐसे दोहरे मापदंड से ग्रसित है कि यहां स्वास्थ्य विभाग के लोग निजी नर्सिंग होम में जाकर उनके निर्धारित मानदंड का तो निरीक्षण करते हैं और उन्हें नर्सिंग होम के लिए सरकार द्वारा निर्धारित मापदंड अपनाए जाने के निर्देश देते हैं। परंतु देश के तमाम सरकारी अस्पताल स्वयं उन्हीं निर्धारित मापदंडों की अवहेलना करते हैं। यह सभी बातें इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारे देश में इंसान की जान की कोई कीमत नहीं न ही किसी को देश के लोगों के स्वास्थय की कोई परवाह है। देश में विभिन्न उपमार्गों पर बने सडक़ों के गड्ढे,तमाम खुले मेन होल,बिजली की लटकती तारें भी हमारे देश में इंसान की जान की क़ीमत का बोध कराती हैं। सडक़ों पर सरेआम घूमने व बैठे रहने वाले आवारा पशु जो आए दिन वाहनों के जानलेवा हादसे का कारण बनते हैं यह भी इस बात के गवाह हैं कि इस देश में आम लोगों की जान की कीमत क्या है?
और संभवत: विदेशी व्यापारियों ने भी इन बातों का भलीभांति अध्ययन करने के बाद ही भारतवर्ष में ऐसे ही सामानों की बिक्री भी शुरु कर दी है जो देश के स्वास्थय की परवाह तो कम कर रहे हैं और अपने भारी-भरकम मुनाफे की फ़िक्र ज़्यादा। पिछले दिनों देश में खाद्य सामग्री बनाने वाली विश्व की अग्रणी कंपनी नेस्ले द्वारा तैयार किए जा रहे मैगी उत्पाद को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया। मैगी को लेकर हुए इस रहस्योदघाटन के पहले क्या देश का कोई व्यक्ति सोच भी सकता था कि चटपटी मैगी के साथ हम सीसा जैसा ज़हरीला पदार्थ भी खा रहे हैं? परंतु मैगी का उत्पाद बाज़ार में लाकर नेस्ले ने लाखों करोड़ रुपये हम भारतवासियों की जेबों से ऐंठ लिए और हमारे शरीर को ज़हरीला बना डाला। जिस समय मैगी की हकीकत का भंडाफोड़ हुआ उस समय भी कंपनी द्वारा अपने बचाव की पूरी कोशिश की गई। अखबारों में अपनी बेगुनाही के विज्ञापन कंपनी द्वारा प्रकाशित कराए गए तथा उनके लिए विज्ञापन करने वाले कई कलाकारों से उनका स्पष्टीकरण प्रसारित करवाया गया। परंतु इन सबके बावजूद मैगी ने बाज़ार से लगभग साढ़े तीन हज़ार करोड़ रुपये की मैगी वापस उठवा कर यह प्रमाणित कर दिया कि उसके उत्पाद में ज़हर था और यह उत्पाद बाज़ार में बिकने योग्य नहीं था।
लगभग यही हाल शीतल पेय बनाने वाली कंपनियों का भी है। वह भी अपने ग्राहक को ज़बरदस्ती डकार लेने हेतु कई शीतल पेय उत्पाद में ऐसे रसायन व गैस की मिलावट करती हैं जिनसे मुनष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। योग गुरु बाबा रामदेव तो कई ऐसे शीतल पेय को टॉयलेट की सफाई हेतु इस्तेमाल किए जाने की सलाह भी कई बार दे चुके हैं। परंतु ऐसे उत्पाद पूरे देश में धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। इन विषयों पर कोई चाहे जितना टिप्पणी करे,आलेख लिखे अथवा इनके विरुद्ध विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित कराए परंतु इन कंपनियों के स्वास्थय पर कोई असर नहीं पडऩे वाला। आखिर क्यों? क्या इनका संरक्षण व इनके हितों की रक्षा हमारे देशवासियों के स्वास्थय से ज़्यादा ज़रूरी है़ और यदि वास्तव में ऐसा ही है फिर योग के नाम पर लोगों को स्वस्थ रखे जाने के ढोंग की ज़रूरत ही क्या है? इन बातों से साफ़ ज़ाहिर है कि योग के बहाने लोगों को स्वस्थ रहने हेतु प्रेरित करना झूठी लोकप्रियता अर्जित करने का महज़ एक तरीका है। अन्यथा वास्तव में देश के लोगों के स्वास्थय व उनकी जान की कीमत को लेकर देश की सरकारें कितना गंभीर हैं व रचनात्मक रूप से इसके लिए क्या कर रही हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है

देश में विदेश !!!

लेखक परिचय

तारकेश कुमार ओझा

तारकेश कुमार ओझा

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।
हास्य – व्यंग्य
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तारकेश कुमार ओझा
​किसी बीमार राजनेता व मशहूर शख्सियत के इलाज के लिए विदेश जाने की खबर सुन कर मुझे बचपन से ही हैरत होती रही है। ऐसी खबरें सुन कर मैं अक्सर सोच में पड़ जाता था कि आखिर जनाब को ऐसी क्या बीमारी है, जिसका इलाज देश में नहीं हो सकता। शायद विदेश के किसी पहाड़ में उनके मर्ज की संजीवनी बूटी छिपी हो। य द्यपि ज्यादातर राजनेता सत्ता से हटने के बाद ही इलाज के लिए विदेश जाते हैं। सत्तासीन राजनेताओं के बारे में कम ही सुना जाता है कि कोई इलाज के लिए विदेश जाए। देश के एक प्रदेश के चिर कुंवारे एक मुख्यमंत्री के साथ ऐसे ही गजब हो गया। बताते हैं कि अरसे बाद उस मुख्यमंत्री को विदेश  जाने की सूझी। लेकिन वे विदशी धरती पर पैर भी नहीं रख पाए थे कि उनके सूबे में उनके सर्वाधिक भरोसेमंद ने ही उन्हें कुर्सी से उतारने की पूरी व्यवस्था गुचपुच तरीके से कर डाली। गनीमत रही कि समय रहते मुख्यमंत्री को इसकी भनक लग गई और सूबे में लौटते ही उन्होंने पहला काम अपने उस भरोसेमंद को पार्टी से निकालने का किया। इसके बाद से उन्होंने विदेश की कौन कहे , देशी दौरे में भी भारी कटौती कर दी। पहले सत्ता से बेदखल राजनेताओं के इलाज के लिए ही विदेश जाने की खबरें  सुनी – पढ़ी  जाती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में  सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि उनके बाल – बच्चों के भी किसी न किसी बहाने विदेश जाने की खबरें अक्सर सुनने – पढ़ने को मिला करती है। अब ऐसे ही विदेशी दौरे देश के कुछ राजनेताओं की गले की हड्डी साबित हो रहे हैं। लेकिन कायदे से देखा जाए तो विदेशी दौरों का मोह गांव – कस्बे के नेताओं में भी प्रेशर – सूगर की बीमारी की तरह फैल रही है। फ र्क सि र्फ इतना है कि देहाती या कस्बाई स्तर के जो नेता विदेशी दौरे नहीं कर पाते, उन्होंने देश में ही विदेश का प्रबंध कर लिया है। जैसे विदेशों में बसे भारतवंशी चाहे जहां रहे , वे अपने बीच एक छोटा हिंदुस्तान बनाए रखते हैं, वैसे ही अपने देश में इस वर्ग ने विदेश का प्रबंध कर लिया है। यह देशी विदेश उनके गांव – कस्बे से कुछ दूर स्थित जिला मुख्यालय भी हो सकता है तो प्रदेश की राजधानी भी।
राजनीति का ककहरा सीख रहे नेताओं की नई पौध ज्यादातर लोगों पर भौंकाल भरने के लिए  स्वयं के कार्यक्षेत्र से कुछ दूरी पर स्थित जिला मुख्यालय के कचहरी या कलेक्ट्रेट में होने की दलीलें देती है। मेरे शहर में कई नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने प्रदेश की राजधानी में डेरे का इंतजाम कर लिया है। जब जैसी सुविधा हो वे इस देश – विदेश के बीच चक्कर काटते रहते हैं।
जब कभी अपने क्षेत्र में कोई अप्रिय परिस्थिति उत्पन्न हुई  नेताजी झट बोरिया – बिस्तर बांध कर इस कृत्रिम विदेश की यात्रा पर निकल  पड़ते हैं। फिर अनुकूल परिस्थिति की सूचना पर लौट भी आते हैं। यह देशी – विदेश कई तरीके से उनके आड़े वक्त पर काम आता है। किसी झमेले से बचने के लिए नेताजी मोबाइल पर ही बहकने लगते हैं… अरे भाई, मैं तुम्हारी परेशानी समझ रहा हूं, लेकिन क्या करूं … मैं इन  दिनों बाहर हूं। लौट कर देखता हूं कि क्या कर सकता हूं।
किसी के पास न्यौता आया कि फलां कार्यक्रम में आपको विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहना ही है… लेकिन नेताजी इससे संतुष्ट नहीं है तो झट चल दिया इसी देशी – विदेश का दांव। अरे नहीं भाई …. फलां दिन तो मैं बाहर रहने वाला हूं.. बहुत जरूरी काम है… माफ करना।
मेरे शहर में नेताओं की एक नई पीढ़ी तैयार हुई है जिन्होंने देश के किसी सुदूर हिस्से में स्थित किसी प्रसिद्ध तीर्थ स्थली को ही अपना विदेश बना लिया है। जो राजनैतिक दांव – पेंच में उनके बड़े काम आता है। किसी भी प्रकार की असहज स्थिति उत्पन्न होते ही नेताजी झट वहां के लिए निकल जाते हैं। फिर करते रहिए मोबाइल पर रिंग पर रिंग। प्रत्युत्तर में बार – बार बस स्विच आफ की ध्वनि। किसी विश्वस्त सहयोगी से संप र्क करने पर पता लगता है कि भैया तो फलां दिन ही फलां तीर्थ पर निकल गए। हैरत की बात तो यह है कि परिस्थिति अनुकूल होते ही नेताओं की यह नई पौध शहर वापस भी लौट आती है। दांव – पेंच में मात के मामलों में यह उनके लिए ढाल साबित होती है। क्योंकि अपने बचाव में नेताजी फौरन दलील फेंकते हैं कि अरे मैं तो शहर में था नहीं… व र्ना  क्या मजाल उसकी कि ऐसा करने की जु र्रत करे। खैर अब निपटता हूं उनसे। बेशक विदेश यात्राओं के दौरान विवादास्पद से मुलाकात कर फंसे देश के नामचीन नेताओं के सामने भी निश्चय ही ऐसी कोई मजबूरी रही होगी। व र्ना जानते – बुझते अपना हाथ कौन जलाता है भला…।

आपातकाल की पुरानी स्मृतियाँ

लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

emergency
आपातकाल की घोषणा २५ जून १९७५ को हुई थी । रेडियो पर ख़बर आई होगी । मैंने तो नहीं सुनी थी लेकिन सतीश ने सुन ली थी । मैं उन दिनों भारतीय जनसंघ का ज़िला स्तर का अधिकारी था । सतीश के पास भी मंडल स्तर की कोई ज़िम्मेदारी थी । जयप्रकाश नारायण ने सरकार के ख़िलाफ़ देश भर में आन्दोलन छेड़ा हुआ था । उसमें उस समय के भारतीय जनसंघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ही ज़बरदस्त भागीदारी थी । उसी समय इलाहाबाद उच्चन्यायालय ने उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी का चुनाव भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते रद्द कर दिया । इन्दिरा गान्धी ने उच्च न्यायालय के इस प्रश्न का जबाव देश में आपात स्थिति की घोषणा से दिया । ख़ैर सतीश ने ही मुझे आकर बताया कि आपात काल की घोषणा हो गई है । लेकिन इसका क्या अर्थ है , इसका आभास न मुझे हुआ और न ही उसे ।
बंगा के समीप मुकन्दपुर छोटा सा गाँव है । आपात स्थिति का विरोध करना जरुरी है , इसके लिये पार्टी के निर्देश की प्रतीक्षा की जरुरत नहीं थी । । विरोध करने का हमने अपने गाँव में एक तरीक़ा विकसित कर रखा था । गाँव में लाला हरिदेव केसर मंडल कांग्रेस के प्रधान थे । बाज़ार में उनकी कपड़े की दुकान थी । हम सब इक्कठे होकर उनकी दुकान के सामने कुछ समय के लिये प्रदर्शन और भाषणबाज़ी करते थे । मैंने २५ जून की रात्रि को ही कार्यकर्ताओं को बता दिया कि प्रदर्शन के बारे में गाँव की दीवारों पर चाक से नारे लिख दिये जायें । २६ जून को दस बजे प्रदर्शन निश्चित हो गया । लेकिन सुबह होते होते मुझे आपात स्थिति क्या है ,इसका कुछ कुछ अन्दाज़ा भी हो गया था । रेडियो ख़बरें दे रहा था कि जयप्रकाश समेत सभी प्रमुख विरोध नेता पकड़ लिये गये हैं । जयप्रकाश नारायण को भी कोई पकड़ कर जेल में डाल सकता है , ऐसा उस समय हम सोच भी नहीं सकते थे । लेकिन प्रदर्शन की घोषणा तो हो चुकी थी ।
हरिदेव की दुकान के आगे प्रदर्शन हुआ । मैंने भाषण दिया । आधे घंटे में रैली ख़त्म हो गई । शायद आपातकाल का क्या अर्थ है , इसका अन्दाज़ा हरिदेव केसर को भी नहीं था । लेकिन लगभग दो घंटे बाद हरिदेव ने मुझे संदेश भेजकर घर से बुलवाया और बताया कि बंगा थाना से संदेश आया है कि पुलिस मुझे गिरफ़्तार करने के लिये आ रही है । आपातकाल में सरकार के ख़िलाफ़ बोलना भी गुनाह की श्रेणी में आ गया था । मेरे सामने समस्या खड़ी हो गई कि मैं कहाँ जाऊँ ? हमारे गाँव का ही एक लड़का सुभाष पाराशर दिल्ली अपनी मासी के पास कुछ दिनों के लिये गया हुआ था । मैंने उनके घर से उसका पता लिया । लेकिन दिल्ली जाने के लिये पैसे भी तो चाहिये थे । मैंने हरिदेव केसर से ही दो सौ रुपया उधार लिया और पुलिस के आने से पहले ही दिल्ली के लिये रवाना हो गया ।
आपात स्थिति का क्या अर्थ है , यह सबसे पहले दिल्ली आकर ही पता चला । उनदिनों दिल्ली आना यानि साँप के मुँह में हाथ डालना था । सुभाष की मासी का घर शायद सरोजिनी नगर या ऐसे ही किसी स्थान के कूचों में था । दो तीन दिन बाद ही सुभाष को चिन्ता होने लगी । क्योंकि किसी घर में कौन नया मेहमान आया है , ऐसी सूचना पुलिस अपने माध्यमों से पता कर रही थी और फिर नये मेहमान की पूरी जन्मपत्री की छानबीन की जाती थी । गृहपति मेहमाननवाज़ी करता करता किसी संकट में न फँस जाये , यह सोच कर मैं और सुभाष दोनों ही वहाँ से रुखसत हो लिये । दिल्ली सचमुच एक बहुत बड़ी जेल में तब्दील हो चुका था । अलबत्ता इसका इतना असर जरुर हुआ था कि हमारे गाँव में भी चाय बेचने वाले ने चाय का कप आठ आने का कर दिया था ।
बाद की कहानी लम्बी है । जल्दी ही राष्ट्रीयस्वयं सेवक संघ ने आपातकाल के विरोध में सत्याग्रह शुरु कर दिया था । मैं , हरीश कुमार और सतीश कुमार तीनों ही डी ए वी कालिज जालन्धर के आगे सत्याग्रह करते हुये गिरफ़्तार हो गये । पुलिस कोतवाली ले गई और थाने में हवालात का क्या अर्थ होता है , यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है । हमने सर्दियों में सत्याग्रह किया था और हवालात में गर्मी हो या सर्दी दरवाज़ा नहीं होता , खुली सलाखें होती हैं । कई दिन का मलमूत्र वहीं जमा रहता है । रात को सर्दी में क्या हालत होती होगी , अन्दाज़ा लगाया जा सकता है । उसके बाद जालन्धर जेल में और कुछ दिन बाद फ़िरोज़पुर जेल में रहे । फ़िरोज़पुर जेल में मित्रसेन भी थे । लुधियाना के प्रतिष्ठित उद्योगपति । पुलिस ने उन पर केस दर्ज किया था किसी की भैंस चुराने का । भैंस का पता लगाने के लिये पुलिस ने उनकी पैंट में चूहे छोड़ कर नीचे से पैंट को बाँध दिया था । हिमाचल में इससे भी ज़्यादा क्रूर व्यवहार भारतीय मज़दूर संघ के प्यारे लाल बेरी के साथ किया गया था । शान्ता कुमार , दौलतराम चौहान, कँवर दुर्गा चन्द , किशोरी लाल सब सलाखें में पहुँच गये थे ।
उधर फ़िरोज़पुर से जब पुलिस हमें पेशी के लिये जालन्धर लेकर आती थी तो एक बुज़ुर्ग सिपाही हमें समझाता रहता था कि इस उमर में हमें जेबकतरे का घटिया काम नहीं करना चाहिये , कोई और काम करना चाहिये । शायद पुलिस ने हम पर जेब कतरने का केस दर्ज किया होगा । हम उसको बहुत समझाते कि हम जेब क़तरे नहीं हैं बल्कि राजनैतिक क़ैदी हैं जो देश में लोकतंत्र की बहाली के लिये लड़ रहे हैं । लेकिन उसका मानना था कि सभी जेबकतरे ऐसी ही बातें करते हैं और मैं तो इस बिरादरी पर कभी विश्वास कर ही नहीं सकता । विश्वास न करने का कारण यह था कि जब वह अमृतसर में तैनात था और किसी जेब क़तरे को रंगे हाथों पकड़ लेता था तो थाने आकर वह जेबकतरे मिन्नतें करता था और पैर पकड़ता था और दूसरे दिन घंटाघर चौक में मिलने का वायदा करता था । दूसरे दिन यह सिपाही घंटाघर में उस जेबकतरे का लम्बा इन्तज़ार करता रहता लेकिन वह कम्बख़्त आता ही वहीं था । इसलिये इस सिपाही का जेबकतरों पर से विश्वास उठ गया था । मैंने सिपाही से पूछा कि आप जेबकतरे का घंटाघर पर इन्तज़ार करते क्यों थे ? दरअसल जेबकतरा सिपाही को बताता था कि इस समय तो उसके पास पैसे नहीं है लेकिन कल वह इतने बजे घंटाघर पर उसे पैसे दे देगा । सौदा पट जाता था और सिपाही जेबकतरे को छोड़ कर दूसरे दिन पैसा लेने घंटाघर पहुँच जाता था । इस प्रकार वह कई जेबकतरों से धोखा खा चुका था और अब जेबकतरों की किसी भी बात पर विश्वास नहीं करता था । ठीक भी है । दूध का जला छाछ को भी फूँक फूँक कर पीता है । वह हमें बार बार यह तो कहता रहता था कि तुम मेरे बच्चों जैसे हो , इसलिये यह जेबकतरे का काम छोड़ दो । लेकिन इस बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं था कि हम राजनैतिक क़ैदी हैं । इसलिये हमने भी बार बार उसका भाषण सुनने के स्थान पर उससे यह वायदा करना ही ठीक समझा कि हम आगे से जेब कतरने का काम नहीं करेंगे । जेल जीवन कैसा था , इसकी चर्चा का न समय है और न ही अख़बार में स्पेस है । लेकिन मुझे अभी भी याद है जब इन्दिरा गान्धी हारीं तो पंजाब विश्वविद्यालय के होस्टलों में सारी रात ढोल बजते रहे थे । उनकी आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूँज रही है ।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

पृथ्वी मुस्कुराने नहीं सिसकने पर मजबूर

लेखक परिचय

निर्भय कर्ण

निर्भय कर्ण

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार
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जब बारिश की बूंदें धरती/पृथ्वी पर पड़ती हैं तो हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाता है, पृथ्वी खुशी से मुस्कराने लगती है और ईश्वर का धन्यवाद करती है लेकिन वर्तमान हालात ने पृथ्वी को मुस्कुराने पर नहीं बल्कि सिसकने पर मजबूर कर दिया है। वजह साफ है सजीवों को जीवन प्रदान व पोषित करनेवाली अनोखी और सुन्दर पृथ्वी को चारों ओर से क्षति पहुंचाने का कार्य चरम पर है जो प्राकृतिक आपदा के लिए प्रमुख कारक है। मानव यह भूलता जा रहा है कि पृथ्वी हमसे नहीं बल्कि पृथ्वी से हम हैं यानि कि यदि पृथ्वी का अस्तित्व है तो हमारा अस्तित्व है अन्यथा हमारा कोई मूल्य नहीं। लेकिन यह बात मानव मन-मस्तिष्क से निकाल व नजरअंदाज कर भारी गलती कर रहा है और इसका नतीजा मानव भुगत भी रहा है। दुनियाभर में प्रदूषण से लगभग 21 लाख लोग हर साल मौत की गोद में समा जाते हैं, यह जानते हुए भी हम पृथ्वी के अस्तित्व से खिलवाड़ करने पर लगातार उतारू हैं !
कुल मिलाकर पृथ्वी को मुख्यतः चार चीजों से खतरा है। पहला है ग्लोबल वार्मिंग। विशेषज्ञ यह आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग ने मौसम को और भी मारक बना दिया है और आनेवाले वर्षों में मौसम में अहम बदलाव होने की पूरी संभावना है, चक्रवात, लू, अतिवृष्टि और सूखे जैसी आपदाएं आम हो जाएंगी। धरती पर विद्यमान ग्लेशियर से पृथ्वी का तापमान संतुलित रहता है लेकिन बदलते परिवेश ने इसे असंतुलित कर दिया है। तापमान में बढ़ोतरी का अंदाजा वर्ष दर वर्ष हम सहज ही महसूस करते हैं। कुछ दशक पहले अत्यधिक गर्मी पड़ने पर भी 38 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान हुआ करता था लेकिन अब यह 50 से 55 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा है। लगातार बढ़ते तापमान से ग्लेशियर पिघलने लगा है और वह दिन दूर नहीं जब पूरी पृथ्वी को जल प्रलय अपने आगोश में ले लेगा। संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि धरती के बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु के लिए कोई प्राकृतिक कारण नहीं बल्कि इंसान की गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। इसलिए अभी भी वक्त है कि हम समय रहते संभल जाएं।

बढ़ते तापमान से न केवल जलवायु परिवर्तन होने लगा है बल्कि पृथ्वी पर ऑक्सीजन की मात्रा भी कम होने लगी है जिससे कई बीमारियों का बोलबाला होता जा रहा है और इसका मुख्य कारण है ग्रीनहाउस गैस, बढ़ती मानवीय गतिविधियां और लगातार कट रहे जंगल। पेड़ों की अंधाधुध कटाई एवं सिमटते जंगलों की वजह से भूमि बंजर और रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है। यदि भारत की ही बात करें तो यहां पिछले नौ सालों में 2.79 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास की भेंट चढ़ गए जबकि यहां पर कुल वन क्षेत्रफल 6,90,899 वर्ग किलोमीटर है। वन न केवल पृथ्वी पर मिट्टी की पकड़ बनाए रखता है बल्कि बाढ़ को भी रोकता और मृदा को उपजाऊ बनाए रखता है। साथ ही, वन ही ऐसा अनमोल चीज है जो बारिष कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर हमें पानी उपलब्ध कराता है। धरती पर पानी की उपलब्धता की बात करें तो धरती पर 1.40 अरब घन किलोमीटर पानी है। इसमें से 97.5 फीसदी खारा पानी समुद्र में है, 1.5 फीसदी पानी बर्फ के रूप में है। इसमें से ज्यादा ध्रुवों एवं ग्लेशियरों में है लोगों की पहुंच से दूर है। बाकी एक फीसदी पानी ही नदियों, तालाबों एवं झीलों में है जहां मनुष्य की पहुंच तथा पीने योग्य है। लेकिन इस पानी का भी एक बड़ा भाग जो 60-65 फीसदी तक है खेती और औद्योगिक क्रियाकलापों पर खर्च हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड वॉटर डेवलेपमेंट रिपोर्ट ‘2014’ के मुताबिक, 20 प्रतिशत भूमिगत जल खत्म हो चुका है और 2050 तक इसकी मांग में 55 प्रतिशत तक इजाफा होने की संभावना है। पानी संकट का मुख्य कारण इसकी बर्बादी ही है। आंकड़ों पर गौर करें तो 60 प्रतिशत तक पानी इस्तेमाल से पहले ही बर्बाद हो जाता है।
दूसरा है ओजोन परत में छिद्र। सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी किरणों से ओजोन की छतरी हमें बचाती है लेकिन मानवीय गतिविधियां एवं प्रदूशण ने इसमें लगातार छिद्र होने पर मजबूर कर दिया है। इस महत्वपूर्ण परत में छिद्र का आकार लगातार बढ़ता ही जा रहा है जो भयंकर विनाश की ओर इशारा करती है। देखा जाए तो, ओजोन क्षरण के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस और खेती में इस्तेमाल किया जाने वाला पेस्टीसाइड मेथिल ब्रोमाइड जिम्मेदार है। रेफ्रीजरेटर से लेकर एयरकंडीशनर तक क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस का उत्सर्जन करते हैं और इन उपकरणों के प्रचलन में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। बढ़ते प्रदूषण ने लोगों का सांस लेना दूभर कर दिया है। येल यूनिवर्सिटी के ग्लोबल इनवायरनमेंट परफॉरमेंस इंडेक्स (ईपीआई) ‘2014’ के मुताबिक, दमघोंटू देश में जहां भारत 155वें स्थान पर है वहीं नेपाल 139वें स्थान पर।
तीसरा है प्राकृतिक संसाधनों का दोहन। धरती का गर्भ दिन-प्रति-दिन खोखला होता जा रहा है जिसका मुख्य कारण है खनिज पदार्थों का दोहन, प्राकृतिक संपदाओं की तलाश आदि। विषेशज्ञ इस बात की आशंका का व्यक्त कर रहे हैं कि धरती का ऊपरी परत का आवरण कमजोर पड़ता जा रहा है जिससे धरती बिखर सकती है। खदानों और बोरवेल के दौर में पहाड़, नदी, पेड़ और जंगल लगभग समाप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं।
चौथा है परमाणु युद्ध। पूरी दुनिया में तेजी से आगे बढ़ने की दौड़ की जद्दोजहद में देशों के बीच शत्रुता और वैमनस्यता अपना स्थान बना रही है। ऐसे हालात में परमाणु युद्ध होने का खतरा भी सबसे ज्यादा बना रहना स्वाभाविक है। इसी वजह से सभी देश परमाणु बम बनाने की जुगत में रहते हैं और कई दर्जन देश इसे हासिल भी कर चुके हैं। आज विश्व में इतने परमाणु बम हैं कि लगभग 1000 बार धरती को नष्ट किया जा सकता है। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम इस्तेमाल करने के परिणामों से इन बमों की विध्वंसक शक्ति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
हमें हर हाल में अपनी जीवनदायिनी पृथ्वी को बचाना होगा। पर्यावरण संतुलन के लिए अधिक से अधिक पेड़-पौधों को लगाना, उनकी देखभाल करना सभी को अपना कर्त्तव्य मानना होगा। पर्यावरण को बचाने की दिशा में ऊर्जा संरक्षण पर बल देना, वैश्विक ताप के निवारक उपायों में गैसों के उत्सर्जन पर भारी कटौती के साथ-साथ प्रभावकारी उपायों पर गंभीर चिंतन करना, घरों से निकलने वाला मलमूत्र और कूड़ा फैक्ट्रियों से निकलने वाली गंदगी से ज्यादा प्रदूषण के पूर्ण निस्तारण पर काम करना, इको फ्रेंडली विकास पर जोर देना होगा। बायो गैस के साथ-साथ सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को अधिक से अधिक करना आज की जरूरत बन गयी है जिससे कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव को कम किया जा सके। इसके साथ ही हमें दुनिया की बढ़ती आबादी को नियंत्रण करने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।

रविवार, 5 अप्रैल 2015

हाथी के दांत: दिखने के और, खाने के और

देश की संसद और विधान सभाओं में हमारे जन प्रतिनिधि संयत और मर्यादित आचरण नहीं करते. राजनीतिक पार्टियां रणनीति बनाकर संसद और विधानसभा में हो-हल्ला करती हैं और कामकाज नहीं चलने देतीं. पार्टी नेतृत्व भी ऐसे नेताओं की चुनावी उपयोगिता देखता है, उनका आचरण नहीं. मसलन गिरिराज सिंह बिहार के भूमिहारों के प्रभावशाली नेता हैं. आने वाले विधानसभा चुनाव में वे बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं. साध्वी निरंजन ज्योति भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज़रूरत पड़ने पर बहुत काम की सिद्ध होंगी. इसलिए नेतृत्व ऐसे तत्वों को सजा देने की बजाय शह देता है. यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है. भारत में लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह शुभ संकेत नहीं है.
बिहार से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जब कहते हैं कि अगर राजीव गांधी गोरी चमड़ी वाली सोनिया गांधी के बजाय काली चमड़ी वाली किसी नाइजीरियन महिला से शादी करते तो भी क्या कांग्रेस पार्टी उस महिला को अपना नेता स्वीकार करती? गिरिराज सिंह के कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ रंगभेदी बयान पर नाराज़गी तो जताई जा सकती है लेकिन यह कोई हैरत की या नई बात नहीं है. गत वर्ष लोकसभा चुनाव के दौरान हाजीपुर में एक चुनाव सभा को संबोधित करते हुए भी सिंह ने एक बयान दिया था कि नरेंद्र मोदी के विरोधियों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है और उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए. तब मंच पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी भी बैठे थे. लेकिन गडकरी ने उनके बयान की आलोचना में एक शब्द भी नहीं कहा. आश्चर्य की बात यह है कि पार्टी नेतृत्व ने कभी भी इस तरह के बयानों की खुलकर आलोचना नहीं की. अब इस नए बयान पर पार्टी सूत्रों के हवाले से ही खबर है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने गिरिराज सिंह से फोन पर कहा है कि वह अपने बयान के लिए खेद प्रकट करें लेकिन पार्टी की ओर से स्पष्तः उनकी कोई आलोचना या निंदा नहीं की गई. पिछले साल भी मीडिया में पार्टी सूत्रों के हवाले से खबर आई थी कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने फोन पर गिरिराज सिंह को ऐसे बयान न देने के लिए कहा है. लेकिन गिरिराज सिंह पर इस समझाइस का असर नहीं हुआ.
असलियत तो यह है कि भाजपा ने ऐसे नेताओं को दंडित करने के बजाय पुरस्कृत ही किया है. लोकसभा चुनाव के बाद गिरिराज सिंह को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करके उन्हें इसका पुरस्कार दिया गया. पहली बार केंद्र में मंत्री बने गिरिराज ने केजरीवाल की तुलना राक्षस मारीच से कर दी और प्रधानमंत्री को राम कहा. दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले एक और केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति का रामजादा वाला बयान काफ़ी विवादित हुआ था. लेकिन इस बयान के बाद भी उनके खिलाफ किसी किस्म की कार्रवाई नहीं हुई. कुछ दिनों पहले बीजेपी नेता और सांसद साक्षी महाराज ने अपने एक विवादित बयान में कहा था कि हर हिंदू चार संतान पैदा करे. विपक्ष ने इन बयानों को बड़ा मुद्दा बनाकर संसद में जोरदार हंगामा किया. यहां तक कि इन बयानों को लेकर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल खड़े कर दिये गये. भाजपा नेताओं को अपने बयानों को लेकर संसद में माफी मांगनी पड़ी. लेकिन यह सिलसिला रुका नहीं, भाजपा के आनुषंगिक संगठनों के नेता इसे और हवा देते रहे. विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की नेता साध्वी प्राची द्वारा गत एक फरवरी को बदायूं में आयोजित हिन्दू सम्मेलन में दिए गए बयान में कहा गया कि हिंदू महिलाओं को अधिक बच्चे पैदा करना चाहिए। प्राची ने कहा कि एक बच्चे से देश की रक्षा नहीं हो सकती है, इसलिए चार बच्चे पैदा करो. एक ही क्‍यों कम से कम चार बच्‍चे पैदा करें। प्राची ने कहा कि हम कहते हैं कि हम दो हमारे दो, लेकिन भाइयों और बहनों अब हमें चार-चार बच्चे चाहिए। कहा जाता है कि शेर का एक बच्चा-यह जो बात कही जा रही है वह गलत है। एक शेर के एक बच्चे को हम सीमा पर लड़ने के लिए भेज देंगे तो क्या होगा? पाकिस्तान वहां पर खून-खराबा कर रहा है, इसलिए चार-चार बच्चे पैदा करो। उन्होंने कहा कि एक बच्चे को देश की सीमा की रक्षा के लिए बॉर्डर पर भेजो। एक बच्चे को संतों को सौंप दो, एक बच्‍चे को समाज के लिए दो जोकि समाज के काम आए और एक बच्चे को संस्कृति की रक्षा करने के लिए वीएचपी को दे दो। उन्‍होंने कहा कि सरकार तो अच्छी बन गई लेकिन परिवर्तन होना चाहिए।
परिवर्तन सरकारों से नहीं संस्कारों से होगा। गिरिराज किशोर और प्रवीण तोगड़िया को तो इस तरह के बयानों में पूरी महारत हाशिल है ही. हाल ही में वीएचपी नेता तोगड़िया ने गुजरात के भावनगर में यह बयान दिया कि भारत में रहने वाले तमाम मुस्लिम और ईसाई हिंदुओं के वंशज हैं. विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेता प्रवीण तोगड़िया वर्षों से मुस्लिम-विरोधी भड़काऊ बयान दे रहे हैं. लेकिन किसी पर भी अंकुश लगाने की कहीं कोई कोशिश नज़र आती नहीं दिखती. साधु-साध्वियां जिन्हें हिंदू मान्यताओं, ग्रंथों और पारंपरिक भावनाओं के अनुसार यह समझा जाता था कि वे माया-मोह और लोभ-लाभ से दूर रह कर भौतिक सुख-सुविधाओं का परित्याग कर संसारी जनों को अपने कर्म सुधारने को प्रेरित किया करते थे, अब स्वयं बेहद संसारी और सत्ता प्रेमी हो चुके हैं. इसीलिए इलाहाबाद में माघ मेले में शिरकत कर रहे उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा है कि नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए हिन्दुओं को दस-दस बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदुओं की एकता की वजह से ही मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। वह आने वाले समय में भी बहुमत में रहें, इसके लिए हिंदू परिवारों को 10 बच्चे पैदा करने होंगे।
बयानों के इस दौर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद सुब्रमण्यम स्वामी कैसे पीछे रहते। सुब्रमण्यम स्वामी ने बयान दिया कि मस्जिद धार्मिक स्थल नहीं है सिर्फ इमारत है, इसलिए उसे कभी भी तोड़ा जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा, सभी भारतीय मुसलमान पहले हिंदू थे. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने गुवाहाटी में शुक्रवार को एक कार्यक्रम के दौरान यह बात कही. सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने बयान के पक्ष में तर्क देते हुए सऊदी अरब का एक उदाहरण पेश किया। उन्होंने कहा कि वहां सड़कें बनाने के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है. इसके साथ ही उन्होंने कहा, अगर कोई मेरे राय से इत्‍तेफाक नहीं रखता, तो मैं इस मुद्दे पर उसके साथ बहस करने को तैयार हूं.
खैर सांप्रदायिक राजनीति तो भाजपा की रगों में दौड़ती है लेकिन अब सुनिए कुछ स्वास्थ्य संबंधी उपदेश। इलाहाबाद से बीजेपी सांसद श्याम चरण गुप्ता ने तम्बाकू से कैंसर के बारे में कहा, ‘मैं आपके सामने ऐसे कई लोगों को पेश कर सकता हूं, जो खूब बीड़ी पीते हैं और उन्हें अब तक कोई बीमारी नहीं हुई, कैंसर भी नहीं हुआ.’ उन्होंने यह भी कह दिया कि चीनी, चावल, आलू खाने से आपको डायबिटीज हो जाती है, तो इन सारी चीजों के लिए भी आप चेतावनी क्यों नहीं लिखते? इससे पहले दिलीप गांधी ने कहा था कि तंबाकू से कैंसर होने संबंधी सभी अध्ययन विदेशों में हुए हैं और किसी को भारतीय परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखना चाहिए. गांधी ने कहा, ‘तंबाकू के हानिकारक प्रभावों पर सभी एकमत हैं. यह साबित करने वाली कोई भारतीय रिसर्च नहीं है कि तंबाकू के सेवन से कैंसर होता है. कैंसर सिर्फ तंबाकू के कारण नहीं होता है.
अब दिलीप गांधी का एक और जानकारी भरा बयान सामने आया. एक टीवी चैनल की खबर के मुताबिक, गांधी ने बयान दिया कि तंबाकू असल में हाजमे में मददगार होता है. ध्यातव्य है गांधी तंबाकू और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003’ के प्रावधानों के परीक्षण के लिए गठित एक संसदीय समिति के प्रमुख हैं. ऐसा नहीं है कि विवादित बयान सिर्फ भाजपाई और उनके सहयोगी ही देते हैं उनके अलावा कांग्रेस, सपा, जदयू, बसपा, तृणमूल कांग्रेस सभी दलों के नेता अनाप-शनाप बोलते रहते हैं. दूसरी पार्टियों का हाल भी बहुत बेहतर नहीं है. पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को धमकी दी थी. उन्होंंने कहा था कि यदि उन्होंने या उनके साथियों ने वहां दंगे भड़काए तो वह उनकी ‘बोटी-बोटी कर देंगे’. हैदराबाद के ओबैसी बंधू और समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान और अबू आज़मी भी भड़काऊ और विवादास्पद बयान देने के लिए कुख्यात हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने अपने समर्थकों से मार्क्सवादियों के बारे में एक बेहद उत्तेजक बयान दिया था.
अभी कुछ ही दिनों पहले जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने पहले दक्षिण भारतीय महिलाओं के शरीर सौष्ठव पर अपनी राय पेश की, आश्चर्य यह कि इस पर सभी सांसद मुस्करा रहे थे. फिर उन्होंने भाजपा की महिला मंत्री स्मृति ईरानी के विषय में आपत्तिजनक टिप्पणी कर डाली, कुछ दिनों हो हल्ला हुआ और मामला धीरे-धीरे शांत हो गया. ये नेता यहीं नहीं रुकते हैं, बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी ये अपनी गैरजिम्मेदार टिप्पणियां करने से बाज नहीं आते. कुछ समय पूर्व हरियाणा में गैंगरेप की बढ़ती वारदातों पर कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्‍ता ने एक बेहद विवादित और गैर जिम्‍मेदाराना बयान दे डाला उन्‍होंने कह दिया कि 90 फीसदी लड़कियां सहमति से शारीरिक संबंध बनाती हैं। जब लड़कियां किसी के साथ जाती हैं तो उन्‍हें मालूम नहीं होता कि वह गैंगरेप की शिकार हो जाएंगी। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव और विदेशी सोच को जिम्मेदार ठहरा दिया था। उन्होंने कहा कि रेप ‘इंडिया’ में होते हैं ‘भारत’ में नहीं। इससे पहले भी कई बड़े लोग दिल्ली गैंगरेप और महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मसलों पर बेतुके और विवादित बयान दे चुके हैं. विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार अशोक सिंघल ने बयान में कहा था कि महिलाओं का पाश्चात्य रहन-सहन दुष्कर्म सहित हर तरह के यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार है. मध्य प्रदेश में भाजपा के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तो और एक कदम आगे निकले। उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि सीताजी (महिलाएं) ने लक्ष्मण रेखा पार की, तो रावण उनका हरण कर लेगा। इसलिए महिलाओं को अपनी मर्यादा के भीतर ही रहना चाहिए। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र और सांसद अभिजीत मुखर्जी ने दिल्ली गैंगरेप के विरोध में हो रहे विरोध प्रदर्शन पर कहा था कि रेप के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने वाली महिलाएं डिस्को में जाने वाली होती है। जिन्हें हकीकत मालूम नहीं होती, वह केवल कैंडल मार्च पर उतर आती है। हालांकि बाद में राष्ट्रपति की पुत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने भाई के बयान पर असहमति जताते हुए कहा था कि यह बयान महिलाओं का अपमान है और उन्हें तुरंत ये वापस लेना चाहिए। एक नाबालिग लड़की का यौनशोषण करने वाले दुराचारी बाबा आसाराम ने कहा था कि अकेली महिला रात को घर से निकलती है तो उसे भाई को साथ लेकर निकलना चाहिए।
आसाराम ने कथित रूप से टिप्पणी की कि पीड़िता को आरोपियों को ‘भाई’ कहकर संबोधित करना चाहिए था। उन्होंने यहां तक कह डाला कि अगर हिम्मत नहीं थी आत्मसमर्पण क्यों नहीं कर दिया। सार्वजनिक संवाद का यह स्तर और राजनीतिक पार्टियों की चुप्पी भारतीय लोकतंत्र में आई गिरावट का सबूत है. प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अपनी इस फिक्र का जिक्र तो करते हैं लेकिन कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं। यह जनमानस में संदेह पैदा करता है। क्या वास्तव में वे इसके लिए प्रतिबद्ध हैं ? अब तक ऐसा लगता तो कतई नहीं है. शायद हाथी के दांत खाने के और व दिखाने के और हैं. जनमानस निराश है, उद्वेलित है. वह कानूनविदों को आदर्श के रूप में देखता है. इन कर्मों का उसके ऊपर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे विवादित और अमर्यादित बयानों पर रोक लगाने के लिए देश के कानूनविदों , बुद्धजीवियों ,विधि आयोग समेत सभी दलों को इस बात पर गम्भीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है. वर्ना ऐसे बयानों की अटूट श्रंखला यूँ ही चलती रहेगी और इससे उपजे तू-तू मै-मै से देश का विकास कैसे होगा यह तो मोदी जी ही बताएंगे लेकिन यह तय है, पूरे विश्व में जहां वह भारत की मजबूती का परिचय देने की कोशिश कर रहे हैं वहीँ इन गैर जिम्मेदार बयानों से देश की छवि अवश्य धूमिल होती जा रही है.

–शैलेन्द्र चौहान

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

किसके अच्छे दिन! जिसके अच्छे दिन, वह मनायें जश्न!

नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी, प्लीज हमसे ना कहें नया साल मुबारक!

भारत में अब अबाध विदेशी पूंजी के लिए, अबाध बिल्डर प्रोमोटर राज के लिए अब फिर वही 1884 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधान लागू करने का इंतजाम हो गया है।

नया साल शुरु होने से दो दिन पहले भारत में फिर ईस्ट इंडिया कंपनी का राजकाज शुरु हो गया है, एक मुश्त हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों की अरबों डालर के वर्चस्व मध्ये हवाओं, पानियों में भोपाल गैस त्रासदी दुहराया जाने लगा है।

और अब इसे अध्यादेश राज कहा जायेगा। कि नरसंहार जारी रहेगा।

कि मनुस्मृति का गीता महोत्सव और शत प्रतिशत हिंदुत्व का दुस्समय है यह अपना समय कि नया साल मुबारक कहने का मतलब हुआ, आपके चौतरफा सर्वनाश के लिए शुभकामनाएं।

कृपया किसी से न कहें नया साल मुबारक।

खत्म हो रही इंसानियत की कयामत है

खत्म होने को कायनात की कयामत है

फिजां में मौत की खुशबुओं

की बहार है कि कयामत है

लहूलुहान है जिस्म न सही

लहूलुहान है रुह हमारी

हमसे जिस्मानी मोहब्बत

की उम्मीद मत रख

कि हमारी मर्दानगी

मर्दों के राजकाज में

कत्लगाहों की मौज है

और खूबसूरतियां तमाम

बर्बर कातिलों के कब्जे में

दम तोड़ रही है

हम जी नहीं रहे हैं हरगिज

हमारी मुकम्मल खामोशी

हमारे जनाजे के इंतजार में है

बेहया वक्त के ताबूत में कैद हैं हम

नये कंपनी बंदोबस्त के अध्यादेश में खासोआम को खबर हो कि मुलाहिजा फरमाये हुक्म है शाही हिंदू साम्राज्यवादी केसरिया कहर का, जमीन डकैती के लिए किसी की न सुनवाई होगी न नियमागिरि के आदिवासियों को तरह किसी को राय बताने की छूट होगी।

कि जो है धर्मराज्य के हक में, उसका भी काम तमाम है

कि जो इस महाभारत में गीतोपदेश के मुताबिक निमित्तमात्र भारतीय धर्मोन्मादी जनगण है, उसका भी काम तमाम है

हर गैरनस्ली हिंदू कि गैर हिंदू, सवर्ण कि अछूत, बूझै हैं कि न बूझै,

सगरे मुलुक के लिए प्रजाजनों, मौत का पैगाम है

अश्वमेध के घोड़े हुए बेलगाम, सांढ़ों का राज है

त्वाडे नाल राज के वास्ते जिंदा जला देने का पैगाम है कि धर्म और धर्मस्थलकि मजहब और जात पांत नस्ल कातिल के बहाने हैं

त्वाड्डा साड्डा काम तमाम है

मुआवजा जरूर सरकारी हिसाब के मुताबिक दे दिया जायेगा। मुआवजा हर वक्त बांटा जाता है। हर विस्थापन का वायदा फिर मुआवजा है। कि हर बलात्कार का जश्न अब मुआवजा है और हर कत्ल का मुआवजा अब माफीनामा है।

कि अपने अपने घर खाली कर दो, दोस्तों

कि कातिलों को बसेरा चाहिए।

सीमेंट के जंगल में

अपना ठिकाना तलाशों दोस्तों

कि खेतों खलिहानों

रोजी रोटी की मौत का

चाकचौबंद बंदोबस्त है

कि मनुस्मृति राज बहाल है।

लूट के माल का हिस्सा उम्मीद है तो

बेशक खामोशी अख्तियार करो, दोस्तों

वरना चीख सको तो चीखो गला फाड़कर

कि फिर चीखने का मौका मिल न मिले

कयामत मुंह बाँए खड़ी है कि

अबकी तो मुलाकाते हैं

जश्न है, जलवा भी है

रोजी भी है, रोटी भी है

फिर अपना गांव रहे न रहे


फिर मुलाकात हो न हो

हो सके तो मिल लो गले

शायद आखिरी बार

कि किन हादसों के मंजर से

गुजरना पड़े, न जिंदगी का ठौर ठिकाना है

न हम अस्मत किसी की बचाने काबिल

न हमारा कोई फसाना है

उम्मीद फिर वही हरजाना है

खालिस हरजाना है

जीने का फिर वही बहाना है

मजहबी अंधे जो करें, न करें कम है

कब किस इमारत पर टोंके दावा

किसे फिर तबाह कर दे

कब किसे बांटे रेवड़ियां

और कब किस शहर में आग लगा दें

यह देश अब मजहबी आग के हवाले हैं

और हम सारे लोग जनाजे में शामिल है

मोहर्रम पर ईद मुबारक न कहें

भारत में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से मुख्यमंत्री बनीं एकमात्र राजनेता ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ मोर्चा जरूर जमाया है और सुधारों की महागंगा कांग्रेस भी अब सुधार विरोधी उल्टी दिशा में बहने का दिखावा कर रही है। लेकिन जब तक धर्मोन्माद का यह तिलिस्म खत्म नहीं होता, लगता नहीं कि यह कायमत रुकने वाली है।

कारपोरेट वकील वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अधिनियम में बदलाव लाने के सरकार के फैसले को जायज ठहराते हुए कहा, इस तरह की परियोजनाएं रक्षा के लिए तैयारी एवं रक्षा निर्माण सहित भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। सहमति संबंधी उपधारा के बारे में पूछे जाने पर जेटली ने कहा, अगर भूमि अधिग्रहण पांच उद्देश्यों के लिए किया जाता है तो सहमति की उपधारा से छूट मिल जाएगी। संप्रग के कार्यकाल में अमल में आए कानून के मुताबिक पीपीपी परियोजनाओं के लिए जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की जा रही है, उनमें 70 फीसदी लोगों की सहमति जरूरी है।

इस फैसले के साथ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन तथा उचित मुआवजे का अधिकार और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम-2013 में पारदर्शिता 13 मौजूदा केंद्रीय कानूनों के लिए भी लागू होगी। सरकार ने कहा कि जिन मुश्किलों की बात आ रही थी, उनको देखते हुए कैबिनेट ने कुछ संशोधनों को मंजूरी दी है।

जब मौत सर पर मंडरा रही हो तो कातिलों के लिए जश्न का मौका होता है, मारे जाने वालों की चीखें तक निषिद्ध हो जाती हैं।

अब इस केसरिया हिंदू साम्राज्य में चीखने, रोने और पुकारने की भी आजादी नहीं है।

नया साल इसके बावजूद मुबारक हो तो मनाइये जश्न बाशौक।

कृपया हमें न कहें, या हमरी दीवाल पर हरगिज न टांगें नया साल मुबारक।

किसके अच्छे दिन!

जिसके अच्छे दिन, वह मनायें जश्न!

बाकी देश के लिए तो मंजर कयामत है।

फिजां कयामत है।

जिंदगी का दूसरा नाम कयामत है।

नया साल फिर फिर कयामत का इंतहा है।

नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी, हमसे कोई न कहें नया साल मुबारक!

नये साल से ठीक दो दिन पहले आर्डिनेंस राज बहाल हो गया है। यह कोई मुझ जैसे नाचीज का मंतव्य नहीं है।

तमाम विशेषज्ञ जिस इकोनामिक टाइम्स के पन्नों पर भारतीय अर्थव्यवश्ता में दौड़ते सांढ़ों की नब्ज टटोलते रहते हैं, उस अखबार की चीखती हुई सुर्खियां बता रही हैं कि दरअसल नया साल किस तबके के लिए बेहद बेहद मुबारक होने वाला है।

Ordinance Raj Begins, 2 Days Ahead of 2015

केंद्र सरकार ने आज भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इस अध्यादेश के तहत सरकार ने ज़मीन अधिग्रहण की मौजूदा शर्तों में ढील देते हुए काफी आसान बना दिया है।

हमारे पाठकों को याद होगा कि भूमि अधिग्हण की इन तैयारियों के बारे में हमने पूरा ब्यौरा हस्तक्षेप पर कई दिनों पहले लगाया है, ईटी ने हमारी आशंकाओं पर मुहर ठोंक दिया है। हमने वह आलेख अंग्रेजी में लिखा था।

बहराहाल, वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बता दिया है कि सरकार ने बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का अध्यादेश लाने का फैसला किया है।

वित्मंत्री गरीब गुरबों और बेगर लोगों को सब्जबाग यह दिखा रहें है कि जैसे लाकों करोड़ों के प्लैटों की खैरात बंटने वाली है। उनके कहे मुताबिक इस निर्णय से दिल्ली में रहने वाले 60 लाख से अधिक लोगों को फायदा होगा। सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र में अनधिकृत कालोनियों में सीलिंग पर तीन साल के लिए रोक लगाने से जुडे विधेयक को भी पारित कराया था। उन्होंने कहा कि किसानों को मुआवजे से जुडे प्रावधानों में कोई संशोधन नहीं किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्रीय कैबिनेट ने अधिनियम के दायरे में 13 केंद्रीय कानूनों को लाने के लिए संशोधन का फैसला किया है। जिन कानूनों में बदलाव की बात की गई, उनमें रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा, किसानों को अधिक मुआवजा प्रदान करना और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन से संबंधित कानून शामिल हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार ने समाज की विकास संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अधिनियम के कुछ प्रावधानों में रियायत देने और कानून में धारा 10ए को शामिल करने का फैसला किया है।

बहरहाल, इन उद्देश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण करने की स्थिति में नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन पैकेज लागू होगा। अध्यादेश में जो बदलाव शामिल किए जाने हैं, उनके मुताबिक बहुफसली सिंचाई की भूमि भी इन उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित की जा सकती है।

आज भूमि अधिग्रहण आर्डिनेंस से जो मेरे दिलोदिमाग में रक्तपात हो रहा है, उसमें मतुआ आंदोलन के जख्मी लहूलुहान हो जाने का अहसास जितना है, उससे ज्यादा तकलीफ हमारे आदिवासी परिजनों और पुरखों की हजारों साल की लड़ाइयां बेकार हो जाने की वजह से है। तमाम किसान आंदोलनों को गैरप्रासंगिक बना दिये जाने की वजह से है। 1956 और 1958 की तराई की लड़ाइयां, ढठे और सातवें दशक के सारे जनांदोलनों के बेमतलब हो जाने का मातम मना रहा हूं मैं।

अब भूमि अधिग्रहण अबाध है।

अब विदेशी पूंजी और कालाधन अबाध है। यही है गीता महोत्सव।

यही है नये साल के जश्न का मतलब।

किसी की सुनवाई, किसी की सम्मति की कोई जरूरत नहीं है।

नियमागिरि की आदिवासी पंचायतों की राय अब बेमतलब है।

बेमतलब है, संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूचियां, वनाधिकार कानून, पंचायती राज कानून , पर्यावरण कानून, समुद्र तट सुरक्षा कानून वगेैरह वगैरह।

1956 के बाद पुनर्वास के बावजूद बेदखल जमीन का दखल हासिल करने की मेरे गांव के लोगों, मेरे पिता, बसंतीपुर में मेरे दोस्त कृष्णो के पिता गांव के शाश्वत प्रेसीडेंट मांदार बाबू, शाश्वत सेक्रेटरी अतुल शील और शाश्वत कैशियर शिशुवर मंडल की लड़ाई के बेमतलब हो जाने का दर्द है।

- पलाश विश्वास

आम चुनाव में लोग वोट क्‍यों देते हैं?

सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति हत्‍याकांड में अमित शाह बरी हो गए। तो? जब बरी नहीं हुए थे, अभियुक्‍त थे, तब भी कौन सी कीमत उन्‍होंने चुकायी थी? वे तो उलटे सियासी सीढि़यां चढ़ते गए, साहेब के साथ-साथ। यही दोनों क्‍यों, कुल 186 लोकसभा सांसदों के खिलाफ क्रिमिनल मुकदमे चल रहे हैं। अमित शाह भले जनप्रतिनिधि न हों, साहेब के मैनेजर हों, लेकिन बीजेपी के कुल सांसदों में से एक-तिहाई के खिलाफ़ तो आपराधिक मुकदमा दर्ज ही है। तो क्‍या हुआ? जनता ने उन्‍हें चुनकर भेजा है, अब चाहे जै फीसदी जनता हो। मतलब कि हत्‍या, लूट, सेंधमारी, बलात्‍कार, छिनैती, डकैती, दंगा, नरसंहार, धोखाधड़ी आदि से लोग अपने उम्‍मीदवार को नहीं तौलते।

ठीक है। अपना काम-वाम करवाने के मामले में पार्षद-विधायक को चुनने तक तो बात समझ में आती है, लेकिन आम चुनाव में लोग वोट क्‍यों देते हैं? एक अपराधी को सांसद बनने से रोककर लोग अपराधबोध से आसानी से बच सकते थे, खासकर इसलिए भी कि सांसद लोगों का काम सीधे नहीं करवाता। जिसकी कोई उपयोगिता ही नहीं, तिस पर वो अपराधी भी है, उसे वोट देकर अपने हाथ गंदे क्‍यों करना। लोकसभा चुनाव में लोगों ने मोदी को चुना, तभी तो बिना चुना हुआ शाह नाम का आदमी नत्‍थी होकर यहां तक आ गया और बरी हो गया!

मेरा सवाल है: आम चुनाव में लोग वोट क्‍यों देते हैं? क्‍या जनता का काम करने/करवाने के लिए वास्‍तव में किसी राष्‍ट्रीय सरकार की ज़रूरत है? इस पर कम से कम दो बार सोचिएगा।
O- अभिषेक श्रीवास्तव

भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था गांधी की हत्या

  • पुनरूत्थान गोडसे के महिमामंडन का
समय बदल रहा है और इस परिवर्तन की गति काफी तीव्र है। पिछले कुछ दशकों में अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादियों को अपने नायक नाथूराम गोडसे के प्रति अपने प्रशंसाभाव को दबा-छिपाकर रखने की आदत-सी पड़ गई थी। कभी कभार, कुछ कार्यक्रमों में उसका गुणगान किया जाता था परंतु ऐसे कार्यक्रम बहुत छोटे पैमाने पर आयोजित होते थे और उनका अधिक प्रचार नहीं किया जाता था। पिछले कुछ सालों में, प्रदीप दलवी के मराठी नाटक ‘मी नाथूराम बोलतोए‘ (मैं नाथूराम बोल रहा हूं), जिसमें गांधी पर कटु हमला और गोडसे की तारीफ की गई है, का मंचन महाराष्ट्र में कई स्थानों पर हुआ और नाटक देखने के लिए भारी भीड़ भी उमड़ी। इस नाटक का अलग-अलग लोगों द्वारा समय-समय पर विरोध भी किया जाता रहा है।

मई 2014 में दिल्ली में नई सरकार आने के बाद से साम्प्रदायिक भाषणबाजी, टिप्पणियों और कार्यकलापों में तेजी से वृद्धि हुई है। ऐसा लगता है कि सत्ताधारी वर्ग इन हरकतों का मूकदर्शक बना रहना चाहता है। यह निष्कर्ष इसलिए तार्किक प्रतीत होता है क्योंकि अब तक गोडसे प्रशंसकों को न तो किसी सत्ताधारी ने फटकार लगाई है और ना ही उनका विरोध किया है। सरकार में रहने की मजबूरी के चलते वे गोडसे प्रशंसक क्लब के सदस्य तो नहीं बन सकते परंतु वे उसकी निंदा भी नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे स्वयं भी हिन्दू राष्ट्रवाद की गोडसे विचारधारा में आस्था रखते हैं। इस हिन्दू राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रवाद‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। हिन्दू शब्द का उच्चारण इतने धीमे स्वर में किया जाता है कि वह सुनाई ही नहीं देता।

गोडसे प्रशंसक क्लब की सबसे ताजा गतिविधि है मेरठ में 25 दिसम्बर 2014 को हिन्दू महासभा द्वारागोडसे के मंदिर के निर्माण के लिए भूमिपूजन । अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कार्यकर्ता, महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मेरठ में देश का पहला मंदिर बनाने जा रहे हैं। हिन्दू महासभा के कई कार्यालयों में गोडसे की मूर्ति स्थापित करने की तैयारी चल रही है। हिन्दू महासभा ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि दिल्ली में गोडसे की मूर्ति स्थापित करने के लिए उसे भूमि आवंटित की जाए। गोडसे की किताब का द्वितीय पुनर्मुद्रित संस्करण बाजार में आ चुका है।

भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कुछ समय पहले गोडसे को राष्ट्रवादी बताया था। बाद में वे अपने बयान से पीछे हट गए ताकि सत्ताधारी भाजपा परेशानी में न फंस जाए। भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस ने आतंरिक वितरण के लिए दो नई पुस्तकें जारी की हैं। इन पुस्तकों का उद्धेश्य है संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों को उसकी विचारधारा से परिचित करवाना। इन पुस्तकों के शीर्षक हैं, ‘आरएसएस-एक परिचय‘ व ‘आरएसएस-एक सरल परिचय‘। इनमें से दूसरी पुस्तक के लेखक आरएसएस के वरिष्ठ सदस्य एम. जी. वैद्य हैं। वैद्य का कहना है कि ‘आरएसएस के चारों ओर आरोपों का घेरा बना दिया गया है‘। इस पुस्तक का उद्धेश्य, आरोपों के इस घेरे से आरएसएस को बाहर निकालना है।

जहां प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे पर मौन धारण किए हुए हैं वहीं विपक्षी नेताओं ने हिन्दू महासभा व अन्यों द्वारा गोडसे के कृत्य का महिमामंडन करने के प्रयास की कड़ी आलोचना की है।

गोडसे और आरएसएस का क्या रिश्ता था? क्या वह आरएसएस का सदस्य था और क्या उसने बाद में संघ छोड़ दिया था या फिर उसने संघ का सदस्य रहते हुए, सन् 1930 के मध्य में, हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली थी? आधिकारिक रूप से आरएसएस हमेशा यह कहता आया है कि उसका गोडसे से कोई लेनादेना नहीं है और गोडसे ने जब महात्मा गांधी की हत्या की थी, उस समय वह संघ का सदस्य नहीं था। इस बहाने, आरएसएस हमेशा से गोडसे से अपना पल्ला झाड़ता रहा है। यहां यह याद करना मुनासिब होगा कि सन् 1998 में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख प्रो. राजेन्द्र सिंह ने कहा था कि ‘गोडसे अखंड भारत की परिकल्पना से प्रेरित था। उसका उद्धेश्य पवित्र था परंतु उसने गलत साधनों का इस्तेमाल किया‘ (‘आउटलुक‘, अप्रैल 27, 1998)।

हम इस पूरे मुद्दे को कैसे देखें? इसे समझने के लिए सबसे पहले हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को समझना आवश्यक है-उस राजनीति को, जिसके कर्ताधर्ता हिन्दू महासभा और आरएसएस थे। ये दोनों संगठन स्वाधीनता संग्राम से दूर रहे। हिन्दू महासभा की रूचि हिन्दू साम्प्रदायिक राजनीति के झंडाबरदार बतौर राजनीति में प्रवेश करने में थी। आरएसएस, अपने कार्यकर्ताओं का जाल खड़ा करना चाहता था और अलग-अलग संगठन बनाकर शिक्षा, संस्कृति व राज्यतंत्र में घुसपैठ करने का इच्छुक था। इन दोनों संगठनों के एजेन्डा में अनेक समानताएं थीं क्योंकि दोनों, मूलतः हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए काम कर रहे थे। नाथूराम गोडसे इन दोनों संगठनों की विचारधारा के ‘अद्भुत मिलन‘ का प्रतीक था।

आरएसएस, गोडसे को स्वयं से इसलिए अलग कर सका क्योंकि संघ के सदस्यों का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं रखा जाता था और इसलिए कानूनी दृष्टि से संघ को गोडसे से जोड़ना संभव नहीं था। गोडसे ने सन् 1930 में आरएसएस की सदस्यता ली और जल्दी ही वह उसका बौद्धिक प्रचारक बन गया। हिन्दू महासभा और आरएसएस की तरह, वह भी अखंड भारत – अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार का संयुक्त भूभाग – की परिकल्पना का जबरदस्त समर्थक था।

कट्टर हिंदुत्ववादी होने के नाते, वह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत और उनके नेतृत्व में चलाए गए ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन का कटु आलोचक था। गोडसे, स्वाधीनता संग्राम में गांधी की भूमिका में कुछ भी अच्छा नहीं देखता था। आरएसएस और हिन्दू महासभा, गांधी की लगातार इस बात के लिए आलोचना करते थे कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में सभी धार्मिक समुदायों को भागीदार बनाया। गांधी की मान्यता यह थी कि धर्म एक व्यक्तिगत मसला है और उनका प्रयास था कि सभी देशवासी, धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर, भारतीय के रूप में अपनी पहचान स्थापित करें। हिन्दू महासभा और आरएसएस को यह बर्दाश्त नहीं था क्योंकि वे चाहते थे कि केवल हिन्दुओं को ही भारतीय के रूप में स्वीकार किया जाए। गांधी के राष्ट्रवाद का मूल्यांकन, गोडसे, हिन्दू राजाओं के राष्ट्रवाद की कसौटी पर करता था। गांधीजी का मूल्यांकन करने के लिए वह बहुत अजीब मानकों का इस्तेमाल करता था। ‘उनके (गांधी) समर्थक वह नहीं देख पा रहे हैं जो किसी अंधे को भी साफ-साफ दिखाई दे सकता है और वह यह कि शिवाजी, राणाप्रताप और गुरू गोविंद सिंह के सामने गांधी एकदम बौने हैं‘ (वाय आई एसेसिनेटिड गांधी, 1993, पृष्ठ 40) व ‘जहां तक स्वराज और स्वाधीनता प्राप्त करने का सवाल है, उसमें महात्मा का योगदान नगण्य था‘ (पूर्वोक्त, पृष्ठ 87)।


वह महात्मा को मुसलमानों का तुष्टिकरण करने का दोषी और पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार मानता था। आरएसएस और हिन्दू महासभा से अपने जुड़ाव के बारे में वह लिखता है, ‘‘हिन्दुओं की बेहतरी के लिए काम करते हुए मुझे यह अहसास हुआ कि हिन्दुओं के न्यायपूर्ण अधिकारों की रक्षा के लिए राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेना आवश्यक है। इसलिए मैंने संघ छोड़कर हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली‘‘ (पूर्वोक्त पृष्ठ 102)।

उस समय हिन्दू महासभा एकमात्र हिन्दुत्ववादी राजनैतिक दल था। गोडसे, महासभा की पुणे शाखा का महासचिव बन गया। कुछ समय बाद उसने एक अखबार का प्रकाशन शुरू किया जिसका वह संस्थापक संपादक था। अखबार का शीर्षक था ‘अग्रणी या हिन्दू राष्ट्र‘। यह साफ है कि गांधी की हत्या, उन कारणों

(देश का विभाजन और पाकिस्तान को उसके 55 करोड़ रूपये चुकाने पर गांधीजी का जोर), से नहीं की गई थी, जिनका ये संगठन प्रचार करते हैं। गांधी की हत्या इसलिए की गई क्योंकि हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों और गांधी की राजनीति में बुनियादी मतभेद थे। इन दोनों कारणों को तो केवल बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

जब गोडसे कहता है कि उसने आरएसएस छोड़ दिया था, तब उसका क्या अर्थ है? क्या यह सच है? गोडसे के आरएसएस छोड़ने के पीछे के सच का खुलासा उसके भाई गोपाल गोडसे ने ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया‘ (25 जून 1998) को दिए गए एक साक्षात्कार में किया। गोपाल गोडसे, जो कि गांधी हत्या में सहआरोपी था, नाथूराम गोडसे के इस बयान कि ‘उसने आरएसएस छोड़ दिया था‘ के बारे में कहता है, ‘‘उनकी (गांधी) तुष्टिकरण की नीति-जो सभी कांग्रेस सरकारों पर लाद दी गई थी-ने मुस्लिम अलगाववादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया और इसका अंतिम नतीजा पाकिस्तान के निर्माण के तौर पर सामने आया…तकनीकी और सैद्धांतिक दृष्टि से वे (नाथूराम) सदस्य (आरएसएस के) थे परंतु उन्होंने बाद में उसके लिए काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने अदालत में यह बयान कि उन्होंने आरएसएस छोड़ दिया था इसलिए दिया था ताकि हत्या के बाद गिरफ्तार किए गए आरएसएस कार्यकर्ताओं की सुरक्षा हो सके। वे यह समझते थे कि उनके आरएसएस से स्वयं को अलग कर लेने से उन्हें (आरएसएस कार्यकर्ताओं) को लाभ होगा और इसलिए उन्होंने खुशी-खुशी यह किया‘‘।

गोडसे के आरएसएस छोड़ने का दावा करने का असली कारण यह था। गोडसे की दोहरी सदस्यता (आरएसएस व हिन्दू महासभा) से दोनों ही संगठनों को कोई परेशानी नहीं थी। इस तरह, यह स्पष्ट है कि गांधी की हत्या के पीछे हिन्दुत्व की राजनीति की दोनों धाराएं-आरएसएस व हिन्दू महासभा- थीं। गोडसे के संपादन में प्रकाशित समाचारपत्र का शीर्षक ‘हिन्दू राष्ट्र‘ भी इसी तथ्य को रेखांकित करता है। गांधी की हत्या को हिन्दू महासभा व आरएसएस दोनों की ही स्वीकृति प्राप्त थी और उनके कार्यकर्ताओं ने हत्या के बाद, मिठाईयां बांटकर जश्न भी मनाया था। ‘उसके (आरएसएस) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे रहते थे। इसका अंतिम नतीजा यह हुआ कि देश में ऐसा जहरीला वातावरण बन गया जिसके चलते इतनी भयावह त्रासदी संभव हो सकी। आरएसएस के लोगों ने इस पर अपनी खुशी का इजहार किया और गांधी की मृत्यु के बाद मिठाईयां बांटी‘ (सरदार पटेल के एम. एस. गोलवलकर और एस. पी. मुकर्जी को लिखे पत्रों से उद्वत)। गोडसे सनकी नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा गांधी के खिलाफ फैलाए जा रहे जहर का तार्किक परिणाम था। और गोडसे को तो आरएसएस व हिन्दू महासभा दोनों की शिक्षाओं का ‘लाभ‘ प्राप्त था। वे गांधी की हत्या के लिए ‘वध‘ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। सामान्यतः इस शब्द का इस्तेमाल उन राक्षसों की हत्या के लिए किया जाता है जो कि समाज के शत्रु हों। एक अर्थ में, गांधी की हत्या, भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था। इसने उसके आगे की राह प्रशस्त की और पिछले कुछ दशकों में हिन्दुत्ववादी राजनीति कहां से कहां जा पहुंची है, हम सब इससे वाकिफ हैं।

यद्यपि आधिकारिक रूप से संघ परिवार गोडसे के हाथों गांधी की हत्या से स्वयं को अलग रखता है परंतु निजी बातचीत में उसके सदस्य न केवल इस कायराना हरकत को उचित ठहराते हैं बल्कि महात्मा गांधी के महत्व और उनकी महानता को कम करके बताते हैं। उन्हें गोडसे से पूरी सहानुभूति है। यह चालबाजी, यह दोगलापन अब तक चला आ रहा था। मोदी सरकार के आने के बाद अब इस सच को छुपाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। और इसलिए गोडसे का महिमामंडन बिना किसी लागलपेट के, पूरे जोशोखरोश से किया जा रहा है। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

Writer  -राम पुनियानी

दो तिहाई नजरबंद दलित-आदिवासी और मुस्लिम अकेले गुजरात और तमिलनाडु में- मोदी

  • गुजरात में 98 में भाजपा सरकार बनने के साथ ही हो गया था सिलसिला शुरू
नई दिल्ली। बिना किसी अपराध के, विभिन्न प्रतिबंधात्मक कानूनों में, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय को जेल में नजरबंद रखने के मामले में आज भी ब्रिटिश सरकार वाला रवैया जारी है। जहाँ इस मामले में तमिलनाडु हमेशा से आगे रहा है, वहीं गुजरात में 1998 में भाजपा सरकार कायम होने के साथ इसमें बड़ी तेजी आई।

समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय सचिव अनुराग मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरोद्वारा जारी के आंकड़े यह बताते हैं कि, 2013 में देश की जेलों में नजरबंद कैदियों में मुस्लिम, दलित और आदिवासियों का प्रतिशत 67 है – 20% मुस्लिम; 31% दलित; 16% आदिवासी; वहीं देश की कुल आबादी में इनका प्रतिश्त मात्र 38.73 है। इन कैदियों में से 81% गुजरात और तमिलनाडु की जेलों में नजरबन्द है। जबकि गुजरात में इस वर्ग की हिस्सेदारी राष्ट्रीय अनुपात में 14% है तो तमिलनाडु की 11%। गुजरात में बंद कुल नज़रबंद में से 66% नजरबंद इस वर्ग से है, तो तमिलनाड में 72। जबकि राज्य की जनसँख्या के अनुपात में गुजरात में इस वर्ग की कुल जनसँख्या 31 प्रतिशत है, तो तमिलनाड में 27। कमाल की बात यह है कि, नक्सल प्रभावित छतीसगढ़ में कुल मिलाकर सिर्फ एक और झारखंड में कुल 10 नजरबंद थे, तो आतंकवाद प्रभावित जम्मू और काश्मीर में 72। यही नहीं, देश भर की जेल से रिहा 5826 कुल नज़रबन्दों में से 76% गुजरात (2209) और तमिलनाड (2211) जेलों में नजरबंद थे – प्रत्येक राज्य में 38%। यह आंकड़े जाति और धर्मवार नहीं है , लेकिन उपर दिए आंकड़े यह दर्शाते है कि इन रिहा कैदियों में भी मुस्लिम, दलित और आदिवासियों का प्रतिशत अमूमन वहीं होगा।

श्री मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की वेब साईट पर जेल में बंद विभिन्न श्रेणियों के कैदियों के आंकड़ें 1995 से उपलब्ध हैं| गुजरात दंगों में मुस्लिम, दलित और आदिवासी समुदायों का एक दूसरे के खिलाफ जमकर उपयोग हुआ था, इसलिए इन आंकड़ों का विश्लेषण यह बता सकता है कि किस तरह गुजरात में 2002 में हुए दंगों के पहले से ही- 1998 में भाजपा सरकार आने के साथ ही - प्रतिबंधात्मक धाराओं में में मुस्लिम, दलित और आदिवासियों को नजरबंद करने का सिलसिला जोर पकड़ गया था; जो आज तक जारी है। इसमें जहाँ गुजरात में 1995 एवं 1996 में कोई नजरबंद नहीं बताए गए हैं, वहीं 1997 में पहली बार 267 नजरबंद थे जो 1998 में दुगने होकर लगातर बढ़ते रहे और गुजरात में 1998 में 30% कैदी इस वर्ग के थे, जो 2002 में 68 पर पहुंचकर 2013 में भी 66 पर कायम है। तमिलनाड हमेशा से मुस्लिम, दलित और आदिवासीयों को नजरबंद करने के मामले में आगे रहा है: 1998 में प्रतिश्त 86 था; जो 2006 में बढकर 98 तक गया और 2013 में थोडा गिरकर 72 जरुर हो गया है। उन्होंने कहा तमिलनाडु में इन समुदायों के प्रति अति भेदभावपूर्ण है, इस बात में कोई शक नहीं है, लेकिन इस रवैये में किसी सरकार विशेष के बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ा।

जो करेगा, सो भरेगा, तू काहे होत उदास

पीके फिल्म
 डा. अरविन्द कुमार सिंह

इस लेख को लिखने के पूर्व, मैं इस बात की उद्घोषणा करना जरूरी समझता हूॅ कि मैने पीके फिल्म देखी है। ऐसा इस लिये की लेख के बीच में आपके जेहन में ऐसा सवाल उठ सकता है। ठीक उस टीवी एंकर की तरह जिसके पास जब कोई सवाल नही बचता तो यही सवाल उसका सबसे किमती सवाल होता है। लेख प्रारम्भ करने के पूर्वएक छोटी घटना -
एक मुहल्ले में एक व्यक्ति ने एक बच्चे को एक फूल देकर कहा – यदि तुम यह फूल उस सामने वाली लडकी को ले जाकर दे दोगे तो मैं तुम्हे सौ रूपये दूॅगा।
इस घटनाक्रम से कुछ सवाल पैदा होते है -

क्या किसी लडकी को फूल देना गलत है?
क्या इस घटनाक्रम में छोटा लडका गलत है?
जिसने फूल भिजवाया क्या वह गलत है?
इन प्रश्नो का उत्तर देते हुये मैं लेख को आगे बढाउगा।

किसी को फूल देना गलत नही है, फूल देने के पीछे छिपी नियत ज्यादा महत्वपूर्ण है।
छोटा लडका गलत नही है। यदि वह फूल देने के पीछे छिपी नियत को यदि नही समझ पा रहा है तो।
जी हाॅ, वह गलत है। उसकी नियत गलत है। यदि उसकी नियत गलत नही थी तो उसने स्वंय क्यो नही फूल खुद उस लडकी को जाकर दिया।
कुछ इसी तरह के सवाल उठ रहे है फिल्म पीके पर। सबसे पहले हम उन प्रश्नो को जान ले जो इस फिल्म के बाबत आज चर्चा के मध्य में है। या दूसरे अर्थो में पहले यह समझ ले कि क्यो विरोध हो रहा है पीके फिल्म का।

धार्मिक अन्धविश्वास या पाखण्ड पर चोट है इस कारण?
अधिकांश हिस्सा हिन्दू धर्म के अन्धविश्वास पर चोट है इस कारण?
ईश्वर के वजूद पर सवाल उठाया गया है इस कारण?
देवी देवताओ का उपहास उडाया गया है इस कारण?
मुस्लीम या ईसाइ धर्म के अन्धविश्वासो को फिल्म में विस्तार न देने के कारण?
फिल्म का उद्देश्य क्या है – मनोरंजन ? समाजसुधार या पैसा कमाना?
एक एक बिन्दुओ की चर्चा करते है बिन्दुवार -

धार्मिक अन्धविश्वास और पाखण्ड पर चोट पहले भी होती रही है और आगे भी होती रहेगी। संत कबीर और राजा राम मोहन राय उन व्यक्तियों के जामात में खडे है जिन्होने अन्धविश्वास और पाखण्ड पर जमकर चोट की। कबीर से बडा समाजसुधारक और हिम्मतवर व्यक्ति खोजना मुश्किल है। हम कबीर के नियत पर शक नही कर सकते । क्योकि कबीर की खुद की जिन्दगी पाखण्ड से कोसो दूर थी। अतः इस आधार पर फिल्म का विरोध कही से उचीत नही है। लेकिन इस बिन्दू पर क्या फिल्म निर्माता या आमिर खुद को पाते है? उनकी खुद की जिन्दगी क्या अन्धविश्वास या पाखण्ड से दूर है? यदि है तो पहला पत्थर उन्हे मारने का हक है। वरना पहला पत्थर वो मारे जो गुनहगार नही।
इस पूरी फिल्म का ज्यादातर फुटेज हिन्दु अन्धविश्वास पर चोट है। क्यो? क्या मुस्लीम अन्धविश्वासपर चोट करने पर फिल्म नही चलती इसका डर था? अगर इसाई धर्म के अन्धविश्वास को फिल्म के केन्द्रिय भाग में रखा जाता तो फिल्म के न चलने का या भारी विरोध की आशंका थी? आने वाले वक्त में क्या निर्माता इसाई या मुस्लीम धर्म के अन्धविश्वासो पर चोट करती फिल्म देश को देगें? और आमिर खाॅन उसमें एक कलाकार के तौर पर काम करेगें? यदि नहीं तो क्यो? इस आधार पर यदि फिल्म का विरोध है तो यह विल्कुल उचीत है। मनोरंजन की विषयवस्तु किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था नहीं हो सकती। आमिर या राजकुमार हिरानी उस छोटे बच्चे की भूमिका में नही है कि जिसे लडकी को फूल देने का अर्थ नही पता है।
इस फिल्म में एक जगह संवाद है – जो डरता है वो ईश्वर की पूजा करता है। आस्था डर नही श्रद्धा की विषयवस्तु है। आमिर 2012 में हज यात्रा पर गये थे। उन्हे स्पष्ट करना चाहिये, यह डर था या श्रद्धा?
फिल्म में शंकर भगवान का एक कलाकार के माध्यम से जो उपहास उडाया गया है। क्या यह भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी है? या भारतीय लोकतंत्र की सुविधा? यदि सुविधा है तो फिर इस सुविधा का फायदा मुस्लीम या अन्य धर्मो के लिये क्यो नही?
मुस्लीम या इसाई धर्म के अन्धविश्वासो पर चोट करती हुयी कोई फिल्म निर्माता क्यो नही बनाता? इस विषय पर किसी टीवी चैनल पर बहस क्यों नही? शायद इस लिये नही कि ये धर्म विरोध का माद्दा रखते है? या इन धर्मो में मनोरंजन का तत्व नही? या भारत में ये संगठित है, विरोध करने की क्षमता रखते है? हिन्दु समाज का संगठित न होना क्या उसके उपहास का कारण है? यह जुमला आखिर कबतक रटा जायेगा कि थोडे से उपहास करने से क्या हिन्दू समाज इतना कमजोर है कि वह टूट जायेगा? भारतीय लोकतंत्र की आड में किसी समाज से ऐसे मजाक की छूट क्यो?
कोई भी चीज बिना उद्देश्य की नही होती। आखिर इस फिल्म का उद्देश्य क्या है? मनोरंजन? समाजसुधार या पैसा कमाना? याद रखे किसी की धार्मिक आस्था मनोरंजन की विषयवस्तु नही होती। समाजसुधार, अपनी तिजोरी भरने का माध्यम नही होता? गाॅधी, कबीर या राजा राम मोहन राय ने समाजसुधार के माध्यम से अपनी तिजोरियाॅ नही भरी।
कितना हास्यास्पद है फिल्म निर्माता राजकुमार हिरानी कहते है हमने गाॅधी और कबीर के सिद्धांतो पर फिल्म बनायी है। क्या सिर्फ पैसा कमाने के लिये? यदि ऐसा है तो एक कलाकार का सच से यह एक अवैध गठबन्धन है। राग नम्बर है फिल्म के डायलाग के अनुसार। यदि पैसा कमाना इस फिल्म का उद्देश्य है तो यह गिरावट की निम्न सीमा है, जहाॅ अब कोई विषय पैसा कमाने के लिये नही मिल रहा है। चूकि राजकुमार हिरानी जी ने कबीर को याद किया है अतः कबीर के माध्यम से इस लेख का समापन करना चाहूॅगा -

कहते है कबीर बहुत परेशान रहा करते थे। कारण उनके घर के पास एक कसाई रहा करता था। कबीर जब भी शाम को घर वापस आते थे कसाई को देखकर उन्हे बहुत दुख होता था। वे सोचते थे, मैं दिन भर अच्छी बाते करता हूॅ और यह दिन भर बकरा काटता है। कहते है एक दिन कबीर को इलहाम हुआ। इलहाम का अर्थ, जिन प्रश्नो का उत्तर हम अपने बौद्धिक क्षमता से प्राप्त नही कर पाते है, उनका उत्तर हमे उस चेतन सत्ता से प्राप्त होता है। इसे हम इलहाम की संज्ञा देते है। कबीर ने उस इलहाम को शब्दो में व्यक्त किया।

कबीरा तेरी झोपडी, गलकटियन के पास । हे कबीर तेरी झोपडी गला काटने वाले के पास है। तू , न तो यह वातावरण बदल सकता और न ही यह परिस्थिति। अतः यह याद रख -

कबीरा तेेरी झोपडी, गलकटियन के पास ।
जो करेगा, सो भरेगा, तू काहे होत उदास।।

और याद रख, यदि तू गलत करेगा तो तू भी भरेगा। ईश्वरिय सत्ता की अनुभूति, स्व अनुभूति की बात है। सारी जिन्दगी दूसरो को ढूढने वाला यदि नही ढूढ पाता है तो सिर्फ अपने आप को। जिस दिन अपने को ढूढ लेगा उस दिन किसी और की आवश्यकता नही।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

‘बौद्धिक आतंक’ का साया प्रसार भारती में

प्रसार भारती की एक एंकर की अयोग्यता पर बहस हो रही है। माना कि लड़की से भूल हुई या वह अयोग्य ही है, तो इसका क्या मतलब कि उसकी सोशल मीडिया पर धज्जियां उडाई जाएं? और अवसाद में उसे डाला जाए ?

प्रसार भारती जाय भाड़ में। इससे ज्यादा मूल्यवान उस महिला एंकर का जीवन है। बहुत विद्वान प्रसार भारती में घुस भी जायेंगे तो देश और समाज के लिए क्या उखाड़ कर दे देंगे, यह हमें भी पता है ?

उस एंकर का भी भविष्य है। सपने और संघर्ष हैं। ’गवर्नर ऑफ़ इंडिया‘ बोल देने पर एक पंक्ति का खेद प्रसारित किया जा सकता था। इसके लिए उस लड़की के अस्तित्व से खेलना ठीक नहीं। सदियों बाद ये वंचित चहक और चमक रही है। अरे भाई करने दो इन्हें भूल ? उनकी भूल हमारी ही धूर्तई का नतीजा है।

प्रसार भारती में व्याप्त अराजकता पर आपको बोलने का हक़ है। इसके गुण – धर्म में सुधार हो, यह कौन नहीं चाहेगा ?

उस एंकर को अपराध के अनुपात में ही सजा मिलनी चाहिए। उनके साथ अब जो हो रहा है वह अपराध के करीब का मामला है।

यह एक बौद्धिक आतंकवाद है। बुद्धि के बल पर आतंक फ़ैलाने वाले कम बुद्धि वाले को ऐसे ही जीने नहीं देना चाहते ? कितनों के प्रयोग असफल होते हैं ? रॉकेट उड़ते के साथ ही फुस्स हो जाता है तो क्या वैज्ञानिक को मारने काटने दौड़ जाते हैं ?

इस बौद्धिक आतंक के खेल में हमारे भी परिजन शामिल हैं। यह हमारे लिए दुखद है। प्रसार भारती अयोग्य को भी योग्य बनाये। फिटेस्ट नहीं वीकेस्ट की सोचें। उन्हें सहयोग दें। मार्गदर्शन दें ताकि अयोग्यतम की भी जीत हो सके।

O- बाबा विजयेंद्र
About The Author बाबा विजयेंद्र, लेखक स्वराज्य खबर के संपादक हैं।