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बुधवार, 1 जुलाई 2015

आपातकाल की पुरानी स्मृतियाँ

लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

emergency
आपातकाल की घोषणा २५ जून १९७५ को हुई थी । रेडियो पर ख़बर आई होगी । मैंने तो नहीं सुनी थी लेकिन सतीश ने सुन ली थी । मैं उन दिनों भारतीय जनसंघ का ज़िला स्तर का अधिकारी था । सतीश के पास भी मंडल स्तर की कोई ज़िम्मेदारी थी । जयप्रकाश नारायण ने सरकार के ख़िलाफ़ देश भर में आन्दोलन छेड़ा हुआ था । उसमें उस समय के भारतीय जनसंघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ही ज़बरदस्त भागीदारी थी । उसी समय इलाहाबाद उच्चन्यायालय ने उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी का चुनाव भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते रद्द कर दिया । इन्दिरा गान्धी ने उच्च न्यायालय के इस प्रश्न का जबाव देश में आपात स्थिति की घोषणा से दिया । ख़ैर सतीश ने ही मुझे आकर बताया कि आपात काल की घोषणा हो गई है । लेकिन इसका क्या अर्थ है , इसका आभास न मुझे हुआ और न ही उसे ।
बंगा के समीप मुकन्दपुर छोटा सा गाँव है । आपात स्थिति का विरोध करना जरुरी है , इसके लिये पार्टी के निर्देश की प्रतीक्षा की जरुरत नहीं थी । । विरोध करने का हमने अपने गाँव में एक तरीक़ा विकसित कर रखा था । गाँव में लाला हरिदेव केसर मंडल कांग्रेस के प्रधान थे । बाज़ार में उनकी कपड़े की दुकान थी । हम सब इक्कठे होकर उनकी दुकान के सामने कुछ समय के लिये प्रदर्शन और भाषणबाज़ी करते थे । मैंने २५ जून की रात्रि को ही कार्यकर्ताओं को बता दिया कि प्रदर्शन के बारे में गाँव की दीवारों पर चाक से नारे लिख दिये जायें । २६ जून को दस बजे प्रदर्शन निश्चित हो गया । लेकिन सुबह होते होते मुझे आपात स्थिति क्या है ,इसका कुछ कुछ अन्दाज़ा भी हो गया था । रेडियो ख़बरें दे रहा था कि जयप्रकाश समेत सभी प्रमुख विरोध नेता पकड़ लिये गये हैं । जयप्रकाश नारायण को भी कोई पकड़ कर जेल में डाल सकता है , ऐसा उस समय हम सोच भी नहीं सकते थे । लेकिन प्रदर्शन की घोषणा तो हो चुकी थी ।
हरिदेव की दुकान के आगे प्रदर्शन हुआ । मैंने भाषण दिया । आधे घंटे में रैली ख़त्म हो गई । शायद आपातकाल का क्या अर्थ है , इसका अन्दाज़ा हरिदेव केसर को भी नहीं था । लेकिन लगभग दो घंटे बाद हरिदेव ने मुझे संदेश भेजकर घर से बुलवाया और बताया कि बंगा थाना से संदेश आया है कि पुलिस मुझे गिरफ़्तार करने के लिये आ रही है । आपातकाल में सरकार के ख़िलाफ़ बोलना भी गुनाह की श्रेणी में आ गया था । मेरे सामने समस्या खड़ी हो गई कि मैं कहाँ जाऊँ ? हमारे गाँव का ही एक लड़का सुभाष पाराशर दिल्ली अपनी मासी के पास कुछ दिनों के लिये गया हुआ था । मैंने उनके घर से उसका पता लिया । लेकिन दिल्ली जाने के लिये पैसे भी तो चाहिये थे । मैंने हरिदेव केसर से ही दो सौ रुपया उधार लिया और पुलिस के आने से पहले ही दिल्ली के लिये रवाना हो गया ।
आपात स्थिति का क्या अर्थ है , यह सबसे पहले दिल्ली आकर ही पता चला । उनदिनों दिल्ली आना यानि साँप के मुँह में हाथ डालना था । सुभाष की मासी का घर शायद सरोजिनी नगर या ऐसे ही किसी स्थान के कूचों में था । दो तीन दिन बाद ही सुभाष को चिन्ता होने लगी । क्योंकि किसी घर में कौन नया मेहमान आया है , ऐसी सूचना पुलिस अपने माध्यमों से पता कर रही थी और फिर नये मेहमान की पूरी जन्मपत्री की छानबीन की जाती थी । गृहपति मेहमाननवाज़ी करता करता किसी संकट में न फँस जाये , यह सोच कर मैं और सुभाष दोनों ही वहाँ से रुखसत हो लिये । दिल्ली सचमुच एक बहुत बड़ी जेल में तब्दील हो चुका था । अलबत्ता इसका इतना असर जरुर हुआ था कि हमारे गाँव में भी चाय बेचने वाले ने चाय का कप आठ आने का कर दिया था ।
बाद की कहानी लम्बी है । जल्दी ही राष्ट्रीयस्वयं सेवक संघ ने आपातकाल के विरोध में सत्याग्रह शुरु कर दिया था । मैं , हरीश कुमार और सतीश कुमार तीनों ही डी ए वी कालिज जालन्धर के आगे सत्याग्रह करते हुये गिरफ़्तार हो गये । पुलिस कोतवाली ले गई और थाने में हवालात का क्या अर्थ होता है , यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है । हमने सर्दियों में सत्याग्रह किया था और हवालात में गर्मी हो या सर्दी दरवाज़ा नहीं होता , खुली सलाखें होती हैं । कई दिन का मलमूत्र वहीं जमा रहता है । रात को सर्दी में क्या हालत होती होगी , अन्दाज़ा लगाया जा सकता है । उसके बाद जालन्धर जेल में और कुछ दिन बाद फ़िरोज़पुर जेल में रहे । फ़िरोज़पुर जेल में मित्रसेन भी थे । लुधियाना के प्रतिष्ठित उद्योगपति । पुलिस ने उन पर केस दर्ज किया था किसी की भैंस चुराने का । भैंस का पता लगाने के लिये पुलिस ने उनकी पैंट में चूहे छोड़ कर नीचे से पैंट को बाँध दिया था । हिमाचल में इससे भी ज़्यादा क्रूर व्यवहार भारतीय मज़दूर संघ के प्यारे लाल बेरी के साथ किया गया था । शान्ता कुमार , दौलतराम चौहान, कँवर दुर्गा चन्द , किशोरी लाल सब सलाखें में पहुँच गये थे ।
उधर फ़िरोज़पुर से जब पुलिस हमें पेशी के लिये जालन्धर लेकर आती थी तो एक बुज़ुर्ग सिपाही हमें समझाता रहता था कि इस उमर में हमें जेबकतरे का घटिया काम नहीं करना चाहिये , कोई और काम करना चाहिये । शायद पुलिस ने हम पर जेब कतरने का केस दर्ज किया होगा । हम उसको बहुत समझाते कि हम जेब क़तरे नहीं हैं बल्कि राजनैतिक क़ैदी हैं जो देश में लोकतंत्र की बहाली के लिये लड़ रहे हैं । लेकिन उसका मानना था कि सभी जेबकतरे ऐसी ही बातें करते हैं और मैं तो इस बिरादरी पर कभी विश्वास कर ही नहीं सकता । विश्वास न करने का कारण यह था कि जब वह अमृतसर में तैनात था और किसी जेब क़तरे को रंगे हाथों पकड़ लेता था तो थाने आकर वह जेबकतरे मिन्नतें करता था और पैर पकड़ता था और दूसरे दिन घंटाघर चौक में मिलने का वायदा करता था । दूसरे दिन यह सिपाही घंटाघर में उस जेबकतरे का लम्बा इन्तज़ार करता रहता लेकिन वह कम्बख़्त आता ही वहीं था । इसलिये इस सिपाही का जेबकतरों पर से विश्वास उठ गया था । मैंने सिपाही से पूछा कि आप जेबकतरे का घंटाघर पर इन्तज़ार करते क्यों थे ? दरअसल जेबकतरा सिपाही को बताता था कि इस समय तो उसके पास पैसे नहीं है लेकिन कल वह इतने बजे घंटाघर पर उसे पैसे दे देगा । सौदा पट जाता था और सिपाही जेबकतरे को छोड़ कर दूसरे दिन पैसा लेने घंटाघर पहुँच जाता था । इस प्रकार वह कई जेबकतरों से धोखा खा चुका था और अब जेबकतरों की किसी भी बात पर विश्वास नहीं करता था । ठीक भी है । दूध का जला छाछ को भी फूँक फूँक कर पीता है । वह हमें बार बार यह तो कहता रहता था कि तुम मेरे बच्चों जैसे हो , इसलिये यह जेबकतरे का काम छोड़ दो । लेकिन इस बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं था कि हम राजनैतिक क़ैदी हैं । इसलिये हमने भी बार बार उसका भाषण सुनने के स्थान पर उससे यह वायदा करना ही ठीक समझा कि हम आगे से जेब कतरने का काम नहीं करेंगे । जेल जीवन कैसा था , इसकी चर्चा का न समय है और न ही अख़बार में स्पेस है । लेकिन मुझे अभी भी याद है जब इन्दिरा गान्धी हारीं तो पंजाब विश्वविद्यालय के होस्टलों में सारी रात ढोल बजते रहे थे । उनकी आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूँज रही है ।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

किसके अच्छे दिन! जिसके अच्छे दिन, वह मनायें जश्न!

नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी, प्लीज हमसे ना कहें नया साल मुबारक!

भारत में अब अबाध विदेशी पूंजी के लिए, अबाध बिल्डर प्रोमोटर राज के लिए अब फिर वही 1884 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधान लागू करने का इंतजाम हो गया है।

नया साल शुरु होने से दो दिन पहले भारत में फिर ईस्ट इंडिया कंपनी का राजकाज शुरु हो गया है, एक मुश्त हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों की अरबों डालर के वर्चस्व मध्ये हवाओं, पानियों में भोपाल गैस त्रासदी दुहराया जाने लगा है।

और अब इसे अध्यादेश राज कहा जायेगा। कि नरसंहार जारी रहेगा।

कि मनुस्मृति का गीता महोत्सव और शत प्रतिशत हिंदुत्व का दुस्समय है यह अपना समय कि नया साल मुबारक कहने का मतलब हुआ, आपके चौतरफा सर्वनाश के लिए शुभकामनाएं।

कृपया किसी से न कहें नया साल मुबारक।

खत्म हो रही इंसानियत की कयामत है

खत्म होने को कायनात की कयामत है

फिजां में मौत की खुशबुओं

की बहार है कि कयामत है

लहूलुहान है जिस्म न सही

लहूलुहान है रुह हमारी

हमसे जिस्मानी मोहब्बत

की उम्मीद मत रख

कि हमारी मर्दानगी

मर्दों के राजकाज में

कत्लगाहों की मौज है

और खूबसूरतियां तमाम

बर्बर कातिलों के कब्जे में

दम तोड़ रही है

हम जी नहीं रहे हैं हरगिज

हमारी मुकम्मल खामोशी

हमारे जनाजे के इंतजार में है

बेहया वक्त के ताबूत में कैद हैं हम

नये कंपनी बंदोबस्त के अध्यादेश में खासोआम को खबर हो कि मुलाहिजा फरमाये हुक्म है शाही हिंदू साम्राज्यवादी केसरिया कहर का, जमीन डकैती के लिए किसी की न सुनवाई होगी न नियमागिरि के आदिवासियों को तरह किसी को राय बताने की छूट होगी।

कि जो है धर्मराज्य के हक में, उसका भी काम तमाम है

कि जो इस महाभारत में गीतोपदेश के मुताबिक निमित्तमात्र भारतीय धर्मोन्मादी जनगण है, उसका भी काम तमाम है

हर गैरनस्ली हिंदू कि गैर हिंदू, सवर्ण कि अछूत, बूझै हैं कि न बूझै,

सगरे मुलुक के लिए प्रजाजनों, मौत का पैगाम है

अश्वमेध के घोड़े हुए बेलगाम, सांढ़ों का राज है

त्वाडे नाल राज के वास्ते जिंदा जला देने का पैगाम है कि धर्म और धर्मस्थलकि मजहब और जात पांत नस्ल कातिल के बहाने हैं

त्वाड्डा साड्डा काम तमाम है

मुआवजा जरूर सरकारी हिसाब के मुताबिक दे दिया जायेगा। मुआवजा हर वक्त बांटा जाता है। हर विस्थापन का वायदा फिर मुआवजा है। कि हर बलात्कार का जश्न अब मुआवजा है और हर कत्ल का मुआवजा अब माफीनामा है।

कि अपने अपने घर खाली कर दो, दोस्तों

कि कातिलों को बसेरा चाहिए।

सीमेंट के जंगल में

अपना ठिकाना तलाशों दोस्तों

कि खेतों खलिहानों

रोजी रोटी की मौत का

चाकचौबंद बंदोबस्त है

कि मनुस्मृति राज बहाल है।

लूट के माल का हिस्सा उम्मीद है तो

बेशक खामोशी अख्तियार करो, दोस्तों

वरना चीख सको तो चीखो गला फाड़कर

कि फिर चीखने का मौका मिल न मिले

कयामत मुंह बाँए खड़ी है कि

अबकी तो मुलाकाते हैं

जश्न है, जलवा भी है

रोजी भी है, रोटी भी है

फिर अपना गांव रहे न रहे


फिर मुलाकात हो न हो

हो सके तो मिल लो गले

शायद आखिरी बार

कि किन हादसों के मंजर से

गुजरना पड़े, न जिंदगी का ठौर ठिकाना है

न हम अस्मत किसी की बचाने काबिल

न हमारा कोई फसाना है

उम्मीद फिर वही हरजाना है

खालिस हरजाना है

जीने का फिर वही बहाना है

मजहबी अंधे जो करें, न करें कम है

कब किस इमारत पर टोंके दावा

किसे फिर तबाह कर दे

कब किसे बांटे रेवड़ियां

और कब किस शहर में आग लगा दें

यह देश अब मजहबी आग के हवाले हैं

और हम सारे लोग जनाजे में शामिल है

मोहर्रम पर ईद मुबारक न कहें

भारत में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से मुख्यमंत्री बनीं एकमात्र राजनेता ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ मोर्चा जरूर जमाया है और सुधारों की महागंगा कांग्रेस भी अब सुधार विरोधी उल्टी दिशा में बहने का दिखावा कर रही है। लेकिन जब तक धर्मोन्माद का यह तिलिस्म खत्म नहीं होता, लगता नहीं कि यह कायमत रुकने वाली है।

कारपोरेट वकील वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अधिनियम में बदलाव लाने के सरकार के फैसले को जायज ठहराते हुए कहा, इस तरह की परियोजनाएं रक्षा के लिए तैयारी एवं रक्षा निर्माण सहित भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। सहमति संबंधी उपधारा के बारे में पूछे जाने पर जेटली ने कहा, अगर भूमि अधिग्रहण पांच उद्देश्यों के लिए किया जाता है तो सहमति की उपधारा से छूट मिल जाएगी। संप्रग के कार्यकाल में अमल में आए कानून के मुताबिक पीपीपी परियोजनाओं के लिए जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की जा रही है, उनमें 70 फीसदी लोगों की सहमति जरूरी है।

इस फैसले के साथ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन तथा उचित मुआवजे का अधिकार और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम-2013 में पारदर्शिता 13 मौजूदा केंद्रीय कानूनों के लिए भी लागू होगी। सरकार ने कहा कि जिन मुश्किलों की बात आ रही थी, उनको देखते हुए कैबिनेट ने कुछ संशोधनों को मंजूरी दी है।

जब मौत सर पर मंडरा रही हो तो कातिलों के लिए जश्न का मौका होता है, मारे जाने वालों की चीखें तक निषिद्ध हो जाती हैं।

अब इस केसरिया हिंदू साम्राज्य में चीखने, रोने और पुकारने की भी आजादी नहीं है।

नया साल इसके बावजूद मुबारक हो तो मनाइये जश्न बाशौक।

कृपया हमें न कहें, या हमरी दीवाल पर हरगिज न टांगें नया साल मुबारक।

किसके अच्छे दिन!

जिसके अच्छे दिन, वह मनायें जश्न!

बाकी देश के लिए तो मंजर कयामत है।

फिजां कयामत है।

जिंदगी का दूसरा नाम कयामत है।

नया साल फिर फिर कयामत का इंतहा है।

नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी, हमसे कोई न कहें नया साल मुबारक!

नये साल से ठीक दो दिन पहले आर्डिनेंस राज बहाल हो गया है। यह कोई मुझ जैसे नाचीज का मंतव्य नहीं है।

तमाम विशेषज्ञ जिस इकोनामिक टाइम्स के पन्नों पर भारतीय अर्थव्यवश्ता में दौड़ते सांढ़ों की नब्ज टटोलते रहते हैं, उस अखबार की चीखती हुई सुर्खियां बता रही हैं कि दरअसल नया साल किस तबके के लिए बेहद बेहद मुबारक होने वाला है।

Ordinance Raj Begins, 2 Days Ahead of 2015

केंद्र सरकार ने आज भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इस अध्यादेश के तहत सरकार ने ज़मीन अधिग्रहण की मौजूदा शर्तों में ढील देते हुए काफी आसान बना दिया है।

हमारे पाठकों को याद होगा कि भूमि अधिग्हण की इन तैयारियों के बारे में हमने पूरा ब्यौरा हस्तक्षेप पर कई दिनों पहले लगाया है, ईटी ने हमारी आशंकाओं पर मुहर ठोंक दिया है। हमने वह आलेख अंग्रेजी में लिखा था।

बहराहाल, वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बता दिया है कि सरकार ने बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का अध्यादेश लाने का फैसला किया है।

वित्मंत्री गरीब गुरबों और बेगर लोगों को सब्जबाग यह दिखा रहें है कि जैसे लाकों करोड़ों के प्लैटों की खैरात बंटने वाली है। उनके कहे मुताबिक इस निर्णय से दिल्ली में रहने वाले 60 लाख से अधिक लोगों को फायदा होगा। सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र में अनधिकृत कालोनियों में सीलिंग पर तीन साल के लिए रोक लगाने से जुडे विधेयक को भी पारित कराया था। उन्होंने कहा कि किसानों को मुआवजे से जुडे प्रावधानों में कोई संशोधन नहीं किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्रीय कैबिनेट ने अधिनियम के दायरे में 13 केंद्रीय कानूनों को लाने के लिए संशोधन का फैसला किया है। जिन कानूनों में बदलाव की बात की गई, उनमें रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा, किसानों को अधिक मुआवजा प्रदान करना और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन से संबंधित कानून शामिल हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार ने समाज की विकास संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अधिनियम के कुछ प्रावधानों में रियायत देने और कानून में धारा 10ए को शामिल करने का फैसला किया है।

बहरहाल, इन उद्देश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण करने की स्थिति में नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन पैकेज लागू होगा। अध्यादेश में जो बदलाव शामिल किए जाने हैं, उनके मुताबिक बहुफसली सिंचाई की भूमि भी इन उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित की जा सकती है।

आज भूमि अधिग्रहण आर्डिनेंस से जो मेरे दिलोदिमाग में रक्तपात हो रहा है, उसमें मतुआ आंदोलन के जख्मी लहूलुहान हो जाने का अहसास जितना है, उससे ज्यादा तकलीफ हमारे आदिवासी परिजनों और पुरखों की हजारों साल की लड़ाइयां बेकार हो जाने की वजह से है। तमाम किसान आंदोलनों को गैरप्रासंगिक बना दिये जाने की वजह से है। 1956 और 1958 की तराई की लड़ाइयां, ढठे और सातवें दशक के सारे जनांदोलनों के बेमतलब हो जाने का मातम मना रहा हूं मैं।

अब भूमि अधिग्रहण अबाध है।

अब विदेशी पूंजी और कालाधन अबाध है। यही है गीता महोत्सव।

यही है नये साल के जश्न का मतलब।

किसी की सुनवाई, किसी की सम्मति की कोई जरूरत नहीं है।

नियमागिरि की आदिवासी पंचायतों की राय अब बेमतलब है।

बेमतलब है, संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूचियां, वनाधिकार कानून, पंचायती राज कानून , पर्यावरण कानून, समुद्र तट सुरक्षा कानून वगेैरह वगैरह।

1956 के बाद पुनर्वास के बावजूद बेदखल जमीन का दखल हासिल करने की मेरे गांव के लोगों, मेरे पिता, बसंतीपुर में मेरे दोस्त कृष्णो के पिता गांव के शाश्वत प्रेसीडेंट मांदार बाबू, शाश्वत सेक्रेटरी अतुल शील और शाश्वत कैशियर शिशुवर मंडल की लड़ाई के बेमतलब हो जाने का दर्द है।

- पलाश विश्वास

रविवार, 16 नवंबर 2014

….जहाँ सभ्यता नंगी खड़ी है

कतरा-कतरा आबरू

भंवर मेघवंशी
 ‘‘दोपहर होते-होते नीचे हथाई पर पंच और गाँव के मर्द लोग इकट्ठा होने लगे। उनकी आक्रोशित आवाजें ऊपर मेरे कमरे तक पहुँच रही थी, सबक सिखाने की बातें हो रही थी। आज सुबह से ही हमारे परिवार को हत्यारा समझकर गाँव से भाग जाने की अफवाह जान-बूझकर फैला दी गयी थी, जबकि हम निकटवर्ती नाथेला उप स्वास्थ्य केन्द्र पर अपनी गर्भवती बेटी लीला को प्रसव पीड़ा उठने पर नर्स के पास लेकर गये थे। जब अफवाहों की खबर हमें लगी तो बेटी को वहीं छोड़कर घर लौटे। तब तक 50-60 लोग आ चुके थे। धीरे-धीरे और लोग भी आ रहे थे। हम अपने घर में ही थे। नीचे आवाजें तेज होने लगी। ‘बुलाओ नीचे’ की एक साथ कई आवाजें। तब धड़धड़ाते हुए कई नौजवान मर्द सीढि़याँ चढ़कर मेरे घर में घुस आए। पहले मुझे चोटी से पकड़ा, फिर पाँवों की ओर से पकड़कर घसीटते हुए नीचे ले गये, जहाँ पर सैंकड़ों पंच, ग्रामीण अन्य तमाशबीन खड़े थे। मैं सोच रही थी ये मर्द भी अजीब होते हैं, कभी ‘कालीमाई’ कहकर पाँव पड़ते है तो कभी ‘कलमुँही’ कहकर पैर पकड़ कर घसीटते है। मर्द कभी औरत को महज इंसान के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। उसे या तो पूजनीय देवी बना देते है या दासी, या तो अतिमानवीय मान कर सिर पर बिठाल देते हैं या अमानवीय बनाकर पाँव की जूती समझते हैं।
वे मुझे घसीटकर नीचे हथाई पर ले आए। उन्होंने मेरे दोनों हाथों में तीन-तीन ईंटें रखी और सिर पर भारी वजन का पत्थर रख दिया। मेरा सिर बोझ सहने की स्थिति में नहीं था। पत्थर नीचे गिर पड़ा, हाथों में भी दर्द हो रहा था, उन्होंने मेरी कोहनियों में लकड़ी के वार किए, वे मुझसे पूछ रहे थे- सच बता। मैं क्या सच बताती? जाने कौन सा सच वे जानना चाहते थे। मैंने कहा-‘‘म्है नहीं जाणूं (मैं नहीं जानती), म्हूं कठऊं कहूँ (मैं कहाँ से कहूँ)।’’
एक अकेली औरत और वह भी हत्या जैसे संगीन आरोप के शक में पंचों की आसान शिकार बनी हुई, अगर निर्भीकता से बोले तो पुरुषों का संसार चुनौती महसूस करने लगता है। लोगों को उसका निडर होकर बोलना पसंद नहीं आया। आखिर तो वह अभी तक औरत ही थी ना। क्या वह अरावली की इन पहाड़ियों के बीच बसे इलाके के प्राचीन कायदों को नहीं जानती थी? क्या वह भूल गयी थी, पिछले ही साल तो राजस्थान के राजसमंद जिले के इसी चारभुजा थाना क्षेत्र में बुरे चाल-चलन के सवाल पर एक बाप ने अपनी ही बेटी का सर तलवार से कलम कर डाला था और फिर लहू झरते उस सिर को बालों से पकड़े, बाप उसे थाने में लेकर पहुँच गया था।
इज्जत के नाम पर, ऐसा तालिबानी कृत्य करते हुए यहाँ के मर्द तनिक भी नहीं झिझकते हैं तो भी इसकी यह बिसात, अरे यह तो सिर्फ औरत जात है यहाँ तो किसी मर्द पर भी हत्या का शक मात्र हो जाए तो उसे गधे पर बिठाकर घुमाते है पंच। फिर यह औरत है ही क्या?
बस फिर देर किस बात की थी। इस छिनाल को नंगा करो…। एक साथ सैकड़ों आवाजें! एक महिला को निर्वस्त्र देखने को लपलपाती आँखों वाले कथित सभ्य मर्द चिल्ला पड़े। ‘उसे नंगा करो।’ उसके कपड़े जबरन उतार लिए गये। वह जो आज तक रिवाजों से, कायदों से, संस्कृति और कथित संस्कारों के वशीभूत हुई मुँह से घूँघट तक नहीं उघाड़ती थी। आज उसकी इज्जत तार-तार हो रही थी, इस बीच 2 नवम्बर 2014 को आत्महत्या करने वाले वरदी सिंह की बेवा सुंदर बाई चप्पलों से उसे मारने लगी। एक महिला पर दूसरी महिला का प्रहार, मर्द आनंद ले रहे थे।
जमाने भर की नफरत की शिकार अपनी पत्नी की हालत उसके पति उदयसिंह से देखी नहीं गयी। वह अपने बेटों पृथ्वी और भैरों के साथ बचाव के लिए आगे आया। उसके दुस्साहस को जाति पंचायत ने बर्दाश्त नहीं किया। सब उस पर टूट पड़े। मार-मार कर अधमरा कर डाला तीनों बाप-बेटों को और उनको उनके ही घर में बंद कर दिया गया। ‘‘अब तुझे कौन बचाएगा छिनाल। बोल, अब भी वक्त है, सच बोल जा, तेरी जान बख्श देंगे। स्वीकार कर ले कि तेने ही मारा है वरदी सिंह को, तू उसकी बेवा सुंदर को नाते देना चाहती है, तेरा कोई स्वार्थ जरूर है, तूने ही मारा है उसे।’’
पीड़िता ने मन ही मन सोचा, यह कैसा गाँव है, अभी जिस दिन वरदी सिंह ने आत्महत्या की तो पुलिस को इत्तला देने की बात आई थीं तब सारा गाँव एकजुट हो गया कि पुलिस को बताने की कोई जरूरत नहीं है। फिर बिना एफआईआर करवाए, बिना पोस्टमार्टम करवाए ही चुपचाप मृतक वरदी सिंह की लाश को इन्हीं लोगों ने जला दिया था तथा उसकी आत्महत्या को सामान्य मौत बना डाला था… और आज उसकी हत्या का आरोप उस पर लगाकर उसकी जान के दुश्मन बन गये हैं।
‘‘अच्छा… ये ऐसे नहीं बोलेगी। इसके मुँह पर कालिख पोतो, बाल काटो इस रण्… के! और गधे पर बिठाओ कलमुँही को।’’ जाति पंचायत का फरमान जारी हुआ। फिर यह सब अकल्पनीय घटा- शर्म के मारे नग्न अवस्था में गठरी सी बनी हुई पीड़िता का काला मुँह किया गयाबाल काटे गयेजूतों की माला पहनाई गयी और गधे पर बिठा कर उसे पूरे गाँव में घुमाया गया। इतना ही नहीं उसे 2 किलोमीटर दूर स्थित थुरावड़ के मुख्य चौराहे तक ले गये। यह कथा पौराणिक नहीं है और ना ही सदियों पुरानी। यह घटना 9 नवम्बर 2014 को घटी।
पीड़िता रो रही थी, मदद के लिए चिल्ला रही थी, उसके आँसू चेहरे पर पुती कालिख में छिप गये थे और रुदन मर्दों के ठहाकों में। औरतें भी देख रही थी, वे भी मदद के लिए आगे नहीं आई। थुरावड़ चौराहे पर तो एक औरत ने उसके सिर पर किसी ठोस वस्तु का वार भी किया था। पढ़े-लिखे, अनपढ़, नौजवान, प्रौढ़, बुजुर्ग तमाम मर्द इंसान नहीं हैवान बन गये थे। लगभग पाँच घंटे तक हैवानियत और दरिंदगी का एक खौफनाक खेल खेला गया मगर किसी की इंसानियत नहीं जागी। जो लोग इस शर्मनाक तमाशे में शरीक थे, उनके मोबाइल तो पंचों ने पहले ही रखवा लिए थे ताकि कोई फोटो या विडियो क्लिपिंग नहीं बनाई जा सके, मगर राहगीरों व थुरावड़ के लोगों ने भी इसका विरोध नहीं किया।
थुरावड़ पंचायत मुख्यालय है। वहाँ पर पटवारी, सचिव, प्रधानाध्यापक, आशा सहयोगिनी, रोजगार सहायक, सरपंच, वार्ड पंच, नर्स, कृषि पर्यवेक्षक इत्यादि सरकारी कर्मचारियों का अमला विराजता है। इनमें से भी किसी ने भी घटना के बारे में अपने उच्चाधिकारियों को सूचित नहीं किया और ना ही विरोध किया। वह अभागिन उत्पीड़ित होती रही। अपनी गरिमा, लाज, इज्जत के लिए रोती रही। चीखती-चिल्लाती, रोती-कलपती जब उसकी आंखें पथरा गयीं और निरंतर मार सहना उसके वश की बात नहीं रही तो वह गधे पर ही बेहोश होकर धरती पर गिरने लगी। मगर दरिंदे अभी उसको कहाँ छोड़ने वाले थे। वे उसे जीप में डालकर वापस उसके गाँव थाली का तालाब की ओर ले चले, रास्ते में जब होश आया तो फिर वही सवाल-‘सांच बोल, कुणी मारियो’ (सच बोल, किसने मारा)। उसने कहा ‘‘मेरा कोई दोष नहीं, मुझे कुछ भी मालूम नहीं, मैं कुछ नहीं जानती, मैं क्या बोलूं।’’ तब उसकी फिर पिटाई की गयी, तभी अचानक रिछेड़ चौकी और चारभुजा थाना पुलिस की गाड़ियाँ वहाँ पहुँच गयी। बकौल पीड़िता-‘‘पुलिस उसके लिए भगवान बनकर आई, उन दरिंदों से पुलिस ने ही छुड़वाया वरना वे मुझे मार कर ही छोड़ते।’’
बाद में पुलिस पीड़िता, उसके पति व बच्चों सहित पूरे परिवार को चारभुजा थाने में ले गयी, ढाढ़स बंधाया और मामला दर्ज किया, उसे अस्पताल ले गये, डॉक्टरों को दिखाया, इलाज करवाया और रात में वहीं रखा।
अब पुलिस के सामने चुनौती थी, आरोपियों की गिरफ्तारी की। सुबह पुलिस ने गाँव में शिकंजा कसा, जो पंच मिले उन्हें पकड़ा और थाने में ले गयी। थाने तक पहुँचने तक भी इन पंचों को अपने किए पर कोई शर्मिन्दगी नहीं थी। वे कह रहे थे-‘‘इसमें क्या हो गया? वो औरत गलत है, उसने गलती की, जिसकी सजा दी गयी।’’ वे कानून-वानून पर भरोसा नहीं करते, अपने हाथों से तुरंत न्याय और फटाफट सजा देने में यकीन करते है। उनका मानना है कि- ‘‘हमने कुछ भी गलत नहीं किया, हम निर्दोष है।’’ यहाँ इसी प्रकार के पाषाणयुगीन न्याय किए जाते हैं, जो कि अक्सर औरतों तथा गरीबों व कमजारों के विरुद्ध होते हैं। यहाँ खाप पंचायत के पंचों का शासन है, वे कुछ भी कर सकते हैं, इसलिए यह शर्मनाक कृत्य उन्होंने बेधड़क किया।
पंचों को घटना की गंभीरता का अहसास ही तब हुआ, जब उन्हें शाम को घर के बजाय जेल जाना पड़ा और पिछले कई दिनों से करीब 30 लोग जेल में पड़े हैं, अब उन्हें अहसास हो रहा है कि – शायद उनसे कहीं कोई छोटी-मोटी गलती हो गयी है।
घटना के दूसरे दिन जिला कलक्टर राजसमंद कैलाश चंद्र वर्मा तथा पुलिस अधीक्षक श्वेता धनखड़ मौके पर पहुँचे, महिला आयोग की अध्यक्ष लाडकुमारी जैन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के प्रवक्ता फरहान हक एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन व स्कूल फॉर डेमोक्रेसी और महिला मंच के दलों ने भी पीड़िता से मुलाकात की है। मगर आश्चर्य की बात यह है कि इसी समुदाय के एक पूर्व जनप्रतिनिधि गणेश सिंह परमार यहाँ नहीं पहुँचेना कोई वार्ड पंच आया और ना ही सरपंचस्थानीय विधायक एवं पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह राठौड़ भी नहीं आएइसी जिले की कद्दावर नेता और सूबे की काबीना मंत्री किरण माहेश्वरी भी घटना के पांच दिन बाद आई और मुख्यमंत्री की ओर से राहत राशि देकर वापस चली गयीं।
गृहमंत्री हो अथवा मुख्यमंत्री किसी के पास इस पीड़िता के आंसू पोछने का वक्त नहीं है। कुछ मानवाधिकार संगठन, मीडिया और पुलिस के अलावा सबने इस शर्मनाक घटना से दूरी बना ली है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं पर तो आरोपियों को बचाने के प्रयास के आरोप भी लग रहे है, वहीं राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित इस कांड के विरूद्ध मुख्य विपक्षी दल ने तो बोलने की जहमत तक नहीं उठाई है।
जब मामला मीडिया के मार्फत थाली का तालाब गाँव से निकलकर देश, प्रदेश और विदेश तक पहुँचा और चारों ओर थू-थू होने लगी, तब राज्य की नौकरशाही चेती और पटवारी, स्थानीय थानेदार, नर्स, प्रधानाध्यापक, वार्ड पंच, उप सरपंच और सरपंच आदि को निलंबित किया। राशन डीलर तो इस जघन्य कांड में खुद ही शामिल हो गया था। उसका प्राधिकार पत्र खत्म करने की कार्यवाही भी अमल में लाई गयी है, मगर प्रश्न यह है कि सांप के निकल जाने पर ही लकीर क्यों पीटता है प्रशासन? क्या उसे नहीं मालूम कुंभलगढ़ का यह क्षेत्र महिला उत्पीड़न की नरकगाह हैयहाँ डायन’ बताकर कई औरतें मारी गयी हैं। हत्या, जादू-टोने के शक में महिलाओं पर अत्याचार आम बात है, आज भी इस इलाके में जाति के नाम पर खौफनाक खाप पंचायतों के तालिबानी फरमान लागू होते है, सरकारी धन से बने सार्वजनिक चबूतरों पर बैठकर खाप पंच औरतों तथा गाँव के कमजोर वर्गों के विरुद्ध खुले आम फैसले करते है, सही ही कहा था संविधान निर्माता अंबेडकर ने कि गाँव अन्याय, अत्याचार तथा भेदभाव के मलकुण्ड है।
सबसे ज्वलंत सवाल अभी भी पीड़िता व उसके परिवार की सुरक्षा का है, उसके पुनर्वास तथा इलाज का है। न्याय देने और उसे क्षतिपूर्ति देने का है। सरकार से किसी प्रकार की मदद के सवाल पर पीड़िता ने कहा-‘‘ पुलिस ने मुझे बचाकर मदद की है, बाकी मेरे हाथों की पाँचों अंगुलियाँ सलामत है तो मैं मेहनत मजदूरी करके जी लूँगी।’’
मुझे पीड़ितों की इस बात को सुनकर पंजाब के संघर्षशील दलित कवि और गायक कामरेड बंत सिंह की याद हो आईजिनको अपनी बेटी के साथ दबंगों द्वारा किए गये बलात्कार का विरोध करने की सजा उनके हाथ-पाँव काट कर दी गयी। जब बंत सिंह होश में आए तब उन्होंने कहा-‘‘जालिमों ने भले ही मेरे दोनों हाथ व दोनों पाँव काट डाले है मगर मेरी जबान अभी भी सलामत है और मैं अत्याचार के खिलाफ बोलूँगा।’’
सही है, इस पीड़िता ने भी अपनी अंगुलियों की सलामती और बाजुओं की ताकत पर भरोसा किया है तथा उसे लगता है कि उसकी अंगुलियाँ सलामत है तो वह संघर्ष करते हुए मेहनत-मजूरी से जीवन जी लेगी।पीड़िता की तो अंगुलियाँ सलामत है मगर हमारे इस पितृसत्तात्मक घटिया समाज का क्या सलामत है, जो उसे जिंदा रखेगा? पीड़िता के पास तो अपना सच है और पीड़ा की यादें है, ये यादें उसके जीने के संघर्ष का मकसद बनेगी, मगर हम निरे मृतप्रायः लोगों के पास अब क्या है जो सलामत है ? अगर अब भी हम सड़कों पर नहीं उतरते हैं, अन्याय और अत्याचार की खिलाफत नहीं करते है तो हमारा कुछ भी सलामत नहीं है। हम पर लाख-लाख लानतें और करोड़ों-करोड़ धिक्कार!

About The Author

भंवर मेघवंशी, 
लेखक राजस्थान में कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।

आप अपनी पॉलिटिक्‍स ठीक करिए, हम अपनी भाषा ठीक करते हैं

अभिषेक श्रीवास्तव

पिछले कई बरस से जनसत्‍ता में बिला नागा छप रहे ‘कभी-कभार’ में अशोक वाजपेयी का आज पहला स्‍तम्भ है ‘अनुपस्थित श्रोता’। वे चिन्तित हैं कि इस वर्ष SamanvaY: IHC Indian Languages’ Festival में हिंदी के श्रोता गायब रहे। वे लिखते हैं, ”सबसे अधिक दुख लगा बस्‍तर की बोलियों पर एक सत्र में बहुत कम उपस्थिति देखकर।” उनका दुख जायज़ है, हम सब ‘हिंदीवाले’ इस संकट से रोज़ दो-चार होते हैं, लेकिन जहाँ पर खड़े होकर वे अपने ‘दुख’ की वजहों का विश्‍लेषण कर रहे हैं, गड़बड़ी वहाँ है। इसी कारण उनके स्‍तम्भ में ”अंग्रेज़ी के नकली स्‍वर्ग और खाती-पीती-उड़ाती दुनिया के विश्‍व नागरिकों” का हिकारत भरा जि़क्र आता है और हिंदीवालों की अनुपस्थिति का ‘दुख’ अंग्रेज़ी वालों के सिर मढ़कर वे संतुष्‍ट हो जाते हैं। नतीजतन, अंग्रेज़ी की नागरिकता को वे हिंदी की नागरिकता के खिलाफ खड़ा कर देते हैं।

अशोकजी ज़रा सा सावधान रहते तो अपने स्‍तम्भ में ही अपने सवाल का जवाब खोज लेते। आइए देखें, यह गड़बड़ी कहा है। बस्‍तर के बारे में वे लिखते हैं, ”उसका इस समय नक्‍सली हिंसा का लगातार कुछ दशकों से ग्रस्‍त होना उसकी अपार सांस्‍कृतिक संपदा और भाषिक विपुलता को भी क्षति पहुँचा रहा है।’‘

वाक्‍य-संरचना की गड़बड़ी (संभवत: संपादन) और ‘कुछ दशकों’ की तथ्यात्‍मक ग़लती को छोड़ दें, तो अशोकजी की राजनीतिक लोकेशन इस वाक्‍य से आपको समझ आ सकती है। उनके कहने का मतलब यह है कि बस्‍तर की ‘नक्‍सली हिंसा‘ हवा में है। वे उन कम्पनियों का जि़क्र नहीं करते जो वहाँ के जल, जंगल और ज़मीन को निगल चुकी हैं। उन्‍हें उस राज्‍यतंत्र का ख़याल नहीं जिसने सलवा जुड़ुम के नाम पर भाई से भाई को लड़वाया। हिंसा मनुष्‍य का शौक़ नहीं है और नक्‍सली मंगल ग्रह से नहीं आए हैं। राज्‍य और कम्पनियों की मिलीभगत से बस्‍तर में मुसलसल चल रही प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ वहाँ का आदिवासी नाराज़ है। लिहाज़ा बस्‍तर आज एक युद्धक्षेत्र बन चुका है, जहाँ कई ताकतें काम कर रही हैं। इन अंतर्विरोधों की उपेक्षा कर के किसी एक के सिर पर भाषा-संस्‍कृति के नाश का दोष मढ़ देना आखिर आपको किसके पाले में खड़ा करता है?

प्रसंगवश, जिस दिन ‘समन्‍वय’ का उद्घाटन था, उसी शाम राजेंद्र भवन में अरुण फरेरा से उनके जेल संस्‍मरणों पर अशोक भौमिक, संजय काक और शुद्धब्रत सेनगुप्‍ता का संवाद था। हिंदी के कई लेखक-पाठक समेत पंजाब, हरियाणा, दक्षिण भारत के करीब 200 श्रोता वहाँ मौजूद थे। आखिर क्‍यों? इसलिए क्‍योंकि भाषा-संस्‍कृति की बुनियाद राजनीति ही है। जनवादी राजनीति को अगर हिंदी के करीब आने की ज़रूरत है, तो हिंदी की चिंता करने वालों को भी अपनी राजनीतिक लोकेशन दुरुस्‍त करनी होगी। आप अपनी पॉलिटिक्‍स ठीक करिए, हम अपनी भाषा ठीक करते हैं। फिर देखिए, श्रोताओं का टोटा नहीं होगा। आप राजनीति के सवाल को अंग्रेज़ी बनाम हिंदी में उलझाएंगे और राज्‍य व कॉरपोरेट की ओर से आंखें मूंद कर बस्‍तर के नाम पर आह भी भरेंगे, तो इससे किसी का भला नहीं होगा अशोकजी।

About The Author
अभिषेक श्रीवास्तव, 
जनसरोकार से वास्ता रखने वाले खाँटी पत्रकार हैं। 
हस्तक्षेप के सहयोगी हैं।

रविवार, 9 नवंबर 2014

लड़ाई उदार और कट्टर इस्लाम के बीच

जावेद अनीस
“उठो ! अहमद शाह अब्दाली, मुहम्मद बिन कासिम, शहीद सईद अहमद और पैगम्बर व उनके साथियों की तरह……एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में तलवार लो और जिहाद के क्षेत्र की ओर निकलो।”…. इराक़ और सीरिया की रेगिस्तान की मिट्टी से उठनेवाली पुकार सुनो, ढाढस बाँधो और जिहाद की मातृभूमि अफगानिस्तान की ओर निकलो।” यह पुकार अंसार-उल-तौहीद द्वारा अपने ट्विटर अकाउंट में जारी किये गये वीडियो में है। एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार विडियो में दिखाई दे रहा नकाबपोश 39 वर्ष का सुलतान अब्दुल कादिर आरमार है जो कर्नाटक के भटकल गाँव के एक छोटे व्यापारी का बेटा है।  अगर यह खबर सही है तो यह पहली बार है जब एक भारतीय द्वारा सार्वजनिक  रूप देश के मुसलमानों को वैश्विक जिहाद के लिए आह्वान किया गया है।
उधर बिन लादेन की मौत के बाद सुर्खियों से दूर रहे अलकायदा का जिन्न भी बोतल के बाहर आ गया है। अलकायदा की तरफ से जारी एक वीडियो में अल जवाहिरी ने एलान किया है कि अब उनका इरादा भारतीय उपमहाद्वीप में झंडा लहराने का है। जवाहिरी के मुताबिक उसका संगठन अब “बर्मा, बांग्लादेश, असम,गुजरात और कश्मीर में” मुसलमानों को जुल्म से बचने के लिए लड़ाई लड़ेगा। उसने भारत में तथाकथित “इस्लामिक राज” के वापसी की भी बात की है।
उपरोक्त दोनों घटनायें इस ओर इशारा करती हैं कि ग्लोबल जिहादियों के निशाने पर अब भारत और यहाँ के मुसलमान हैं, भारत के मुसलमानों ने अलकायदा के सरगना के आह्वाहन का सख़्त अल्फाज़ो में मुजम्मत  की है, लेकिन इस मुल्क के वहाबी इस्लाम के पैरोकार भी हैं जिनका सब से पहला टकराव उदार और सूफी इस्लामके भारतीय स्वरूप से है।
इस्लामिक स्टेट भी उसी पोलिटिकल इस्लाम की पैदाइश है जिसकी जड़ें वहाबीवाद में है, इनका दर्शन चौदहवी सदी के ऐसे सामाजिक-राजनीतिक प्रारुप को फिर से लागू करने की वकालत करता है, जहाँ असहमतियों की कोई जगह नहीं है, उनकी सोच है कि या तो आप उनकी तरह बन जाओ नहीं तो आप का सफाया कर दिया जायेगा।
पाकिस्तान के मशहूर कार्टूनिस्ट साबिर नज़र ने तथाकथित “अरब स्प्रिंग ” को लेकर एक कार्टून बनाया है जिसमें दिखाया गया है कि विभिन्न अरब मुल्कों में बसंत के पौधे थोड़े बड़े होने के बाद जिहादियों के रूप में फलते–फूलते दिखाई पड़ने लगते हैं, शायद अरब स्प्रिंग की यही सचाई भी है। अपने आप को दुनिया भर में लोकतंत्र के सबसे बड़े रखवाले के तौर पर पेश करने वाले पश्चिमी मुल्कों ने अपने हितों के खातिर एक के बाद एक सिलसिलेवार तरीके से इराक में सद्दाम हुसैनइजिप्ट में हुस्नी मुबारक और लीबिया में कर्नल गद्दाफी आदि को उनकी सत्ता से बेदखल किया है, इन हुक्मरानों का आचरण परम्परागत तौर पर सेक्यूलर रहा है। आज ये सभी मुमालिक भयानक खून-खराबे और अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं, अब वहां धार्मिक चरमपंथियों का बोल बाला है “इस्लामिक स्टेट” कुछ और नहीं बल्कि तथाकथित अरब स्प्रिंग की देन है।  
इस्लामिक स्टेट द्वारा आज बहुत कम समय में इराक़ और सीरिया के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा जमा लिया गया है। इराक जैसा मुल्क जो पुराने समय में मेसोपोटामिया सभ्यता के नाम से विख्यात रहा है, जो एक समय शिक्षा, व्यापार, तकनीक, सामाजिक विकास, संस्कृति को लेकर काफी समृद्ध रहा है, आज अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है। अपनी धरती में दफन अकूत तेल के वजह से यह मुल्क समृद्ध तो अभी भी है, लेकिन इसी तेल की वजह से उसे नए जमाने के साम्राज्यवादियों की नज़र लग गयी है और यह मुल्क आईएस जैसे घोर अतिवादी संगठन के चँगुल में फँस कर मध्ययुग के दौर में पहुँच गया दिखाई पड़ता है।
एकांगी इस्लाम में विश्वास करने वाले इस्लामिक स्टेट के सबसे पहले शिकार तो चरमपंथी, सूफी और ग़ैर-सुन्नी मुसलमान ही हैं, वे सूफी और ग़ैर-सुन्नी मुसलामनों के एतिहासिक धार्मिक स्थलों को तबाह कर रहे है क्योंकि उनका शुद्धतावादी वहाबी इस्लाम बताता है कि कब्रों और मक़बरों पर जाना इस्लाम के खिलाफ है। उनकी सोच कितनी संकुचित है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों उन्होंने एक आदेश जारी किया है कि दुकानों पर लगे हुए सभी बुतों के चेहरे ढँके हुए होने चाहिए। आईएस के वहशियों द्वारा की जा रही बर्बरता की दास्तानें रोंगटे खड़ी कर देने वाली हैं। पूरी दुनिया यजीदी समुदाय का बड़े पैमाने पर किये जा रहे जनसंहार को लगातार देख और सुन रही है। यजीदी समुदाय की महिलाओं और बच्चों को जिंदा दफन और महिलाओं को गुलाम बनाया जा रहा है। अगवा किया गये अमेरिकी- ब्रिटिश पत्रकारों की गर्दन काटते हुई वीडियो जारी किये जा रहे हैं और यह सब मजहब के नाम पर हो रहा है।
इन सब के बीच आईएसआईएस के गठन में सीआईए और मोसाद जैसी खुफिया एजेंसियों की सक्रिय भूमिका की ख़बरें भी आयी हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अधिकारी एडवर्ड इस्नोडन ने खुलासा किया है कि इस्लामिक स्टेट का मुखिया अबू बकर अलबगदादी अमेरिका और इसराइल का एजेंट है और उसे इसराइल में प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। एडवर्ड के अनुसार सीआईए ने ब्रिटेन और इजरायल के खुफिया एजेंसियों के साथ मिल कर इस्लामिक स्टेट जैसा जिहादी संगठन बनाया है जो दुनिया भर के चरमपंथियों को आकर्षित कर सके, इस नीति को ‘द हारनीटज़ नीसट’ का नाम दिया गया, अमरीका के पुराने इतिहास को देखते हुए एडवर्ड इस्नोडन के इस खुलासे को झुठलाया भी नहीं जा सकता है। आखिरकार यह अमरीका ही तो था जिसने अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीनों की मदद की थी, जिससे आगे चल कर अल-क़ायदा का जन्म हुआ था। अमरीका के सहयोगी खाड़ी देशों पर आईएस की मदद करने के आरोप हैं, साथ ही इस संगठन के पास इतने आधुनिक हथियार कहां से आये इसको लेकर भी सवाल है?
इस्लामिक स्टेट का मंसूबा है कि 15वीं सदी में दुनिया के जितने हिस्से पर मुसलमानों का राज था, वहाँ  दोबारा इस्लामी हुकूमत कायम की जाये, शायद इसी वजह से इस्लामिक स्टेट ने खिलाफत का ऐलान करते हुए अपने नेता अबु अल बगदादी को पूरी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा घोषित कर दिया है, यह स्वयम्भू खलीफा दुनिया भर के मुसलमानों से एकजुट हो कर इस्लामी खिलाफत के लिए जिहाद छेड़ने की अपील जारी कर रहा है।
तो इन सब का असर भारत पर क्या हो रहा है ? पिछले दिनों नदवा जैसी विश्वविख्यत इस्लामी शिक्षा केंद्र के एक अध्यापक सलमान नदवी द्वारा आई एस आई एस के सरग़ना अबूबकर बग़दादी को एक ख़त लिख कर उसकी हुकूमत को बधाई दी गयी है, ख़त का मजमून कुछ यूँ है– “आप जो भूमिका निभा रहे हैं उसको सभी ने स्वीकार किया है और आप को अमीर उल मोमेनीन (खलीफा) मान लिया है”। इसी तरह से महाराष्ट्र के चार युवा जो की पढ़े लिखे प्रोफेशनल है जिहादियीं का साथ देने इराक चले गये हैं। तमिलनाडु में मुस्लिम युवाओं द्वारा इस्लामिक स्टेट के चिन्हों वाली टीशर्ट बाँटे जाने की खबर भी सामने आई है। सोशल मीडिया पर भी पर इस्लामिक स्टेट के तारीफ में पोस्ट और फोटो शेयर किये जा रहे हैं। इन्हें इस्लामिक स्टेट, अल क़ायदा और तालिबान के खूँखार हत्यारों में अपना मसीहा और इराक के क़त्लेआम में एक इस्लामी देश की स्थापना के लिए लड़ा जाने वाला धर्मयुद्ध नज़र आता है।
बेशक यह सब घटनायें चिंता का सबब है। लेकिन इसके बरअक्स आज भी भारत के ज्यादातर मुसलमान  सूफी और उदार इस्लाम में यकीन करते हैं और ख्वाजा मुईन-उद-द्दीन चिश्ती, कुतबुद्दीन बख्तियार खुरमा, निजाम-उद-द्दीन औलिया, अमीर खुसरो, वारिस शाह, बुल्लेशाह, बाबा फरीद जैसे सूफियों के तालीम को  मानते हैं। इस्लाम का भारतीय संस्करण उदार है, इसमें भारत के स्थानियता (लोकेलिटी) समाहित है। भारत में सूफी-संतों की वजह से इस्लाम की एक रहस्यमयी और सहनशील धारा सामने आई जो एकांकी नहीं है। सूफियों-संतों ने दोनों धर्मों की कट्टरता को नकारा और सभी मतों, पंथों से परम्पराओं और विचारों को ग्रहण किया। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों को सहनशीलता, एक दूसरे के धर्म का आदर करना और साथ रहना, तमाम कोशिशों के बावजूद एक दुसरे के भावनाओं को इज्ज़त करने और साथ मिल कर रहने की तालीम दी जिसका असर अभी भी बाकी है। भारत में ऑल इंडिया उलमा एंड मशाइख़ बोर्ड जैसे संगठन वहाबी (सलफ़ी) विचारधारा का जमकर विरोध कर रहे हैं। करीब चार साल पहले ही इस संगठन द्वारा भारत में वहाबियत के प्रसार के खिलाफ एक रैली कि गयी थी  जिसमें लाखों लोग शरीक हुए और नारा दिया गया ‘वहाबी की ना इमामत कुबूल है, ना कयादत कुबूल’।
इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू कहा है कि,“यह अल क़ायदा की ग़लतफ़हमी है कि भारतीय मुसलमान उसके इशारों पर नाचेंगे….भारतीय मुसलमान देश के लिए ही जिएंगे और भारत के लिए ही जान देंगे,” मोदी ने ये बात अलकायदा द्वारा कुछ दिनों पहले जारी की गयी उस विडियो को लेकर पूछे गये प्रश्न के उत्तर में कही हैं जिसमें अलकायदा ने भारत में अपनी शाखा खोलने और भारतीय मुसलमानों की मदद करने कि बात की है।
लगभग इसी दौरान में देश के प्रख्यात न्यायविद फली एस. नरीमन ने मोदी सरकार को बहुसंख्यकवादी बताते हुए चिंता जाहिर की है कि बीजेपी-संघ परिवार के संगठनों के नेता खुलेआम अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दे रहे हैं लेकिन सीनियर लीडर इस पर कुछ नहीं कहते। जिस प्रकार से नयी सरकार बनने के बाद से संघ परिवार आक्रमक तरीके से लगातार यह सुरसुरी छोड़ रहा है कि भारत हिन्दू राष्ट्र है,यहाँ के रहने वाले सभी लोग हिन्दू है, उससे फली एस. नरीमन जी कि चिंता सही जान पड़ती है, और प्रधानमंत्री कि कथनी और करनी में फर्क साफ़ दिखाई दे रहा है
प्रधानमंत्री को  मुसलमानों को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने की जगह संघ परिवार और अपने पार्टी के उन नेताओं पर लगाम लगाना चाहिए जो भारत के बहुलतावादी सवरूप को नष्ट करके इसे हिन्दू राष्ट्र बनाने का मंसूबा पाले हुए हैं, दरअसल इनकी ये हरकतें परोक्ष रूप से जिहादी संगठनों और मुल्क मैं मौजूद उनके तलबगारों को मदद ही पहुँचायेगी, मुसलमानों को दोयम दर्जे  का नागरिक बना देने की इनकी जिद वहाबियत का रास्ता आसान करेगी, क्योंकि इसी बहाने वे नवजवानों को जुल्म और भेद-भाव  का हवाला देकर उन्हें अपने साथ खड़ा करने की कोशिश कर सकते हैं ।
अगर भारत को इस्लामिक स्टेट या अलकायदा जैसे संगठनों से कोई खतरा है तो इसका सबसे ज्यादा असर यहाँ के मुसलमानों पर पड़ेगा, इस मुल्क के एक- आध फीसीदी मुसलमान भी अगर इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे जिहादी संगठनों की इमामत स्वीकार कर लेते हैं तो भारत के मुसलमान भी भी उसी आग का शिकार हो सकते हैं जिसमें पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जल रहे हैं इसीलिए  भारत में इस खतरे का सबसे ज्यादा मुकाबला यहाँ के मुसलमानों को ही करना पड़ेगा। ऑल इंडिया उलमा एंड मशाइख़ बोर्ड और मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी जैसे संगठन इस दिशा में आगे आ  रहे हैं ।

अरे मोदी जी, ये “जयापुर” में मरने वाले 5 लोग कौन थे ?

Posted by: हस्तक्षेप 2014/11/07 

नई दिल्ली। कथित राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या में गोलीकांड के बाद भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगते रहे थे कि उसने कथित मृतकों के फर्जी अस्थि कलश सारे देश में घुमाए। लेकिन अब तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो कमाल ही कर दिया। वाराणसी में अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि “जब मैं यहां अपने चुनावी नामांकन के लिए आया था तभी उसी दिन मैंने सुना था कि इस गांव में हाईटेंशन तार गिरने से में 5 लोगों की मौत हो गई है जिसके कारण तभी मैंने सोचा था कि इस गांव के लोगों की मदद करनी चाहिए और मैंने तभी प्रण कर लिया था कि इस गांव को गोद लूंगा।”

लेकिन बताया जा रहा है कि जयापुर में हाईटेंशन तार गिरने से आधा दर्जन लोग झुलसे तो थे लेकिन कोई मृत्यु नहीं हुई थी।

वाराणसी से इंदु शेखर सिंह ने दूरभाष पर बताया कि जयापुर में हाईटेंशन तार गिरने से आधा दर्जन लोग झुलसे थे लेकिन कोई मृत्यु नहीं हुई थी।

इंटरनेट पर भी गूगल में सर्च करने पर आपको कहीं इस घटना में किसी मृत्यु की खबर देखने को नहीं मिलेगी। इस घटना के बाद मोदी ने स्वयं जयापुर के ग्राम प्रधान को फोन करके घटना की जानकारी ली थी- यह खबर इन लिंक पर देखें-




दैनिक भास्कर की 5 नवंबर 2014 की खबर भी बताती है कि 3 लोग इस घटना में घायल हुए थे-

“खबर कहती है- जयापुर वही गांव है जहां 13 अप्रैल 2014 को हाइटेंशन तार गिरने से हड़कंप मच गया था। इसमें कई लोग घायल हो गए थे। इसके बाद मोदी ने ट्वीट कर और गांव के प्रधान से बातचीत के बाद दुख जताया था। ”

फेसबुक पर भी “मोदी आने वाला है” नाम से एक प्रोफाइल है, उस पर भी तीन फोटो शेयर करते हुए 13 अप्रैल 2014 को लिखा गया है- “वाराणसी लोक सभा के जयापुर गाँव में हाईटेंशन तार गिरने से कई परिवार के लोग उसके चपेट में आगएं| उसके बाद मोदी जी ने कल रात गाँव के प्रधान से गाँव का हाल चाल जाना| और आज श्री नलिन कोहली जी ने उस गाँव का जायजा लिया और परिवार को हौसला बढ़ाया और अभी तक उत्तर प्रदेश शासन प्रशासन से अभी तक कोई नहीं पहुंचा”

यह एक गंभीर चूक है, जिस पर प्रधानमंत्री को स्पष्टीकरण देना चाहिए। यदि वास्तव में उस घटना में 5 लोगों की मृत्यु हुई थी तो क्या राज्य सरकार या केंद्र सरकार ने कोई मुआवजा दिया था, यदि दिया था तो उसकी सूची जारी की जाए और यदि नहीं दिया था तो मोदी सरकार अब तक क्या कर रही थी ?

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

हमारे लोकतंत्र का हर स्तम्भ चीनी मिल मालिकों के पाले में खड़ा है किसान हतप्रभ है

आज गन्ने की खेती करने वाले एक किसान से भेंट हुई। उनका कहना था कि इस बार चीनी मिल मालिक सही समय पर मिल चालू करने से मना कर रहे हैं। पिछले साल भी देर से मिल चलने के कारण खेत खाली नहीं हुआ, इसलिए गेंहूँ की बुआई समय से नहीं हो पाई थी। मिल मालिकों ने गन्ने का पेमेंट भी समय से नहीं किया। सरकार से ढेर सारी सहूलियतें मिलने के बावजूद अभी तक चीनी मिलों पर किसानों का हजारों करोड़ रूपए बकाया है। अपना पैसा पाने के लिए हम अदालतों का मुँह देखने और पुलिस की लाठी खाने को मजबूर हैं।इस बार सरकार ने गन्ने का भाव 220 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है जो पिछले साल से काफी कम है। भाजपा ने चुनाव के समय वादा किया था कि सरकार

दिगंबर, लेखक जाने-माने वामपंथी विचारक हैं।

बनी तो वह किसानों की फसल की कीमत कुल लागत पर पचास फीसदी लाभ जोड़ कर दिलाएगी। इस हिसाब से गन्ने की कीमत 400 रुपए प्रति क्विंटल से कम नहीं होना चाहिए।220 रुपए में तो खर्च भी पूरा नहीं पड़ेगा। लागत खर्च लगातार बढ़ रहा है, फसल का दाम घट रहा है। इसीलिए क़र्ज़ में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग गन्ने की कीमत तय करते हैं, उनको पहले नंगे बदन गन्ने के खेत में दौड़ाना चाहिए और ज्यादा नहीं तो सिर्फ एक क्विंटल तैयार गन्ने की फसल काट कर और छील कर उसे चीनी मिल के गेट तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी देनी चाहिए। तभी उनको गन्ने की कीमत का कुछ अंदाज़ा लग पायेगा। उनका यह भी कहना था कि लाखों रूपए तनख्वाह पाने वालों का वेतन-भत्ता जब किसान तय नहीं करते, तो वे हमारी फसल का दाम तय करने वाले कौन होते हैं। चीनी मिल मालिकों और किसानों के बीच की रस्साकशी में हमारे लोकतंत्र का हर स्तम्भ चीनी मिल मालिकों के पाले में खड़ा है। किसान हतप्रभ हैं, भीतर-भीतर सुलग रहे हैं।

मोदी सरकार यूपीए की राह पर – आइपीएफ

लखनऊ, 19 अक्टूबर, 2014। आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) ने मोदी सरकार द्वारा काले धन के सवाल पर जनता के साथ की गयी वादाखिलाफी पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए इसकी तीखी निन्दा की है।

आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता व पूर्व आई0 जी0 एस0 आर0 दारापुरी ने आज जारी बयान में कहा कि मोदी सरकार पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार की ही सच्ची वारिस साबित हो रही है और उसी के नक्शेकदम पर चल रही है। उसने चुनाव के दौरान काले धन को वापस लाने के जो बड़े-बड़े वायदे से जनता से किए थे और जनादेश हासिल किया था उस पर अब सरकार पीछे हटकर जनादेश का अपमान कर रही है।

श्री दारापुरी ने हालिया डीजल के दामों में हुयी कमी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मोदी सरकार अनावश्यक रूप से तेल की कीमतों में कमी का श्रेय ले रही है। जबकि सच यह है कि अमेरिका ने सऊदी अरब और जार्डन के साथ मिलकर रूस-ईरान गठजोड़ को तेल बाजार में शिकस्त देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डीजल के दामों में भारी कमी कर दी है। लेकिन इसी बहाने खतरनाक निर्णय लेते हुए मोदी सरकार ने डीजल की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म कर इसे बाजार के हवाले कर दिया है और इस पर दी जाने वाली सारी सब्सडियां खत्म कर दी हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कमी का यह रूख कभी भी बदल सकता है और आने वाले दिनों में डीजल के दामों में भारी वृद्धि हो सकती है, जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ेगा।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

एक समाज सुधारक का भाषण

नरेंद्र मोदी का भाषण हमें खुश कर सकता है. उनकी अपील में जो उन्होंने नक्सलवादियों से की, उसमें हम सार्थकता देख सकते हैं. लेकिन, अगर नरेंद्र मोदी इसके साथ यह घोषणा करते कि विकास कार्यों में होने वाला भ्रष्टाचार किसी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, तो शायद ज़्यादा सार्थक नतीजा निकलता. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, उन्हें इस बात का एहसास होगा कि देश के 272 से ज़्यादा ज़िले नक्सलवाद से प्रभावित हैं. 
आख़िर क्या फ़़र्क पड़ता है, अगर आज़ादी की 68वीं वर्षगांठ पर हम खुश नहीं हैं. क्या फ़़र्क पड़ता है कि देश के लिए शिद्दत और गहराई से सोचने वाले लोग खुश नहीं हैं. और, इससे भी क्या फ़़र्क पड़ता है कि हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जो आशाएं लगा रखी थीं, वे पूरी तरह से पूरी होती नहीं दिखाई दे रहीं. खुश इस बात से होना चाहिए कि देश का एक बड़ा तबका लाल किले से दिए गए नरेंद्र मोदी के भाषण से स्वयं को काफी उत्साहित महसूस कर रहा है, स्वयं को उत्तेजना में महसूस कर रहा है और उसे लगता है कि देश के लिए एक नए रास्ते की दिशा नरेंद्र मोदी ने दिखाई है. हमें भी लोगों की इस खुशी में शामिल होना चाहिए और हम स्वयं को इस खुशी में शामिल करना ज़रूरी मानते हैं.

दरअसल, यह खुश होने वाले लोग बहुत आशावान लोग हैं, जो अपनी ज़िंदगी में बदलाव लाने, खुशियां लाने के लिए किसी भी तरह की आशा को एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखते हैं. जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने ग़रीबी हटाओ का नारा दिया, तो आज खुश होने वाले लोगों के पूर्वजों में बहुत सारे ऐसे थे, जो खुश हुए थे. जब इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, तब लगा था कि अब बैंक इस देश के सामान्य लोगों के साथ खड़े हो जाएंगे और देश के चौदह बड़े घरानों की कैद से अर्थव्यवस्था को आज़ाद कराएंगे. ये खुश होने वाले लोग राजीव गांधी के उस बयान से भी बहुत खुश हुए थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश की जनता तक स़िर्फ 15 पैसे पहुंच पाते हैं, बाकी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. तब लोगों को लगा था कि अब उल्टा हो जाएगा, 85 प्रतिशत जनता के पास पहुंचेगा और 15 प्रतिशत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेगा.

खुश होने वाले लोग विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होकर भी खुश हुए थे और उन्हें लगा था कि यह देश अब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान में किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं करेगा और न भ्रष्टाचार का आचरण पसंद करेगा. अटल बिहारी वाजपेयी के सत्ता में आते ही यह देश इस आशा में खुश हो गया था कि अब पाकिस्तान से रिश्ते भी बनेंगे और इस देश में टकराव की राजनीति भी ख़त्म हो जाएगी. इसके पहले हमारा देश जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के फलस्वरूप बनी जनता पार्टी की सरकार के समय भी बहुत खुश हो गया था. लोगों को लगा था कि यह देश संपूर्ण रूप से बदल जाएगा, पर देश नहीं बदला.

लाल किले से नरेंद्र मोदी जी के भाषण ने यह आशा जगाई कि अब शायद देश कम से कम सामाजिक मुद्दों पर कुछ और अधिक जागरूक हो जाएगा. नरेंद्र मोदी के भाषण ने यह भी आशा जगाई कि जिन सवालों पर हम नहीं सोचते हैं, जैसे सफाई, भू्रण हत्या, शताब्दियों से चली मैला ढोने की अमानवीय प्रथा, शौच के लिए ज़्यादातर ग्रामीण महिलाओं का खेतों में जाना आदि का समाधान संभव है. नरेंद्र मोदी के भाषण ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं जताईं. नरेंद्र मोदी के भाषण ने लोगों को आगाह किया कि वे लड़कियों की तरह लड़कों से भी सवाल पूछें और बलात्कार जैसे अपराधों को दूर करने में उनकी क्या भूमिका है, इसे वे अपेक्षित ढंग से पूरा करें. एक अच्छा भाषण, अविरल भाषण, सोच-समझ कर दिया गया हृदय से भाषण, लेकिन एक समाज सुधारक का भाषण.

नरेंद्र मोदी के इस भाषण ने कम से कम यह तो बताया कि उनमें पिछले दस सालों से प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह से ज़्यादा समझ है, उनमें लोगों की समस्याओं को देखने की क्षमता मनमोहन सिंह से ज़्यादा है और वह इस देश को मनमोहन सिंह से ज़्यादा समझते हैं. ये सारी बातें ज़रूरी थीं, लेकिन हम नरेंद्र मोदी को इस देश के असाधारण नेता के रूप में देखना चाहते थे. असाधारण नेतृत्व वह होता है, जो सारे देश को नए विकास का रास्ता दिखाए. विकास का रास्ता शायद वह नहीं है, जिसे नरेंद्र मोदी बताना चाहते हैं. दुनिया के लोग आएं, भारत की चीजें सारी दुनिया में बिकें और भारत दुनिया के बाज़ारों में मेड इन इंडिया की मुहर लगी वस्तुएं भर दे, यह कहना और सौ प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश को भारत में आमंत्रित करना परस्पर विरोधी दृष्टिकोण हैं. हम इस बात से आशांवित थे कि नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वदेशी के सिद्धांत को आर्थिक नीतियों में लागू करेंगे. वह बजट में संभव नहीं हो पाया, लेकिन रोडमैप के रूप में हम आशा करते थे कि 15 अगस्त को इसकी घोषणा होगी, लेकिन शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी स्वयं इसके लिए तैयार नहीं हैं. चूंकि नरेंद्र मोदी तैयार नहीं हैं, इसलिए देश भी इसके लिए तैयार नहीं है.

हमारी अपेक्षा थी कि नरेंद्र मोदी इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले के प्राचीर से दिए अपने पहले संबोधन में यह घोषणा करेंगे कि वह इस देश के गांवों को उद्योगों की बुनियादी इकाई के रूप में स्थापित करेंगे. जब तक उद्योग गांव में नहीं पहुंचते और गांवों को कृषि आधारित उपज के फिनिश प्रोडक्ट की फैक्ट्री के रूप में विकसित नहीं किया जाता, तब तक यह देश दुनिया के सामने आर्थिक शक्ति नहीं बन सकता. जिस दिन यह निर्णय होगा कि इस देश के गांवों को औद्योगिक इकाई के रूप में विकसित किया जाएगा, उसी दिन से चाहे सड़कें हों, संचार हो, बिजली हो, इन सारी चीजों में बदलाव आना शुरू हो जाएगा. लेकिन, जब तक इसका फैसला नहीं होता, तब तक सड़कें, बिजली, संचार यानी सब कुछ स़िर्फ वहीं दिखेंगे, जहां एसईजेड बनेंगे. वहीं पानी जाएगा, सड़क जाएगी, बिजली जाएगी, जहां विदेशी कंपनियां सौ प्रतिशत उत्पादन इकाइयां लगाएंगी. माल यहां बनेगा, लेकिन यहां के लोगों को रोज़गार स़िर्फ उतना ही मिलेगा, जितना जीने के लिए ज़रूरी है. सारा मुनाफा, सारा फ़ायदा विदेशों में जाएगा.

हमारी यह अपेक्षा थी कि साल या दो साल में पूरे होने वाले लक्ष्य की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इनमें पहला लक्ष्य है, देश में सौ प्रतिशत बिजली या ऊर्जा का उत्पादन. यह सब बड़ी आसानी से हो सकता है, अगर हम बड़ी विद्युत उत्पादन कंपनियों का मोह छोड़ दें. कोयला अगले बीस सालों में लगभग समाप्त होने की दिशा में पहुंच जाएगा, इसलिए हमें अपने कोयले के भंडार को बचाना चाहिए. पानी की कोई योजना हमारे देश में नहीं है. नदियां सूख रही हैं, इसलिए जल आधारित विद्युत उत्पादन इकाइयां लगाना लाभदायक नहीं है. हमारे देश में जिस एक चीज की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता है, वह है सौर ऊर्जा. सारे देश को सौर ऊर्जा की शक्ति से दो सालों में पूर्णतय: भरा जा सकता है. इसमें सरकार को एक पैसा खर्च नहीं करना है. उसे चाहिए कि वह देश और विदेश के सौर ऊर्जा उत्पादन करने वालों से कहे कि वे अपनी लागत से सौर ऊर्जा उत्पादन इकाई लगाएं और जब वे बिजली बना लें, तब उसे सरकार एक निश्‍चित दर पर खरीद ले. इसका उदाहरण स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात है, जहां उन्होंने 15 रुपये प्रति यूनिट बिजली जो सौर ऊर्जा निर्मित है, खरीदी है. 15 रुपये से एक-दो रुपये कम या ज़्यादा सारे देश में प्रति यूनिट भाव घोषित करके सारी कंपनियों को, जो सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करती हैं, हिंदुस्तान आमंत्रित करना चाहिए. और, दो साल तब बीतेंगे, जब हमारे देश में विद्युत उत्पादन सौ प्रतिशत हो जाएगा, सर्वसुलभ हो जाएगा और न केवल घर के लिए, उद्योगों के लिए, सिंचाई के लिए, बल्कि हर चीज के लिए हमें बिजली मिल जाएगी.

दूसरी घोषणा गांव को दो सालों में औद्योगिक इकाइयों के रूप में परिवर्तित करने की हो सकती थी. इस देश में पढ़े-लिखे बेरोज़गारों से ज़्यादा ग़ैर पढ़े-लिखे बेरा़ेजगार हैं, जिन्हें पढ़ाई का अवसर इसलिए नहीं मिला, क्योंकि उनके पास कोई सुविधा नहीं थी, साधन नहीं थे. उन्हें पढ़ने के बाद नौकरी मिलने की उम्मीद भी नहीं थी. इसलिए गांव को औद्योगिक इकाइयों में परिवर्तित करने की योजना बने, तो यह देश बेरोज़गारी से मुक्ति पा सकता है. दो घोषणाएं और की जा सकती थीं कि यह देश सर्वसुलभ शिक्षा और सर्वसुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा. इन घोषणाओं की जगह नरेंद्र मोदी ने एक समाज सुधारक की तरह भाषण दिया.

नरेंद्र मोदी का भाषण हमें खुश कर सकता है. उनकी अपील में जो उन्होंने नक्सलवादियों से की, उसमें हम सार्थकता देख सकते हैं. लेकिन, अगर नरेंद्र मोदी इसके साथ यह घोषणा करते कि विकास कार्यों में होने वाला भ्रष्टाचार किसी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, तो शायद ज़्यादा सार्थक नतीजा निकलता. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, उन्हें इस बात का एहसास होगा कि देश के 272 से ज़्यादा ज़िले नक्सलवाद से प्रभावित हैं. नरेंद्र मोदी को इस बात का भी एहसास होगा कि यह नक्सलवाद शौकिया नहीं उपजा है. इन 272 ज़िलों में सैकड़ों किलोमीटर के बीच न सड़कें हैं, न अस्पताल हैं, न शिक्षा है, न उद्योग का दूर-दूर तक कोई निशान है. यहां के लोग जीते किस तरह हैं, यह जानना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बहुत ज़रूरी है. और, यही वह ज़मीन है, जो लोगों को उस व्यवस्था से निराश करती है, जो आज़ादी के बाद से प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय बनी और आज जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हैं, तक चली आ रही है. यह व्यवस्था लोगों को निराश करती है और उन्हें हथियार उठाने के लिए प्रेरित करती है, क्योंकि तब उन्हें लगता है कि हम क्यों नहीं लूट कर, छीन कर, कम से कम ज़िंदा तो रहें.

नरेंद्र मोदी ने बहुत महत्वपूर्ण बात देश की बड़ी संख्या के लिए कही, जो लगभग 40 प्रतिशत के आसपास है, जिसका बैंक खाता नहीं है, उसे बैंक से जोड़ने की बात की और कहा कि जिनका खाता बैंक में खुलेगा, उन्हें बीमा से एक लाख रुपये की सुविधा मिलेगी. यह खासकर किसानों के लिए है, जिसे उन्होंने किसानों की आत्महत्या से जोड़ा है. हम इस घोषणा का हृदय से स्वागत करते हैं, लेकिन अगर हम इसमें रास्ता तलाशें, तो हमें किसान को उसकी उपज का सही मूल्य मिले या उसकी कृषि लागत सस्ती हो, इसका रास्ता नज़र नहीं आता. हमें स़िर्फ यह समझ में आता है कि अगर कोई किसान आत्महत्या करता है, तो बीमा कंपनी एक लाख रुपये उसके परिवार को देगी. अगर किसान की किसी दुर्घटना में मौत होती है, तो भी उसके घर वालों, आश्रितों को एक लाख रुपये की मदद मिलेगी. हम इसका स्वागत करते हैं, लेकिन इसकी जगह अच्छा होता, अगर नरेंद्र मोदी किसानों के लिए कृषि लाभकारी कैसे हो, इसका खाका पेश करते.

हम अगर नरेंद्र मोदी को मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री के रूप में देखें, तो हमें उनके भाषण में कोई कमी या लोचा दिखाई नहीं देता. लेकिन अगर 67 साल के बाद 68वें जन्मदिन पर भी हिंदुस्तान के लोगों को स़िर्फ और स़िर्फ अच्छे शब्द, अच्छे वाक्य, अच्छे सपने ही मिलने हैं, तो फिर हमारे लिए नरेंद्र मोदी असाधारण प्रधानमंत्री नहीं हैं, महानायक नहीं हैं, इतिहास पुरुष नहीं हैं. लेकिन, फिर भी हमें आशा है कि नरेंद्र मोदी साल बीतते-बीतते इस देश की जनता को बाज़ार के उस दुष्प्रभाव, बाज़ार के उस शोषण से मुक्त करा लेंगे, जो उसे विकास की परिधि से बाहर रखे हुए है. और, नरेंद्र मोदी पूरी विकास की योजना इस तरह बनाएंगे, जिससे विकास स़िर्फ 20 प्रतिशत लोगों के लिए न हो, बल्कि 70 से 80 प्रतिशत जनता के लिए हो. इस स्वतंत्रता दिवस पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इतनी आशा तो करनी ही चाहिए. इसीलिए तो हमने कहा कि क्या हुआ, अगर हम खुश नहीं हैं. लेकिन, हम खुश नहीं हैं, तो भी प्रधानमंत्री जी, हम शपथ के साथ आपसे कहते हैं कि इस देश के वे सारे लोग खुश नहीं हैं, जो रोजाना ज़िंदगी का दर्द झेलते हैं, जो रोजाना बाज़ार के दिए हुए घाव झेलते हैं, जो रोजाना अपने सपनों को मरते हुए देखते हैं, जो रोजाना हाथ में हथियार उठाने के बारे में सोचते हैंया फिर मर जाने का ़फैसला लेने का साहस जुटाते हैं. ऐसे लोग देश में 70 प्रतिशत हैं. उनकी आंखों में संभावनाओं का सूरज उगाइए, यह हमारा आपसे अनुरोध है.

दस अहम घोषणाएं 
  • योजना आयोग की जगह नई संस्था का गठन.
  • सांसद निधि से एक साल तक स्कूलों में शौचालयों का निर्माण. दो अक्टूबर से देश भर में सफ़ाई अभियान शुरू किया जाएगा.
  • संसद ग्राम योजना के तहत हर सांसद अपने क्षेत्र के एक गांव को आदर्श ग्राम बनाएगा.
  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना के माध्यम से ग़रीबों को बैंक से जोड़ा जाएगा और हर खाताधारक को डेबिट कार्ड और एक लाख रुपये की बीमा सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी.
  • देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया जाएगा, भारत आयातक से निर्यातक बनेगा.
  • स्किल इंडिया के माध्यम से विकास को मिशन बनाने का संकल्प. प्रवासी भारतीयों को भी देश के निर्माण में भागीदारी का निमंत्रण.
  • देश के विकास के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल की ज़रूरत.
  • महिलाओं के खिलाफ़ अपराध और कन्या भ्रूण हत्या ख़त्म करने पर विशेष बल.
  • ई-गवर्नेंस, मोबाइल गवर्नेंस और टूरिज़्म से विकास को गति दी जाएगी.
  • सांप्रदायिकता और हिंसा ख़त्म करने की अपील. कहा, ख़ून से धरती लाल ही होगी और कुछ नहीं मिलेगा.
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बुधवार, 8 जनवरी 2014

राजनीति के गड़े मुर्दे

हमारे देश को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दर्जा यूं ही नहीं मिला हुआ है। उसके लिए हमारे देश के जागरूक और दूरदर्शी राजनीतिज्ञों ने अथक प्रयास किए हैं। उनके इन भगीरथी प्रयासों के परिणामस्वरूप ही हमारे देश की राजनीति का स्वरूप इतना बहुआयामी बन पाया है। इसके अनेक रंग हैं। जैसे, समाज में भले ही गड़े मुदरें को अच्छा नहीं समझा जाता हैं, उनसे बराबर परहेज रखने की बात की जाती है पर हमारी राजनीति में उन्हें अवसर के अनुकूल गले लगाया जाता है। उन्हें ऊंचा स्थान प्रदान किया जाता है। उन्हें बहुत आदर के साथ देखा जाता है। उन्हें हिफाजत से सुरक्षित जगह पर रखा जाता है, सहेजा जाता है। वे राजनीतिज्ञों की आंख का तारा होते हैं। ज्ञानीजन बताते हैं कि गड़े मुदरे में अपार शक्ति होती है। बस किसी को भी उसका सही इस्तेमाल करना आना चाहिए। जिस प्रकार कापालिक, तांत्रिक, अघोरी श्मशान जगाते हैं, ठीक वैसे ही राजनीति में राजनीतिज्ञों को गडे मुदरें को जाग्रत करने के लिए बयान, आरोप आदि की साधना करना पड़ती है। राजनीति के गड़े मुर्दे नाना प्रकार के पाए जाते हैं। इनमें कुछ व्यक्तिगत जीवन के गड़े मुर्दे होते हैं तो कुछ सार्वजनिक जीवन के। कुछ पार्टी पर आधारित गड़े मुर्दे हो सकते हैं तो कुछ पार्टी की मातृ संस्था या सहयोगी संगठन के भी गड़े मुर्दे हो सकते हैं। गड़े मुर्दे अनेक विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं। इनसे जमीन मजबूत की जाती है। कारण, ये जमीनी पकड़ बढ़ाने में भी बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। गडे मुदरे की बुनियाद पर सत्ता की भव्य इमारत का मजबूती से निर्माण किया जा सकता है। इनकी उंगली पकड़कर बड़ी सरलता से कुर्सी तक पहुंचने की पतली गली खोजी जा सकती है। गड़े मुर्दे का चेहरा दिखाकर मतदाताओं को रिझाया जा सकता है। इनकी याद दिलाकर मतदाताओं से वोट झटके जा सकते हैं। इनके कंधे पर हाथ डालकर, इनका सहारा लेकर लालबत्ती में प्रवेश किया जा सकता है। गड़े मुदरें के स्मरण मात्र से ही सत्ता सुंदरी के सपने देखे जा सकते हैं। गड़े मुर्दे खेवनहार होते हैं। वह चुनावी भंवर में फंसी पार्टी की नैया को किनारे लगाने तक की क्षमता रखते हैं। गड़े मुर्दे के पारखी नेताओं की पार्टी में खूब पूछ परख होती है। उन्हें स्टार का दर्जा प्राप्त हो जाता है। कौन सा मुर्दा कहां गड़ा है और उसे कब कहां से निकालना है और किस प्रकार किस कोण से उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है, इस प्रकार की गूढ़ जानकारी रखने वाले नेतागण पार्टी के थिंक टैंक का दर्जा पा जाते हैं। ऐसे नेता पार्टी की नीतियां तय करते हैं। जिस प्रकार महाभारत में भीष्म पितामह को पराजित करने के लिए शिखंडी को गुप्त रूप से रथ पर ले जाया गया था, उसी प्रकार चुनावी महाभारत में गड़े मुर्दे को सभाओं, रैलियो में ले जाया जाता है। जिसे देखकर प्रतिद्वंद्वी के होश फाख्ता हो जाते हैं। उनके पैरों के तले जमीन खिसक जाती है। उनसे जवाबी हमला करते नहीं बनता। इस प्रकार के संग्राम में यह भी देखा गया है कि कई बार विरोधी पक्ष भी अपने रथ पर किसी गड़े मुर्दे को धर लाते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों ओर के गड़े मुदरे का रोचक युद्ध देखने को मिलता है। कई बार प्रतिद्वंद्वी का गड़ा मुर्दा आप पर भारी हो सकता है। कई बार गड़े मुर्दे बेकाबू भी हो जाते हैं और उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है। इसलिए विशेषज्ञों का मत है कि गड़े मुदरे का प्रयोग किसी कुशल गुरु की देखरेख में ही संपादित करना चाहिए । गड़े मुदरे के पक्के खिलाड़ी उनका भली भांति उपयोग कर वापस ले आते हैं और उसे ऐसी जगह पर फिर से दफन कर देते हैं जहां से वक्त जरूरत पड़ने पर इन्हें आसानी से निकाल सकें। दूरदर्शी नेताओं की यही तो पहचान होती है।
-मृदुल कश्यप