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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

किसके अच्छे दिन! जिसके अच्छे दिन, वह मनायें जश्न!

नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी, प्लीज हमसे ना कहें नया साल मुबारक!

भारत में अब अबाध विदेशी पूंजी के लिए, अबाध बिल्डर प्रोमोटर राज के लिए अब फिर वही 1884 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधान लागू करने का इंतजाम हो गया है।

नया साल शुरु होने से दो दिन पहले भारत में फिर ईस्ट इंडिया कंपनी का राजकाज शुरु हो गया है, एक मुश्त हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों की अरबों डालर के वर्चस्व मध्ये हवाओं, पानियों में भोपाल गैस त्रासदी दुहराया जाने लगा है।

और अब इसे अध्यादेश राज कहा जायेगा। कि नरसंहार जारी रहेगा।

कि मनुस्मृति का गीता महोत्सव और शत प्रतिशत हिंदुत्व का दुस्समय है यह अपना समय कि नया साल मुबारक कहने का मतलब हुआ, आपके चौतरफा सर्वनाश के लिए शुभकामनाएं।

कृपया किसी से न कहें नया साल मुबारक।

खत्म हो रही इंसानियत की कयामत है

खत्म होने को कायनात की कयामत है

फिजां में मौत की खुशबुओं

की बहार है कि कयामत है

लहूलुहान है जिस्म न सही

लहूलुहान है रुह हमारी

हमसे जिस्मानी मोहब्बत

की उम्मीद मत रख

कि हमारी मर्दानगी

मर्दों के राजकाज में

कत्लगाहों की मौज है

और खूबसूरतियां तमाम

बर्बर कातिलों के कब्जे में

दम तोड़ रही है

हम जी नहीं रहे हैं हरगिज

हमारी मुकम्मल खामोशी

हमारे जनाजे के इंतजार में है

बेहया वक्त के ताबूत में कैद हैं हम

नये कंपनी बंदोबस्त के अध्यादेश में खासोआम को खबर हो कि मुलाहिजा फरमाये हुक्म है शाही हिंदू साम्राज्यवादी केसरिया कहर का, जमीन डकैती के लिए किसी की न सुनवाई होगी न नियमागिरि के आदिवासियों को तरह किसी को राय बताने की छूट होगी।

कि जो है धर्मराज्य के हक में, उसका भी काम तमाम है

कि जो इस महाभारत में गीतोपदेश के मुताबिक निमित्तमात्र भारतीय धर्मोन्मादी जनगण है, उसका भी काम तमाम है

हर गैरनस्ली हिंदू कि गैर हिंदू, सवर्ण कि अछूत, बूझै हैं कि न बूझै,

सगरे मुलुक के लिए प्रजाजनों, मौत का पैगाम है

अश्वमेध के घोड़े हुए बेलगाम, सांढ़ों का राज है

त्वाडे नाल राज के वास्ते जिंदा जला देने का पैगाम है कि धर्म और धर्मस्थलकि मजहब और जात पांत नस्ल कातिल के बहाने हैं

त्वाड्डा साड्डा काम तमाम है

मुआवजा जरूर सरकारी हिसाब के मुताबिक दे दिया जायेगा। मुआवजा हर वक्त बांटा जाता है। हर विस्थापन का वायदा फिर मुआवजा है। कि हर बलात्कार का जश्न अब मुआवजा है और हर कत्ल का मुआवजा अब माफीनामा है।

कि अपने अपने घर खाली कर दो, दोस्तों

कि कातिलों को बसेरा चाहिए।

सीमेंट के जंगल में

अपना ठिकाना तलाशों दोस्तों

कि खेतों खलिहानों

रोजी रोटी की मौत का

चाकचौबंद बंदोबस्त है

कि मनुस्मृति राज बहाल है।

लूट के माल का हिस्सा उम्मीद है तो

बेशक खामोशी अख्तियार करो, दोस्तों

वरना चीख सको तो चीखो गला फाड़कर

कि फिर चीखने का मौका मिल न मिले

कयामत मुंह बाँए खड़ी है कि

अबकी तो मुलाकाते हैं

जश्न है, जलवा भी है

रोजी भी है, रोटी भी है

फिर अपना गांव रहे न रहे


फिर मुलाकात हो न हो

हो सके तो मिल लो गले

शायद आखिरी बार

कि किन हादसों के मंजर से

गुजरना पड़े, न जिंदगी का ठौर ठिकाना है

न हम अस्मत किसी की बचाने काबिल

न हमारा कोई फसाना है

उम्मीद फिर वही हरजाना है

खालिस हरजाना है

जीने का फिर वही बहाना है

मजहबी अंधे जो करें, न करें कम है

कब किस इमारत पर टोंके दावा

किसे फिर तबाह कर दे

कब किसे बांटे रेवड़ियां

और कब किस शहर में आग लगा दें

यह देश अब मजहबी आग के हवाले हैं

और हम सारे लोग जनाजे में शामिल है

मोहर्रम पर ईद मुबारक न कहें

भारत में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से मुख्यमंत्री बनीं एकमात्र राजनेता ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ मोर्चा जरूर जमाया है और सुधारों की महागंगा कांग्रेस भी अब सुधार विरोधी उल्टी दिशा में बहने का दिखावा कर रही है। लेकिन जब तक धर्मोन्माद का यह तिलिस्म खत्म नहीं होता, लगता नहीं कि यह कायमत रुकने वाली है।

कारपोरेट वकील वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अधिनियम में बदलाव लाने के सरकार के फैसले को जायज ठहराते हुए कहा, इस तरह की परियोजनाएं रक्षा के लिए तैयारी एवं रक्षा निर्माण सहित भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। सहमति संबंधी उपधारा के बारे में पूछे जाने पर जेटली ने कहा, अगर भूमि अधिग्रहण पांच उद्देश्यों के लिए किया जाता है तो सहमति की उपधारा से छूट मिल जाएगी। संप्रग के कार्यकाल में अमल में आए कानून के मुताबिक पीपीपी परियोजनाओं के लिए जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की जा रही है, उनमें 70 फीसदी लोगों की सहमति जरूरी है।

इस फैसले के साथ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन तथा उचित मुआवजे का अधिकार और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम-2013 में पारदर्शिता 13 मौजूदा केंद्रीय कानूनों के लिए भी लागू होगी। सरकार ने कहा कि जिन मुश्किलों की बात आ रही थी, उनको देखते हुए कैबिनेट ने कुछ संशोधनों को मंजूरी दी है।

जब मौत सर पर मंडरा रही हो तो कातिलों के लिए जश्न का मौका होता है, मारे जाने वालों की चीखें तक निषिद्ध हो जाती हैं।

अब इस केसरिया हिंदू साम्राज्य में चीखने, रोने और पुकारने की भी आजादी नहीं है।

नया साल इसके बावजूद मुबारक हो तो मनाइये जश्न बाशौक।

कृपया हमें न कहें, या हमरी दीवाल पर हरगिज न टांगें नया साल मुबारक।

किसके अच्छे दिन!

जिसके अच्छे दिन, वह मनायें जश्न!

बाकी देश के लिए तो मंजर कयामत है।

फिजां कयामत है।

जिंदगी का दूसरा नाम कयामत है।

नया साल फिर फिर कयामत का इंतहा है।

नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी, हमसे कोई न कहें नया साल मुबारक!

नये साल से ठीक दो दिन पहले आर्डिनेंस राज बहाल हो गया है। यह कोई मुझ जैसे नाचीज का मंतव्य नहीं है।

तमाम विशेषज्ञ जिस इकोनामिक टाइम्स के पन्नों पर भारतीय अर्थव्यवश्ता में दौड़ते सांढ़ों की नब्ज टटोलते रहते हैं, उस अखबार की चीखती हुई सुर्खियां बता रही हैं कि दरअसल नया साल किस तबके के लिए बेहद बेहद मुबारक होने वाला है।

Ordinance Raj Begins, 2 Days Ahead of 2015

केंद्र सरकार ने आज भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इस अध्यादेश के तहत सरकार ने ज़मीन अधिग्रहण की मौजूदा शर्तों में ढील देते हुए काफी आसान बना दिया है।

हमारे पाठकों को याद होगा कि भूमि अधिग्हण की इन तैयारियों के बारे में हमने पूरा ब्यौरा हस्तक्षेप पर कई दिनों पहले लगाया है, ईटी ने हमारी आशंकाओं पर मुहर ठोंक दिया है। हमने वह आलेख अंग्रेजी में लिखा था।

बहराहाल, वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बता दिया है कि सरकार ने बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का अध्यादेश लाने का फैसला किया है।

वित्मंत्री गरीब गुरबों और बेगर लोगों को सब्जबाग यह दिखा रहें है कि जैसे लाकों करोड़ों के प्लैटों की खैरात बंटने वाली है। उनके कहे मुताबिक इस निर्णय से दिल्ली में रहने वाले 60 लाख से अधिक लोगों को फायदा होगा। सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र में अनधिकृत कालोनियों में सीलिंग पर तीन साल के लिए रोक लगाने से जुडे विधेयक को भी पारित कराया था। उन्होंने कहा कि किसानों को मुआवजे से जुडे प्रावधानों में कोई संशोधन नहीं किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्रीय कैबिनेट ने अधिनियम के दायरे में 13 केंद्रीय कानूनों को लाने के लिए संशोधन का फैसला किया है। जिन कानूनों में बदलाव की बात की गई, उनमें रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा, किसानों को अधिक मुआवजा प्रदान करना और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन से संबंधित कानून शामिल हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार ने समाज की विकास संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अधिनियम के कुछ प्रावधानों में रियायत देने और कानून में धारा 10ए को शामिल करने का फैसला किया है।

बहरहाल, इन उद्देश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण करने की स्थिति में नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन पैकेज लागू होगा। अध्यादेश में जो बदलाव शामिल किए जाने हैं, उनके मुताबिक बहुफसली सिंचाई की भूमि भी इन उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित की जा सकती है।

आज भूमि अधिग्रहण आर्डिनेंस से जो मेरे दिलोदिमाग में रक्तपात हो रहा है, उसमें मतुआ आंदोलन के जख्मी लहूलुहान हो जाने का अहसास जितना है, उससे ज्यादा तकलीफ हमारे आदिवासी परिजनों और पुरखों की हजारों साल की लड़ाइयां बेकार हो जाने की वजह से है। तमाम किसान आंदोलनों को गैरप्रासंगिक बना दिये जाने की वजह से है। 1956 और 1958 की तराई की लड़ाइयां, ढठे और सातवें दशक के सारे जनांदोलनों के बेमतलब हो जाने का मातम मना रहा हूं मैं।

अब भूमि अधिग्रहण अबाध है।

अब विदेशी पूंजी और कालाधन अबाध है। यही है गीता महोत्सव।

यही है नये साल के जश्न का मतलब।

किसी की सुनवाई, किसी की सम्मति की कोई जरूरत नहीं है।

नियमागिरि की आदिवासी पंचायतों की राय अब बेमतलब है।

बेमतलब है, संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूचियां, वनाधिकार कानून, पंचायती राज कानून , पर्यावरण कानून, समुद्र तट सुरक्षा कानून वगेैरह वगैरह।

1956 के बाद पुनर्वास के बावजूद बेदखल जमीन का दखल हासिल करने की मेरे गांव के लोगों, मेरे पिता, बसंतीपुर में मेरे दोस्त कृष्णो के पिता गांव के शाश्वत प्रेसीडेंट मांदार बाबू, शाश्वत सेक्रेटरी अतुल शील और शाश्वत कैशियर शिशुवर मंडल की लड़ाई के बेमतलब हो जाने का दर्द है।

- पलाश विश्वास

आम चुनाव में लोग वोट क्‍यों देते हैं?

सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति हत्‍याकांड में अमित शाह बरी हो गए। तो? जब बरी नहीं हुए थे, अभियुक्‍त थे, तब भी कौन सी कीमत उन्‍होंने चुकायी थी? वे तो उलटे सियासी सीढि़यां चढ़ते गए, साहेब के साथ-साथ। यही दोनों क्‍यों, कुल 186 लोकसभा सांसदों के खिलाफ क्रिमिनल मुकदमे चल रहे हैं। अमित शाह भले जनप्रतिनिधि न हों, साहेब के मैनेजर हों, लेकिन बीजेपी के कुल सांसदों में से एक-तिहाई के खिलाफ़ तो आपराधिक मुकदमा दर्ज ही है। तो क्‍या हुआ? जनता ने उन्‍हें चुनकर भेजा है, अब चाहे जै फीसदी जनता हो। मतलब कि हत्‍या, लूट, सेंधमारी, बलात्‍कार, छिनैती, डकैती, दंगा, नरसंहार, धोखाधड़ी आदि से लोग अपने उम्‍मीदवार को नहीं तौलते।

ठीक है। अपना काम-वाम करवाने के मामले में पार्षद-विधायक को चुनने तक तो बात समझ में आती है, लेकिन आम चुनाव में लोग वोट क्‍यों देते हैं? एक अपराधी को सांसद बनने से रोककर लोग अपराधबोध से आसानी से बच सकते थे, खासकर इसलिए भी कि सांसद लोगों का काम सीधे नहीं करवाता। जिसकी कोई उपयोगिता ही नहीं, तिस पर वो अपराधी भी है, उसे वोट देकर अपने हाथ गंदे क्‍यों करना। लोकसभा चुनाव में लोगों ने मोदी को चुना, तभी तो बिना चुना हुआ शाह नाम का आदमी नत्‍थी होकर यहां तक आ गया और बरी हो गया!

मेरा सवाल है: आम चुनाव में लोग वोट क्‍यों देते हैं? क्‍या जनता का काम करने/करवाने के लिए वास्‍तव में किसी राष्‍ट्रीय सरकार की ज़रूरत है? इस पर कम से कम दो बार सोचिएगा।
O- अभिषेक श्रीवास्तव

भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था गांधी की हत्या

  • पुनरूत्थान गोडसे के महिमामंडन का
समय बदल रहा है और इस परिवर्तन की गति काफी तीव्र है। पिछले कुछ दशकों में अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादियों को अपने नायक नाथूराम गोडसे के प्रति अपने प्रशंसाभाव को दबा-छिपाकर रखने की आदत-सी पड़ गई थी। कभी कभार, कुछ कार्यक्रमों में उसका गुणगान किया जाता था परंतु ऐसे कार्यक्रम बहुत छोटे पैमाने पर आयोजित होते थे और उनका अधिक प्रचार नहीं किया जाता था। पिछले कुछ सालों में, प्रदीप दलवी के मराठी नाटक ‘मी नाथूराम बोलतोए‘ (मैं नाथूराम बोल रहा हूं), जिसमें गांधी पर कटु हमला और गोडसे की तारीफ की गई है, का मंचन महाराष्ट्र में कई स्थानों पर हुआ और नाटक देखने के लिए भारी भीड़ भी उमड़ी। इस नाटक का अलग-अलग लोगों द्वारा समय-समय पर विरोध भी किया जाता रहा है।

मई 2014 में दिल्ली में नई सरकार आने के बाद से साम्प्रदायिक भाषणबाजी, टिप्पणियों और कार्यकलापों में तेजी से वृद्धि हुई है। ऐसा लगता है कि सत्ताधारी वर्ग इन हरकतों का मूकदर्शक बना रहना चाहता है। यह निष्कर्ष इसलिए तार्किक प्रतीत होता है क्योंकि अब तक गोडसे प्रशंसकों को न तो किसी सत्ताधारी ने फटकार लगाई है और ना ही उनका विरोध किया है। सरकार में रहने की मजबूरी के चलते वे गोडसे प्रशंसक क्लब के सदस्य तो नहीं बन सकते परंतु वे उसकी निंदा भी नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे स्वयं भी हिन्दू राष्ट्रवाद की गोडसे विचारधारा में आस्था रखते हैं। इस हिन्दू राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रवाद‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। हिन्दू शब्द का उच्चारण इतने धीमे स्वर में किया जाता है कि वह सुनाई ही नहीं देता।

गोडसे प्रशंसक क्लब की सबसे ताजा गतिविधि है मेरठ में 25 दिसम्बर 2014 को हिन्दू महासभा द्वारागोडसे के मंदिर के निर्माण के लिए भूमिपूजन । अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कार्यकर्ता, महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मेरठ में देश का पहला मंदिर बनाने जा रहे हैं। हिन्दू महासभा के कई कार्यालयों में गोडसे की मूर्ति स्थापित करने की तैयारी चल रही है। हिन्दू महासभा ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि दिल्ली में गोडसे की मूर्ति स्थापित करने के लिए उसे भूमि आवंटित की जाए। गोडसे की किताब का द्वितीय पुनर्मुद्रित संस्करण बाजार में आ चुका है।

भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कुछ समय पहले गोडसे को राष्ट्रवादी बताया था। बाद में वे अपने बयान से पीछे हट गए ताकि सत्ताधारी भाजपा परेशानी में न फंस जाए। भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस ने आतंरिक वितरण के लिए दो नई पुस्तकें जारी की हैं। इन पुस्तकों का उद्धेश्य है संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों को उसकी विचारधारा से परिचित करवाना। इन पुस्तकों के शीर्षक हैं, ‘आरएसएस-एक परिचय‘ व ‘आरएसएस-एक सरल परिचय‘। इनमें से दूसरी पुस्तक के लेखक आरएसएस के वरिष्ठ सदस्य एम. जी. वैद्य हैं। वैद्य का कहना है कि ‘आरएसएस के चारों ओर आरोपों का घेरा बना दिया गया है‘। इस पुस्तक का उद्धेश्य, आरोपों के इस घेरे से आरएसएस को बाहर निकालना है।

जहां प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे पर मौन धारण किए हुए हैं वहीं विपक्षी नेताओं ने हिन्दू महासभा व अन्यों द्वारा गोडसे के कृत्य का महिमामंडन करने के प्रयास की कड़ी आलोचना की है।

गोडसे और आरएसएस का क्या रिश्ता था? क्या वह आरएसएस का सदस्य था और क्या उसने बाद में संघ छोड़ दिया था या फिर उसने संघ का सदस्य रहते हुए, सन् 1930 के मध्य में, हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली थी? आधिकारिक रूप से आरएसएस हमेशा यह कहता आया है कि उसका गोडसे से कोई लेनादेना नहीं है और गोडसे ने जब महात्मा गांधी की हत्या की थी, उस समय वह संघ का सदस्य नहीं था। इस बहाने, आरएसएस हमेशा से गोडसे से अपना पल्ला झाड़ता रहा है। यहां यह याद करना मुनासिब होगा कि सन् 1998 में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख प्रो. राजेन्द्र सिंह ने कहा था कि ‘गोडसे अखंड भारत की परिकल्पना से प्रेरित था। उसका उद्धेश्य पवित्र था परंतु उसने गलत साधनों का इस्तेमाल किया‘ (‘आउटलुक‘, अप्रैल 27, 1998)।

हम इस पूरे मुद्दे को कैसे देखें? इसे समझने के लिए सबसे पहले हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को समझना आवश्यक है-उस राजनीति को, जिसके कर्ताधर्ता हिन्दू महासभा और आरएसएस थे। ये दोनों संगठन स्वाधीनता संग्राम से दूर रहे। हिन्दू महासभा की रूचि हिन्दू साम्प्रदायिक राजनीति के झंडाबरदार बतौर राजनीति में प्रवेश करने में थी। आरएसएस, अपने कार्यकर्ताओं का जाल खड़ा करना चाहता था और अलग-अलग संगठन बनाकर शिक्षा, संस्कृति व राज्यतंत्र में घुसपैठ करने का इच्छुक था। इन दोनों संगठनों के एजेन्डा में अनेक समानताएं थीं क्योंकि दोनों, मूलतः हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए काम कर रहे थे। नाथूराम गोडसे इन दोनों संगठनों की विचारधारा के ‘अद्भुत मिलन‘ का प्रतीक था।

आरएसएस, गोडसे को स्वयं से इसलिए अलग कर सका क्योंकि संघ के सदस्यों का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं रखा जाता था और इसलिए कानूनी दृष्टि से संघ को गोडसे से जोड़ना संभव नहीं था। गोडसे ने सन् 1930 में आरएसएस की सदस्यता ली और जल्दी ही वह उसका बौद्धिक प्रचारक बन गया। हिन्दू महासभा और आरएसएस की तरह, वह भी अखंड भारत – अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार का संयुक्त भूभाग – की परिकल्पना का जबरदस्त समर्थक था।

कट्टर हिंदुत्ववादी होने के नाते, वह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत और उनके नेतृत्व में चलाए गए ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन का कटु आलोचक था। गोडसे, स्वाधीनता संग्राम में गांधी की भूमिका में कुछ भी अच्छा नहीं देखता था। आरएसएस और हिन्दू महासभा, गांधी की लगातार इस बात के लिए आलोचना करते थे कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में सभी धार्मिक समुदायों को भागीदार बनाया। गांधी की मान्यता यह थी कि धर्म एक व्यक्तिगत मसला है और उनका प्रयास था कि सभी देशवासी, धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर, भारतीय के रूप में अपनी पहचान स्थापित करें। हिन्दू महासभा और आरएसएस को यह बर्दाश्त नहीं था क्योंकि वे चाहते थे कि केवल हिन्दुओं को ही भारतीय के रूप में स्वीकार किया जाए। गांधी के राष्ट्रवाद का मूल्यांकन, गोडसे, हिन्दू राजाओं के राष्ट्रवाद की कसौटी पर करता था। गांधीजी का मूल्यांकन करने के लिए वह बहुत अजीब मानकों का इस्तेमाल करता था। ‘उनके (गांधी) समर्थक वह नहीं देख पा रहे हैं जो किसी अंधे को भी साफ-साफ दिखाई दे सकता है और वह यह कि शिवाजी, राणाप्रताप और गुरू गोविंद सिंह के सामने गांधी एकदम बौने हैं‘ (वाय आई एसेसिनेटिड गांधी, 1993, पृष्ठ 40) व ‘जहां तक स्वराज और स्वाधीनता प्राप्त करने का सवाल है, उसमें महात्मा का योगदान नगण्य था‘ (पूर्वोक्त, पृष्ठ 87)।


वह महात्मा को मुसलमानों का तुष्टिकरण करने का दोषी और पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार मानता था। आरएसएस और हिन्दू महासभा से अपने जुड़ाव के बारे में वह लिखता है, ‘‘हिन्दुओं की बेहतरी के लिए काम करते हुए मुझे यह अहसास हुआ कि हिन्दुओं के न्यायपूर्ण अधिकारों की रक्षा के लिए राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेना आवश्यक है। इसलिए मैंने संघ छोड़कर हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली‘‘ (पूर्वोक्त पृष्ठ 102)।

उस समय हिन्दू महासभा एकमात्र हिन्दुत्ववादी राजनैतिक दल था। गोडसे, महासभा की पुणे शाखा का महासचिव बन गया। कुछ समय बाद उसने एक अखबार का प्रकाशन शुरू किया जिसका वह संस्थापक संपादक था। अखबार का शीर्षक था ‘अग्रणी या हिन्दू राष्ट्र‘। यह साफ है कि गांधी की हत्या, उन कारणों

(देश का विभाजन और पाकिस्तान को उसके 55 करोड़ रूपये चुकाने पर गांधीजी का जोर), से नहीं की गई थी, जिनका ये संगठन प्रचार करते हैं। गांधी की हत्या इसलिए की गई क्योंकि हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों और गांधी की राजनीति में बुनियादी मतभेद थे। इन दोनों कारणों को तो केवल बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

जब गोडसे कहता है कि उसने आरएसएस छोड़ दिया था, तब उसका क्या अर्थ है? क्या यह सच है? गोडसे के आरएसएस छोड़ने के पीछे के सच का खुलासा उसके भाई गोपाल गोडसे ने ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया‘ (25 जून 1998) को दिए गए एक साक्षात्कार में किया। गोपाल गोडसे, जो कि गांधी हत्या में सहआरोपी था, नाथूराम गोडसे के इस बयान कि ‘उसने आरएसएस छोड़ दिया था‘ के बारे में कहता है, ‘‘उनकी (गांधी) तुष्टिकरण की नीति-जो सभी कांग्रेस सरकारों पर लाद दी गई थी-ने मुस्लिम अलगाववादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया और इसका अंतिम नतीजा पाकिस्तान के निर्माण के तौर पर सामने आया…तकनीकी और सैद्धांतिक दृष्टि से वे (नाथूराम) सदस्य (आरएसएस के) थे परंतु उन्होंने बाद में उसके लिए काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने अदालत में यह बयान कि उन्होंने आरएसएस छोड़ दिया था इसलिए दिया था ताकि हत्या के बाद गिरफ्तार किए गए आरएसएस कार्यकर्ताओं की सुरक्षा हो सके। वे यह समझते थे कि उनके आरएसएस से स्वयं को अलग कर लेने से उन्हें (आरएसएस कार्यकर्ताओं) को लाभ होगा और इसलिए उन्होंने खुशी-खुशी यह किया‘‘।

गोडसे के आरएसएस छोड़ने का दावा करने का असली कारण यह था। गोडसे की दोहरी सदस्यता (आरएसएस व हिन्दू महासभा) से दोनों ही संगठनों को कोई परेशानी नहीं थी। इस तरह, यह स्पष्ट है कि गांधी की हत्या के पीछे हिन्दुत्व की राजनीति की दोनों धाराएं-आरएसएस व हिन्दू महासभा- थीं। गोडसे के संपादन में प्रकाशित समाचारपत्र का शीर्षक ‘हिन्दू राष्ट्र‘ भी इसी तथ्य को रेखांकित करता है। गांधी की हत्या को हिन्दू महासभा व आरएसएस दोनों की ही स्वीकृति प्राप्त थी और उनके कार्यकर्ताओं ने हत्या के बाद, मिठाईयां बांटकर जश्न भी मनाया था। ‘उसके (आरएसएस) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे रहते थे। इसका अंतिम नतीजा यह हुआ कि देश में ऐसा जहरीला वातावरण बन गया जिसके चलते इतनी भयावह त्रासदी संभव हो सकी। आरएसएस के लोगों ने इस पर अपनी खुशी का इजहार किया और गांधी की मृत्यु के बाद मिठाईयां बांटी‘ (सरदार पटेल के एम. एस. गोलवलकर और एस. पी. मुकर्जी को लिखे पत्रों से उद्वत)। गोडसे सनकी नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा गांधी के खिलाफ फैलाए जा रहे जहर का तार्किक परिणाम था। और गोडसे को तो आरएसएस व हिन्दू महासभा दोनों की शिक्षाओं का ‘लाभ‘ प्राप्त था। वे गांधी की हत्या के लिए ‘वध‘ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। सामान्यतः इस शब्द का इस्तेमाल उन राक्षसों की हत्या के लिए किया जाता है जो कि समाज के शत्रु हों। एक अर्थ में, गांधी की हत्या, भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था। इसने उसके आगे की राह प्रशस्त की और पिछले कुछ दशकों में हिन्दुत्ववादी राजनीति कहां से कहां जा पहुंची है, हम सब इससे वाकिफ हैं।

यद्यपि आधिकारिक रूप से संघ परिवार गोडसे के हाथों गांधी की हत्या से स्वयं को अलग रखता है परंतु निजी बातचीत में उसके सदस्य न केवल इस कायराना हरकत को उचित ठहराते हैं बल्कि महात्मा गांधी के महत्व और उनकी महानता को कम करके बताते हैं। उन्हें गोडसे से पूरी सहानुभूति है। यह चालबाजी, यह दोगलापन अब तक चला आ रहा था। मोदी सरकार के आने के बाद अब इस सच को छुपाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। और इसलिए गोडसे का महिमामंडन बिना किसी लागलपेट के, पूरे जोशोखरोश से किया जा रहा है। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

Writer  -राम पुनियानी

दो तिहाई नजरबंद दलित-आदिवासी और मुस्लिम अकेले गुजरात और तमिलनाडु में- मोदी

  • गुजरात में 98 में भाजपा सरकार बनने के साथ ही हो गया था सिलसिला शुरू
नई दिल्ली। बिना किसी अपराध के, विभिन्न प्रतिबंधात्मक कानूनों में, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय को जेल में नजरबंद रखने के मामले में आज भी ब्रिटिश सरकार वाला रवैया जारी है। जहाँ इस मामले में तमिलनाडु हमेशा से आगे रहा है, वहीं गुजरात में 1998 में भाजपा सरकार कायम होने के साथ इसमें बड़ी तेजी आई।

समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय सचिव अनुराग मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरोद्वारा जारी के आंकड़े यह बताते हैं कि, 2013 में देश की जेलों में नजरबंद कैदियों में मुस्लिम, दलित और आदिवासियों का प्रतिशत 67 है – 20% मुस्लिम; 31% दलित; 16% आदिवासी; वहीं देश की कुल आबादी में इनका प्रतिश्त मात्र 38.73 है। इन कैदियों में से 81% गुजरात और तमिलनाडु की जेलों में नजरबन्द है। जबकि गुजरात में इस वर्ग की हिस्सेदारी राष्ट्रीय अनुपात में 14% है तो तमिलनाडु की 11%। गुजरात में बंद कुल नज़रबंद में से 66% नजरबंद इस वर्ग से है, तो तमिलनाड में 72। जबकि राज्य की जनसँख्या के अनुपात में गुजरात में इस वर्ग की कुल जनसँख्या 31 प्रतिशत है, तो तमिलनाड में 27। कमाल की बात यह है कि, नक्सल प्रभावित छतीसगढ़ में कुल मिलाकर सिर्फ एक और झारखंड में कुल 10 नजरबंद थे, तो आतंकवाद प्रभावित जम्मू और काश्मीर में 72। यही नहीं, देश भर की जेल से रिहा 5826 कुल नज़रबन्दों में से 76% गुजरात (2209) और तमिलनाड (2211) जेलों में नजरबंद थे – प्रत्येक राज्य में 38%। यह आंकड़े जाति और धर्मवार नहीं है , लेकिन उपर दिए आंकड़े यह दर्शाते है कि इन रिहा कैदियों में भी मुस्लिम, दलित और आदिवासियों का प्रतिशत अमूमन वहीं होगा।

श्री मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की वेब साईट पर जेल में बंद विभिन्न श्रेणियों के कैदियों के आंकड़ें 1995 से उपलब्ध हैं| गुजरात दंगों में मुस्लिम, दलित और आदिवासी समुदायों का एक दूसरे के खिलाफ जमकर उपयोग हुआ था, इसलिए इन आंकड़ों का विश्लेषण यह बता सकता है कि किस तरह गुजरात में 2002 में हुए दंगों के पहले से ही- 1998 में भाजपा सरकार आने के साथ ही - प्रतिबंधात्मक धाराओं में में मुस्लिम, दलित और आदिवासियों को नजरबंद करने का सिलसिला जोर पकड़ गया था; जो आज तक जारी है। इसमें जहाँ गुजरात में 1995 एवं 1996 में कोई नजरबंद नहीं बताए गए हैं, वहीं 1997 में पहली बार 267 नजरबंद थे जो 1998 में दुगने होकर लगातर बढ़ते रहे और गुजरात में 1998 में 30% कैदी इस वर्ग के थे, जो 2002 में 68 पर पहुंचकर 2013 में भी 66 पर कायम है। तमिलनाड हमेशा से मुस्लिम, दलित और आदिवासीयों को नजरबंद करने के मामले में आगे रहा है: 1998 में प्रतिश्त 86 था; जो 2006 में बढकर 98 तक गया और 2013 में थोडा गिरकर 72 जरुर हो गया है। उन्होंने कहा तमिलनाडु में इन समुदायों के प्रति अति भेदभावपूर्ण है, इस बात में कोई शक नहीं है, लेकिन इस रवैये में किसी सरकार विशेष के बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ा।

रायपुर में नये बीरबल की खोज

अकबर के साथ किसी एक आदमी का नाम जुड़ा है तो वह बीरबल है। उन्हीं के किस्से- कहानी लोक में मशहूर हैं। बीरबल न होता तो अकबर का कोई नामलेवा न होता। लोग तो अकबर से ज्यादा अक्लमंद बीरबल को मानते हैं। पता नहीं ये बीरबल उस जमाने चाय पीता था क्या ? जो हर समय उसे नई –नई तरकीबें सूझती रहती थीं।

भारत एक खोज की तर्ज पर आजकल बीरबल की खोज जारी है। जैसे चुनाव में जीत की गारंटी के लिए बाहुबली की तलाश हर दल के नेताओं को रहती है ,उसी तरह हर नेता अपने साथ एक बीरबल भी रखता है ,जिसका काम नेताजी की छवि को हर तरह से चमकाना होता है। एक तरह से यह बीरबल राजा और प्रजा के बीच सौहार्द और सम्बन्ध कायम करने का विश्वसनीय माध्यम होता है। राजतन्त्र में यह काम अक्सर अक्लमंद ,हंसोड़ विदूषकों के जिम्मे होता था। कई बार जब राजा उनके इशारों को समझ नहीं पाता था तो उन्हें आँखों में अंगुली डालकर समझाना पड़ता था। नबावी दौर में भी यह काम जारी रहा।

अंग्रेजों ने अपने इन वफादार बीरबलों को बड़ी –बड़ी जायदाद और इनाम –इकराम बख्शे थे। रायबहादुर –रायसाहब जैसे ख़िताब इन्हीं जैसों के लिए थे। आजादी की लड़ाई में यह काम कवियों और शायरों ने किया था। इसीलिए गांधीजी इन्हें बड़ी इज्जत देते थे। गुरुदेव और राष्ट्रकवि जैसी उपाधि तक उन्हें हासिल थी।

चाचा नेहरू जरा नजाकत –नफासत पसंद थे। बीरबलों की उन्हें जरूरत नहीं थी लेकिन राष्ट्रवादी एक- दो कवि उन्होंने भी पाल रखे थे। चीन युद्ध में इनका वीररस किसी काम नहीं आया था और देश की गरीब, साधनहीन सेना पिट गयी थी। तब बीरबल की जगह मेनन को बलि का बकरा बनना पड़ा था।

उसके बाद अनेक बीरबल हुए हैं जिनका नाम जनता जानती है ,इसलिए बताने की जरूरत नहीं। उनमें कई तो वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। आजकल की भाषा में चुनाव में जमानत जब्त हो जाना ही वीरगति को प्राप्त होना है। इसीलिए हर झंगा –पतंगा शहीद कहलवाना पसंद करता है। कई तो खुद ही अंगुली में आलपिन चुभाकर शहीद हो जाते हैं।

तो किस्सा –कोताह यह कि देश को नये बीरबल की जरूरत है। जो लोग खुद को इस पद के योग्य समझते हों आवेदन करें। वेतन ,बंगला। ..वगैरह योग्यतानुसार \

नोट-रायपुर महोत्सव में एक बार भाग ले चुके साहित्यकार कृपया दोबारा न आयें

About The Author
मूलचन्द्र गौतम, 
लेखक प्रख्यात आलोचक हैं।
 साहित्यिक पत्रिका “परिवेश” के संपादक हैं।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

आधार कार्ड से किसे लाभ?

29 सितम्बर, 2010 को महाराष्ट्र के नन्दूरबार जिले के तमभली गांव में सोनिया गांधी द्वारा एक महिला को भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा जारी 12 अंकों का पहचान पत्र आधार कार्ड देकर इस योजना का आरंभ किया गया। आधार कॉर्ड योजना को लागू करते समय नीलकेणी ने जोर देते हुए कहा था कि यह स्वैच्छिक योजना होगी, लेकिन जिस तरह से इसका प्रचार-प्रसार किया गया, उससे यही लग रहा है कि यह अनिवार्य हो गयी है। यह योजना शुरूआती दिनों से ही विवादों में रही है। यह योजना सीधे-सीधे लोगों की निजता (व्यक्तिगत जानकारी) से जुड़ा हुआ है। इस विशिष्ट पहचान को लेकर ब्रिटेन जैसे देश में चुनावी मुद्दा बना है और सरकार का हार की एक मुख्य कारण रहा है। चुनाव जीतने के बाद सरकार ने न केवल योजना को रद्द कर दिया बल्कि जो डाटा इकट्ठा हुआ था, उसे भी सुरक्षित तरीके से नष्ट किया। कहा गया कि स्टेट यानी राज्य को हर नागरिक के निजता के अधिकार का सम्मान करना चाहिए।
इसी तरह भारत में भी इसका विरोध हुआ और इसे लोगों की निजता पर कुठाराघात माना गया। उस समय की विपक्षी पार्टी (भाजपाजो अब सत्ता में है) ने भी विरोध जताया था। इस पर मीडिया में बहस चली और अनेकों लेखों में लिखा गया कि यह योजना गैरकानूनी है, लोगों की निजता पर प्रहार है, मेहनतकश जनता के साथ धोखा है। संसद की स्थायी समिति ने भी सवाल उठाये। स्थायी समिति की रिपोर्ट (सिफारिशों वाले खंड में) में कहा गया है कि ‘बायोमेट्रिक सूचना संग्रहण के काम कोनागरिकता कानून 1955 तथा नागरिकता नियम 2003 में संशोधन के बगैर कोई अन्य विधेयक बनाकर सही ठहराने की गुंजाइश नहीं बनती, और इसकी संसद को विस्तार से पड़ताल करनी होगी।’ समिति की रिपोर्ट को भी उस समय की कांग्रेस सरकार ने अनदेखा कर आधार कार्ड बनाने का काम जारी रखी।
इस योजना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने 21 सितम्बर, 2013 को आदेश दिया कि आधार कार्ड की अनिवार्यता खत्म की जाए। ‘‘किसी भी सरकारी सुविधा हासिल करने के लिए आधार कार्ड जरूरी नहीं है। किसी भी व्यक्ति का आधार डिटेल पुलिस या सीबीआई को कार्ड होल्डर की अनुमति के बिना नहीं दिया जाएगा। साथ में यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी भी अवैध नागरिक का आधार कार्ड न बने।’’ इस पर भाजपा के अनंत कुमार ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बीजेपी पहले ही कह चुकी है कि आधार कार्ड निराधार है। कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस सरकार के व्यवहार में नरमी आई और लोगों के अन्दर आधार कार्ड बनाने का खौफ खत्म होने लगा था।
एनडीए सरकार बनने के बाद आधार कार्ड के विरोध कर रहे सिविल सोसाईटी और आम जन निश्चिंत थे कि आधार कार्ड की अब जरूरत नहीं है, क्योंकि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने इस योजना का विरोध किया था। लेकिन सत्ता में आते ही उसने यू टर्न लिया और हर कल्याणकारी योजना को आधार कार्ड से जोड़ने का ऐलान कर दिया। इस योजना के लिए 1200 करोड़ रुपये भी आवंटित कर दिया गया। इसके बाद फिर से यह बहस का विषय बना हुआ है। लोग सवाल कर रहे है सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या होगालोगों की निजता कैसे बचेगी….? इन सब चिंताओं के बीच में आधार कार्ड बनाने वाली कम्पनियों में खुशी है, क्योंकि वे आम नागरिकों से इसके लिए 20 से 100 रुपये तक की वसूली कर रही हैं। निःशुल्क फार्मों को बेचा जा रहा है। लोगों से पैसा वसूलने के लिए जानबूझ कर आधार केन्द्रों पर एक से अधिक बार बुलाया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ-साफ कहा है कि कार्ड होल्डर की अनुमति के बिना उनकी जानकारी किसी भी एजेंसी को नहीं दी जा सकती, जबकि पंजीयन के दौरान ही घोषणापत्र भरवाया जाता है कि आवेदक द्वारा दी गई सूचना को प्राधिकरण उपयोग में ला सकता है। इस तरह कार्ड होल्डर की जानकारी हर विभाग के साथ साझा किया जायेगा। कार्ड होल्डर की पूरी जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध रहेगी।
आधार कार्ड बनाने में धांधली को लेकर कानपुर के सिकंदरा तहसील में लोगों ने पैसा देने से मना किया तो उनको आधार कार्ड बनाने से मना कर दिया गया। इसी तरह बलिया जिले के बासडीह तहसील के बकवा गांव में एक 72 साल के बुर्जुग द्वारा पैसा देने से मना करने पर उनका आधार कार्ड नहीं बनाया गया और धक्का दे कर उन्हें भगा दिया गया। इस घटना की लिखित शिकायत बांसडीह तहसीलदार और थाने को दी गई। ईमेल के द्वारा आधार कार्ड निदेशक, बलिया के जिलाधिकारी, गृह सचिव, उ.प्र. सरकार व भारत सरकार के गृह सचिव को देने के बावजूद उस कम्पनी पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। यहां तक कि ये सभी यह भी नहीं बता पाये कि उस क्षेत्र में कौन सी कम्पनी आधार कॉर्ड बना रही है। थाने में पुलिस अधिकारी यह समझा रहे हैं कि हमने भी पैसा देकर बनवाया है, आप भी दे दीजिये। इसी तरह की शिकायत पर फिरोजाबाद में नियम बनाये गये हैं कि आधार कार्ड बनाने वाली कम्पनियां एक सप्ताह पहले अपना ब्यौरा देगी कि किस क्षेत्र में वह आधार कार्ड बना रही है। आधार कार्ड नामांकन शिविर सार्वजनिक स्थलों (स्कूल, पंचायत भवन एवं अन्य सरकारी भवनों) में ही लगने चाहिए, जबकि वे गांव, कस्बों के दबंग व्यक्यिों के घरों पर लगाये जा रहे हैं।
दिल्ली जैसे इलाके में फॉर्म नहीं दिये जा रहे हैं, फॉर्म फोटो स्टेट की दुकान से 5 रु. में खरीद कर लानी पड़ रही है। दिल्ली जैसे शहरों में लाखों लोग किराये के मकान में रहते हैं जिसका पता बदलता रहता है और पता बदलवाने के लिए 100 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं।
इस तरह से इस योजना के कार्यान्वयन में हजारों करोड़का भ्रष्टाचार छुपा हुआ है। आपके डाटा को किस तरह से सुरक्षित रखा गया है और उस डाटा के चोरी होने पर क्या इस्तेमाल होगाकहा नहीं जा सकता। सरकार डाटा सुरक्षा का आश्वासन देती है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली से ऐसा नहीं लगता, जब सरकार यह नहीं पता कर पा रही है कि किस इलाके में कौन सी कम्पनी आधार कार्ड बना रही है तो वह कैसे पता लगा पायेगी कि किस का डाटा किस रूप में प्रयोग हो रहा है। आधार कार्ड जब पैसे लेकर बनाये जा रहे हैं तो इसे कोई भी अवैध व्यक्ति पैसा देकर बनवा सकता है। इस योजना से आम आदमी को कितना लाभ होगा यह अनिश्चित है, लेकिन कम्पनियों को कितना लाभ होगा यह निश्चित है। आधार कार्ड को कल्याणकारी योजनाओं से क्यों जोड़ा जा रहा है, क्या गरीब लोगों का डाटा सरकार को चाहिए? इस योजना को स्वैच्छिक कह कर स्वीस बैंक में पैसा रखने वालों को छूट दी जा रही है। क्या भविष्य में आधार कार्ड के पहचान पर एक धर्म विशेष व पूंजीवादी विचारधारा के खिलाफ काम कर रहे लोगों को निशाना बनाया जायेगा?
O- सुनील कुमार About The Author
सुनील कुमार, लेखक राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

आधी दुनिया की हुंकार

पंचायत चुनावों को भयमुक्त एवं हिंसामुक्त बनाने के लिए आगे आई  महिला जन-प्रतिनिधि
राजसमंद। महिलाओं की राजनैतिक क्षमता बढ़ाने, आगामी पंचायत चुनावों को भयमुक्त एवं हिंसामुक्त बनाने, आरक्षित एवं अनारक्षित सीटों  पर वंचित वर्ग की महिलाओं को अधिक  लड़ने हेतु प्रेरित करने के उद्देश्य से द  हंगर प्रोजेक्ट, जयपुर के निर्देशन एवं दक्षिणीं राजस्थान की सहयोगी स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से राज्य-स्तरीय महिला सम्मेलन का आयोजन स्थानीय तुलसी साधना शिखर पर  आयोजित किया गया।
कार्यक्रम अधिकारी वीरेंद्र श्रीमाली ने बताया कि आगामी चुनावों में  अधिकाधिक संख्या में चुनाव लड़ने हेतु प्रेरित करने तथा उनके चुनकर आने हेतु रणनीति निर्माण तथा ग्राम स्तर पर चुनावों में अधिक मतदान   के लिए चेतना निर्माण हेतु स्वीप अभियान का आगाज़ इस सम्मेलन में किया गया। सम्मेलन में 400  से अधिक वर्तमान महिला जन-प्रतिनिधियों भागीदारी निभाई। श्रीमाली ने बताया कि विगत चुनावों में 55  प्रतिशत महिलाएं चुनकर आई थी जबकि इस बार इस से अधिक  महिलाओं की भागीदारी द्वारा स्थानीय स्वशासन में क्षेत्र को मजबूती देना कार्यक्रम का उद्देश्य था।
महिलाओं ने अपने हाथ उठाकर आगामी चुनावों में खड़े होने, प्रस्तावक बनने आदि हेतु हुंकार भरी। घर से लेकर  पंचायत चलाने तक के अपने सामर्थ्य  और भ्रष्टाचार मुक्त विकास सपने को परवाज़ दिया। सम्मेलन में महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए स्वीप अभियान के तहत प्रेरणा गीत, फिल्म आदि का भी विमोचन ग्रामीण महिलाओं द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए रेलमगरा प्रधान रेखा अहीर ने महिलाओं से मुखातिब होते हुए कहा कि  अगर महिलाएं चुनावों में चुनकर आती हैं  तो वे स्थानीय मुद्दों को अच्छे से समझ सकती हैं। स्वीप अभियान  द्वारा महिलाओं को  जागरूक करने की भी प्रशंसा की.
आस्था संस्थान के अश्विनी पालीवाल ने कार्यक्रम में इतनी अधिक महिलाओं की भागीदारी पर सबका धन्यवाद  प्रकट करते हुए कहा कि पांच साल पहले जब महिलाएं किसी कार्यक्रम में आती थीं तो उनके घर के पुरुष सदस्य  साथ होते थे, किन्तु आज कार्यक्रम  में महिलाओं का अकेले आना एक बड़ी उपलब्धि रहा।  उन्होंने कहा कि  यह साबित करता है  कि  महिलाएं  समाज  को  नेतृत्व  देने  में  सक्षम है, बशर्ते पुरुष उन्हें आगे आने हेतु स्पेस दे। थुरावड प्रकरण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भविष्य में पंचायत चुनावों  महिलाएं अधिक संख्या में जीतकर आएँगी तो  जाति-पंचों के फरमानों को ख़त्म करने में उल्लेखनीय सफलता मिल सकेगी.
जतन संस्थान के गोवर्धन सिंह ने कई महिला जन प्रतिनिधियों के उदाहरण देते हुए कहा कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों में अधिक विकास हुआ है।
सम्मेलन को बिछीवाड़ा, सीमलवाडा, रेवदर, आबू रोड, राजसमन्द, रेलमगरा, कुम्भलगढ़ तथा  खमनोर ब्लॉक से आई विभिन्न महिला जन-प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव सुनाये। केलवाड़ा पंचायत से आई वार्ड पंच पार्वती बाई मेघवाल ने बताया कि उनके क्षेत्र में एक प्रभावी व्यक्ति के अतिक्रमण हटाने को लेकर उन्हें धमकियां तक मिली।  किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और अतिक्रमण हटा कर ही दम लिया ।
क्यारियाँ (आबू रोड) की युवा सरपंच नवली गरासिया ने अपनी पंचायत  को आदर्श बनाने और उसके कार्यों को बताने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाने की बात बताइ. वर्धनी पुरोहित (ओडा रेलमगरा ), मांगी बाई (पछमता रेलमगरा), चुन्नी बाई (गुंजोल राजसमन्द )  ने भी अपने अनुभव सुनाये। कार्यक्रम में मंजू खटीक, सुमित्रा मेनारिया, धनिष्ठा, तारा बेगम, ओमप्रकाश आदि ने भी सम्बोधित किया।
सम्मेलन में जतनआस्थाजनशिक्षा एवं विकास संगठनजन चेतनासारद संस्थान आदि संगठनों की भागीदारी रही।

मेहनतकश जनता का कत्लेआम, पर केसरिया कारपोरेट राष्ट्र के एजंडे सबसे टाप पर

श्रमसुधारों को संसद की मंजूरी

बाबासाहेब ने संविधान रचा है, बार-बार इस जुगाली के साथ जयभीम, नमोबुद्धाय और जयमूलनिवासी कहने वाले तबके के लोगों को मालूम है ही नहीं कि उस संविधान को कैसे खत्म किया जा रहा है और उसी संविधान को हमारी संसद और हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों के जरिये पूना समझौते की अवैध संतानें कैसे-कैसे मनुस्मृति में बदल लगी हैं।

विपक्ष के कड़े विरोध के बावजूद लोकसभा में शुक्रवार को श्रम विधि संशोधन विधेयक 2014 के पारित होने के साथ ही इसे संसद की मंजूरी मिल गई। अब सिर्फ राष्ट्रपति का दस्तखत नये कानून को अमल में लाने के लिए बाकी है, जो कहना न होगा, महज औपचारिकता मात्र है।

मेहनतकश जनता का कत्लेआम केसरिया कारपोरेट राष्ट्र के एजंडे पर सबसे टाप पर, इसीलिए लोकसभा में श्रम कानूनों में सशोधन को हरी झंडी! संगठित और असंगठित मजदूरों में इन संशोधनों के बाद भारी समानता हो जायेगी, अच्छी बात यह है। अब मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स अधिनियम 1961, अंतर राज्यीय प्रवासी मजदूर (रोजगार और सेवा शर्तों का विनियमन) अधिनियम 1976, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 आदि सहित सात नए कानून बन गए।

सरकार ने हाल ही में ‘श्रमेव जयते‘ का नारा देकर श्रम कानूनों को सरल बनाने और इंस्पेक्टर राज को खत्म करने की बात कही थी।

जाहिर है कि मालिकान जब बहीखाता रखने को मजबूर न होंगे और किसी को कोई लेखा जोखा रिकार्ड दिखाने को बाध्य नहीं किये जा सकेंगे, लेबर कमीशन और ट्रेड यूनियन के अधिकार भी खत्म हैं।

अयंकाली, नारायणराव लोखंडे और बाबासाहेब की विरासतें भी खत्म हैं और खत्म है शिकागो में खून से लिखी गयीं मजदूर दिवस की इबारतें।

पूरा देश अब आईटी उद्योग है और आउटसोर्सिंग है।

अमेरिका हो गये हैं हम।

न काम के घंटे तय हैं और न पगार तय है। भविष्य में न वेतनमान होंगे न होंगे भत्ते। न होंगे पीएफ और न ग्रेच्युटि। श्रम को भी संघ परिवार ने विनियंत्रित कर दिया जैसे कृषि को कर दिया है और कारोबार को कर रहे हैं एफडीआई और ईटेलिंग मार्फत।

न किसान गोलबंद है, न मेहनतकश जनता। न कारोबरी गोलबंद हैं और न कर्मचारी।

झंडे छोड़कर सभी मिलकर इस स्थाई बंदोबस्त के खिलाफ खड़े होंगे, इसके आसार भी नहीं है।

बिना लड़े लड़ाई की खुशफहमी में जीते हुए अपने किले हार रहे हैं हम।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति ने हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित तीन श्रम संबंधी केंद्रीय कानूनों में बदलाव को मंजूरी दे दी जिससे अब राज्य में संशोधित श्रम कानून लागू होंगे।

कारपोरेट खेमे की युक्ति है कि ऐसा लगता है मानो हम देश के किसी कोने में श्रम कानून में हुए मामूली से मामूली बदलाव पर भी खुशी मनाने को तैयार बैठे हैं जबकि जरूरत यह है कि इन कानूनों में देशव्यापी बदलाव हों।

संसद में श्रम कानूनों में संसोधन इसी कारपोरेट लाबिइंग की लहलहाती फसल है जिसक जहर अब हमारी जिंदगी है।

राजस्थान में जो बदलाव किए गए हैं उनमें सबसे अहम यह है कि अगर किसी कंपनी में 300 से कम कर्मचारी हैं तो उसे कर्मचारियों की छंटनी करने अथवा किसी उद्यम को बंद करने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं होगी।

पहले इसकी सीमा 100 कर्मचारियों की थी। हालांकि दिलासा यह दिलाया जा रहा है कि अगर किसी कंपनी को यह सुविधा हासिल हो कि वह जरूरत के मुताबिक छंटनी कर सकती है तो उसके नए लोगों को भर्ती करने की संभावना भी बढ़ जाती है। ताजा नौकरियों, नियुक्तियों और भर्तियों का हाल क्या बयान करने की जरूरत है।

बाबासाहेब ने बाहैसियत ब्रिटिश सरकार के श्रम मंत्री और बाद में संविधान रचयिता बतौर मेहनतकश जनाते के लिए जो उत्पादन प्रणाली में जाति धर्म लिंग नस्ल भाषा क्षेत्र निर्विशेष जो श्रम कानून बना दिये, एक ओबीसी समुदाय के नेता को देश की बागडोर सौंपकर संघपरिवार उसे खत्म करते हुए विदेशी पूंजी का मनुस्मृति शासन लागू कर रहा है। वैदिकी सभ्यता का पुनरूत्थान हो रहा है नवनाजी जायनी कायाकल्प के साथ, जिसमें वर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणों की भी शामत आने वाली है कारपोरेट निरंकुश आवारा पूंजी के राज के लिए,करोड़पति अरबपति के नये वर्ण श्रेष्ठ वर्ण के लिए, नये भूदेवताओं के लिए।

संघ परिवार की रणनीति के तहत अब बहुजन समाज एक दिवास्वप्न है क्योंकि बहुसंख्य ओबीसी समुदाय के लोग ही संघ परिवार के सबसे बड़े सिपाहसालार हैं केंद्र और राज्यों में और सारे क्षत्रप गरजते रहते हैं, बरसते कभी नहीं, कभी नहीं और किसी बंधुआ मजदूर से बेहतर न उनकी हैसियत है और न औकात है।

शिक्षा, चिकित्सा, आजीविका, जल जंगल हवा जमीन पर्यावरण नागरिकता से लेकर खाद्य के अधिकार असंवैधानिक तौर तरीके से कारपरेट लाबिइंग के तहत खत्म किये जा रहे हैं एक के बाद एक। दुनिया भर में तेल की कीमतें कम हो रही हैं और भारत में सत्ता वर्ग ने तेल की कीमतें बाजार के हवाले कर दी हैं।

अब विदेशी पूंजी के हित में, विदेशी हित में निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेश, प्रत्यक्ष निवेश, छंटनी, लाक आउट, बिक्री के थोक अवसरों के लिए तमाम श्रम कानून बदले जा रहे हैं और खबरों में कानून बदले जाने के वक्त कभी सकारात्मक पक्ष को हाईलाइट करने के अलावा उसके ब्यौरे या उसके असली एजेंडे का खुलासा होता ही नहीं है।

हमारे लोगो को मालूम ही नहीं चला कि बाबासाहेब ने भारतीय महिलाओं और मेहनतकश जनता की सुरक्षा के लिए जो शर्म कानून बनाये उसे खत्म करने के लिए देश के सभी क्षेत्रों से चुने हुए करोड़पति अरबपति जनप्रतिनिधियों ने हरी झंडी दे दी है।

मेहनकशों के जो झंडेवरदार हैं जुबानी जमाखर्च के अलावा सड़क पर उतरकर विरोध तक दर्ज कराने की औकात तक उनकी नहीं है और जो अंबेडकरी एटीएम से हैसियतों के हाथीदांत महल के वाशिंदे अस्मिता दुकानदार हैं, उन्हें तो संविधान दिवस मनाने की भी हिम्मत नहीं होती।

बाबासाहेब ने संविधान रचा है, बार-बार इस जुगाली के साथ जयभीम, नमोबुद्धाय और जयमूलनिवासी कहने वाले तबके के लोगों को मालूम है ही नहीं कि उस संविधान को कैसे खत्म किया जा रहा है और उसी संविधान को हमारी संसद और हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों के जरिये पूना समझौते की अवैध संतानें कैसे-कैसे मनुस्मृति में बदल लगी हैं।

इसी वास्ते जनजागरण के लिए हमने देशभर में संविधान दिवस को लोकपर्व बनाने की अपील की थी। महाराष्ट्र में तो भाजपा सरकार ने ही संविधान दिवस का शासकीय आयोजन किया था, लेकिन भीमशक्ति को संविधान दिवस तक मनाने की फुरसत नहीं हुई तो बाबासाहेब की विरासत बचाने के लिए उनसे क्या अपेक्षा रखी जा सकती है।

रंग बिरंगे झंडो में बंटे हुए हैं इस देश के लोग और एक दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंद है इस देश के लोग। सड़क से संसद तक इसीलिए कत्लेआम के खिलाफ सन्नाटा है और मौत के सौदागरों की महफिल में तवायफ को रोल निभा रहे हैं हम लोग।

अपनी फिजां को कयामत बना रहे हैं हमी लोग ही।

गौर तलब है कि लोकसभा में शुक्रवार को श्रम कानून संशोधित बिल, 2011 पास कर दिया गया। यह बिल 1988 के वास्तविक श्रम कानून में कुछ बदलावों के साथ पास किया गया। नए संशोधित बिल में छोटी यूनिट्स को रिटर्न फाइल करने, रजिस्टर मेंटेन करने जैसे काम में छूट दी गई है। साथ ही 7 नए एक्ट भी शामिल किए गए हैं।

असली मामला इन नये सात कानूनों का है जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और निजीकरण का खुल्ला खेल फर्रुखाबादी है और जो परदे के पीछे खेला जा रहा है।

असली मजा तो यह है कि देशभक्त संघ परिवार अब भी स्वदेशी का अलख जगाकर विदेशी पूंजी और एफडीआई का कारपरेट राज चला रहा है और प्रचार यह दिखाने के लिए, हिंदुत्व की पैदल फौजों को काबू में रखने के लिए कि केंद्र की मोदी सरकार आर्थिक सुधारों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐतराज को दरकिनार कर आगे बढ़ने की तैयारी में है। श्रम कानून में सुधार संबंधी बिल संसद से पास कराकर सरकार ने अपना पहला कदम बढ़ा भी दिया है।

खेल यह है मनुस्मृति कारपोरेट राजकाज और राजकरण का कि आर्थिक सुधार के लगभग 6 मुद्दों पर अपनी आपत्ति जताने के बाद संघ ने निर्णय का अधिकार सरकार के विवेक पर छोड़ दिया है। मजा यह भी कि संघ के विभिन्न संगठनों ने बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने, श्रम कानून में सुधार, रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश, जीएम फसलों के ट्रायल जैसे मुद्दों पर अपनी आपत्ति जताई थी।

हालांकि सरकार ने आर्थिक सुधारों के मामले में तेजी से आगे बढ़ने का फैसला किया है।

O- पलाश विश्वास

विस्थापितों को पुनर्वास का इंतजार

पिछले दो दशकों से झेलम, सतलज, गंगा, घाघरा, शारदा, गोमती, गंडक एवं ब्रह्मपुत्र आदि नदियों में होने वाले कटान हज़ारों गांवों पर कहर बरपा रही है, जिसके चलते बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर और नदी पर निर्भर आजीविका छोड़कर दूसरे गांव-शहर पलायन करना पड़ा. कटान की समस्या पिछले बीस-बाइस बरसों में और गंभीर हुई है. भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल एवं बांग्लादेश में भी बड़ी संख्या में लोग नदियों के कटान से उपजी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. बड़े-बड़े बांध एवं चेक डैम के निर्माण ने कटान की समस्या बढ़ा दी है. बांधों के चलते नदियों की अविरल एवं निर्मल प्राकृतिक धारा के प्रवाह में रुकावट पैदा हुई है. कटान ने न स़िर्फ लोगों को विस्थापित किया, बल्कि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आजीविका के परंपरागत साधनों से भी दूर किया. बड़े पैमाने पर विस्थापन ने न स़िर्फ उनके अस्तित्व, बल्कि उनकी नागरिकता की पहचान का भी संकट खड़ा किया. पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर के गांव सेमरा एवं शिवराय का पुरा के कटान पीड़ित 558 विस्थापित परिवारों के माध्यम से यहां लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, सीतापुर, गोंडा, बहराइच, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, पडरौना, महाराजगंज, बलिया, आजमगढ़, मऊ एवं संत कबीर नगर आदि ज़िलों और देश के अन्य राज्यों के कटान पीड़ितों के विस्थापन व पुनर्वास की समस्या समझने की कोशिश की जा रही है.

सेमरा एवं शिवराय का पुरा गांव के 558 परिवार पिछले ढाई वर्षों से सड़क के किनारे, मुहम्मदाबाद स्थित प्राथमिक-उच्च प्राथमिक विद्यालय एवं यूसुफपुर स्थित मंडी समिति में बंजारों जैसा जीवन गुज़ार रहे हैं. कटान की स्थिति का मौक़ा-मुआयना करने बड़े-बड़े नेता और अधिकारी सेमरा गांव आ चुके हैं. इनमें वर्तमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह, कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राजीव राय, भाकपा (माले) के ईश्‍वरी प्रसाद कुशवाहा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व सांसद एवं भारतीय खेत-मज़दूर यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विश्‍वनाथ शास्त्री, इंसाफ़वादी समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष फरीद अहमद ग़ाज़ी, कृषि भूमि बचाव मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष राघवेंद्र कुमार, पूर्व सांसद नीरज शेखर, वर्तमान सांसद भरत सिंह, पूर्व विधायक राजेंद्र यादव, वर्तमान रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा आदि शामिल हैं. इतने कद्दावर नेताओं के आश्‍वासनों के बावजूद कटान पीड़ितों की सुनवाई आज तक दूर की कौड़ी बनी हुई है.

कटान की पीड़ा झेल रहे परिवारों अगर कोई राहत पहुंचा रहा है, तो उस शख्स का नाम है, प्रेमनाथ गुप्ता. यह प्रेमनाथ के गांव बचाव आंदोलन का ही नतीजा है कि अब कटान विस्थापित धारा 52 के प्रकाशन की मांग कर रहे हैं. बीते 20 अक्टूबर को एसडीएम मुहम्मदाबाद की तरफ़ से एक बार फिर कहा गया है कि दहेंदु, बालापुर या जकरौली आदि गांवों में कहीं न कहीं ग्राम समाज की ज़मीन चिन्हित कर ली जाएगी, तभी विस्थापित परिवारों को आवासीय भूमि का आवंटन संभव हो सकेगा. दूसरी ओर गांव बचाव आंदोलन के कुछ सदस्य अपना भविष्य किसी दूसरे गांव की बजाय शेरपुर ग्राम पंचायत के किसी गांव में ही देख रहे हैं. उनका मानना है कि यदि धारा 52 का प्रकाशन हो जाए, तो उन्हें सेमरा या नज़दीकी किसी अन्य गांव में रहने को जगह ज़रूर मिल जाएगी. ऐसे में उन्हें अपने गांव से बिछड़ने का ग़म नहीं होगा और न सांस्कृतिक विक्षोभ और आजीविका छिन जाने का दु:ख. विस्थापित परिवारों का कहना है कि यदि शेरपुर ग्राम पंचायत के संपन्न लोग चाह लें, उन्हें (जिनमें ज़्यादातर दलित और पिछड़े वर्ग के लोग हैं) गांव में बसने योग्य ज़मीन मा़ैके पर निकल आएगी.

कटान पीड़ितों में ऐसे भी लोग हैं, जो पुनर्वास की समस्या को भूमि के रूप में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन पर नियंत्रण के रूप में देखते-समझते हैं. शिवकुमार एवं श्रीनारायण सरीखे लोगों को लगता है कि यदि वे गांव में बस जाएंगे, तो वहां उपलब्ध ज़मीनों पर नियंत्रण में उनकी भी हिस्सेदारी सुनिश्‍चित होने लगेगी. अफ़सोस की बात यह है कि देश और समाज के ज़िम्मेदार लोगों के पास कटान पीड़ितों की पीड़ा पर विचार करने और उन्हें राहत पहुंचाने के लिए समय नहीं हैं. प्रेमनाथ का गांव बचाव आंदोलन हर दूसरे दिन अपनी गतिविधियों से अख़बारों की सुर्खियां बनता है. गांव बचाओ आंदोलन एवं मीडिया के माध्यम से वह ज़िला और मंडल स्तर की पैरवी के अलावा राज्य के मुख्यमंत्री के साथ-साथ दर्जनों मंत्रियों को कटान पीड़ितों की समस्या से अवगत करा चुके हैं. वह केंद्रीय जल संसाधन एवं गंगा पुनर्जीवन मंत्री, रेल राज्य मंत्री के अलावा प्रधानमंत्री को भी पत्र लिख चुके हैं. उनके पत्रों के सहानुभूतिपूर्ण जवाब भी आए हैं.

कटान पीड़ितों के पुनर्वास के लिए मनोज कुमार राय, प्रेमनाथ गुप्ता एवं अन्य दो बनाम उत्तर प्रदेश राज्य नाम से एक पीआईएल (नं0-47610/2014) भी डाली गई, जिसकी सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दिलीप गुप्ता एवं पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने बीते 10 अक्टूबर को ज़िलाधिकारी ग़ाज़ीपुर को दो माह के अंदर कटान पीड़ितों की समस्याओं का निपटारा करने का निर्देश दिया है. गांव बचाओ आंदोलन का ध्यान इस समय पूरी तरह ग्राम पंचायत शेरपुर में धारा 52 के प्रकाशन पर केंद्रित है. क़ाबिले जिक्र है कि शेरपुर के ग्रामीणों ने 18 अगस्त, 1942 को गांधी जी के करो या मरो के नारे पर एक साथ 11 शहादतें दी थीं. इस ग्राम पंचायत के एक पुरवा शिवराय का पुरा का संपूर्ण और सेमरा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा नदी के कटान में विलीन हो चुका है. शेष बचे गांव को बचाने एवं बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास का अब तक कोई प्रयास सफल नहीं हुआ, जबकि विस्थापितों के पुनर्वास के लिए भूमि खरीद कर नि:शुल्क आवंटन कराए जाने के संबंध में उत्तर प्रदेश शासन की ओर से सभी मंडलायुक्तों एवं ज़िलाधिकारियों को निर्देश दिए जा चुके हैं (देखें शासनादेश संख्या-2010/1-10-12-33(37)/12, टीसी).

प्रेमनाथ कहते हैं कि इस ऐतिहासिक गांव में आज भी ग्राम समाज की सैकड़ों एकड़ ज़मीन पड़ी हुई है, जिसे साधन संपन्न एवं दबंग लोगों ने कब्जा रखा है. उन्होंने उक्त ज़मीनों पर अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए धारा 52 का प्रकाशन बरसों से प्रभावित कर रखा है. भूमि सुधार एवं चकबंदी के विशेष जानकार लखनऊ निवासी जगत नारायण बताते हैं कि जब देश में भूमि सुधार लागू हुआ, तो जमींदारों ने अपनी ज़मीनें तकनीकी रूप न स़िर्फ अपने नाबालिग बच्चों, बल्कि गाय-भैंस और कुत्तों-बिल्लियों तक के नाम कर दीं, ताकि ज़मीनों पर उनका कब्जा बना रहे और वे उन पर होने वाली खेती का लाभ बदस्तूर उठाते रहें. किसी भी ग्राम सभा में भूमि के छोटे या बड़े टुकड़े यानी चक की उपलब्धता का प्रमाणन इस बात से होता है कि वहां धारा 52 का प्रकाशन हुआ है या नहीं. रा़ेजगार हक़ अभियान के अजय शर्मा कहते हैं कि देश में लगभग 90 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में धारा 52 का प्रकाशन हो चुका है, लेकिन उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में चकबंदी विभाग इस काम में बहुत पीछे है.

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े ज़िले लखीमपुर खीरी के फूल बेहड़ ब्लॉक स्थित बेड़हा सुतिया गांव (जंगल नंबर एक) के सैकड़ों कटान पीड़ित परिवार पिछले बीस-बाइस वर्षों से नदी के पास सड़क के दोनों ओर झुग्गी-झोंपड़ी में रहने के लिए मजबूर हैं. उनके पुनर्वास की मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी है. विडंबना देखिए, सरकार कॉरपोरेट घरानों के लिए विशेष आर्थिक जोन (सेज) को मूर्त रूप देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां बनाती हैं, लेकिन बाढ़ या कटान जैसी आपदा से होने वाला विस्थापन कम करने और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए उसके पास कोई ठोस नीति नहीं है. ज़रूरत इस बात की है कि सेमरा जैसे तमाम गांव, जहां पर दैवीय आपदा एवं मानव हस्तक्षेप जनित विस्थापन की समस्या है, वहां के विस्थापितों के लिए सरकार एक ठोस राहत एवं पुनर्वास नीति बनाए. ऐसा नीतिगत क़दम उठाए, जिससे भूमि एवं नदी जल संसाधन के अमानवीय दोहन पर रोक लगे. तभी बाढ़ और कटान की समस्या का उचित समाधान हो सकेगा.
चौथी दुनिया

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टेरर कॉरिडोर बनाने की तैयारी..!


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उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, पश्‍चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच आतंकी गलियारा बनाने की कोशिशें चल रही हैं. उत्तर प्रदेश के बिजनौर और पश्‍चिम बंगाल के बर्धमान ज़िले में हुए विस्फोटों के तार किस तरह उत्तर प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल एवं बांग्लादेश से जुड़े हुए थे, उसका जैसे-जैसे खुलासा हो रहा है, वैसे-वैसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं. जिस तरह दक्षिणी राज्यों से उत्तरी राज्यों और नेपाल को मिलाकर माओवादी-कॉरीडोर बनाने में नक्सली संगठन लगभग कामयाब हुए, ठीक उसी तरह उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्‍चिम बंगाल और बांग्लादेश को मिलाकर कम्युनल-कॉरीडोर बनाने की कोशिश तेज गति से चल रही है. दो दशकों से भी अधिक समय से फरार कुख्यात आतंकी सलीम पतला के मुजफ्फरनगर में पकड़े जाने के बाद इस खुलासे पर आधिकारिक मुहर लग गई. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के समक्ष अब यह साफ़ हो गया कि बिजनौर विस्फोट, बर्धमान विस्फोट और मध्य प्रदेश की खंडवा जेल से हुई आतंकियों की फरारी की कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं.
21 सालों से फरार चल रहे कुख्यात आतंकी सलीम पतला को पिछले दिनों मुजफ्फरनगर में खतौली पुलिस और एटीएस की टीम ने पकड़ा. सलीम पर 1992 में मेरठ के नौचंदी ग्राउंड और 1993 में हापुड़ रोड पर पशु चिकित्सालय के पास पीएसी कैंप पर बमों से हमला करने का आरोप है. सलीम देश भर में घूम-घूमकर इंडियन मुजाहिदीन के लिए काम कर रहा था और उसने मुरादाबाद को छिपने का अड्डा बना रखा था. पीएसी कैंप पर हमले के बाद सलीम के छह साथी तो गिरफ्तार हो गए थे, लेकिन वह पकड़ से बाहर था. पीएसी कैंप पर उक्त हमले में कई जवान शहीद हुए थे और कुछ गंभीर रूप से घायल हो गए थे. सलीम मेरठ के लिसाड़ी गेट का रहने वाला है. मुजफ्फर नगर दंगे के बाद उत्तर प्रदेश और खास तौर पर पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश आतंकियों की सक्रिय गतिविधियों का केंद्र बन गया है. लश्कर के आतंकी सुभान एवं उसके कुछ साथियों के पकड़े जाने के बाद सलीम की गिरफ्तारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है. सुभान हरियाणा के मेवात मॉड्यूल के तहत काम करता था. उसी ने शामली और मुजफ्फर नगर के राहत शिविरों का दौरा करके दंगा पीड़ितों को भड़काने और बरगलाने की कोशिश की थी.
खुफिया एजेंसियों के समक्ष आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि हो चुकी है कि अलकायदा जैसे संगठन शामली, मुजफ्फर नगर, सहारनपुर, मेरठ एवं मुरादाबाद के दंगों का हवाला देकर युवकों को आतंकी बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. सलीम की गिरफ्तारी के बाद यह खुलासा हुआ कि वह उत्तर प्रदेश के क़रीब-क़रीब सभी संवेदनशील जनपदों में इंडियन मुजाहिदीन और सिमी का नेटवर्क खड़ा कर रहा था. उसके गुर्गे किसी भी शहर में दंगा कराने में माहिर हैं. सलीम बांग्लादेश के दुर्दांत आतंकी संगठन हूजी से गोला-बारूद लेता था. आतंकियों के लिए हथियारों का भी वह बड़ा सप्लायर रहा है. सलीम पतला, सलीम मोटा और जब्बार वे तीन नाम थे, जो 27 जनवरी, 1993 को मेरठ पीएसी बम कांड के बाद सामने आए थे. उनमें से सलीम पतला अब तक फरार था. खुफिया एजेंसियों को मिली जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेश के दुर्दांत आतंकी संगठन हूजी से सलीम के गहरे रिश्ते हैं. हूजी ही सलीम को गोला-बारूद और असलहे उपलब्ध कराता था.
आतंकियों की मदद के लिए सलीम पतला चोरी की गाड़ियां कश्मीर सप्लाई करने का काम भी कर रहा था. उसने 25 से अधिक ऑडी, डस्टर, फॉर्च्यूनर एवं इनोवा जैसी गाड़ियां कश्मीर भेजी थीं. उसने जम्मू-कश्मीर में मोटर गैराज भी खोल रखा था. खुफिया एजेंसी बताती है कि सलीम पतला आतंकी संगठन अलबर्क तंजीम का भी सदस्य रहा है. पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के ही बिजनौर में क़रीब एक महीने पहले हुए धमाकों से भी सलीम के तार जुड़े हैं. बिजनौर धमाकों के बाद आतंकियों के कमरे से जो सिम बरामद हुए थे, उन्हीं के आधार पर जांच को आगे बढ़ाते हुए एटीएस सलीम पतला तक पहुंची. मध्य प्रदेश की खंडवा जेल से फरार हुए आतंकी बिजनौर में ही आकर छिपे थे. इन आतंकियों की कोशिश थी कि पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश आतंकी गतिविधियों का केंद्र बने. इसके लिए आतंकियों ने मेरठ को मुख्य संपर्क क्षेत्र बना रखा था. बिजनौर में रहकर सिलेंडर बम तैयार करने वाले चार आतंकी मेरठ में पीएल शर्मा रोड आकर लैपटॉप खरीद कर ले गए थे. बिजनौर में उपचुनाव के ऐन पहले सिलेंडर से ब्लास्ट हो गया और आतंकी फरार हो गए.
इसके बाद ही खुलासा हुआ कि वे मेरठ आए थे. मेरठ के पूर्वा फैय्याज अली मोहल्ले के निवासी आसिफ अली की आतंकी गतिविधियों के बारे में दिसंबर 2013 में ही खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिल चुकी थी, लेकिन उसे इस साल 17 अगस्त को गिरफ्तार किया जा सका. उसकी गिरफ्तारी से पहले ही यह खुलासा हो गया था कि आसिफ इंडियन मुजाहिदीन के साथ-साथ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए भी काम करता है. आईएसआई के लिए जासूसी करने में कोलकाता में पकड़े गए भारतीय सेना के पूर्व जूनियर कमीशंड अफसर मदन मोहन पाल और पीके पोद्दार के आसिफ से गहरे रिश्ते थे. आईएसआई इन गद्दारों के खाते में आसिफ के जरिये ही पैसे डलवाती थी. बिहार के बोधगया में हुए सिलसिलेवार धमाकों में इस्तेमाल हुए सिलेंडर बम भी मेरठ में बनाए गए थे.
बिजनौर, बर्धमान एवं बोधगया धमाकों के आपस में जुड़े हुए तार आतंकी कॉरीडोर की स्थापना के प्रयासों की पुष्टि करते हैं. इसमें बांग्लादेश को जोड़ने के लिए कड़ी का काम कर रहा था आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेयूएम-बी) का कमांडर शेख रहमहतुल्ला उर्फ साजिद. बर्धमान ज़िले के खागरागढ़ में हुए विस्फोट मामले में कोलकाता पुलिस ने साजिद को गिरफ्तार किया है. एनआईए ने इस आतंकी पर 10 लाख रुपये का ईनाम रखा था. साजिद बांग्लादेश के एक रिटायर्ड सेनाधिकारी का बेटा है. साजिद के बांग्लादेशी आतंकी संगठन मजलिसे सूरा से भी संबंध हैं. साजिद ही बर्धमान मॉड्यूल चला रहा था. उसने धमाके में शामिल आतंकी कौशर को उत्तर प्रदेश के इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों से संपर्क रखने के लिए लाखों रुपये दिए थे. असम के बरपेटा में रहने वाला एक डॉक्टर भी आतंकी लिंक स्थापित करने के लिए फंडिंग की व्यवस्था करता था. डॉक्टर शाहनूर तो पकड़ा नहीं गया, पर उसकी पत्नी सुजाना बेगम को गिरफ्तार कर लिया गया है.
बिजनौर, बोधगया एवं बर्धमान धमाकों के लिंक खंगालने में लगी खुफिया एजेंसियों को यह पता लगा कि भारत में इंडियन मुजाहिदीन को सक्रिय करने में बांग्लादेशी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेयूएम-बी) लगा हुआ है और उसका इरादा आईएसआई की मदद से कराची से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्‍चिम बंगाल होते हुए ढाका तक एक ताकतवर आतंकी गलियारा स्थापित करना है. इस काम में राजनीतिज्ञों के अलावा मीडियाकर्मी भी आतंकियों का साथ दे रहे हैं और उन्हें संरक्षण देने का काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश और पश्‍चिम बंगाल के कुछ राजनीतिज्ञों एवं पत्रकारों के नाम खुफिया एजेंसियों के हाथ आ चुके हैं, जिन पर निगरानी रखी जा रही है और अंदरूनी तौर पर पूछताछ भी की जा रही है. अभी हाल में नेपाल सीमा पर एनआईए के हाथों पकड़े गए यूसुफ शेख से भी इन साजिशों का खुलासा हुआ है. यूसुफ शेख शिमुलिया मदरसा का संस्थापक है. इस मदरसे को एनआईए ने अपनी रिपोर्ट में जेहादी तैयार करने का कारखाना कहा है.
पश्‍चिम बंगाल के बर्धमान के जिस मकान में विस्फोट हुआ, वहां आईएम का स्लीपर सेल और जेयूएम-बी के सदस्य मिलकर देश भर में आतंकी गतिविधियां चलाने के लिए षड्यंत्र रच रहे थे. ठीक उसी तरह, जैसे उत्तर प्रदेश के बिजनौर में छिपकर बड़े पैमाने पर सिलेंडर बम बनाने का काम किया जा रहा था. बर्धमान में भी बम बनाते समय विस्फोट हो जाने से आतंकी शकील अहमद एवं शोभन मंडल की मौत हो गई थी और जख्मी हुए तीसरे आतंकी हसन साहब उर्फ अब्दुल हाकिम को अस्पताल में भर्ती कराया गया था. विस्फोट के बाद दो महिलाओं समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें विस्फोट में मारे गए शकील अहमद की पत्नी रजीरा बीबी और हसन साहब उर्फ अब्दुल हाकिम की पत्नी अमीना बीबी शामिल हैं. ठीक उसी तरह बिजनौर में भी बम बनाते समय धमाका हुआ था और उसमें जख्मी हुए आतंकी महबूब को उसके साथी स्थानीय डॉक्टर शमीम के पास ले गए थे, लेकिन 70 फ़ीसद से अधिक जले होने के कारण आतंकी उसे वापस लेकर चले गए.
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि उस आतंकी की मौत हो गई, लेकिन उसकी लाश बरामद नहीं हो सकी. बिजनौर प्रकरण में भी एक महिला पकड़ी गई थी. बर्धमान विस्फोट कांड की तरह बिजनौर में भी धमाके के बाद मा़ैके से 9-एमएम की पिस्टल, लैपटॉप, कई छोटे सिलेंडर, मोबाइल सेट, सिम कार्ड, बम बनाने की सामग्री और तीन आईडी बरामद किए गए थे. बिजनौर में एक दर्जी की दुकान से भी बम बनाने का सामान और विस्फोटक बड़ी तादाद में बरामद हुआ था. बर्धमान, बिजनौर एवं बोधगया बम कांड को जोड़ते हुए एनआईए ने झारखंड के जमशेदपुर स्थित आज़ाद नगर के रोड नंबर 12 पर एक घर से शीश महमूद को गिरफ्तार किया था. वह जेयूएम-बी का एरिया कमांडर था. महमूद के नेतृत्व में जेयूएम-बी ने बांग्लादेश में तीन सौ स्थानों पर बम प्लांट किए थे, जिनमें से स़िर्फ एक स्थान पर वे बम विस्फोट करा पाए. शेष बम बांग्लादेश की सेना एवं पुलिस ने बरामद कर लिए थे. बांग्लादेश में दबाव बढ़ने पर महमूद अपने कई साथियों के साथ भारत भाग आया. बर्धमान, बिजनौर एवं बोधगया विस्फोट की जांच में ही पश्‍चिम बंगाल, बिहार एवं उत्तर प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों में इनके नेटवर्क के फैलाव का खुलासा हुआ. असम, मध्य प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर एवं महाराष्ट्र में भी इनका तगड़ा नेटवर्क है. दक्षिण भारत में भी इंडियन मुजाहिदीन का नेटवर्क बेहद मजबूत है. एनआईए के एक अधिकारी ने कहा कि केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु में इनके सदस्य बड़ी संख्या में हैं. केरल और कर्नाटक में इंडियन मुजाहिदीन का बड़ा आधार है.


बस्ती में छिपा था बर्धमान कांड का षड्यंत्रकारीउत्तर प्रदेश से पश्‍चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश तक आतंकी गलियारा बनाने की कोशिशों की आधिकारिक सूचनाओं में एक और पुख्ता प्रमाण यह जुड़ गया कि पश्‍चिम बंगाल के बर्धमान में हुए धमाके में विस्फोटक एवं अन्य सामग्री मुहैया कराने वाला बांग्लादेशी आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (जेयूएम-बी) का कमांडर अमजद शेख उर्फ काजल फरारी के दौरान उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में छिपा था. शेख पर भी एनआईए ने दस लाख रुपये का ईनाम घोषित कर रखा था. एक और सनसनीखेज खुलासा यह हुआ कि सीमा सुरक्षा बल (एसएसबी) के एक जवान ने उसे बस्ती में छिपाकर रखा था. एनआईए ने उक्त एसएसबी जवान को हिरासत में ले लिया है. बर्धमान विस्फोट के बाद अमजद बीते आठ अक्टूबर को दिल्ली आ गया था. यहां से वह उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में पहुंचा और उसने एसएसबी के अपने उक्त पूर्व परिचित जवान से संपर्क किया तथा उसी जवान की मदद से वह बस्ती में छिपा रहा.

सलीम पतला से जुड़े थे कुछ नेता और मीडियाकर्मी पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में दहशत का ख़तरनाक जाल बुनने में लगे रहे आतंकी सलीम पतला से मीडियाकर्मियों के घनिष्ठ संबंधों का खुलासा हुआ है. चार कद्दावर स्थानीय नेता भी सलीम के संरक्षक थे. आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने जो डायरी बरामद की है, उससे यह जानकारी सामने आई. सलीम के इससे पहले गिरफ्तार होने पर यही मीडियाकर्मी और नेता उसे पुलिस से छुड़ाकर ले गए थे. संदेह के घेरे में आए मीडियाकर्मियों एवं नेताओं पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है.
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श्रीनगर की बाढ़ मोदी के लिए वरदान


कश्मीर में आई बाढ़ ने घाटी में काफी कुछ बदल कर रख दिया है. इस बाढ़ ने तबाही तो खूब मचाई, जिसका असर आगामी विधानसभा चुनाव पर भी दिखाई देने लगा है. कश्मीर में एक बड़ा बदलाव आया है, वह है सोच का. इस बाढ़ में मुश्किलों का सामना कर बाहर निकले स्थानीय लोगों की सोच में दो तरह के महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए. पहला, लोगों के सेना विरोधी नज़रिये में बदलाव हुआ है और दूसरा, लोग राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा को तरजीह देने पर विचार करने लगे हैं. आम लोगों में यह विश्‍वास देखा जा रहा है कि विकास की बात करने वाले नरेंद्र मोदी बाढ़ के बाद बदसूरत हुई राज्य की तस्वीर को बदल सकने में सक्षम हैं. कश्मीर यानी दुनिया के स्वर्ग के विभिन्न इलाकों के दौरे के बाद तैयार हुई यह विशेष रिपोर्ट आपको कश्मीर की ताजा और वास्ततिक स्थिति से अवगत कराने की कोशिश कर रही है.
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कश्मीर में इन दिनों नरेंद्र मोदी की आवाज़ें गूंजनी शुरू हो गई हैं. कारण अलग-अलग हैं और पूरा कश्मीर इस समय नरेंद्र मोदी की तरफ़ आशा भरी निगाहों से देख रहा है. मुसलमानों के बारे में माना जाता था कि वे नरेंद्र मोदी का नाम सुनना भी पसंद नहीं करेंगे, लेकिन इस समय कश्मीर में, विशेषकर श्रीनगर में मुसलमान नरेंद्र मोदी का नाम सुन रहे हैं. और इन सबके पीछे जो कारण है, वह कारण देश के नेताओं के लिए एक सीख है. दो महीने पहले कश्मीर में आई बाढ़ ने नरेंद्र मोदी के लिए श्रीनगर घाटी में घुसने का मुहाना खोल दिया है. नरेंद्र मोदी को मिले इस अप्रत्याशित अवसर के बारे में बाद में बात करेंगे. पहले उस बाढ़ के बारे में बात करते हैं, जिसने पूरे श्रीनगर को डुबो दिया था और जो नरेंद्र मोदी के लिए विजय का घोड़ा साबित हो सकती है.
जो कश्मीर नहीं गया, उसने स्वर्ग नहीं देखा. और फारसी कहावत है, जिसे हमारे देश के अधिकांश लोग जानते हैं कि पृथ्वी पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है यानी कश्मीर में है और कश्मीर में भी श्रीनगर में है. स़िर्फ लिखने से और तस्वीरों से कश्मीर के स्वर्ग की कल्पना नहीं की जा सकती. आई हुई बाढ़ की तबाही बिना कश्मीर गए महसूस ही नहीं की जा सकती. अभी दो-ढाई महीने पहले देश ने टेलीविजन के ऊपर श्रीनगर की तबाही देखी. लेकिन उस तबाही के फौरन बाद हमने मनोरंजन के कार्यक्रम देखे, नेताओं के झगड़े देखे और वह दर्द जो श्रीनगर के लोगों ने भुगता, उसका हमें स्पर्श बहुत कम हो पाया. इसीलिए आज भी जब श्रीनगर जाते हैं, तो पता चलता है कि कश्मीरियों ने किस तरह से कयामत जैसे हालात का सामना किया और कैसे अपनी ज़िंदगी दोबारा जीने के लिए सारी परेशानियां भूल फिर से खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं.
झेलम नदी में बाढ़ आती है. झेलम नदी में बढ़े हुए पानी को निकालने के लिए फ्लड चैनल महाराजा हरि सिंह ने बनवाए थे और भी कई सारे चैनल थे, जो बाढ़ के पानी को दाएं-बाएं खेतों की तरफ़ फेंक देते थे. लेकिन, इन चैनलों के ऊपर, खासकर फ्लड चैनलों के ऊपर पिछले बीस सालों में काफी कब्ज़े हुए, जिसे इन्क्रोचमेंट कहते हैं. लोगों ने घर बनाए, चैनलों की सफ़ाई नहीं हुई और इस बार जब झेलम में पानी बढ़ा, तो जितना पानी झेलम में था, उतना ही पानी इस चैनलों में भी था. झेलम ने किनारे के बांध कुछ अपने आप तोड़ दिए, कुछ लोगों ने काट दिए. पूरे शहर में पानी इस तेजी से भरा कि लोग केवल किसी तरह से अपनी जान बचा पाए. जो श्रीनगर नहीं गया, वह कैसे अंदाज़ा लगा सकता है कि एक मंजिल और डेढ़ मंजिल पूरी तरह से पानी में डूब गई हो और घर का एक-एक सामान पानी में भीग गया हो. घरों में कुछ नहीं बचा और यह मीलों का किस्सा है. श्रीनगर का दिल और सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र लाल चौक, वहां भी नावें चल रही थीं. एक-एक दुकान में करोड़-करोड़ रुपये का सामान भरा होता है. सारे सामान भीग गए, बर्बाद हो गए. दुकानें जूतों की रही हों, कपड़ों की रही हों, जेवरों की रही हों, इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं की रही हों, सारा सामान बर्बाद हो गया. जो लोग अपने घरों से निकलने में थोड़ा भी चूक गए, उनके घरों में पानी इस तेजी से गया कि उन्हें घर की ऊपरी मंजिल पर, फिर उसके बाद छत पर जाना पड़ा. मोटे तौर पर दो सौ से ढाई सौ के बीच मौतें आंकी जाती हैं. इसमें उन लोगों का आंकड़ा शामिल नहीं है, जो श्रीनगर शहर से बाहर गांव में रहते हैं.

बारिश ने अनंतनाग में तबाही मचा दी और लगभग छह से आठ फीट तक पानी पूरे अनंतनाग क्षेत्र में भर गया. और इस भरने का मतलब, वहां से वह पानी हाईवे को अपने नीचे डुबाता हुआ, घरों को तबाह करता हुआ श्रीनगर की तरफ़ बढ़ा. जितना पानी झेलम में जा सकता था, उतना झेलम में गया. झेलम उफन गई, उसने पानी लेने से इंकार कर दिया और वह पानी चारों ओर फैलने लगा. गांव के गांव साफ़ हो गए. लोग अपना सामान ऊपर नहीं ले जा पाए और यह पानी श्रीनगर की तरफ़ बढ़ने लगा. श्रीनगर में सरकार सोई रही और उसे शायद लगा कि यह पानी श्रीनगर में आने से पहले ही जज्ब हो जाएगा या सूख जाएगा.

श्रीनगर से अस्सी किलोमीटर दूर अनंतनाग है, जहां लगभग छह दिनों तक भारी बारिश हुई. कुछ लोग उसे क्लाउड बर्स्ट कहते हैं, कुछ लोग लगातार बारिश की बात कहते हैं. उस बारिश ने अनंतनाग में तबाही मचा दी और लगभग छह से आठ फीट तक पानी पूरे अनंतनाग क्षेत्र में भर गया. और इस भरने का मतलब, वहां से वह पानी हाईवे को अपने नीचे डुबाता हुआ, घरों को तबाह करता हुआ श्रीनगर की तरफ़ बढ़ा. जितना पानी झेलम में जा सकता था, उतना झेलम में गया. झेलम उफन गई, उसने पानी लेने से इंकार कर दिया और वह पानी चारों ओर फैलने लगा. गांव के गांव साफ़ हो गए. लोग अपना सामान ऊपर नहीं ले जा पाए और यह पानी श्रीनगर की तरफ़ बढ़ने लगा. श्रीनगर में सरकार सोई रही और उसे शायद लगा कि यह पानी श्रीनगर में आने से पहले ही जज्ब हो जाएगा या सूख जाएगा. अफ़वाहें थोड़ी-थोड़ी फैल रही थीं, लेकिन सरकार ने साधारण चेतावनी ही दी. उसने यह नहीं कहा कि लोग अपना सामान निकाल लें और श्रीनगर में ऊंची जगहों पर, सुरक्षित जगहों पर चले जाएं. इस चेतावनी के अभाव में लोग अपने घरों में और दुकानों पर बने रहे. और उन्हें लगा कि जिस तरह हर साल बाढ़ आती है, उसी तरीके से
थोड़ा-बहुत पानी रिसेगा, लेकिन वह झेलम एवं फ्लड चैनल के जरिये बह जाएगा.
यह पानी दो से तीन दिनों के भीतर श्रीनगर पहुंचा और सरकार की नातजुर्बेकारी की वजह से, लापरवाही की वजह से श्रीनगर इस पानी में डूब गया, क्योंकि झेलम ने तटबंध को काट दिया था. पानी का वेग इतना था कि मैंने अपनी आंखों से देखा कि मजबूत कंक्रीट की दीवारें ताश के पत्ते की तरह गिर पड़ीं. घरों के भीतर पानी ने जाकर हर चीज को तबाह कर दिया और डेढ़ मंजिल ऊंची खिड़कियों से पानी झरने की तरह बाहर आ रहा था. स्थानीय निवासी बताते हैं कि कारें कागज की नाव की तरह बह रही थीं. सैकड़ों कारें तबाह हो गईं, घरों का सामान तबाह हो गया, किताबें तबाह हो गईं. यानी जो कुछ भी डेढ़ मंजिल के नीचे था, वह सब तबाह हो गया. आप स़िर्फ यह अंदाज़ा कर सकते हैं. आप अपना घर ज़मीन से डेढ़ मंजिल जोड़ लीजिए और वह पानी ऐसा नहीं कि स़िर्फ एक घर में आता है. पानी का स्तर एक रहता है और कम से कम तीस-चालीस किलोमीटर तक वह पानी लोगों को तबाह करता हुआ कम से कम सात दिनों तक बना रहा. इसके बाद पानी थोड़ा कम हुआ, लेकिन इलाकों में भरा रहा. अमीर लोगों ने तो फिर भी अपने लिए ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने के लिए रास्ते निकाले, लेकिन ग़रीब लोगों की ज़िंदगी नर्क की तरह हो गई.


श्रीनगर में बाढ़ का सबसे ज़्यादा असर शिवपुरा, सोनावार, कैंटोनमेंट एरिया, लाल चौक और राजबाग में दिखाई दिया. बेमिना ग़रीबों का इलाका है. बाढ़ ने यहां लोगों की ज़िंदगी ही तबाह कर दी. सोनावार मजबूत दीवार के अंदर सेना का पूरा शहर है. यहां पर सेना का अस्पताल, मॉल सभी कुछ मौजूद है. यह सब कुछ बाढ़ के पानी में डूब गया था, लेकिन सेना के जवान लोगों की ज़िंदगियां बचाने का प्रयास कर रहे थे. लाल चौक सहित सभी जगहों पर नावें चल रही थीं. इतिहास में पहली बार हुआ था कि श्रीनगर पानी के अंदर था. नाव वालों ने एक-एक परिवार से 20-20, 25-25 हज़ार रुपये लिए घरों से बाहर निकालने के लिए और उस समय सरकार कहीं नहीं थी. लगभग चार हज़ार नावें डल झील में हैं. सरकार ने उनको लेने की कोशिश नहीं की और शिकारे वालों या नाव वालों ने लोगों को जमकर लूटा. सरकार कहीं थी ही नहीं. खुद उमर अब्दुल्ला का संपर्क किसी से नहीं था. श्रीनगर की हर वह चीज, जो सत्ता का केंद्र होती है, पानी में डूबी हुई थी. रेडियो स्टेशन, दूरदर्शन, हाईकोर्ट, सचिवालय, पोस्ट ऑफिस, बैंक सब पानी में डूबे हुए थे. और मेरा ख्याल है कि जितने भी बैंक थे, उनके स्ट्रांग रूम जनरली ग्राउंड फ्लोर पर होते हैं, लॉकर्स होते हैं, तो जितने लोगों ने पैसे लॉकर में रखे थे, वे बर्बाद हो गए. बैंक का कैश, जो स्ट्रांग रूम में था, वह बर्बाद हो गया. स़िर्फ गहने बच गए. दवाइयां बर्बाद हो गईं. श्रीनगर में स्टोरेज में छह महीने के अन्न का स्टॉक रखा जाता है. वह सब कुछ बाढ़ के पानी में डूबकर बर्बाद हो गया. लगभग चालीस हज़ार टन चावल को बाढ़ का पानी लील गया. गैस, पेट्रोल सभी का स्टॉक बर्बाद हो गया. किसी का किसी से कोई संपर्क नहीं रहा.
मैं जब श्रीनगर की सड़कों पर घूमा, तो हर तरफ़ मलबे के बड़े-बड़े ढेर दिखाई दिए.
मोहल्लों में गया, तो लोग अपना सामान जलाते हुए दिखे, क्योंकि डॉक्टरों ने कहा कि किसी भी चीज का इस्तेमाल महामारी में घिर जाने की आशंका पैदा करेगा. इसलिए कपड़े, घर का फर्नीचर, अच्छे-अच्छे घरों में झाड़-फानूस ऐसे निकले हुए थे, जैसे पेड़ की छालें निकली हुई होती हैं, सब लोग अपने घर का सामान जलाते हुए दिखाई दिए. कारों के शोरूम में कारें दस दिनों से ज़्यादा समय तक डूबी रहीं. कितना नुक़सान हुआ, अभी इसका कोई आकलन नहीं है. पर मध्यम वर्ग एवं उच्च-मध्यम वर्ग इससे बचने की सलाहों पर अमल कर रहा है. जैसे, पढ़ने की किताबें जलाई जा रही हैं. स्कूल में इन किताबों का इस्तेमाल न हो, इसका ख्याल रखा जा रहा है, क्योंकि डॉक्टरों ने यह सलाह दी है. दुकानों में भीगे हुए सामान सड़कों पर दोबारा न बिकें, इसकी सलाह दी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद श्रीनगर में सूखे हुए कपड़े कौड़ी के भाव बेचने की कोशिश हो रही है. एक दुकानदार ने बहुत खूबसूरत दीवार घड़ियों की नुमाइश लगा रखी थी और कहा कि दस रुपये में आज जो चाहें, वह घड़ी ले जाएं. और सारा माल उसने दस-दस रुपये में बेच दिया. बहुत सारे दुकानदारों ने जूतों को सुखाकर बेचने की कोशिश की. लेकिन, सरकार और स्वास्थ्य अधिकारी यही कह रहे हैं कि पानी में भीगा हुआ कोई भी सामान इस्तेमाल न हो. पढ़ने की किताबें जलाई जा रही हैं और धार्मिक किताबों को इज्जत के साथ दफन किया जा रहा है.
मैं शब्दों के जरिये आपको एक हल्की झलक दिखाने की कोशिश कर रहा हूं. आप देखिए कि जो ग़रीब लोग हैं, वे अपने कीचड़ से सने हुए सामानों को धोकर दोबारा से इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास नया खरीदने के लिए पैसा है ही नहीं और कश्मीर में ठंड शुरू हो चुकी है. घर तिनकों की तरह बर्बाद हो गए हैं. लोगों के पास अभी भी रहने की जगह नहीं है. लोग सेना और सरकार द्वारा मुहैया कराए गए टेंटों में रह रहे हैं. इन टेंटों की भी कमाल की कहानी है. सेना को लेकर कश्मीर में बने विरोधी वातावरण में कमी आई है, क्योंकि सेना ने बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने का अद्भुत काम किया है. पुलिस वाले तो हथियार छोड़कर भाग गए थे. श्रीनगर पांच दिनों तक लोगों के रहमोकरम पर था. सेना ने लोगों को बचाया. एक जगह सेना के जवानों से
अलगाववादियों का झगड़ा हुआ. इसमें सीआरपीएफ का एक जवान मारा गया. वहां पर फायरिंग हुई. पूरा कश्मीर इन लोगों के ख़िलाफ़ हो गया कि लोग इस समय मुसीबत में हैं और आप अपनी बात कर रहे हैं. आप कश्मीर में तनाव पैदा कर रहे हैं. परिणाम यह हुआ कि ऐसे सारे लोग खामोश हो गए, क्योंकि श्रीनगर के लोगों का पूरा समर्थन सेना को था. सेना ने लोगों को बचाया. लोगों के यहां खाना-पानी पहुंचाया. खासकर, पीने का पानी. और पहली बार श्रीनगर के लोगों में सेना को लेकर हमदर्दी दिखाई दी. लेकिन यहां यह भी कहना पड़ेगा कि जम्मू-कश्मीर में एक समानता दिखाई देती है. जब भी चुनाव आते हैं, लॉ इंफोर्समेंट एजेंसियों द्वारा गोलियां चल जाती हैं, लोग मारे जाते हैं और पूरा माहौल खराब हो जाता है.
सरकार गायब थी, लेकिन लोगों में जज्बा था. बहुत सारे लोग दूर के गांवों से आकर बाढ़ में फंसे हुए लोगों को बचाने का काम कर रहे थे. किसी ने दस को बचाया, किसी ने बीस को बचाया, तो किसी ने पच्चीस को. पीने के पानी की बोतलें अपने पूरे शरीर में बांधकर नौजवान तैरते हुए बाढ़ में फंसे हुए लोगों के बीच फेंक रहे थे, जिससे उन्हें बचे रहने का वक्त मिल सके. खाना तो नहीं दे सकते थे, लेकिन पीने का पानी तो दे सकते थे. विडंबना यह कि जिन्होंने लोगों को बचाया, वे खुद किसी न किसी हादसे का शिकार होकर शहीद हो गए. दूसरों को बचाते हुए कुछ लोगों की जानें चली गईं. पानी की बोतलें फेंकते हुए भार की वजह से वे पानी में डूब गए. जब पानी उतर गया, तो कुछ लोगों की मौत इसलिए हो गई, क्योंकि इतनी देर पानी में रहने की वजह से पानी से पैदा हुई बीमारियों ने उनकी जान ले ली. उन्हें इलाज मुहैया नहीं हो पाया. ऐसे लोगों के नाम नहीं पता. सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों के नाम पता करे और उनके परिवार को मदद करे, क्योंकि ऐसे लोगों के जज्बे को सलाम करना चाहिए और इज्जत भी देनी चाहिए, जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर लोगों को बचाया.
श्रीनगर अब स्वर्ग नहीं है. इसे स्वर्ग बनने में पांच से दस साल का समय लगेगा. यहीं पर लोगों को नरेंद्र मोदी का इंतजार है. लोगों को लगता है कि पिछले प्रधानमंत्री रस्म निभाने के लिए कश्मीर आते थे, पर नरेंद्र मोदी पिछले छह महीने में छह बार किसी ने किसी बहाने कश्मीर आ चुके हैं. और चूंकि नरेंद्र मोदी बाढ़ को देखने आए थे, इसलिए वह बचाव कार्य के लिए, पुनर्वास के लिए और इससे जुड़े विकास कार्यों के लिए एक अच्छी रकम देंगे. नरेंद्र मोदी ने एक हज़ार करोड़ रुपये का पहला पैकेज एनाउंस किया. और कश्मीर के लोगों को इस बात की खुशी है कि नरेंद्र मोदी ने यह पैसा जम्मू-कश्मीर सरकार को नहीं दिया, क्योंकि लोगों को लगता है कि राज्य सरकार भ्रष्टाचार में यह सारा पैसा बर्बाद कर देती. जिन लोगों के नाम चेक भी आ रहे हैं, कश्मीर में इस तरह की अफ़वाहें हैं या जानकारियां हैं कि वे सारे चेक दिल्ली से बनकर ही आ रहे हैं. उमर अब्दुल्ला सरकार पर रिलीफ की कोई ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार का पैसा बांटने के संबंध में नहीं डाली गई है. उमर अब्दुल्ला की सरकार अभी तक इस बात का अंदाज़ा भी नहीं लगा पाई है कि कितना ऩुकसान हुआ है और लोगों को कितनी सहायता मिलनी चाहिए या नहीं मिलनी चाहिए. इसीलिए स्थानीय सरकार पर नाराज़गी और नरेंद्र मोदी पर विश्‍वास का यह नायाब काम इस बाढ़ ने कर दिखाया. बाढ़ से प्रभावित पूरा श्रीनगर बिना किसी संदेह के यह मान बैठा है कि चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी यहां के राहत, पुनर्वास और विकास के कार्यों में ज़्यादा दिलचस्पी लेंगे.


दूसरी तरफ़ भाजपा इन चुनावों को गंभीरता से लड़ रही है. पिछले 25-30 सालों में न तो केंद्र के कांग्रेसी नेताओं ने कश्मीर जाकर वहां के लोगों से कोई संपर्क बनाया और न ही समाजवादी एवं साम्यवादी नेताओं ने. जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस की पैठ थी, लेकिन यह क्षेत्र अब भाजपा के साथ है. और घाटी में जहां भाजपा को उम्मीदवार नहीं मिलते थे, अब उसे उम्मीदवार मिलने शुरू हो गए हैं. भाजपा जोर-शोर से किसी भी क़ीमत पर हर सीट पर उम्मीदवार उतारना चाहती है. श्रीनगर में उसे लगता है कि लोग नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस से नाराज़ हैं. दूसरी तरफ़ गिलानी साहब और उनकी हुर्रियत कांफ्रेंस हर बार की तरह इस बार भी चुनाव बहिष्कार का नारा देंगे, जिससे उनका वोट प्रतिशत कम हो जाएगा और उस स्थिति में भाजपा के मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले वोट उन्हें जिताने में बड़ा योगदान दे सकते हैं. यहां पर हुर्रियत द्वारा चुनाव बहिष्कार का नारा सौ प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जा सकता है.
अनंतनाग हो, कश्मीर घाटी हो, यहां पर पहली बार मुस्लिम उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह के ऊपर चुनाव लड़ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी किस शिद्दत के साथ लोगों से संपर्क कर रही है, उसका एक उदाहरण मैं आपको बता सकता हूं. स्वयं वित्त मंत्री अरुण जेटली एक-एक घंटे आधे-आधे घंटे लोगों से बात करके चुनाव लड़ने की अपील कर रहे हैं. किसी भी व्यक्ति के बारे में पता चलता है कि वह चुनाव लड़ सकता है, तो सवाल जीतने-हारने का नहीं है, सवाल स़िर्फ चुनाव लड़ने का है. उसे पैसों की मदद, उसे साधनों की मदद का वादा दिल्ली से किया जा रहा है. और अगर किसी को अरुण जेटली खुद फोन करके कहें कि वह उनकी पार्टी से चुनाव लड़े, तो यह बखूबी समझा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार कश्मीर में अपने संपर्क और साधन के सहारे क्या नतीजा निकालना चाहती है.
मुझसे बहुत सारे लोगों ने कहा कि हुर्रियत कांफ्रेंस चोर है. जब मैंने गिलानी के बारे में पूछा, तो लोगों ने कहा कि गिलानी साहब खुद तो भारत का पैसा खाते हैं और हमसे कहते हैं कि वोट मत दो. जब मैंने पूछा, कौन जीत सकता है, तो दो ही जवाब आए. पहला, मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी को अच्छा समर्थन मिलेगा और दूसरा जवाब आया कि भारतीय जनता पार्टी को वहां सीटें मिल सकती हैं. भारतीय जनता पार्टी को ज़्यादा सीटें मिलने का सबसे बड़ा कारण कांगे्रस के समर्थक वर्ग का भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देना हो सकता है, पर पूरे कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद को लेकर बहुत ज़्यादा भरोसा है. लोगों को लगता है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद एक ऐसे शख्स हैं, जिन्हें अनुभव है, जिनके पास विजन है, जिनके पास पूरे कश्मीर का एक नक्शा है. और अगर वह जीतते हैं, मुख्यमंत्री बनते हैं, तो चाहे जम्मू हो, चाहे लेह हो या कश्मीर घाटी हो, हर जगह विकास का एक नया दौर आ सकता है तथा जो लोग बाढ़ के शिकार हुए हैं, उनकी ज़िंदगी में दोबारा रोशनी आ सकती है. मुफ्ती मोहम्मद सईद के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में किए हुए बहुत सारे काम लोगों को याद हैं. इसलिए संभावना इस बात की है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद या तो अकेले सरकार बना लें या फिर अगर कुछ कमी रहती है, तो वह दूसरे दल के साथ मिलकर सरकार बनाएं. लेकिन, शायद वह सरकार इसी शर्त पर बनाएंगे कि उनके काम में सहयोगी दल हस्तक्षेप न करें.

श्रीनगर की यह त्रासदी देश के नेताओं को संदेश देती है कि अब वह दिन गए, जब आप जनता को यूं ही बहलाने की कोशिश करते थे. यह भी संदेश देती है और हर सरकारों को देती है कि अब आपदा सिग्लन देकर नहीं आती. इसलिए आपदा तंत्र को बहुत सक्रिय बनाकर रखना चाहिए, अन्यथा सिवाय हाथ मलने और सिर पीटने के कुछ रह नहीं जाता.

श्रीनगर की यह त्रासदी देश के नेताओं को संदेश देती है कि अब वह दिन गए, जब आप जनता को यूं ही बहलाने की कोशिश करते थे. यह भी संदेश देती है और हर सरकारों को देती है कि अब आपदा सिग्लन देकर नहीं आती. इसलिए आपदा तंत्र को बहुत सक्रिय बनाकर रखना चाहिए, अन्यथा सिवाय हाथ मलने और सिर पीटने के कुछ रह नहीं जाता. श्रीनगर वैली में पानी निकालने के पंप ही नहीं हैं. जो कुछ पंप थे, वे पानी के नीचे डूबे हुए थे. कहीं से छोटे-छोटे पंप मंगाए गए, पर उनमें पानी निकालने की क्षमता ही नहीं थी. इसके बावजूद जो सबसे ख़तरनाक बात थी कि वहां का आपदा प्रबंधन तंत्र था ही नहीं. और जो बाहर से लोग आए थे, उन्हें यही नहीं मालूम था कि श्रीनगर शहर में कहां जाना है, क्या करना है और प्राथमिकताएं क्या तय करनी हैं. स्थानीय लोगों को उसमें शामिल ही नहीं किया गया. सब कुछ बिखरा-बिखरा सा था, जिसका आकलन अरबों-खरबों रुपये के नुक़सान के रूप में सामने आया. शायद पूरी तरह कभी न पता चले कि श्रीनगर यानी दुनिया का स्वर्ग पानी में डूबा और जब उबरा, तो क्या खोकर उबरा.
पर इसके बावजूद कश्मीरी लोगों को सलाम करना चाहिए कि वे इस सबसे उबर चुके हैं. जब मैंने पूछा कि यह बाढ़ क्यों आई, तो ज़्यादातर लोगों ने कहा कि शायद हमारे बुरे कर्म थे, जिसकी वजह से अल्लाह हमें सबक देना चाहता था. बहुत सारे अपराध का काम करने वाले, बुरा काम करने वाले लोग सुधर गए हैं. उन्हें लग रहा कि अल्लाह ने उन्हें एक मौक़ा दिया है, अच्छी ज़िंदगी बिताने का. लेकिन, नए लोग अपराध के काम में जुट गए हैं, जैसे इंश्योरेंस कंपनियों को ग़लत जानकारी देना और यह सब वे कर रहे हैं, जो बड़े पैसे वाले हैं. इंश्योरेंस कंपनियों से लूट की योजना बनाना, बाहर से आई मदद के नाम पर फर्जी एनजीओज खड़े करना जैसे काम हो रहे हैं. स्वयंसेवी संस्थाओं की तो कश्मीर में बाढ़ आ गई है. बाहर के लोग भी बिना यह जाने कि उनकी सहायता प्रभावित लोगों तक पहुंच रही है या नहीं, इन संस्थाओं को पैसे भेज रहे हैं. इसके बावजूद कश्मीर के लोग खड़े हो रहे हैं और उसमें सबसे पहला सबक उनसे सीखना चाहिए, जिनके पास साधन नहीं हैं, जो ग़रीब हैं, जिनके सामने इस समय भी खराब सामान को इस्तेमाल कर महामारी में फंसने का ख़तरा है, लेकिन वे भी दोबारा ज़िंदा होने की कोशिश कर रहे हैं. कश्मीर देश के लिए आपदा प्रबंधन के मामले में तो सबक है ही, देश के राजनीतिक नेताओं के लिए भी एक सबक है. अब देखना यही है कि कौन इससे सबक सीखता है.

चौथी दुनिया