पुण्य प्रसून बाजपेयी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पुण्य प्रसून बाजपेयी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 1 जुलाई 2015

सत्ता का नया पाठ, राजनीति कीजिये नौकरी पाइए

पुण्य प्रसून बाजपेयी

75 के आंदोलन में छात्रों ने जेपी की पीछे खड़े होकर डिग्री गंवाई। नौकरी गंवाई। 89 के आंदोलन में वीपी के पीछे खड़े होकर छात्रों ने आरक्षण को डिग्री पर भारी पाया। सत्ता के गलियारे में जातिवाद की गूंज शुरु हुई। 2013 में सत्ता ने पहले अन्ना आंदोलन को हड़पा और फिर 2015 में सत्ता ने ही छात्रों को रोजगार का सियासी पाठ पढ़ाया। यानी पहली बार खुले तौर पर छात्रों को यह खुले संकेत दिये जा रहे है कि अगर वह राजनीतिक दलों से जुड़ते है तो सत्ता में आने के बाद छात्रो की डिग्री पर उनकी राजनीतिक सक्रियता भारी पड़ेगी। यानी जो छात्र राजनीति से दूर रहते है या सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देते हुये अच्छे नंबरो के लिये दिन रात एक किये होते है आने वाले वक्त में उसका कोई महत्व बचेगा नहीं। यह सवाल इसलिये डराने लगा है क्योंकि इससे पहले यूपी में समाजवादी पार्टी की सत्ता तले यादवों के भर्ती के किस्से खूब रहे हैं। संयोग से इतनी बडी तादाद में खुले तौर पर जातीय आधार पर नौकरी बांटी गई कि भर्ती घोटाला शब्द ही यूपी की सत्ता के साथ जुड़ गया। मध्यप्रदेश में शिवराज चौहाण सरकार के दौर में व्यापम ने नौकरी को पूंजी से जोड़ दिया। करोडों के वारे-न्यारे के खेल इतने खुले तौर पर हुये कि जब पोटली खुलनी शुरु हुई तो राजनेता, नौकरशाह, बिजनेसमैन और दलालों की नैक्सस भी सामने आ गया। लेकिन ताजा मिसाल तो उन दो नेताओं की सत्ता से जा टिका है, जिन्होंने सत्ता के लिये भावनात्मक तौर पर वोटरों के दिल-दिमाग को छुआ। अर्से बाद इन दो नेताओं के गुस्से से भरे भाषणों को सुनकर वोटरों में यह एहसास जागा कि बदलाव की घड़ी अब उनके दरवाजे पर दस्तक दे ही देगी। क्योंकि एक तरफ नरेन्द्र मोदी का लुटियन्स की दिल्ली की रईसी पर सीधी चोट करना था तो दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल का सामाजिक ढांचे को ही बदलने का प्रण था। मोदी के भाषणों ने छात्रो को इस हदतक प्रभावित किया कि 26 मई 2014 के तुरंत बाद ही एडमिशन से लेकर नौकरी पाने के हकदार छात्रों के सामने जैसे ही नंबर होने के बावजूद कही आरक्षण तो कही डोमिसाइल के चक्कर में एडमिशन ना हो पाने का संकट उभरा तो हर किसी ने पीएम मोदी को ही याद किया। कइयों ने पीएमओ के नाम मेल किये तो कईयो ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। कुछ ऐसा ही नौकरी पाने का हकदार होने के बावजूद कही पैरवी तो कही राजनीतिक खेल की वजह से नौकरी ना मिल पाने वाले छात्रों ने भी अपने अपने तरीके से पीएम को ही याद किया। 

क्योंकि राजनीतिक सत्ता के भीतर के मवाद को निकालने की कसम मोदी ने पीएम पद के लिये चुनावी प्रचार के वक्त की थी। छात्रों को ऐसी ही आशा केजरीवाल से भी जागी। खासकर दिल्ली में पढने के लिये आने वाले छात्रो ने महसूस किया कि केजरीवाल पढे लिखे हैं । नौकरी छोड़कर नेता बने हैं। तो सत्ता मिलने के बाद दिल्ली में छात्रों को संकट से निजात मिलेगा। एडमिशन हो या पढाई के बाद नौकरी का सवाल दोनों दिशा में दिल्ली सरकार कदम जरुर उठायेगी। दोनों ही नेताओं को लेकर छात्रों में आस इस हद तक हुई कि प्रधानमंत्री मोदी के पद संभालते ही सारी मुश्किले छूमंतर हो जायेगी कुछ एसा ही 88 फीसदी नंबर पाने के बाद पूना में कहीं दाखिला ना होने पर य़श को लगा और उसने अगस्त-सितबंर 2014 में ही पीएमओ में मेल कर अपना गुस्सा निकाला। तो दिल्ली में जिस तरह राजस्थान छात्र को 92 फीसदी नेबर आने पर भी दिल्ली विश्वविघालय में नामांकन ना मिला उसने केजरीवाल और देश की शिक्षा मंत्री को मेल कर अपना गुस्सा निकला । मुश्किल गुस्सा निकालने भर की नहीं है । मुस्किल है कि राजनेताओं और राजनीति से गुस्से में आया युवा तबका ही तो 2011-12 में दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में जुटता था । और देखते देखते देश के शहर दर शहर में रामलीला मैदान ओऔर जंतर मंतर बनने लगे थे । जिससे पारंपरिक राजनीतिक सत्ता की चूले हिलेने लगी थी और उसी के बाद केजरीवाल हो या मोदी दोनों ने ही जनता के आक्रोष की इसी नब्ज को पकडा । पहली बार राजनीतिक भाषणो में बख्शा किसी को नहीं गया। मोदी ने गांधी परिवार से लेकर दामाद राबर्ट वाड्रा और किसान मजदूर से लेकर शिक्षा की खास्ता हालात पर जमकर अपनी जुबां से कोडे चलाये । अच्छा लगा । कोई नेता तो लग दिख रहा है । इसी तर्ज पर केजरीवाल ने भी बख्शा किसी को नहीं । जो भ्रष्ट थे । जो दागी थे। जो मालामाल थे । जो लूट का नैक्सेस बनाये हुये देश को खोखला कर रहे थे। सभी को निशाने पर लिया । युवा साथ कड़े हुये क्योंकि यह जुबां बदलाव वाले थे । लेकिन सत्ता संभालने के साथ ही सच जिस खौफनाक तरीके से दस्तक देने लगा उसने उन्ही छात्रों-युवाओं के सामने अंधेरा कर दिया जो आस लगाये बैठे थो कि उनकी काबिलियत को तो मौका मिलेगा ही । सत्ता केजरीवाल के हाथ आई तो पहली नजर कैडर को ही नौकरी देने या दिल्ली सरकार में काम पर ल गाने की शिरी हुई। चूंकि केजरीवाल का कैडर पारंपरिक राजनीतिक कैडर से अलग था। आम आदमी पार्टी को संभालने वाले या तो केजरीवाल के एनजीओ के साथी है या फिर प्रोपेशनल्स की कतार जो राजनीति की मार तले बदलाव के लिये केजरीवाल में अपना अक्स देखने लगी। 

और तीसरी कतार दिल्ली हरियाण के उम मुफलिसी में खोये छात्रों की है जो केजरीवाल के विस्तार के साथ अपना विस्तार भी देख रहे थे। तो उनके लिये किसी परिक्षा की तैयारी के सामान ही राजनीतिक संघर्ष करना। तो सीएम बनते ही सबसे पहले उसी कैडर को नौकरी पर लगाना प्राथमिकता बनी। दिल्ली में ही करीब दो से तीन हजार कैडर महीने की तयशुदा रकम पा कर दिल्ली सरकार की राजनीतिक नौकरी कर रहा है। यानी जो काम प्रोफेशनल्स के हाथ में होना चाहिये या जिस काम के लिये सत्ता को पढ़े लिके छात्रों के बीच समानता के साथ नौकरी दी जानी चाहिये उसमें प्राथमिकता या कहे समूचा रोजगार ही अपने कैडर में बांट दिया गया। जबकि दिल्ली का सच बेरोजगारी को लेकर कम डराने वाला नहीं है । दिल्ली में दो लाख से ज्यादा बेरोजगार ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट हैं। औप पढ़े लिखे बेरोजगारो की तादाद तो 15 लाख के पार हैं। तो यह सवाल किसी भी जहन में आ सकता है कि सिर्फ अपने कैडर के काम के आसरे तो दिल्ली में राजनीति संघर्ष केजरीवाल ने खड़ा नहीं किया उसमे भ्रष्ट व्यवस्था की मार खाया युवा तबका भी होगा। तो उसका ख्याल कैन करेगा। या फिर सियासी आरक्षण तले अगर कैडर को ही सारी सुविधा मिलेगी तो फिर दूसरे नेता और पार्टी से केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अलग कैसे हुई । यही सवाल नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद के हालात से समझा जा सकता है। देश के अलग अलग विश्वविद्यालयों औररिसर्च इस्टटीयूट में बीजेपी के छात्र संगठन अखिल बारतीय विघार्थी परिषद  में रहे छात्रों को प्रथमिकता मिलने लगी। मसलन हाल में एबीवीपी के तीस छात्रो को अलग अलग जगहो पर एडहोक तरीके से निटुक्त कर दिया गया । बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में भी पांच एबीवीपी छात्रो को लेक्चरर की नौकरी मिल गई। इसके अलावे में झटके में केन्द्र में सरकार बीजेपी की बनी तो संघ से जुडे तमाम इंसटीट्यूट को बजट से लेकर बाकी सुविधायें मानव संसाधन मंत्रालय से मिलने लगी। तो वहा भी संघ विचारधारा से जुडे छात्रों को रोजगार मिलने लगा। और नौकरी पाने के पायदान पर सबसे आगे खडा छात्र राजनीतिक कनेक्शन खोजने में भटकने लगा। जयपुर में तो बीजेपी का दफ्तर ही कैडर के रोजगार के लिये खुल गया। जो बीजेपी के साथ खड़ा है उसकी पर्ची पर रोर से लेकर उसके उम्मीदवार की ट्रांसफर पोस्टिग तक होने लगी। यानी छात्र हो या शिक्षक उसका राजनीतिकरण होना कितना जरुरी है यह केन्द्रीय विघालयों में गर्मी छुट्टियों के वक्त होने वाले ट्रांसफर-पोस्टिंग से भी समझा जा सकता है। हर शिक्षक को कम से कम दो या तीन बरस तो एक जगह गुजरना ही पता है। लेकिन बीजेपी के साथ जुड़े हैं। संघ के किसी स्वयंसेवक की चिट्टी है तो दो से तीम नहीने के भीतर ही इस बार मनमाफिक जगह पर ट्रांसफर कर दिया गया। बच्चों के एडमिशन का कोटा मानवसंसाधन मंत्रालय का साढे चार सौ छात्रो का है। लेकिन बीजेपी/संघ की सक्रियता का आलम यह है कि जून तक केन्द्रीय विद्यालयों को साढे चार हजार बच्चों के एडमिशन की पर्ची देश के हर स्कूल में जा चुकी है। 

यानी छात्र सिर्फ पढलिखकर आगे बढना चाहे तो उसका राजनीतिक अज्ञान उसके सामने रोड़ा बनेगा। और अगर इस दिशा में बचे तो सामने कंपटिशन की परिक्षाओं में करोडों के वारे न्यारे करने वाला नैक्सस आकर खड़ा हो जायेगा। और असर इसी का है कि इस बार देशभर के साढे तेरह लाख से ज्यादा छात्रों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि हर परीक्षा पेपर अगर लीक होगा तो फिर वे करेंगे क्या। क्योंकि सीबीएसई की एआईपीएमटी की परीक्षा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फटाफट अगले हफ्ते कराया जा रहा है जिसमें साढे छह लाख छात्र परीक्षा देगें । लेकिन जरा कल्पना किजिये लेकिन एमयू की मेडिकल परीक्षा, इंजीनियरिंग परीक्षा, बीडीएस परीक्षा , यूपी की पीसीएस परीक्षा और पीएमटी परीक्षा  सभी तो इस बार रद्द होगई । क्योकि इसके पीछे का नैक्सेस बताता है कि जिनके पास पैसा है उनके लिये इन परिक्षाओ को पास करना कितना आसान बना दिया गया है । और हर रैकेट के तार उसी राजनीति से जा जुडते है जहा पैसो का लेन-देन नेताओं के कद को बढा करता है और उसके बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिये शिक्षा में सुधार या शिक्षा माफिया पर नकेल कसने के वादे कर पढने लिखने वाले छात्रो की भावनाओ को अपने साथ करने के लिये ईमानदार दिखने काराजनीतिक प्रहसन खुले आम होता है। क्योंकि किसी सत्ता के पास ना तो शिक्षा का और ना ही समाज को आगे ले जाने का कोई ब्लू प्रिंट है। सिवाय पूंजी बनाने और ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता पैदा कर देश को बाजार में बदलने की सोच हर सत्ता के पास के जरुर है । और असर इसी का है कि बढती बेरोजगारी के बीच मलाईदार नौकरी का रास्ता जहा धंधे या कहे येन –केन प्रकारेण से हो जाये ओऔर वरदहस्त सत्ता का ही रहे तो फिर छात्रो का भविष्य ही नहीं बल्कि देश का भविष्य भी माफिया रैकेट में फंस रहा है इससे इंकार कौन कैसे करेगा ।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

देश के भीतर युद्ध भूमि का ग्राउंड जीरो

पुलिस के शव में बम रखने की जिस घटना ने पूरे देश को अंदर से हिला दिया,अगर उसी घटना वाले इलाके लातेहार के हर दिन के सच को देश जान जाये तो उसे समझ में आ सकता है देश के भीतर कैसी युद्द भूमि तैयार है। और कैसे युद्द भूमि में हर दिन बारुद के बंकर बनाये जाते हैं। कैसे आईईडी घमाके होते हैं । कैसे डायनामायट से सरकारी इमारतों को नेस्तानाबूद किया जाता है। कैसे हर सरकारी योजना नक्सल लूट में बदल दी जाती है। कैसे खाद्यान्न से लेकर मनरेगा के रोजगार का पैसा विकास के नाम पर खपा भी दिया जाता है और हर हाथ खाली होकर पेट की खातिर बंदूक थामने से कतराता भी नहीं है। कैसे पक्की सड़क पर दौड़ती पुलिसिया जीप ही सरकार के होने का ऐलान करती है और कैसे पक्की सड़क से नीचे उतरती हर कच्ची सडक सरकार के सामानातंर माओवाद की व्यवस्था को चलाती है।

यह ऐसा सच है जो लातेहार के हर गांव में हर बच्चा और बुजुर्ग हर दिन देखता है। जीता है और फिर कभी इनकाउंटर में मारे जाने के बाद पक्की सड़क पर माओवादी और कच्ची सड़क पर मारे गये ग्रामीण आदिवासी
के तौर पर अपनी पहचान पाता है। दिन के उजाले में पक्की सड़क पर सुरक्षाकर्मियों के लिये हर इनकाउंटर तमगे का काम करता है और कच्ची पगडंडियो पर इनकाउंटर में मारे गये ग्रामीण का परिवार आक्रोश की आग में खुद को झोकने के लिये तैयार हो जाता है। यानी वर्तमान का सच भविष्य के लिये ना रुकने वाली ऐसी उर्वर युद्द भूमि तैयार करता जा रहा है, जहां सभ्य देश के लिये आने वाले वक्त में कौन कौन सी त्रासदी किस किस रुप में देश का सिर शर्म से झुकायेगी, इसका सिर्फ इंतजार किया जा सकता है। क्योंकि वहां युद्द ही जीने का आक्सीजन है। जरा सिलसिलेवार तरीके से पुलिस शवों में लगाये गये बम के इलाकों को परखें। 6-7 जनवरी को माओवादियों का हमला लातेहार के कोमांडी, हेहेगढा और अमवाटीकर गांव के इलाके में हुआ। 10 सुरक्षाकर्मी मारे गये। तीन गांववाले तब मारे गये, जब पुलिस के शव में रखा बम फटा। जाहिर है शव के भीतर बम रखने की यह अपने तरह की पहली घटना थी जो इतनी वीभत्स है कि देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे तक परेशान हो गये।

सवाल उठ सकता है कि अब माओवाद वैचारिक संघर्ष को छोड़कर और खौफ पैदा कर अपने होने का अहसास करा रहा है। इसे अमानवीयता का आखिरी रुप भी माना जा सकता है। इसे मानसिक दिवालियापन से भी जोड़ा जा सकता है। लेकिन जिस लातेहार को युद्द भूमि मान कर पुलिस-सरकार काम कर रही हो। जहां रहने वाले लोगो की पहचान दुश्मन और दोस्त के तौर पर कच्ची और पक्की सड़क के साथ बदल जाती हो। वहां कौन सी व्यवस्था मानवीयता को जिन्दा रखे हुये है, यह समझना भी जरुरी है। युद्द भूमि कैसे और किसके बीच बनी हुई है, यह एनकाउंटर वाले तीन गांव ही नहीं बल्कि लातेहार के बनवीरुआ, डीहीमारी, टुबेड, नेबारी, मानगरा, लूटी, अमेझाहारण समेत दो दर्जन से ज्यादा गांव के हर दिन के हालात को देखकर समझा जा सकता है। लातेहार में सरकार का मतलब चतरा से डालटेनगंज जाने वाली सडक पर पुलिस पेट्रोलिंग है। जिसके बीच में लातेहार आता है। यह पेट्रोलिंग भी जब तक सूरज की रोशनी पक्की सड़कों पर रहती है तभी तक होती है। गांवों के बीच में पुलिस कैंप नहीं सीआरपीएफ कैंप और झारखंड जगुआर सेना के कैंप हैं, जो सरकार की इमारतों में कैद रहते हैं। किसी पुरानी सभ्यता की तरह सुरक्षाकर्मियों के कैंप नदी या पानी के सोते के किनारे ही हैं। जिससे पीने के पानी की कोई दिक्कत ना हो। हर सुबह सूरज निकलने के बाद ग्रामीण इलाकों में सेना की हलचल पानी इकठ्टा करने और नित कार्य करने को लेकर ही होती है। पक्की सड़क से होते हुये जब सीआरपीएफ या जगुआर फोर्स के जवान गांव में घुसते हैं तो ही कैंपो से सुरक्षाकर्मी सड़क के लिये निकलते हैं। सीधे कहे तो पक्की सड़क से गांव तक कोई लैंड माइन नहीं है, इसकी जांच करते हुये जब सुरक्षाकर्मियो का दस्ता गांव के सुरक्षा दस्ते के पास पहुंचता है तो ही गांव के कैंप में तैनात सुरक्षा दस्ता बाहर निकलता है। लेकिन इस पक्की और कच्ची सड़क के बीच हर सुबह आईईडी ब्लास्ट की ट्रेनिग गांव वालो को मिलती है। बंकर ब्लास्ट की जानकारी गांव वाले अपने स्तर पर पाते हैं।

डायनामाइट कैसे लगाया जाये, जिससे किसी सरकारी इमारत को एक ही धमाके में उड़ा दिया जाये। यह जानकारी होना हर गांव वाले की जरुरत है। और जिस कैंप के सुरक्षाकर्मियो के शिकार जो गांववाले उससे पहले हुये होते हैं, उस गांव की ही यह जिम्मदारी होती है कि कैंप से बाहर निकले सुरक्षाकर्मी वापस कैंप में लौट ना सके। इस युद्द के बीच खेती, मजदूरी, विकास परियोजना या औघोगिक विकास का कोई मतलब नहीं होता । क्योंकि युद्ध के नियम या जीत हार जान लेने की तादाद पर ही निर्भर करते हैं। जिसका खौफ ज्यादा होता है, उसके लिये इलाका सुरक्षित होता है। और खौफ पैदा करने के लिये हर रणनीति अपनायी जाती है। इस युद्द भूमि में सरकार की कोई भूमिका क्यों नहीं होती, इसे मौजूदा मुंडा सरकार के बनने और वर्तमान के राजनीतिक संकट से भी जोडकर समझ जा सकता है। तीन बरस पहले अक्टूबर 2009 में जब झारखंड विधानसभा के चुनाव हो रहे थे, तब लातेहार के 22 गांवों ने चुनाव का बहिष्कार किया था। उस वक्त बहिष्कार के तीन आधार थे । पहला मनरेगा की बात कहने वाली कांग्रेस के ही लोगों ने मनरेगा का पैसा खा लिया गांव के गांव में रोजगार दे दिया का दस्तावेजी पुलिंदा तैयार कर लिया। दूसरा, जो खाद्दान्न गांव में सरकार ने बांटने भेजा उसकी काला बाजारी अधिकारियो ने कर दी और दस्तावेज में बताया कि अन्न बांट दिया है। और तीसरा ट्यूब नदी पर बांध बनने का वादा कर तीन साल सरकार ने गुजार दिये । लेकिन गांव वालों को मिला कुछ नहीं। तो यहां सिर्फ चुनाव बहिष्कार ही नहीं हुआ बल्कि रांची में सरकार बनी तो लातेहार में सिलसिलेवार तरीके से न्याय शुरु हुआ। युद्द भूमि है तो न्याय भी यूद्द के तौर पर ही शुरु हुआ । बीते तीन बरस में सोलह पंचायत भवन डायनामाइट से उड़ा दिये गये। पोचरा पंचायत की इमारत की छत को उड़ाकर गांववालों के लिये न्याय घर बनाया गया। जहां नौ गांव में किसी भी मुद्दे के उलझने पर सुलझाया जाता। जिन छह माध्यामिक स्कूलों की इमारतों की स्कूलों में सीआरपीएफ जवान ने कैंप लगाये उन्हे विस्फोट से ध्वस्त कर दिया गया। नेवारी गांव के मिडिल स्कूल की इमारत को गिराकर गांववालों ने अपने युद्द का ट्रेनिंग सेंटर बनाया। फुड

एंड सप्लायी विभाग के एमओ केसर मर्मू का अपहरण कर सबक सिखाया गया। जेरुआ गांव के मनरेगा एक्टीविस्ट नियामत अंसारी की हत्या की गई। इसी तर्ज पर हर गांव वाले ने औतसन तीन बरस में छह से नौ पुलिस या सुरक्षाकर्मियों के वाहनो को नष्ट किया। सीधे समझे तो माइन ब्लास्ट से उड़ाया। इसमें पुलिस मोटरसाइकिल भी है। इस युद्दभूमि में युद्द करना ही कैसे जीने का तरीका बन चुका है, यह सुरक्षाकर्मियों की रणनीति से लेकर माओवाद के नाम पर संघर्ष करते नक्सलियों से लेकर गाम्रीण आदिवासियों के तौर तरीकों से समझा जा सकता है। राज्य पुलिस और सीआरपीएफ के अलावे जगुआर पुलिस से लेकर आधे दर्जन नाम से हंटिंग सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी इस युद्द भूमि में है। वहीं दूसरी तरफ सीपीआई माओवादी-पीपुल्सवार से लेकर झारखंड प्रस्तुति कमेटी और तृतिया प्रसूती कमेटी से लेकर स्वतंत्र इंडियन पीपुल्स कमेटी सरीखे दर्जन भर संगठन अपनी अपनी युद्दभूमि बनाकर अपने जीने के लिये संघर्ष कर रहे है। यानी कोई भी बिना सेना के नहीं है। हर सेना का एक नाम है, जो गांव और पुलिस कैप के साथ बदल जाता है। इस युद्दभूमि में यह सवाल बहुत छोटा है कि कौन सही है या कौन गलत। क्योंकि तीन बरस में मारे गये सात सौ से ज्यादा ग्रामिणों के परिजनो का जो हाल है, उससे बुरा हाल मारे गये सुरक्षाकर्मियो के परिजनो का है । इस युद्द में मारे गये सुरक्षाकर्मी दुधवा मुंडा हो या गोपाल लकडा । या मारे गये ग्रामीण अशोक टोपो हो या प्रकाश घान। इनके परिजन युद्द भूमि में ना सरकार की रियायत पा सकते हैं या युद्द से मुंह मोड़ सकते हैं। और युद्द करते रहना ही क्यों जरुरी है, इसे बताने के लिये घायलों को टटोला जा सकता है। 16 जुलाई 2010 को चाहे वह घायल सुरक्षाकर्मी सुलेमान धान हो या सुरेश टोपो या फिर चन्द्रमोहन जो माओवादियों के एनकाउंटर में घायल हो गये। या फिर इसी इनकाउंटर में घायल कुदमु गांव के मोहन माझी या नायकी। सरकार से मदद किसी को नहीं मिली। अस्पताल का इलाज किसी के पास नहीं पहुंचा। कोई राहत किसी को नहीं मिली । यानी देश की मुख्यधारा से जोड़ने की जो पहल दस्तावेजो में दिल्ली के नार्थ ब्लाक से लेकर रांची में सीएम दफ्तर तक हर दिन हो रही है, वह लातेहार के प्वाइंट जीरो पर कैसे गायब है और कैसे प्वाइंट जीरो पर युद्द ही जीने का एकमात्र रास्ता है। यह ना तो दिल्ली समझ पा रही है और ना ही इसे समझने की जरुरत सत्ता बनाने में भिडे झारखंड की सियासत को है ।

शनिवार, 6 सितंबर 2014

भ्रष्टाचार के सत्ताधारी नैक्सेस को कौन तोड़ेगा

एक लाख 70 हजार करोड़ का 2 जी घोटाला और 1लाख 86 हजार करोड़ के कोयला घोटाले ने मनमोहन सरकार की सियासी नाव में ऐसा छेद किया की सरकार का सूपड़ा ही साफ हो गया और कांग्रेस इतिहास के सबसे बुरे दौर में जा पहुंची। और इसी दौर में इन घोटालों की जांच कर रही सीबीआई के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सरकारी तोता कहने में कोताही नहीं बरती। इसलिये 2 जी सपेक्ट्रम और कोयलागेट की जांच को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में ले लिया। लेकिन दिल्ली के 2 जनपथ यानी सीबीआई डायरेक्टर के सरकारी घर पर मिलने वालो की सूची ने देश के प्रीमियर जांच एजेंसी सीबीआई के डायरेक्टर को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। और अब यह सवाल देश के सामने सबसे बड़ा हो चला है कि क्या कोई पद अगर संवैधानिक हो उसे कटघरे में खड़ा करना प्रधानमंत्री के लिये भी मुश्किल है। हालात परखे तो पहली बार भ्रष्टाचार को लेकर जांच कर रही सीबीआई के डायरेक्टर के घर के मेहमानों ने यह तो सवाल खड़ा कर ही दिया है कि देश में सबसे ताकतवर वहीं है जिसके पास न्याय करने के सबसे ज्यादा अधिकार है। कांग्रेस के दौर में चीफ जस्टिस रहे रंगनाथ मिश्र को सियासी लाभ और बीजेपी के दौर में चीफ जस्टिस

रहे सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने को भी इस हालात से जोड़ा जा सकता है। पूर्व सीएजी विनोद राय की बीजेपी से निकटता भी इस दायरे में आ सकता है। लेकिन बड़ा सवाल तो सीबीआई डायरेक्टर का है, जिन्हें लोकपाल में लाने के खिलाफ वही सियासत थी जो दागियो की फेरहिस्त से इतर मुलाकातियों की सूची में दर्ज है। मुलाकातियों के डायरी के इन पन्नो में जिन नामों को जिक्र बार बार है। उनमें 2 जी स्पेक्ट्रम, कोयला खादानों के अवैध आंवटन, हवाला घपले, सरघाना चीटफंड का घपला यानी किसी आरोपी ने सीबीआई दफ्तर जाकर अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं दिखायी बल्कि सभी ने दसियों बार सीबीआई डायरेक्टर के घर का दरवाजा खटखटाने में कोई हिचक नहीं दिखायी। फेहरिस्त खुद ही कई सवालो को जन्म देती है। मसलन, कोयला घोटाले में फंसे महाराष्ट्र के दर्डा परिवार के देवेन्द्र दर्डा एक दो बार नहीं बल्कि 30 बार सीबीआई डायरेक्टर से मिलने पहुंचे। तीन कोयला खादान पाने वाले एमपी रुगटा तो 40 बार सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे। रिलायंस यानी अनिल अंबानी का नाम भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आया है तो उसके दिल्ली के एक अधिकारी टोनी पचास बार मिलने पहुंचे। इस फेहरिस्त में हवाला घोटाले में फंसे पूर्व सीबीआई डायरेक्टर एपी सिंह और विवादास्पद मोईन अख्तर कुरैशी भी कई बार सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे। खास बात यह भी है कि चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री मोदी भी मीट एक्सपोर्टर मोईन अख्तर कुरैशी को आरोपो के कटघरे में खडा कर चुके थे और उन्होंने कुरैशी के संबंध 10 जनपथ से भी जोड़े थे। मुश्किल सिर्फ यह नहीं है कि सीबीआई डायरेक्टर के घर कोयलाघोटाले के आरोपियों के अलावा 2 जी स्पेक्ट्रम के खेल में फंसे कई कारपोरेट्स के अधिकारी भी पहुंचे। परेशानी का सबब यह है कि 2013-2014 के दौरान आधे दर्जन से ज्यादा अधिकारियों के नाम सीबीआई डायरेक्टर के साथ मुलाकातियों की फेरहिस्त में जिक्र है जिनके खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। और नामों की फेरहिस्त में देश के वीवीआईपी भी है । यानी देश की जिस जांच एंजेसी को लेकर लोगो में भरोसा जागना चाहिये उस जांच एजेंसी का खौफ ही इस तरह हो चुका है कि हर कोई सीबीआई डायरेक्टर की मेहमाननवाजी चाहती है क्योंकि सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे मेहमानों की डायरी के इन पन्नो में सिर्फ दागी नहीं है बल्कि राजनीतिक गलियारे के दलाल भी है राजनेता भी और वीवीआईपी कतार में खड़े खास भी।

तो क्या सीबीआई डायरेक्टर इस देश का सबसे ताकतवर शख्स है जिसके सामने हर किसी को नतमस्तक होना पड़ता है या फिर सीबीआई डायरेक्टर से हर खास की मुलाकात एक आम बात है। क्योंकि नामों की फेरहिस्त में हिन्दुस्तान जिंक के विनिवेश मामले में फंसे वेदांता के अनिल अग्रवाल का नाम भी है। एस्सार कंपनी के प्रतिनिधि सुनील बजाज का भी नाम है जो कंपनी 2 जी मामले में फंसी है। दीपक तलवार का नाम भी है जो राजनीति गलियारे में लॉबिइस्ट माना जाता है। इतना ही नहीं देश के पूर् विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद हो या सेबी के पूर्व अध्यक्ष यू के सिन्हा, पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य हो या दिल्ली के पूर्व पुलिस कमीशनर नीरज कुमार या फिर ओसवाल ग्रूप के अनिल भल्ला या बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन। हर ताकतवर शख्स सीबीआई डायरेक्टर के घर सिर्फ चाय पीने जाता है या सीबीआई डायरेक्टर के घर मेहमान बनना दिल्ली की रवायत है। यह सारे सवाल इसलिये बेमानी है क्योंकि खुद सीबीआई डायरेक्टर को इससे ताकत मिलती है। और ताकतवर लोग अपनी ताकत, ताकतवाले ओहदे के नजदीकी से पाते है। क्योंकि सीबीआई डायरेक्टर ही लगातार बदलते रहे और आखिर में यह कहने से नहीं चुके कि अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जांच पर असर पड़ेगा तो वह खुद को अलग कर सकते है। लेकिन यह हालात क्यों कैसे आ गये। यह भी दिलचस्प है। मीडिया में डायरी की बात आई तो सबसे पहले कहा ऐसी कोई डायरी नहीं है। जब पन्ने छपने लगे तो फिर कहा , मैंने किसी को लाभ नहीं पहुंचाया। अब कहा सुप्रीम कोर्ट चाहे तो वह खुद को जांच से अलग कर लेंगे। मुश्किल सिर्फ इतनी नहीं है बल्कि ताकतवर नैक्सेस कैसे मीडिया को भी दबाना चाहता है यह भी इसी दौर में नजर आया क्योंकि मीडिया डायरी के पन्नों को ना छापे, ना दिखाये या सीबीआई डायरेक्टर एक प्रीमियर पद है इसलिये इसपर रोक लगनी चाहिये। यह सवाल भी सीबीआई डायरेक्टर ने ही सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जब इससे इंकार कर दिया तो फिर सबसे दिलचस्प सच सामने यह आ गया कि जबसे सीबीआई के मेहमानों के नाम सार्वजनिक होने लगे उन 72 घंटों में सीबीआई डायरेक्टर के घर देश का कोई वीवीआईपी चाय पीने नहीं पहुंचा। यानी 2013-14 के दौरान दिल्ली में 2 जनपथ यानी सीबीआई डायरेक्टर का सरकारी निवास जो हर दागी और खास का सबसे चुनिंदा घर था उस घर में जाने वालों ने झटके में ब्रेक लगा दी।

देश में भ्रष्टाचार की असल मुश्किल यही है कि ताकतवर को हर रास्ता कानून की ताकत तबतक देता है जब तक वह कानून की पकड़ में ना आये और इस दौर में जबतक वह चाहे कानून की घज्जिया उड़ा सकता है। क्योंकि ताकतवर लोगों के सरोकार आम से नहीं खास से होते है। और यही नैक्सस इस दौर में सत्ता का प्रतीक बन चुका है। और संसद कुछ कर नहीं पाती क्योंकि वहा भी दागियों की फेरहिस्त सांसदों से नैतिक बल छिन लेती है। और चुनाव के दौर में चुनावी पूंजी को परखे तो ज्यादातर पूंजी उन्हीं कारपोरेट और उघोगपतियों की लगी होती है जो एक वक्त दागी होते है और संसद के जरिये दाग घुलवाने के लिये चुनाव से लेकर सत्ता बनने तक के दौर में राजनेताओं के सबसे करीब हो जाते है!

सोमवार, 1 सितंबर 2014

मोदी के बौद्ध धर्म का प्रेम और हिन्दुत्व राग के पीछे का सच

नरेन्द्र मोदी यूं ही क्योटो के प्रसिद्द तोजी बौद्ध मंदिर में नहीं गये । और उसके बाद किंकाकुजी बौद्दध मंदिर यूं ही नहीं पहुंचे। और इसी बरस नवबंर में होने वाले सार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी नेपाल जायेंगे

तो यूं ही काठमांडू के बौद्धनाथ या स्वंयम्भूनाथ स्तूप के दर्शन करने नहीं जायेंगे या फिर अमिताभा मोनेस्ट्री के दर्शन करने की इत्छा यूं ही नहीं जतायेंगे। यानी नवंबर में सार्क सम्मेलन के दौराम प्रधानमंत्री मोदी

पशुपति नाथ मंदिर नहीं बल्कि बौद्ध मंदिर जायेंग। और सबसे पहले भूटान यात्रा करने भी प्रधानमंत्री मोदी यूं ही नहीं गये। ध्यान दें तो बौद्ध घर्म का जहां जहां प्रचार प्रसार हुआ और जहां जहां की सरकार बौद्ध धर्म से

प्रभावित रही हैं, प्रधानमंत्री मोदी सभी के साथ एक नया रिश्ता बना रहे है और सेतू का काम बौद्ध धर्म कर रहे हैं। तो यह सवाल नागपुर में आंबेडकरवादियो से लेकर यूपी के मायावती के दलित वोट में भी उठने लगा है

कि प्रधानमंत्री मोदी के बौद्ध प्रेम के पीछे की कहानी बौद्ध धर्म प्रभावित देशों के साथ भारत के रिश्तो को नया आयाम देना है या फिर संघ परिवार के विस्तार के लिये गुरु गोलवरकर के दौर की वह सीख है। जिसे

राजनीति के आइने में प्रधानमंत्री मोदी उतारना चाह रहे हैं। संघ के पन्नों को पलटे तो १९७२ में सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ठाणे में पांडुरंग शास्त्री आठवले के निवास पर हुये दस दिन के हुये चिंतन बैठक में इस बात

पर जोर दिया था कि जात-पात, संप्रदाय, भाषा सेउपर उठकर संघ परिवार के विस्तार के लिये सभी को साथ लेना जरुरी है। असर इसी का हुआ कि केरल के दलित चिंतक श्री रंगाहरि आरएसेस के बौद्दिक प्रमुख के पद पर हाल के दिनों तक रहे। और इसी कड़ी में विश्व हिन्दुपरिषद के बालकृष्ण नाईक लंबे समय से दुनियाभर के बौद्ध धर्म को मानने वाले देशो के साथ संपर्क बनाये हुये हैं । और संघ परिवार का भूटान, नेपाल, श्रीलंका ,जापान समेत दर्जनभर देशों के बौद्ध धर्मावलंबी के साथ संबंध बना हुआ है।

लेकिन आजादी के बाद पहली बार संघ परिवार यह महसूस कर रहा है अपने बूते उसकी सरकार बनी है तो संघ की हर उस पहचान को राष्ट्रीयता के साथ जोड़ने का खुला प्रयास भी हो रहा है जिसकी कल्पना इससे पहले की जरुर गयी लेकिन उसे लागू कैसे किया जाये यह सवाल अनसुलझा ही रहा। और चूंकि आरएसएस का प्रचारक रहते हुये नरेन्द्र मोदी ने भी गोलवरकर का पाठ हर प्रचारक की तर्ज पर पढ़ा ही होगा कि विस्तार के लिये जात-पात, वर्ण भाषा संप्रदाय को आडे नहीं आने देना चाहिये। और अब जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री तो सियासत साधने के लिये भी गोलवरकर के मंत्र को राजनीतिक जमीन पर उतारने से चूकेंगे नहीं। यानी महाराष्ट्र में रिपब्लिक पार्टी के नाम पर सियासत करने वाले अंबेडकरवादी हो या अंबेडकर का नाम लेकर दलित राजनीति करने वाली मायवती। खतरे की घंटी दोनों के लिये है। पहली नजर में लग सकता है कि मायावती की समूची सियासत ही आज शून्य पर आ खडी हुई है तो वह प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लेने के लिये जन-धन योजना पर वार करने से चूक नहीं रही है। लेकिन नरेन्द्र मोदी जिस सियासत को साधने के लिये कई कदम आगे बढ़ चुके है, उसके सामने अब मायावती या मुलायम के वार कोई मायने रखेंगे नहीं। क्योंकि राष्ट्रीयता की बिसात पर संघ की उसी सोच को व्यवस्था बनाया जा रहा है जिस दिशा में किसी दूसरे राजनीतिक दल ने काम किया नहीं और आरएसएस अपने जन्म के साथ ही इस काम में लग गया।

वनवासी कल्याण आश्रम जिन क्षेत्रों में सक्रिय है और उस समाज के पिछडी जातियों के जितना करीब होकर काम कर रहा है क्या किसी राजनीतिक दल ने कभी उस समाज में काम किया है। पुराने स्वयंसेवकों से

मिलिये तो वह आज भी कहते मिलेगें कि जेपी के कंघे से राजनीतिक प्रयोग करने वाले बालासाहेब देवरस इंदिरा गांधी के बाद मोरारजी देसाई को नहीं जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते थे । सिर्फ दलित ही नहीं बल्कि जिस हिन्दु शब्द को लेकर सियासी बवाल देश में लगातार बढ़ रहा है उसकी नींव भी कोई आज की नहीं है। जिस नरेन्द्र मोदी को हिन्दूत्व शब्द के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है और अटल बिहारी वाजपेयी का हवाला देकर संघ के प्रचारक का माडरेट चेहरे का जिक्र किया जा रही है क्या १९७४ में लोकसभा में वाजपेयी की दिया भाषण, 'अब हिन्दू मार नहीं खायेगा ' किसी को याद नहीं है। संघ परिवार ने तो वाजपेयी के इस भाषण की करोड़ों कॉपियां छपवाकर देश भर में बंटवायी थीं। यह अलग सवाल है कि १९७७ में विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी ने कभी हिन्दु शब्द का जिक्र सियासी तौर पर नहीं किया। लेकिन संघ के भीतकर का सच यह भी है कि देवरस हो या उससे पहले गोलवरकर या फिर देवरस के बाद में रज्जू भैया। सभी ने वाजपेयी को नेहरु की तर्ज पर देश में सर्वसम्मति वाले भाव को पैदा करने को कहा भी और रास्ता भी बताया। क्योंकि हिन्दु शब्द तो संघ के जन्म के साथ ही जुड़ा। हेडगेवार ने खुले तौर पर हिन्दू होने की वकालत की। तो गोलवरकर ने तो हेडगेवार के दौर से संघ के प्रतिष्ठित स्वयसेवक एकनाथ रानाडे को १९७१-७२ में तब प्रतिनिधि सभा से अलग कर दिया जब उन्होने विवेकानंद शिला स्मारक पर काम करते वक्त विवेकानंद को इंदिरा गांधी के कहने पर हिन्दू संस्कृति की जगह भारतीय संस्कृति का प्रतीक बताया।

उस वक्त गोलवरकर यह कहने से नहीं चूके कि राजनीतिक वजहों से अगर हिन्दू शब्द को दरकिनार करना पड़े तो फिर संघ का आस्तित्व ही संकट में है। और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । और गुरु गोलवरकर के जीवित रहते हुये कभी रानाडे प्रतिनिधी सभा का हिस्सा ना बन पाये। लेकिन देवरस ने अपने दौर में राजनीतिक वजहों से ही हिन्दू शब्द पर समझौता किया। जनता पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर जब चन्द्रशेखर और मधुलिमये ने देवरस को समझाया कि हिन्दू शब्द पर खामोशी बरतनी चाहिये क्योंकि यह राजनीति जरुरत है तो उस वक्त आरएसएस में बकायदा निर्देश जारी हुआ कि कौई हिन्दू शब्द ना बोलें। दरअसल मौजूदा वक्त में दलित सियासत के उफान पर आने के संकेत हो या हिन्दू शब्द के राजनीतिकरण के तो समझना यह होगा कि मौजूदा सरसंघचालक भी देवरस की ही लकीर के है जो खुद हेडगेवार की लकीर पर चले। और तीनों के दौर में ही राजनीतिक प्रयोग हुये और खुले संकेत उभरे कि राजनीतिक प्रयोग आरएसएस कर सकता है और आरएसएस की राजनीतिक सक्रियता उस अंडर-करेंट को उभार सकती है जो राजनीतिक दलों की

सक्रियता से सतह पर नहीं आ पाती। इसलिये तमाम राजनीति दल जो भी सोचे संघ परिवार के भीतर केन्द्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला और गोवा के डिप्टी सीएम फ्रांसिस डिसूजा के बयान को अंडर करेंट के सतह पर आने के नजरिये से ही देखा जा रहा है। संघ परिवार के भीतर हर तबके को साथ जोड़ने की कुलबुलाहट कैसे तेज हुई और कैसे समझौते भी किये गये यह बुद्ध को लेकर संघ की अपनी समझ के बदलने से भी समझा जा सकता है। एक वक्त आरएसएस ने बुद्ध को विष्णु का अवतार कहा। लेकिन आपत्ति होने पर बुद्ध घर्म को अलग से मान्यता भी दी । लेकिन जैसे ही हिन्दू शब्द पर सियासत के लिये मुश्किल हुआ वैसे ही राष्ट्रीयत्व की लकीर आरएसएस ने खींचनी शुरु की। असर इसी का है कि संघ के हर संघठन के साथ राष्ट्रीय शब्द जुड़ा। खुद हेडगेवार ने भी हिन्दु स्वयंसेवक संघ नहीं बनाया बल्कि राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ नाम दिया। और हिन्दु शब्द को सावरकर के हिन्दु महासभा से जोडकर यह बहस करायी कि सावरकर के हिन्दु शब्द में मुस्लिम या ईसाई के लिये जगह नहीं है। लेकिन आरएसएस के हिन्दु शब्द में राष्ट्रीयता का भाव है और इसमें हर घर्म-संप्रदाय के लिये जगह है। लेकिन पहली बार गुरु गोलवरकर १९६३ में जब नेपाल गये और लौटकर उन्होंने चीन का नेपाल में बढते प्रभाव पर नेहरु और लालबहादुर शास्त्री को यह कहकर रिपोर्ट भेजी भारत को अपना अंतराष्ट्रीय प्रभाव विकसित करना चाहिये । नेहरु ने कुछ किया या नहीं लेकिन उसके बाद पहली बार गुरु गोलवरकर ने ही हिन्दू शब्द को खुले तौर पर आत्मसात करते हुये विश्व हिन्दू परिषद का निर्माण किया। और मौजूदा वक्त में इसी विहिप से जुडे प्रचारक बालकृष्ण नाईक अमेरिका छोडकर दिल्ली-नागपुर की गलियां नापने लगे और बौद्ध धर्म को सेतू बनाकर संघ के साथ वास्ता बनाने में जुटे हैं। और मोदी ने क्वेटो के जरीये इस रास्ते को फिलहाल बनारस के नाम पर पकड़ा है लेकिन यह रास्ता सियासी तौर पर कैसे दलित राजनीति करने वालो का डिब्बा

गोल करेगा और बीजेपी को कितना विस्तार देगा इसका इंतजार करना होगा।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

मेंढर के ताबूत से भारी है वाघा बॉर्डर की हर शाम

जिस वक्त पाकिस्तान की हरकतों को लेकर समूचा देश गुस्से में है, उस वक्त भी सरहद पर पाकिस्तान के जवानों से हाथ मिलाना पड़े। जिस वक्त जवानों को पता चला कि सीमा पर तैनात लांसनायक के सिर को पाकिस्तानी सेना ने काट दिया और देश के जवानों को उस वक्त भी अपने गुस्से,आक्रोश को दबाकर पाकिस्तान के जवान से हाथ मिलाकर पड़ोसी और दोस्त का धर्म निभाना पड़े। जिस वक्त दिल्ली में नार्थ-साउथ ब्लाक में पाकिस्तान को खुले तौर पर कठघरे में खड़ा किया जा रहा हो उस वक्त सरहद पर जवानों को यही निर्देश हो कि हर बसंती शाम की तरह ही उन्हें सिर्फ पांव पटक कर गुस्से का इजहार करना है और महज नारों से देश की जय जयकार करनी है तो उस शाम को सरहद पर खड़े होकर डूबते देख किसी भी भारतीय का दिल कैसे डूबेगा। अगर इसे देखना है तो वाघा बॉर्डर पर कोई भी शाम गुजार कर महसूस कर लें। क्योंकि 9 जनवरी की शाम जब जम्मू से लेकर दिल्ली तक और मथुरा से लेकर सीधी [म.प्र.] तक सिर्फ और सिर्फ मातम पसरा था और न्यूज चैनलों के स्क्रीन पर दिल्ली से लेकर इस्लामाबाद तक जेनवा क्नवेंशन से लेकर संयुक्त राष्ट्र की जांच को लेकर सवाल जवाब हो रहे थे, उस शाम भी वाघा बार्डर पर तैनात जवान अपने संबंधों की परंपराओं को ही ढो रहे थे। और वहां मौजूद हजारों हजार लोगों की तादाद को सीमा पर मारे गये दो जवानों के ताबूत से भारी वह पूरी पंरपरा लग रही थी जिसे निभाना भी हर शाम जवानो को ही होता है और उन्हें देखने पहुंचने वालों में राष्ट्रप्रेम जागे यह हुनर भी पैदा करना होता है।

शाम चार बजते बजते वाघा पर नारे गूंजने लगे, हिन्दुस्तान जिन्दाबाद, पाकिस्तान जिन्दाबाद, भारत माता की जय, वंदे मातरम, जियो जियो... पाकिस्तान, जियो जियो...पाकिस्तान। यह वे नारे हैं, जो सरहद की लकीर खींचते भी है और सरहद पिघलाते भी हैं। गुस्से और जोश को हर मौजूद शख्स में भरते भी है और हर गुस्से और आक्रोश में वाघा बॉर्डर पहुंचे हर शख्स को ठंडा करते भी हैं। कमाल का हुनर या पाकिस्तान के साथ रिश्तो का अभूतपूर्व एहसास है वाधा बार्डर पर सात सात फुट के लंबे-तगडे जवानो का नाल लगे जूतों को जमीन पर पटकने से लेकर लोहे के दरवाजे को लहराते हुये हाथ के साथ खोलना। हाथ तान कर संभालना और माथे पर बंधे साफे को संभालने के अंदाज में छू कर अपनी हनक का एहसास कराना। फिर कदमताल करते हुये सरहद की लकीर को पार कर चार गज की जमीन पर खड़े होकर दोस्त ना होने के अंदाज में हाथ मिलाना। और इस माहौल को हवा में नहीं बल्कि वहां मौजूद हजारों हजार लोगों की शिराओ में घोल देना । यह तो हर सामान्य या बसंती शाम का किस्सा है। जब तीन से चार हजार लोग जमा होते हैं। लेकिन जैसे ही जम्मू के करीब मेंढर सीमा पर तैनात लांसनायक के सर कलम किये जाने की खबर ने देश में गुस्सा पैदा किया वैसे ही गुस्से का इजहार करने या अंदर के उबाल को एक एहसास देने वाघा बार्डर पहुंचने वाले लोगों की तादाद में बढोतरी हो गई। जो टैपों 100 रुपये प्रति व्यक्ति लेकर अमृतसर से वाघा बार्डर तक पहुंचा देता है, उसका किराया 125 रुपये हो गया। हजार रुपये वाली टैक्सी का किराया ढाई हजार हो गया। 20 सीटो वाली जो बस साढे तीन हजार रुपये लेती है, उसका किराया पांच हजार रुपये हो गया। देश के अलग अलग हिस्सो से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पहुंचने वाले लोग दोपहर में बाहर निकलते तो वाघा बार्डर का ही सीधा रास्ता पकड़ते। 32 किलोमीटर के रास्ते पर टोल चुकाने के बाद आखिरी पांच किलोमीटर के रास्ते पर कतारों में खड़े सैकड़ों ट्रक को देखकर ही वाघा बार्डर जाने वाली हर भीड़ हिन्दुस्तान जिन्दाबाद और पाकिस्तान के विरोध के नारो से माहौल को और गरमा देती ।

ट्रकों में लदा माल पाकिस्तान जाता है और हर दिन एक हजार से ज्यादा ही ट्रक पर लदा माल अटारी स्टेशन पर मालगाडी में लादा जाता है। इन ट्रको में है क्या। चावल, गेंहू से लेकर खाने पीने की ही हर चीज होती
है। आलू प्याज भी। जी वह भी और चीनी, गुड भी। इसे तो रोक देना चाहिये । लड़ाई और खानपान साथ चल नहीं सकता। महाराष्ट्र से आये शिवकुमार ने जैसे ही ड्राइवर की जानकारी पर पाकिस्तान को लेकर अपने गुस्से का जैसे ही इजहार किया वैसे ही ड्राइवर बोल पड़ा, तुसी चाहे गुस्सा करो, लेकिन यही जोश तो साडा बिजनेस हैगा। क्या मतलब । वाउजी तुसी वाघा बार्डर पहुंचो त्वाउनू खुद समझ विच आ जावेगा। इधर,जैसे जैसे वाघा बॉर्डर नजदीक आ रहा था, वैसे वैसे ट्रकों की सिंगल लेन डबल में बदल गई और चौड़ी सड़क सिमटी सी दिखायी देने लगी। बस, टैपों, टैक्सी, कार, मोटरसाइकिल बड़ी तादाद में गाड़ियों पर नारे लगाते, जोश पैदा करता गाड़ियों का काफिला जब धीरे धीरे एक दूसरे के करीब हो कर चलने लगा तो नारे और तेज हो गये। माहौल ऐसा कि जैसे वाघा वार्डर पर ही आज दो दो हाथ हो जायेंगे। लेकिन ड्राइवर अपने धंधे में मस्त था। हर किसी को वाघा बॉर्डर पहुंचने की जल्दी थी। लेकिन ड्राइवर बायीं तरफ हाथ से दिखा कर बोला यह अटारी स्टेशन है। आखिरी स्टेशन । फिल्म वीरजारा की कुछ शूटिंग भी यहां हुई थी। आप चाहो तो यहां खड़े होकर तस्वीर निकाल लो। वैसे भी बस आगे जायेगी नहीं। बॉर्डर का तमाशा देख कर लौटोगे तो अंधेरा हो जायेगा। कोहरा हो जायेगा। फोटो ले नहीं पाओगे। कुछ जोड़े बस से उतरे अटारी के बोर्ड के आगे खडे होकर तस्वीर खींचने लगे । हर हाथ में मोबाइल कैमरा था तो हर कोई वाघा बॉर्डर को अपने कैमरे में कैद करने लगा। पंजाब पुलिस और बीएसएफ वालो के आपसी झगड़ों की वजह से आज स्थानीय गाड़ियां भी आगे नहीं जा सकती। तो कमोवेश हर कोई पैदल ही वाघा बार्डर चल पड़ा। एक किलोमीटर का रास्ता पैदल नापने में भी वीआईपी लोगों को मुश्किल पैदा हो रही थी। किसी को लंबी हिल परेशान कर रही थी तो किसी को गोद में बच्चा उठाना। कोई आम लोगों की भीड़ में साथ चलने से बचना चाहता था तो कोई अपनी देसी लाल बत्ती की गाडी को वाधा बार्डर तक कुछ भी करके लेना चाहता था। लेकिन आज किसी की नहीं चली तो आम जनता खुश भी थी। सभी पैदल तले तो रास्ते में सेना और जवानों की जो भी महक दिखायी देती उसे हर कोई कैमरे में बंद कर रहा था। लंबे-चौड़े जवानों के बीच खडे होकर गदगद महसूस करने वालों अलग अलग प्रांतों के लोग वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान की तस्वीर लेकर ही खुद के भारतीय होने का धर्म निभा रहे थे। बच्चे नारे लगा रहे थे। बड़ों को यह अच्छा लग रहा था और साढे चार बजे जैसे ही नारे और कदमताल के बीच वाघा बॉर्डर अपनी परंपराओं को जीने लगा। एक साथ,एक जैसे होकर इस और उस पार सरहद के जोश को एक-दूसरे के खिलाफ बनाये रखने के आधे घंटे की कवायद के बाद जब दोनो देश के राष्ट्रीय ध्वज एक साथ उतारे गये और आज की कवायद खत्म किये जाने के ऐलान के साथ ही देश के जीरो माइल तक जाने की इजाजत मिली। तो फिर हर कोई जीरो माइल पत्थर के आगे-पीछे, दांये बायें खड़े होकर तस्वीर ही खींचाने लगा। और इसी एहसास में डूबा रहा कि वह पाकिस्तान और भारत की सीमा पर खड़ा है। हर किसी के लिये यह ताजी हवा के झोंके की तरह था कि वह पाकिस्तान के खेतों को अपनी नंगी आंखों से देख रहा था , कैमरे में कैद कर रहा था। गुस्सा,आक्रोश और नारों की गूंज यहां काफूर थी। खुशी थी। सरहद पर खड़े होकर खुद को कैमरे में कैद करने की कवायद ही नया जोश थी। बीस बीस रुपये में वाघा बार्डर पर होने वाली पूरी कवायद की सीडी हर कोई खरीद रहा था। पक्के अमरुद, गरम मूंगफली और छोले हर कोई खरीद रहा था। बेचने वाला यह कहने से नहीं चूक रहा था कि अमरुद लाहौर के हैं। और खाने वाला कह रहा था कैसे पता चलेगा। अपने जैसा ही तो है। और इसी उत्साह को लिये जब हर कोई वापस लौटने लगे तो रिक्शे वाले, ठेले वाले भी लौटने लगे। दुकाने बंद होने लगी। टैक्सी स्टैंड वाले को भी घर लौटने की जल्दबाजी थी। अटारी स्टेशन भी कोहरे में डूब चुका था। और बस का ड्राइवर भी गाडी स्टार्ट करते ही बोल पड़ा, बाउजी ठंड बढ़ गई है खिडकी बंद कर लो। लेकिन जोश बना रहे यह मनाओ क्योंकि जोश बना रहे तो अपना धंधा मंदा नहीं पड़ता। साड्डे नाल वाधा बार्डर द रिश्ता तो पेट द है। पाकिस्तान के साथ रिश्तों की सारा सच ड्राइवर कह चुका था।

न्यूज चैनलों की पत्रकारिता पर क्यों भारी पड़ा लड़के का इंटरव्यू

अगर ब्राडकास्ट एडिटर एसोशियसेशन [बीईए] की चलती तो बलात्कार की त्रासदी का वह सच सामने आ ही नहीं पाता जो लडकी के दोस्त ने अपने इंटरव्यू में बता दिया। दिल्ली की लडकी के बलात्कार के बाद जिस तरह का आक्रोष दिल्ली ही नहीं समूचे देश की सडको पर दिखायी दिया उसे दिखाने वाले राष्ट्रीय न्यूज चैनलो ने ही स्वयं नियमन की ऐसी लक्ष्मण रेखा अपने टीवी स्क्रिन से लेकर पत्रकारिता को लेकर खिंची कि झटके में पत्रकारिता हाशिये पर चली गई और चैनलो के कैमरे ही संपादक की भूमिका में आ गये। यानी कैमरा जो देखे वही पत्रकारिता और कैमरे की तस्वीरो को बडा बताना या कुछ छुपाना ही बीईए की पत्रकारिता। जरा सिलसिलेवार तरीके से न्यूज चैनलो की पत्रकारिता के सच को बलात्कार के बाद देश में उपजे आक्रोष तले स्वय नियमन को परखे। लडकी का वह दोस्त जो एक न्यूज चैनल के इंटरव्यू में प्रगट हुआ और पुलिस से लेकर दिल्ली की सडको पर संवेदनहीन भागते दौडते लोगो के सच को बताकर आक्रोष के तौर तरीको को ही कटघरे में खडा कर गया। वह पहले भी सामने आ सकता था।

पुलिस जब राजपथ से लेकर जनपथ और इंडियागेट से लेकर जंतर-मंतर पर आक्रोष में नारे लगाते युवाओ पर पानी की बौछार और आंसू गैस से लेकर डंडे बरसा रही थी अगर उस वक्त यह सच सामने आ चुका होता कि दिल्ली पुलिस तो बलात्कार की भुक्तभोगी को किस थाने और किस अस्पताल में ले जाये इसे लेकर आधे घंटे तक भिडी रही तो क्या राजपथ से लेकर जंतर मंतर पर सरकार में यह नैतिक साहस रहता कि उसी पुलिस के आसरे युवाओ के आक्रोष को थामने के लिये डंडा,आंसूगैस या पानी की बौछार चलवा पाती। या फिर जलती हुई मोमबत्तियो के आसरे अपने दुख और लंपट चकाचौंध में खोती व्यवस्था पर अंगुली उठाने वाले लोगो का यह सच पहले सामने आ जाता कि सडक पर लडकी और लडका अद्दनग्न अवस्था में पडे रहे और कोई रुका नहीं। जो रुका वह खुद को असहाय समझ कर बस खडा ही रहा। अगर यह इंटरव्यू पहले आ गया होता तो न्यूज चैनलो पर दस दिनो तक लगातार चलती बहस में हर आम आदमी को यह शर्म तो महसूस होती ही कि वह भी कहीं ना कही इस व्यवस्था में गुनहगार हो गया है या बना दिया गया है। लेकिन इंटरव्यू पुलिस की चार्जशीट दाखिल होने के बाद आया। यानी जो पुलिस डर और खौफ का पर्याय अपने आप में समाज के भीतर बन चुकी है उसे ही जांच कार्रवाई करनी है। सवाल यही से खडा होता है कि आखिर जो संविधान हमारी संसदीय व्यवस्था या सत्ता को लेकर चैक एंड बैलेस की परिस्थिया पैदा करना चाहता है , उसके ठीक उलट सत्ता और व्यवस्था ही सहमति का राग लोकतंत्र के आधार पर बनाने में क्यो लग चुकी है और मीडिया इसमें अहम भूमिका निभाने लगा है।

यह सवाल इसलिये क्योकि मीडिया की भूमिका मौजूदा दौर में सबसे व्यापक और किसी भी मुद्दे को विस्तार देने वाली हो चुकी है। इसलिये किसी भी मुद्दे पर विरोध के स्वर हो या जनआंदोलन सरकार सबसे पहले मीडिया की नब्ज को ही दबाती है। मुश्किल सिर्फ सरकार की एडवाइजरी का नहीं है सवाल इस दौर में मीडिया के रुख का भी है जो पत्रकारिता को सत्ता के पिलर पर खडा कर परिभाषित करने लगी है। बलात्कार के खिलाफ जब युवा रायसीना हिल्स के सीने पर चढे तो पत्रकारिता को सरकार की धारा 144 में कानून उल्लघन दिखायी देने लगा। लोगो का आक्रोष जब दिल्ली की हर सडक पर उमडने लगा तो मेट्रो की आवाजाही रोक दी गई लेकिन पत्रकारिता ने सरकार के रुख पर अंगुली नहीं उठायी बल्कि मेट्रो के दर्जनो स्टेशनो के बंद को सुरक्षा से जोड दिया। जब इंडिया-गेट की तरफ जाने वाली हर सडक को बैरिकेट से खाकी वर्दी ने कस दिया तो न्यूज चैनलो की पत्रकारिता ने सरकार की चाक-चौबंद व्यवस्था के कसीदे ही गढे।

न्यूज चैनलो की स्वयं नियमन की पत्रकारिय समझ ने न्यूज चैनलो में काम करने वाले हर रिपोर्टर को यह सीख दे दी की सत्ता बरकार रहे। सरकार पर आंच ना आये। और सडक का विरोध प्रदर्शन हदो में चलता रहे यही दिखाना बतानी है और लोकतंत्र यही कहता है। इसलिये सरकार की एडवाइजरी से एक कदम आगे बीईए की गाईंडलाइन्स आ गई। सिंगापुर से ताबूत में बंद लडकी दिल्ली कैसे रात में पहुंची और सुबह सवेरे कैसे लडकी का अंतिम सस्कार कर दिया गया। यह सब न्यूज चैनलो से गायब हो गया क्योकि बीईए की स्वयंनियमन पत्रकारिता को लगा कि इससे देश की भावनाओ में उबाल आ सकता है या फिर बलात्कार की त्रासदी के साथ भावनात्मक खेल हो सकता है। किसी न्यूज चैनल की ओबी वैन और कैमरे की भीड ने उस रात दिल्ली के घुप्प अंधेरे को चीरने की कोशिश नहीं की जिस घुप्प अंघेरे में राजनीतिक उजियारा लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और दिल्ली की सीएम से लेकर विपक्ष के दमदार नेता एकजूट होकर आंसू बहाकर ताबूत में बंद लडकी की आखरी विदाई में शरीक हुये।

अगर न्यूज चैनल पत्रकारिता कर रहे होते तो 28 दिसबंर की रात जब लडकी को इलाज के लिये सिंगापुर ले जाया जा रहा था उससे पहले सफदरजंग अस्पताल में लडकी के परिवार वाले और लडकी का साथी किस अवस्था में में रो रो कर लडकी का मातम मना रहे थे यह सब तब सामने ना आ जाता जो सिंगापुर में 48 घंटे के भीतर लडकी की मौत को लेकर दिल्ली में 31 दिसबंर को सवाल उठने लगे। आखिर क्यो कोई न्यूज चैनल उस दौर में लडकी के परिवार के किसी सदस्य या उसके साथी लडके की बात को नहीं दिखा रहा था। जबकि लडका और उसका मामा तो हर वक्त मीडिया के लिये उपलब्ध था। परिवार के सदस्य हो या लडकी का साथी। आखिर सभी को अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने ही कह रखा था कि मीडिया के सामने ना जाये। मीडिया से बातचीत ना करें। केस बिगड सकता है।

वहीं जिस तरह बलात्कार को लेकर सडक पर सरकार-पुलिस और व्यवस्था को लेकर आक्रोष उमडा उसने ना सिर्फ न्यूज चैनलो के संपादको को बल्कि संपादको ने अपने स्ंवय नियमन के लिये मिलकर बनायी ब्राडकास्ट एडिटर एसोसियशन यानी बीईए के जरीये पत्राकरिता को ताक पर रख सरकारनुकुल नियमावली बनाकर काम करना शुरु कर दिया। मसलन नंबर वन चैनल पर लडके के मामा का इंटरव्यू चला तो उसका चेहरा भी ब्लर कर दिया गया। एक चैनल पर लडकी के पिता का इंटरव्यू चला तो चैनल का एंकर पांच मिनट तक यही बताता रहा कि उसने क्यो लडकी के पिता का नाम , चेहरे , जगह यानी सबकुछ गुप्त रखा है। जबकि इन दोनो के इंटरव्यू लडकी की मौत के बाद लिये गये थे। यानी हर स्तर पर न्यूज चैनल की पत्रकारिता सत्तानुकुल एक ऐसी लकीर खिंचती रही या सत्तानुकुल होकर ही पत्रकारिता करनी चाहिये यह बताती रही। यानी ध्यान दें तो बीईए बना इसलिये था कि सरकार चैनलो पर नकेल ना कस लें। और जिस वक्त सरकार न्यूज चैनलो पर नकेल कसने की बात कर रही थी तब न्यूज चैनलो का ध्यान खबरो पर नहीं बल्कि तमाशे पर ज्यादा था। 

इसिलिये स्वयं नियमन का सवाल उठाकर न्यूज चैनलो के खुद को एकजूट किया और बीईए बनाया। लेकिन धीरे धीरे यही बीईए कैसे जडवत होता गया संयोग से बलात्कार की कवरेज के दौरान लडकी के दोस्त के उस इंटरव्यू ने बता दिया जो ले कोई भी सकता था लेकिन दिखाने और लेने की हिम्मत उसी संपादक ने दिखायी जो खुद कटघरे में है और बीईए ने उसे खुद से बेदखल कर दिया है। इसलिये अब सवाल कही बडा है कि न्यूज चैनलो को स्वयं नियमन का ऐलान बीईए के जरीये करना है या फिर पत्रकारिता का मतलब ही स्वयं नियमन होता है जो सत्ता और सरकार से डर कर संपादको का कोई संगठन बना कर पत्रकारिता नहीं करते। बल्कि किसी रिपोर्टर की रिपोर्ट भी कभी कभी संपादक में पैनापन ला देती है। संयोग से न्यूजचैनलो की पत्रकारिता संपादको के स्वंय नियमन पर टिक गयी है इसलिये किसी चैनल का कोई रिपोर्टर यह खडा होकर भी नहीं कह पाया कि जब लडकी को इलाज के लिये सिंगापुर ले जाया जा रहा था उसी वक्त उसके परिजनो और इंटरव्यू देने वाले साथी लडके ने मौत के गम को जी लिया था।

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

किसकी मुट्ठी में देश की तकदीर?

चालीस बच्चों के मां-बाप अपने बच्चो के साथ आगरा में पांच दिनों तक अपने खर्चे पर इसलिये रुके रहे कि साबुन बनाने वाली कंपनी के विज्ञापन में उनके बच्चे नजर आ जाये। सभी बच्चे चौथी-पांचवी के छात्र थे। और ऐसा भी नहीं इन चार पांच दिनों के दौरान बच्चो के स्कूल बंद थे। या फिर बच्चों को मोटा मेहताना मिलना था। महज दो से चार हजार रुपये की कमाई होनी थी। और विज्ञापन में बच्चे का चेहरा नजर आ जाये इसके लिये मां-बाप ही इतने व्याकुल थे कि वह ठीक उसी तरह काफी कुछ लुटाने को तैयार थे जैसे एक वक्त किसी स्कूल में दाखिला कराने के लिये मां-बाप हर डोनेशन देने को तैयार रहते हैं। तो क्या बच्चों का भविष्य अब काम पाने और पहचान बना कर नौकरी करने में ही जा सिमटा है। या फिर शिक्षा हासिल करना इस दौर में बेमानी हो चुका है। या शिक्षा के तौर तरीके मौजूदा दौर के लिये फिट ही नहीं है । तो मां बाप हर उस रास्ते पर बच्चों को ले जाने के लिये तैयार है, जिस रास्ते पढ़ाई-लिखाई मायने नहीं रखती है। असल में यह सवाल इसलिये कहीं ज्यादा बड़ा है क्योंकि सिर्फ आगरा ही नहीं बल्कि देश के अलग अलग हिस्सों में करीब 40 लाख से ज्यादा बच्चे टेलीविजन विज्ञापन से लेकर मनोरंजन की दुनिया में सीधी भागेदारी के लिये पढ़ाई-लिखाई छोडकर भिड़े हुये हैं। और इनके अपने वातावरण में टीवी विज्ञापन में काम करने वाले हर उस बच्चे की मान्यता उन दूसरे बच्चो से ज्यादा है, जो सिर्फ स्कूल जाते हैं। सिर्फ छोटे-छोटे बच्चे ही नहीं बल्कि दसवी और बारहवी के बच्चे जिनके लिये शिक्षा के मद्देनजर कैरियर का सबसे अहम पढ़ाव परीक्षा में अच्छे नंबर लाना होता है, वह भी विज्ञापन या मनोरंजन की दुनिया में कदम रखने का कोई मौका छोड़ने को तैयार नहीं होते।

आलम तो यह है कि परीक्षा छोड़ी जा सकती है लेकिन मॉडलिंग नहीं। मेरठ में ही 12 वी के छह छात्र परीक्षा छोड़ कम्प्यूटर साइंस और बिजनेस मैनेजमेंट इस्ट्टयूट के विज्ञापन फिल्म में तीन हप्ते तक लगे रहे। यानी पढ़ाई के बदले पढाई के संस्थान की गुणवत्ता बताने वाली फिल्म के लिये परीक्षा छोड़ कर काम करने की ललक। जाहिर है यहां भी सवाल सिर्फ पढाई के बदले मॉडलिंग करने की ललक का नहीं है बल्कि जिस तरह शिक्षा को बाजार में बदला गया है और निजी कॉलेजो से लेकर नये नये कोर्स की पढाई हो रही है, उसमें छात्र को ना तो कोई भविष्य नजर आ रहा है और ना ही शिक्षण संस्थान भी शिक्षा की गुणवत्ता को बढाने के लिये कोई मशक्कत कर रहे है। सिवाय अपने अपने संस्थानो को खूबसूरत तस्वीर और विज्ञापनों के जरिये उन्हीं छात्रों के विज्ञापन के जरीये चमका रहे हैं जो पढाई-परीक्षा छोड़ कर माडलिंग कर रहे है। स्कूली बच्चों के सपने ही नहीं बल्कि जीने के तरीके भी कैसे बदल रहे है इसकी झलक इससे भी मिल सकती है कि एक तरफ सीबीएसई 10वीं और 12वीं की परीक्षा के लिये छात्रों को परिक्षित करने के लिये मानव संसाधन मंत्रालय से तीन करोड़ का बजट पास कराने के लिये जद्दोजहद कर रहा है। तो दूसरी तरफ स्कूली बच्चों के विज्ञापन फिल्म का हर बरस का बजट दो सौ करोड रुपये से ज्यादा का हो चला है। एक तरफ 14 बरस के बच्चो को मुफ्त शिक्षा देने का मिशन सरकार मौलिक अधिकार क जरिये लागू कराने में लगी है।

तो दूसरी तरफ 14 बरस के बच्चो के जरिये टीवी मनोरंजन और सिल्वर स्क्रीन की दुनिया हर बरस एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा बना रही है। जबकि मुफ्त शिक्षा देने का सरकारी बजट इस मुनाफे का दस फीसदी भी नहीं है। यहां सवाल सिर्फ प्राथमिकताएं बदलने का नहीं है। सवाल है कि देश के सामने देश के भविष्य के लिये कोई मिशन,कोई एजेंडा नहीं है। इसलिये जिन्दगी जीने की जरुरतें, समाज में मान्यता पाने का जुनून और आगे बढ़ने की सोच उस बाजार पर आ टिका है, जहां मुनाफा और घाटे का मतलब सिर्फ भविष्य की कमाई है। और कमाई के तरीके भी सूचना तकनीक के गुलाम हो चुके हैं। यानी वैसी पढ़ाई का मतलब वैसे भी बेमतलब सा है, जो इंटरनेट या गूगल से मिलने वाली जानकारी से आगे जा नहीं पा रही है। और जब गूगल हर सूचना को देने का सबसे बेहतरीन मॉडल बन चुका है और शिक्षा का मतलब भी सिर्फ सूचना के तौर पर जानकारी हासिल करना भर ही बच रहा है तो फिर देश में पढाई का मतलब अक्षर ज्ञान से आगे जाता कहा है। इसका असर सिर्फ मॉडलिंग या बच्चों के विज्ञापन तक का नहीं है।

समझना यह भी होगा कि यह रास्ता कैसे धीरे धीरे देश को खोखला भी बना रहा है। क्योंकि मौजूदा वक्त में ना सिर्फ उच्च शिक्षा बल्कि शोध करने वाले छात्रों में भी कमी आई है, और जिन विषयों पर शोध हो रहा है, वह विषय भी संयोग से उसी सूचना तकनीक से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं, जिससे आगे शिक्षा व्यवस्था नहीं बढ पा रही है। यह सोच समूचे देश पर कैसे असर डाल सकती है यानी ज्यादा कमाई,ज्यादा मान्यता, ज्यादा चकाचौंध और कोई भी वस्तु जो ज्यादा से जुड़ रही है, जब उसमें शिक्षा कहीं फिट बैठ नहीं रही। ज्यादा कमाई और ज्यादा मान्यता की इस सोच के असर की व्यापकता देश की सेना के मौजूदा हालात से भी समझी जा सकती है। सिर्फ 2012 में दस हजार से ज्यादा सेना के अधिकारियों ने रिटायरमेंट लेकर निजी क्षेत्रो में काम शुरु कर दिया। क्योंकि वहां ज्यादा कमाई। ज्यादा मान्यता थी। मसलन बीते पांच बरस में वायुसेना के जहाज उड़ाने वाले 571 पायलेट नौकरी छोड निजी विमानों को उड़ाने लगे, क्योंकि वहां ज्यादा कमाई थी और अपने वातावरण में ज्यादा मान्यता थी। किसी भी निजी हवाई जहाज को उडाने के जरिये जो मान्यता समाज में मिलती उतनी पूछ वायु सेना से जुड़ कर नही रहती। चाहे सेना का फाइटर विमान ही क्यों ना उड़ाने का मौका मिल रहा हो। सोच कैसे क्यों बदली है। इसकी नींव को जानने से पहले इसकी पूंछ को सेना के जरिये ही पकड लें। क्योंकि भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जहां देश की सेना में 65 हजार से ज्यादा पद खाली हैं। और सेना में नौकरी ही सही उसके लिये भी कोई शामिल होने की जद्दोजहद नहीं कर रहा है। करीब 13 हजार ऑफिसर रैंक के अधिकारियो के पद खाली है। लेकिन जिस दौर में यह पद खाली हो रहे थे, उसी दौर में सेना छोड़ कर अधिकारी देश की निजी कंपनियों के साथ जुड़ रहे थे। कहीं डायरेक्टर का पद तो कही चैयरमैन का पद।

कहीं बोर्ड मेबर तो कही सुरक्षा सर्विस खोलकर नया बिजनेस शुर करने की कवायद। यह सब उसी दौर में हुआ, जिस दौर में सेना को सेना के अधिकारी ही टाटा-बाय बाय बोल रहे थे। देश के लिये यह सवाल कितना आसान और हल्का बना दिया गया है,यह इससे भी समझा जा सकता है कि संसद में सेना के खाली पदों की जानकारी देते हुये रक्षा मंत्री साफ कहते हैं कि थल सेना में 42 हजार से ज्यादा, नौ सेना में 16 हजार से ज्यादा और वायुसेना में करीब 8 हजार पद खाली है। और देश भर में जितनी भी एकडमी है जो सेना के लिये युवाओं को तैयार करती है अगर सभी को मिला भी दिया जाये तो भी हर बरस दस बजार कैडेट भी नहीं निकल पाते। जबकि इसी दौर में हर बरस औसतन बीस हजार से ज्यादा युवाओं को मनोरंजन उद्योग अपने में खपा लेता है। उन्हें काम मिल जाता है। और जिन स्कूलों की शिक्षा दीक्षा पर सरकार नाज करती है और प्राइमरी के एडमिशन से लेकर उच्च शिक्षा देने वाले संस्थानों में डोनेशन के जरिये एडमिशन की मारामारी में युवा फंसा रहता, अब वही बच्चे बड़े होने के साथ ही तेजी से उसी शिक्षा व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर चकाचौंध की दुनिया में कूद रहे है। महानगर और छोटे शहरों के उन बच्चो के मां-बाप जो कल तक अत्याधुनिक स्कूलों में एडमिशन के लिये हाय-तौबा करते हुये कुछ भी डोनेशन देने को तैयार है, अब वही मां-बाप अपने बच्चे का भविष्य स्कूलों की जगह विज्ञापन या मनोरंजन की दुनिया में सिल्वर स्क्रीन पर चमक दिखाने से लेकर सड़क किनारे लगने वाले विज्ञापन बोर्ड पर अपने बच्चों को टांगने के लिये तैयार है। आंकडे बताते हैं कि हर नये उत्पाद के साथ औसतन देश भर में 100 बच्चे उसके विज्ञापन में लगते है। इस वक्त करीब दो सौ ज्यादा कंपनियां विज्ञापनों के लिये देश भर में बच्चों को छांटने का काम इंटरनेट पर अपनी अलग अलग साइट के जरिये कर रही है। इन दो सौ कंपनियों ने तीस लाख बच्चों का रजिस्ट्रेशन कर रखा है। और इनका बजट ढाई हजार करोड़ से ज्यादा का है। जबकि देश की सेना में देश का नागरिक शामिल हो, इस जज्बे को जगाने के लिये सरकार 10 करोड़ का विज्ञापन करने की सोच रही है। यानी सेना में शामिल हो , यह बात भी पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर मॉडलिंग करने वाले युवा ही देश को बतायेंगे। तो देश का रास्ता जा किधर रहा है यह सोचने के लिये इंटरनेट , गूगल या विज्ञापन की जरुरत नहीं है। बस बच्चों के दिमाग को पढ लीजिये या मां-बाप के नजरिये को समझ लीजिये जान जाइयेगा।

जिन्हें नाज है हिन्द पर वह कठघरे में है

पुण्य प्रसून बाजपेयी

जिनके खिलाफ आवाज उठी वे ही अंतिम संस्कार में क्यों थे

हमने शीला दीक्षित को जंतर-मंतर आने से रोका। शीला दीक्षित अंतिम संस्कार में चेहरा दिखा आयीं। हमने मनमोहन सिंह की चकाचौंध व्यवस्था में खोते मानवीय मूल्यों के खिलाफ आवाज उठायी। मनमोहन सिंह खुद सिंगापुर से आये कौफिन में बंद लडकी को रिसीव करने पहुंच गये। हमने सोनिया गांधी को अंधी होती व्यवस्था के खिलाफ जगाने की कोशिश की तो हमें 10 जनपथ के बाहर का रास्ता दिखा कर लड़की के शव पर चंद आंसू बहाने सोनिया गांधी ही हवाई अड्डे पहुंच गयीं। हम नेताओं के तौर तरीके, मंत्रियों के सलीके और पुलिस की ताकत के खिलाफ एकजुट हुये तो नेता, मंत्री और पुलिस ही रात के अंधेरे में मानवीयता का गला घोंट कर सरोकार को दरकिनार कर अपनी मौजूदगी में लड़की का अंतिम संस्कार कर शांति बनाये रखने की अपील कर खुश हो गये। हम क्यों शरीक नहीं हो पाये अंतिम संस्कार में। हम क्या करें। हमें लगा इस व्यवस्था में जो जो दोषी हैं, उन्हें आम लोग एकजुट होकर कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। लेकिन जिस तरह कठघरे में खड़ी व्यवस्था चलाने वाले ही जब पीड़ित लड़की को सफदरजंग से सिंगापुर भेजने का निर्णय लेते हैं और सिंगापुर से ताबूत में बंद लडकी के दिल्ली लौटने पर उसे श्रद्यांजलि देकर अपने होने का एहसास हमे ही कराते हैं, जैसे वह ना हो तो देश रुक जायेगा यह कब तक चलेगा।

यह जंतर-मंतर पर बैटरी से चलने वाले माइक से खामोशी में गूंजती ऐसी आवाज है जिन्हें सुनने के बाद करीब पांच से सात सौ लोगों के सामने यह सवाल खुद ब खुद खड़ा हो जाता है कि उनके विरोध का अब तक का तरीका सरकार-व्यवस्था के सामने कितना अपाहिज सा है। जो देश भर में बन रहे इंडियागेट या मुनीरका या जंतरमंतर से आवाज उठती है, वह मीडिया के जरीये समूचा देश देख तो लेता है लेकिन वह सिवाय भीडतंत्र से आगे क्यों निकल नहीं पाती। बड़े-बुजुर्ग ही नहीं बल्कि स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले लड़के लड़कियां भी जिस शिद्दत से अपने गुस्से का इजहार कागजों पर स्लोगन लिखते हुये और बीच बीच में नारे लगाकर करते हैं, वह किसके खिलाफ है। जो पुलिस नाकाबिल निकलती है, वही पुलिस लड़की के शव की सुरक्षा में लगती है। जो पुलिस सड़क पर अपराधियों को पकड़ नहीं सकती, वही पुलिस इंडिया गेट और लुटियन्स की दिल्ली की सुरक्षा में लग जाती है। जो पुलिस आम आदमी के खिलाफ अन्याय को एफआईआर नहीं मानती वही पुलिस अपनी एफआईआर में इंडियागेट से लेकर जंतरमंतर तक खड़े अपने विरोध के स्वर को अन्याय मान लेती है। जो सरकार चकाचौंध दिल्ली में लुटती अस्मत को संयोग मान कर आंकड़ों तले दिल्ली को सुरक्षित और विकासमय होना करार देती है, वही सरकार अपने विरोध को दबाने के लिये विकास के पायदान पर खड़ी मेट्रो को बंद कर देती है। सत्ता की तरफ जाती हर सड़क पर आवाजाही रोकने के लिये रविवार के दिन भी खाकी का आतंक खुले तौर पर तैनात करने से नही कतराती। यह सारे सवाल जंतर मंतर की सड़कों पर सौ-सौ मीटर तक पड़े उन सफेद कैनवास में दर्ज हैं, जिसे अपने आक्रोश से हर बच्चे ने रंग रखा है। सफेद कागज रंगते रंगते हाथ थकते हैं तो खड़ा होकर कुछ ऐसे ही सवालों को हवा में उछालता है और गुस्से में किसी बुजुर्ग से पूछता है कि क्या आजादी इसी का नाम है। क्या इसी भारत पर नाज है। और सवालो के बीच उसी गुस्से में कोई पिता की उम्र का व्यक्ति जवाब भी देता है, करें क्या जो कुछ नहीं कर सकते वही नेता बन कर सरकार चला रहे हैं। नेता को पढ़ाई-लिखाई कर नौकरी के लिये संघर्ष तो करना नही है। जिन्हे जिन्दगी जीने के लिये संघर्ष करना पडता है उनके लिये सरकार का मतलब सिर्फ वोट डालना है। आवाज तो वोट के खिलाफ भी उठानी होगी। नहीं तो हमारा वोट और हमारी सरकार। हमारी सरकार और हमारी पुलिस। हमारी पुलिस और हमारा कानून।

तो फिर अपराधी भी तो हमीं हैं। यह सब बदलेगा कैसे। सवाल सुधार का नहीं है। हर तरीके को बदलने का है। नौवीं कक्षा की छात्रा हो या मिरांडा हाउस में पीजी की छात्रा। वह यह समझने को तैयार नहीं हैं कि जो उनके सवाल है वह सवाल सरकार के मन में क्यों नहीं रेंगते। क्या देश इतना बदल गया है कि दिल्ली में रहते हुये भी मंत्री और जनता की समझ एक नहीं रही। सरकार सड़कों पर खाकी वर्दी का खौफ दिखाकर हमें कानून सिखाना चाहती है। लेकिन कानून देश और समाज की सोच को खत्म कर कैसे चल सकता है। सरकार किस पर राज करना चाहती है। राजनीतिकशास्त्र या समाजशास्त्र नहीं बल्कि कैमिस्ट्री की पढाई कर रही दिल्ली विश्वविघालय की छात्रा के सवाल समाज की जरुरत को लेकर है। माइक हाथ में थामकर वह सीधे सरकारी तंत्र पर अंगुली उठाती है। फांसी से समाधान नहीं होगा। जो बलात्कारी हैं, उन्हें थाने से लेकर अदालत और अदालत से लेकर जेल ले जाने के दौरान चेहरे ढके क्यों गये। क्यों नहीं उनके चेहरे पूरे देश को दिखाये गये। बलात्कारी की बहन, मां, बेटी के सामने यह सवाल आना चाहिये और बलात्कारी के सामने भी यह सवाल आना चाहिये कि बलात्कार करने के बाद उसके अपनो का समाज में जीना मुश्किल होगा। सामाजिक बहिष्कार की स्थिति हर बलात्कारी के सामने होनी चाहिये। फांसी तो अपराध की सजा है । लेकिन जिस दिमाग और माहौल की यह उपज है, उसें समाज की एकजुटता ही रोक सकती है। लेकिन सरकार या नेताओ का नजरिया समाज को महत्व देना ही नहीं चाहता। वह हर अपराध के लिये कानून को देखता है। ऐसे में यह सवाल बार बार आयेगा कि कानून लागू करने वाला और लागू करवाने वाला अगर अपराधी निकलेगा तो फिर समाधान का रास्ता निकलेगा कैसे। तो फिर संसद के विशेष सत्र का भी मजलब क्या है,जिसकी मांग विपक्ष कर रहा है। सही कह रहे हैं। संसद की महत्ता के आगे समाजिक दबाव बेमानी रहे यह हर नेता चाहता है।

कानून तोड़ने पर पुलिस और अदालत काम करती है। लेकिन कानून बरकरार रहे इसके लिये सामाजिक माहौल होना चाहिये। और फिलहाल समाज से कोई सरोकार सरकार का तो नहीं है। सही है सिर्फ सरकार ही नहीं उस राजनीति का भी नहीं है जो सत्ता के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार है। किसी हद तक ना कहिये, संसद के भीतर तो अब अपराध करने वालों की पूरी फेहरिस्त है। 162 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले किसी ना किसी थाने में दर्ज हैं। लेकिन राजनीति में सभी माफ है। क्योंकि राजनीतिक आरोपों की छांव हर अपराधी को बचा देती है। यह सवाल जवाब चकाचौंध तो नहीं लेकिन पेट भरे आधुनिक स्कूल कॉलेजों में पढ़ रहे लड़के लड़कियो के सवाल हैं, जो आपस में संवाद बना रहे हैं । जंतर-मंतर की सड़क के दोनों किनारे पुलिस के जमावडे के बीच गोल घेरा बना कर बैटरी के माइक या बिना माइक ही चिल्ला चिल्ला कर अपने होने का एहसास करा रहे हैं। इन्हें डर लग रहा है कल से लोगों की तादाद भी कम होती जाये। लोग फिर ना भुल जाये। वह मीडिया से गुहार लगाते हैं, आप तो बोलिये जिससे लोग आते रहे। विरोध करते रहें। नहीं तो सरकार फिर कहेगी यह पिकनिक मनाने आये थे और हमें अपने लोकतंत्र पर नाज है।

All Right Reserved aawaz-e-hind.in.|Online News Channel

जिन्हें नाज है हिन्द पर वह कठघरे में है

जिनके खिलाफ आवाज उठी वे ही अंतिम संस्कार में क्यों थे

हमने शीला दीक्षित को जंतर-मंतर आने से रोका। शीला दीक्षित अंतिम संस्कार में चेहरा दिखा आयीं। हमने मनमोहन सिंह की चकाचौंध व्यवस्था में खोते मानवीय मूल्यों के खिलाफ आवाज उठायी। मनमोहन सिंह खुद सिंगापुर से आये कौफिन में बंद लडकी को रिसीव करने पहुंच गये। हमने सोनिया गांधी को अंधी होती व्यवस्था के खिलाफ जगाने की कोशिश की तो हमें 10 जनपथ के बाहर का रास्ता दिखा कर लड़की के शव पर चंद आंसू बहाने सोनिया गांधी ही हवाई अड्डे पहुंच गयीं। हम नेताओं के तौर तरीके, मंत्रियों के सलीके और पुलिस की ताकत के खिलाफ एकजुट हुये तो नेता, मंत्री और पुलिस ही रात के अंधेरे में मानवीयता का गला घोंट कर सरोकार को दरकिनार कर अपनी मौजूदगी में लड़की का अंतिम संस्कार कर शांति बनाये रखने की अपील कर खुश हो गये। हम क्यों शरीक नहीं हो पाये अंतिम संस्कार में। हम क्या करें। हमें लगा इस व्यवस्था में जो जो दोषी हैं, उन्हें आम लोग एकजुट होकर कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। लेकिन जिस तरह कठघरे में खड़ी व्यवस्था चलाने वाले ही जब पीड़ित लड़की को सफदरजंग से सिंगापुर भेजने का निर्णय लेते हैं और सिंगापुर से ताबूत में बंद लडकी के दिल्ली लौटने पर उसे श्रद्यांजलि देकर अपने होने का एहसास हमे ही कराते हैं, जैसे वह ना हो तो देश रुक जायेगा यह कब तक चलेगा।

यह जंतर-मंतर पर बैटरी से चलने वाले माइक से खामोशी में गूंजती ऐसी आवाज है जिन्हें सुनने के बाद करीब पांच से सात सौ लोगों के सामने यह सवाल खुद ब खुद खड़ा हो जाता है कि उनके विरोध का अब तक का तरीका सरकार-व्यवस्था के सामने कितना अपाहिज सा है। जो देश भर में बन रहे इंडियागेट या मुनीरका या जंतरमंतर से आवाज उठती है, वह मीडिया के जरीये समूचा देश देख तो लेता है लेकिन वह सिवाय भीडतंत्र से आगे क्यों निकल नहीं पाती। बड़े-बुजुर्ग ही नहीं बल्कि स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले लड़के लड़कियां भी जिस शिद्दत से अपने गुस्से का इजहार कागजों पर स्लोगन लिखते हुये और बीच बीच में नारे लगाकर करते हैं, वह किसके खिलाफ है। जो पुलिस नाकाबिल निकलती है, वही पुलिस लड़की के शव की सुरक्षा में लगती है। जो पुलिस सड़क पर अपराधियों को पकड़ नहीं सकती, वही पुलिस इंडिया गेट और लुटियन्स की दिल्ली की सुरक्षा में लग जाती है। जो पुलिस आम आदमी के खिलाफ अन्याय को एफआईआर नहीं मानती वही पुलिस अपनी एफआईआर में इंडियागेट से लेकर जंतरमंतर तक खड़े अपने विरोध के स्वर को अन्याय मान लेती है। जो सरकार चकाचौंध दिल्ली में लुटती अस्मत को संयोग मान कर आंकड़ों तले दिल्ली को सुरक्षित और विकासमय होना करार देती है, वही सरकार अपने विरोध को दबाने के लिये विकास के पायदान पर खड़ी मेट्रो को बंद कर देती है। सत्ता की तरफ जाती हर सड़क पर आवाजाही रोकने के लिये रविवार के दिन भी खाकी का आतंक खुले तौर पर तैनात करने से नही कतराती। यह सारे सवाल जंतर मंतर की सड़कों पर सौ-सौ मीटर तक पड़े उन सफेद कैनवास में दर्ज हैं, जिसे अपने आक्रोश से हर बच्चे ने रंग रखा है। सफेद कागज रंगते रंगते हाथ थकते हैं तो खड़ा होकर कुछ ऐसे ही सवालों को हवा में उछालता है और गुस्से में किसी बुजुर्ग से पूछता है कि क्या आजादी इसी का नाम है। क्या इसी भारत पर नाज है। और सवालो के बीच उसी गुस्से में कोई पिता की उम्र का व्यक्ति जवाब भी देता है, करें क्या जो कुछ नहीं कर सकते वही नेता बन कर सरकार चला रहे हैं। नेता को पढ़ाई-लिखाई कर नौकरी के लिये संघर्ष तो करना नही है। जिन्हे जिन्दगी जीने के लिये संघर्ष करना पडता है उनके लिये सरकार का मतलब सिर्फ वोट डालना है। आवाज तो वोट के खिलाफ भी उठानी होगी। नहीं तो हमारा वोट और हमारी सरकार। हमारी सरकार और हमारी पुलिस। हमारी पुलिस और हमारा कानून।

तो फिर अपराधी भी तो हमीं हैं। यह सब बदलेगा कैसे। सवाल सुधार का नहीं है। हर तरीके को बदलने का है। नौवीं कक्षा की छात्रा हो या मिरांडा हाउस में पीजी की छात्रा। वह यह समझने को तैयार नहीं हैं कि जो उनके सवाल है वह सवाल सरकार के मन में क्यों नहीं रेंगते। क्या देश इतना बदल गया है कि दिल्ली में रहते हुये भी मंत्री और जनता की समझ एक नहीं रही। सरकार सड़कों पर खाकी वर्दी का खौफ दिखाकर हमें कानून सिखाना चाहती है। लेकिन कानून देश और समाज की सोच को खत्म कर कैसे चल सकता है। सरकार किस पर राज करना चाहती है। राजनीतिकशास्त्र या समाजशास्त्र नहीं बल्कि कैमिस्ट्री की पढाई कर रही दिल्ली विश्वविघालय की छात्रा के सवाल समाज की जरुरत को लेकर है। माइक हाथ में थामकर वह सीधे सरकारी तंत्र पर अंगुली उठाती है। फांसी से समाधान नहीं होगा। जो बलात्कारी हैं, उन्हें थाने से लेकर अदालत और अदालत से लेकर जेल ले जाने के दौरान चेहरे ढके क्यों गये। क्यों नहीं उनके चेहरे पूरे देश को दिखाये गये। बलात्कारी की बहन, मां, बेटी के सामने यह सवाल आना चाहिये और बलात्कारी के सामने भी यह सवाल आना चाहिये कि बलात्कार करने के बाद उसके अपनो का समाज में जीना मुश्किल होगा। सामाजिक बहिष्कार की स्थिति हर बलात्कारी के सामने होनी चाहिये। फांसी तो अपराध की सजा है । लेकिन जिस दिमाग और माहौल की यह उपज है, उसें समाज की एकजुटता ही रोक सकती है। लेकिन सरकार या नेताओ का नजरिया समाज को महत्व देना ही नहीं चाहता। वह हर अपराध के लिये कानून को देखता है। ऐसे में यह सवाल बार बार आयेगा कि कानून लागू करने वाला और लागू करवाने वाला अगर अपराधी निकलेगा तो फिर समाधान का रास्ता निकलेगा कैसे। तो फिर संसद के विशेष सत्र का भी मजलब क्या है, जिसकी मांग विपक्ष कर रहा है। सही कह रहे हैं। संसद की महत्ता के आगे समाजिक दबाव बेमानी रहे यह हर नेता चाहता है।

कानून तोड़ने पर पुलिस और अदालत काम करती है। लेकिन कानून बरकरार रहे इसके लिये सामाजिक माहौल होना चाहिये। और फिलहाल समाज से कोई सरोकार सरकार का तो नहीं है। सही है सिर्फ सरकार ही नहीं उस राजनीति का भी नहीं है जो सत्ता के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार है। किसी हद तक ना कहिये, संसद के भीतर तो अब अपराध करने वालों की पूरी फेहरिस्त है। 162 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले किसी ना किसी थाने में दर्ज हैं। लेकिन राजनीति में सभी माफ है। क्योंकि राजनीतिक आरोपों की छांव हर अपराधी को बचा देती है। यह सवाल जवाब चकाचौंध तो नहीं लेकिन पेट भरे आधुनिक स्कूल कॉलेजों में पढ़ रहे लड़के लड़कियो के सवाल हैं, जो आपस में संवाद बना रहे हैं । जंतर-मंतर की सड़क के दोनों किनारे पुलिस के जमावडे के बीच गोल घेरा बना कर बैटरी के माइक या बिना माइक ही चिल्ला चिल्ला कर अपने होने का एहसास करा रहे हैं। इन्हें डर लग रहा है कल से लोगों की तादाद भी कम होती जाये। लोग फिर ना भुल जाये। वह मीडिया से गुहार लगाते हैं, आप तो बोलिये जिससे लोग आते रहे। विरोध करते रहें। नहीं तो सरकार फिर कहेगी यह पिकनिक मनाने आये थे और हमें अपने लोकतंत्र पर नाज है।

देश को पिता नहीं पीएम चाहिये



जिस 72 घंटे इंडिया गेट पर युवाओं के आक्रोश को थामने के लिये पुलिस धारा 144 की दुहाई देकर लाठी भांजती रही, आंसू गैस के गोले दागती रही और पानी की धारा छोड़ती रही, उसी 72 घंटों के दौरान देश में करीब डेढ़ सौ बलात्कार की घटनाएं हुईं। जिस 12 घंटे जंतर मंतर पर युवा जुट कर बिखरता रहा। व्यवस्था से निराश होकर सरकार के तौर तरीके पर अंगुली उठाकर न्याय के हक का सवाल उठाता रहा, उसी 12 घंटो के दौरान भी देश में दो दर्जन से ज्यादा लड़कियो के साथ बलात्कार हुये। यह सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर घंटे दो बलात्कार होते ही हैं। तो फिर सवाल सिर्फ एक बलात्कार के दोषियों को सजा दे दिलाने का है या फेल होते सिस्टम में सरकारी व्यवस्था की हुकूमत दिखाकर पांच बरस की सत्ता को ही लोकतंत्र बताकर राज करने का है। ऐसे मोड़ पर अगर देश के प्रधानमंत्री यह कहे कि वह भी तीन बेटियों के पिता हैं तो यह देश भर के उन पिताओ का मखौल उड़ाने से हटकर और क्या हो सकता है जो बेटियों की असुरक्षा को लेकर गुस्से में हैं। देश को तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चाहिये। लेकिन प्रधानमंत्री ही नही गृहमंत्री भी जब तीन राष्ट्रीय न्यूज चैनलो पर बीस बीस मिनट के इंटरव्यूह में कई बार खुद को बेटियों का बाप बताते हुये युवाओं के आक्रोश के मर्म को अपनी निज भावनाओ के साथ जोड़कर समाधान करने लगे तो इससे ज्यादा बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है।

त्रासदी इसलिये क्योंकि रास्ता अंधेरे में ही गुम होने की दिशा में जा रहा है। सत्ता का सुकून व्यवस्था बनाने या चलाने के बदले खुद को सत्ता की मार तले पिता और परिवार की भावनाओ में तब्दील करने पर आमादा है। सत्ता के तौर तरीके सत्ता चलाने वालो से बड़े हो चुके हैं। इसलिये सत्ता पाने की होड़ में सत्ताधारियों की कतार आम आदमी के मन से ना जुड़ पा रही है और ना ही युवा के उस आक्रोश को समझ पा रही है जो बलात्कार की एक घटना के जरीये बिखरते देश की अनकही कहानी इंडिया गेट से लेकर जंतरमंतर और विश्वविद्यालयों के सेमिनार हाल से लेकर नुक्कड तक पर लगातार कह रहा है। प्रधानमंत्री को चकाचौंध भारत चाहिये। गृहमंत्री को चकाचौंध भारत के रास्ते की हर रुकावट गैरकानूनी हरकत लगती है। और दिल्ली की सीएम के लिये दिल्ली का मतलब रपटीली सड़क। दौड़ती भागती जिन्दगी। और मदहोश रंगीनी में खोया समाज है। यानी किसी भी स्तर पर उस युवा मन की कोई जगह नहीं जो भविष्य के भारत में अपनी जगह अपने हुनर से देखे। अपने हुनर को देश के लिये संवारते हुये सुरक्षा और मान्यता की गुहार लगाने के रास्ते में भी जब आवारा सत्ता की चकाचौंध ही है, तो फिर वह इंडियागेट या जंतर-मंतर छोड कर लौटे कहा। यह सवाल जेएनयू और आईआईटी के छात्रों के ही नहीं बल्कि हर उस युवा के है जो पत्थर फेंक कर, प्लेकार्ड लहरा कर, नारों से माहौल गर्मा कर न्याय और हक के सवाल को अपनी जिन्दगी से जोड़ रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित तक के लिये गद्दी के बरकरार रखने की जमीन अगर समाज की असमानता, मुनाफे के धंधे की नीतियों और उपभोक्ता की चकाचौंध में सबकुछ झोंकने से बनेगी तो इसे बदलने की हिम्मत दिखायेगा कौन। और गद्दी का मतलब ही अगर ऐसे समाज को बनाये रखना हो जाये तो फिर सत्ता की दौड़ में शरीक राजनेताओ की फौज में अलग रंग दिखायी किसका देगा।

शायद सबसे बडी मुश्किल यही है जो राजनीतिक शून्यता के जरीये पहली बार हर उस युवा को भी अंदर से खोखला बना रही है कि उसके आक्रोश का जवाब किसी सत्ता के पास है क्यों नहीं। 2009 में सत्ता में मनमोहन सिंह के लौटने के पीछे साढ़े चार लाख करोड के भारत निर्माण की योजना थी। और 2014 के लिये मनमोहन सिंह के पास तीन लाख बीस हजार करोड़ के नकद ट्रांसफर की योजना है। यही लकीर दिल्ली की सत्ता के लिये रपटीली रास्तों को भी तैयार कर रही है। क्योंकि शीला दीक्षित के लिये भी 2013 के चुनाव में सत्ता बरकरार रखने का मतलब पांच हजार करोड़ की वह सड़क और चकाचौंध योजना है, जिसके बाद दिल्ली चमकेगी और चौथी बार शीला सरकार की दीवानी दिल्ली की जनता होगी। इस रास्ते देश का निर्माण किसके लिये कैसे होगा यह कोई दूर की गोटी नहीं है। दस बरस पहले भी दिल्ली में बलात्कार की तादाद देश में सबसे ज्यादा थी और दस बरस बाद भी यानी 2012 में भी दिल्ली महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार के मामले में टॉप पर है। 2003-04 में बलात्कार के 362 मामले दिल्ली में दर्ज किये गये और 2011-12 में 312 बलात्कार के मामले दिल्ली में दर्ज हुये। दिल्ली में प्रति लाख व्यक्तियो पर अपराध का ग्राफ अगर 385.8 है तो देश में यह महज 172.3 के औसत से है। दिल्ली में अगर 2001 में 143795 मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध के तौर पर दर्ज हुये तो 2011-12 तक आते आते इसमे 12 फीसदी की बढोतरी ही हुई है। लेकिन इन रास्तों को नापने या थामने के जरुरत सत्ताधारियो के लिये अगर सत्ता में बने रहने के लिये ही हो जाये तो कोई क्या कहेगा। यह सवाल इसलिये क्योंकि जिन रास्तो को देश और समाज की जरुरत सत्ता मानती है उसमें अपराध विकास की जायज जरुरत बना दी गई है। जरा इसकी बारीकी को समझे । दिल्ली में दस बरस पहले जितने मामले पुलिस थानों में पहुंचते थे उसको निपटाने के लिये औसतन 18 फीसदी मामलों में सत्ताधारी या पावरफुल लोगों की पैरवी आती थी। लेकिन 2012 में जितने मामले थानो में पहुंचते हैं, उसे निपटाने के लिये औसतन 65 फीसदी मामलों में किसी मंत्री, किसी नेता या किसी हुकूक वाले शख्स की पैरवी हर थाने में पहुंचती है। यानी सिर्फ 35 फीसदी मामले ही पुलिस अपने मुताबिक सुलझाती है। या यह कहें कि दिल्ली में अगर कोई अपराध किसी नेता, मंत्री या पैसे वाले के करीबी से हो जाता है तो न्याय पावरफुल पैरवी के आधार पर काम करता है। वहां कानून या ईमानदार पुलिस मायने नहीं रखती। यानी पुलिस अगर चाहे तो भी ईमानदारी से काम कर नहीं सकती क्योंकि पुलिस की सूंड और पूंछ दोनो सत्ता के गलियारे में गुलामी करती है। और इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि जो दिल्ली पुलिस देश के गृह मंत्रालय के अधीन है और इंडिया गेट पर जिस पुलिसिया कार्रवाई को लेकर पुलिस आयुक्त के तबादले के कयास लगने लगे हैं। उस दिल्ली पुलिस में 29 फीसदी तबादले नेताओं या मंत्रियो की पैरवी के पक्ष या विरोध को लेकर होते हैं। 

दिल्ली पुलिस पर गृह मंत्रालय के नौकरशाहों की फाइलें कहीं ज्यादा भारी है जो नेताओ के इशारे पर चिड़िया बैठाने का काम करती हैं। इस कतार में कास्टेबल से लेकर आईपीएस सभी नेताओ के इशारे पर कदमताल कैसे करते हैं यह पावरफुल पुलिसकर्मियों के मोबाइल काल्स की डिटेल भर से पता लग सकता है कि किसके पीछे कौन है। लेकिन युवाओं के आक्रोश की वजह सिर्फ लंगडी होती व्यवस्था भर नहीं है। बल्कि व्यवस्था के नाम पर विकास और चकाचौंध की आवारा इमारत को खड़ा करने की वह मानसिकता है, जिसमें जेब हर दिमाग पर भारी हो चला है। पास में पैसा है तो पढ़ाई से क्या होगा। साथ में पावरफुल लोगो की जमात है तो डिग्रियों से क्या होगा। और अगर सत्ता की हुकूक ही साथ खड़ी है तो फिर अपराध करने के बाद सजा कौन दिलायेगा। क्योंकि पिछले बरस ही दिल्ली के थानो में दर्ज महिलाओं से छेड़छाड़ से लेकर अपराध के 167 एफआईआर पर कार्रवाई के तरीके बताते हैं कि आरोपी इसलिये छूटे या मामला इसलिये रफा-दफा हो गया क्योंकि पैरवी वीवीआईपी की तरफ से हुई। और यह वीवीआईपी उसी कतार के लोग हैं, जिनकी सुरक्षा में दिल्ली पुलिस जी जान से लगी रहती है। और आम नागरिक सड़क पर लुटता रहता है। इस लूट की समझ का दायरा दि्ल्ली में कैसे लगातार व्यापक हो रहा है, यह इससे भी समझा जा सकता है दस बरस में जिन्दगी की न्यूनतम जरुरतो की परिभाषा तक बदल दी गई है। जो पानी, बिजली, सफर और पार्किंग कमाई के हिस्से में सबसे न्यूनतम हुआ करते थे। अब वह सबसे ज्यादा हो चले हैं। यानी दिल्ली में जीने का मतलब न्यूनतम जरुरतों के जुगाड़ की ऐसी भागमदौड़ है, जहां रुक कर सांस भी ली और इंडियागेट या जंतर मंतर पर नारे लगाने के लिये भी रुके थमे तो घाटा हो जायेगा। और मनमोहन सिंह से लेकर शीला दीक्षित तक की व्यवस्था मुनाफा बनाने की है। घाटा उठाने की नहीं है । तो सरकार पहली बार इसलिये भौचक्की है कि उसने तो ना ठहरने वाली ऐसी व्यवस्था बनायी है, जिसमें कोई दर्द का जिक्र ना करे। और अब युवा ठहर कर सड़क से सरकार को आवाज लगा रहा है तो देश के प्रधानमंत्री को कहना पड़ रहा है कि वह भी तीन बच्चियों के पिता हैं।

बेमकसद देश के सामने मकसद खोजता राजपथ पर युवा

कड़क ठंड, पानी की धार, आंसू गैस ,बरसती लाठियां और लहुलूहान युवा। यह नजारा राजपथ का है। वही राजपथ जिस पर 26 जनवरी को गणतंत्र देश की गाथा दिखाने की तैयारी शुरु हो चुकी थी। तिरंगा लहराने के लिये राजपथ की लाल बजरी के दोनों किनारे लकड़ी गाढ़ी जा चुकी थी। राजपथ के दोनो तरफ गणतंत्र दिवस पर गर्व के साथ देश के गुणगाण करने वाली झांकियों को देखने के लिये लोहे और लकड़ियों की सीटों को लाया जा चुका था। लेकिन युवाओं के हाथो में लहराते प्लेकार्ड और जुबान से निकलते नारो ने जैसे जैसे हक और न्याय के सवालों को खड़ा करना शुरु किया वैसे वैसे सत्ता ने लोकतंत्र की परिभाषा बदलनी शुरु की। जैसे जैसे मकसद खोजता युवा बेमकसद व्यवस्था को कठघरे में खड़ाकर हमलावर होने लगा वैसे वैसे पुलिस-प्रशासन और राजनेता खुद को अपाहिज महसूस करने लगे। पानी की धार ने युवाओ को भिगोया तो तिरंगा लहराने वाली लकड़ियों को आग के हवाले कर युवाओ ने खुद में गर्मी पैदा की। आंसू गैस और लाठियों ने युवाओं को घायल किया तो नारों और गीतों के आसरे अपने जख्मों को मकसद मान कर और कहीं ज्यादा तल्खी और तेजी से खुद को आगे के संघर्ष के लिये तैयार करने में हर युवा लगा।

हर नये चेहरे हर चेहरे को अपने लगने लगे। गाजियाबाद के लोनी की 21 साल की मीना से लेकर गुड़गांव के हुड्डा चौक का 22 वर्षीय राजीव और फरीदाबाद की सलोनी से लेकर दिल्ली के डिफेन्स कॉलोनी के राघव पहली बार मिले लेकिन सभी के सुर एक। हक के सवाल एक। और न्याय की गुहार एक। सभी के मकसद भी एक। तो फिर रास्ता राजपथ का हो या जनपथ का। एक तरफ इंडिया गेट हो या 180 डिग्री में दूसरी तरफ राष्ट्रपति भवन। आमने सामने देश को चलाने वाले नार्थ-साउथ ब्लाक की कतार हो या संसद पर लहराता तिरंगा। हर युवा को यह सभी देश के होकर भी अपने नहीं लग रहे। कम्यूटर साइंस की छात्रा मोहिनी इन लाल इमारतो में अगर दफन होते अपने भविष्य को देख रही है तो जेएनयू के राकेश को लग रहा है कि सभी इमारतें उसे चिढ़ा रही हैं। हर युवा मन में ढेरों सवाल हैं। कोई युवा मीडिया के कैमरों के सामने नपी-तुली भाषा में अपने सवालों को रखने के लिये प्रशिक्षित नहीं है तो उसके आक्रोश की भाषा भी अलग है। कहीं नारो में तो कहीं गुस्से में हक की मांग, न्याय की गुहार यह समझ नहीं पा रही है कि ऐसा उन्होंने क्या मांग लिया जो सरकार की बात की जगह बेबात का पुलिसिया रंग उन्हें अपने रंग में रंगने की बार बार तैयारी करता है। बीते 48 घंटो में 18 बार लाठियां चली। सौ से ज्यादा आंसू गैस के गोले छूटे। तीन सौ पुलिसकर्मियों ने हजारों युवाओ को बसों में उठा-उठा कर भरा। छह गाडियों ने कड़क ठंड में 21 बार पानी की धार मारी। लेकिन हर बार कुछ नये चेहरे हक के सवालों को नये अंदाज में लेकर राजपथ पर कदम-ताल करने के लिये जुड़ते चले गये। मकसद पाने की तालाश में घायल होने के लिये को तैयार दिखे। राजपथ के दोनो किनारे डीयू, जामिया और जेएनयू ही नहीं बल्कि यूपी और हरियाणा के अलग अलग कॉलेजों में पढ़ रहे छात्रों के जमगठ लगातार नारे और हंगामे के बीच जिन सवालों का जवाब पाने के लिये बैचेन दिखे, वह देश के बेमकसद भविष्य को आइना
दिखाने के लिये काफी हैं। दिल्ली की टी-3 हवाई अड्डे के कुल खर्चे के महज दस फीसदी से समूची दिल्ली कैमरे के जरीये सुरक्षा घेरे में लायी जा सकती है फिर यह संभव क्यों नहीं है। चाणक्यपुरी और लुटियन्स की दिल्ली की सुरक्षा के बराबर बाकि समूची दिल्ली जो वीवीआईपी दिल्ली से एक हजार गुना बड़ी है, उसकी सुरक्षा एक बराबर कैसे हो सकती है।

दिल्ली में हर दिन 20 हजार गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन होता है और इस खर्चे के आधे में दिल्ली पुलिस हर तरह से सुरक्षा दायरा मजबूत कर सकती है। फिर यह क्यों नहीं हो पाता। जो बारह हजार पुलिस कर्मी वीवीआईपी सुरक्षा में लगे हैं, उनकी तादाद से महज 15 फीसदी ज्यादा सुरक्षाकर्मी समूची दिल्ली की सुरक्षा कैसे कर सकती है। जबकि वीवीआईपी सिर्फ 575 के करीब हैं और आम लोग सवा करोड़। दिल्ली पुलिस के सामानांतर निजी सुरक्षा का खर्च सिर्फ दिल्ली में तीन सौ गुना ज्यादा है। जबकि निजी सुरक्षा के घरे में दिल्ली के सिर्फ 2 लाख लोग ही आते हैं । यह ऐसे सवाल हैं, जो बलात्कार के सवाल को कहीं ज्यादा तल्खी के साथ मौजूदा व्यवस्था के बेमकसद होने से जोड़ते है और इन सवालों के आसरे युवाओं की टोली अपने अपने घेरे में यह सवाल करने से नहीं चूकती कि आईएएस और आईपीएस होने के बाद क्या राजपथ पर मौजूद पुलिसकर्मियों और नार्थ-साउथ ब्लॉक में बैठे नौकरशाहों की तरह काम करना पड़ेगा। तो क्या हक और न्याय के सवाल राजनेताओं के गुलाम है। या सत्ता की सहुलियत ही लोकतंत्र है। बेचैन करने वाले यह सवाल उन्हीं युवाओं के हैं, जिनके हाथो में हक मांगते प्ले कार्ड हैं। नारो की गूंज के बीच खुद को घायल करने की तैयारी है। और भविष्य में किसी प्रोफेशनल की तर्ज पर काम करने की लगन के साथ साथ यूपीएससी की परीक्षा पास करने का जुनून भी है। लेकिन आईपीएस या आईएएस होने के बाद भी अगर राजपथ खड़े होकर सत्ता के गाल बजाना है तो फिर लाल इमारतों में बंद व्यवस्था को बदलने की दिशा में कदम क्यों ना बढ़ाये जायें। नवीन जेएनयू के एसआईएस का छात्र है। पांव घायल है। आंसू गैस का गोला पांव के पास फटा। लंगडाकर चल रहा है । लेकिन लौटने को तैयार नहीं है। लौट कर कहां जाये। यूपीएससी की पिछली परीक्षा में कैंपस के 32 लड़के पास हुये। 16 छात्र आईएएस तो 11 छात्र आईपीएस होंगे। वह नौकरी शुरु करेंगे तो उन्हें भी देश के किसी ना किसी हिस्से में ऐसी ही किसी राजपथ पर खड़े होकर सत्ताधारियों की व्यवस्था को चलाना होगा। मैं भी कल आईएएस हो गया तो मुझे भी यही करना होगा। तो क्यो ना इस बार सरकार की नीयत को परख लिया जाये। शकील को तो सरकार की नीयत में ही खोट नजर आता है। युवाओं की उर्जा को खपाने का इससे बेहतर तरीका सरकार के पास है भी नहीं। जिन्दगी गुजारने या बिताने के लिये युवा के पास है ही क्या। तो ऐसे ही आंदोलनों के जरीये सरकार अपने होने और युवाओं के होने को आजमाती है। नहीं तो देश में कौन होगा जो बलात्कारी को तुरंत सजा दिलाने में देरी करे। कहीं ज्यादा गुस्से में डीयू की सुष्मिता है। सवाल सुरक्षा का नहीं,सवाल सुरक्षा को भी सत्ता के हंटर की गुलामी करके चलनी पड़ रही है। साथ में सत्ता ना हो तो कोई सुनता ही नहीं। कहीं मंत्री तो कहीं पैसा। यह ना हो तो कोई सुनता ही नहीं। अगर यही सत्ता है और सुरक्षा या कानून सिर्फ सत्ता के लिये है तो हम राजपथ का नाम बदल कर ही लौटेंगे। लेकिन राजपथ पर महीने भर बाद ही देश का गणतंत्र होने के सपने को जीना है तो पुलिस फिर उसी लाठी,आंसू गैस और पानी की धार के तले सफाई में लगी है। उसे राजपथ साफ चाहिये।