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बुधवार, 1 जुलाई 2015

टाइट जींस तथा पश्चिमी सभ्यता के कपङों के नुकसान


लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो


ड्रेसेज के मामले में युवाओं की पहली पसंद है जींस। जींस में इतनी वैरायटी आ गयी हैं कि युवाओं का ध्यान किसी और तरफ जाता ही नहीं। लेकिन ज्यादा टाइट जींस पहनने से आप बीमारियों के भी शिकार हो सकते हैं।
टाइट कपड़ों से नुकसान-
टाइट फिटिंग वाली जींस, स्कटर्स और अन्य ड्रेसेज आपको आकर्षक लुक तो देते हैं, परेशानी हो सकती है। इस तरह की ड्रेस से न सिर्फ चलने-फिरने में परेशानी होती है, बल्कि इनसे आपका पाश्चर भी बिगड़ने की आशंका रहती है। इतना ही नहीं रीढ़ की हड्डियों में भी इस तरह की ड्रेसेज की वजह से परेशानी हो सकती है और आपको उठने-बैठने में भी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। फैशन एक्सपर्ट की माने तो टाइट कपड़ों शरीर की बनावट पर तो असर डालते ही हैं, दिनभर ऐसे कपड़े पहनने से आप असहज भी महसूस करने लगते हैं। इससे आपको सिर दर्द, शरीर दर्द जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है। एक सर्वे के अनुसार आफिस में शर्ट और जींस पहनने वाली महिलाओं की संख्या लगभग सात फीसदी है। टाइट जींस के फैशन को लेकर डा. शर्मिली राज का कहना है कि लोग फैशन के इस कदर दीवाने हैं कि कई बार उससे होने वाली समस्याओं को नजरअंदाज करने लगते हैं। इससे उनकी समस्याएं बाद में काफी बढ़ जाती है, कई बीमारियां उन्हें घेर लेती हैं।
tight jeansटाइट जींस से होने वाली समस्याएं –
* टाइट जींस तथा पश्चिमी सभ्यता के अन्य कपङे पहनने से हमारी कार्यक्षमता पर बहुत विपरीत प्रभात पङता है। अर्थात् हम बहुत जल्दी थकान का अनुभव करते है। किसी भी कार्य करने में नीरसता रहती है। अगर आपमें भी यह लक्षण है तो कुछ दिन खादी का ढीला कुर्ता और पजामा पहन कर देखें पहले दिन से परिवर्तन महसूस करेंगे और पूरे दिन ऊर्जा से भरे रहेगें।
* टाइट जींस की सबसे बड़ा नुकसान है नपुंसकता |
शरीर से हमेशा चिपके रहने के कारण त्वचा , मांसपेशियो और नाड़ीयो की तापमान लगातार बढ़ता है | जिससे शुक्राणु की कमी होने लगती है क्योकी यह जांघ के आस पास ज्यादा दबाव व ताप बढ़ाता है तथा आवश्यक रक्त संचार में व्यवधान उत्पन्न करता है|
जो लोग पारिवारिक जीवन में अपने जीवनसाथी से संतुष्ट नहीं है उसका भी एक बङा कारण पश्चिमी सभ्यता के कपङे है।अगर आप चहाते है की आपके बच्चे इस दौर से ना गुजरे तो आज से ही अपने बच्चों को भारतीय परिधान पहनाये।

* स्किनी और फिटेड जींस का आजकल खूब प्रचलन है। लेकिन इस तरह की जींस से स्किन प्रॉब्लम हो सकती है। टाइट जींस से ब्लड सर्कुलेशन और नर्वस सिस्टम भी प्रभावित होता है। दरअसल स्किनी जींस बहुत लंबे समय तक स्किन से चिपकी होती है, जिस कारण पसीना पूरी तरह से सूख नहीं पाता। इससे स्किन इरिटेशन और फंगस इंफेक्शन की आशंका काफी बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, ऐसे में चर्म रोग होने का खतरा भी बढ़ जाता है।
* टाइट जींस पहनने से त्वचा संक्रमण बढ़ जाता है, जिससे छाले और घाव पड़ने की आशंका रहती है।
* स्किनी जींस और टाइट जींस जैसे कपड़े त्वचा की नमी को छीन लेते हैं। इस कारण खुजली, रैशेस पड़ने लगते हैं। इससे कई बार छोटे-छोटे लाल दाग हो जाते हैं और कारण त्वचा संक्रमण भी हो जाता है।
सावधानियां-
हम तो आपको सुझाव देंगें की पश्चिमी सभ्यता के कपङे किसी आपातकाल में ही पहने। फिर भी इनसे होने वाली सम्स्याओं को कुछ सीमा तक ही कम कर सकते है अगर कुछ यह सुझाव माने।

* यदि आपको बहुत ज्यादा भाग दौड़ करनी है तो टाइट जींस का प्रयोग न करें।
* जींस को धोते समय अच्छी तरह से साबून-सर्फ निकाल दें, जिससे त्वचा संक्रमण का शिकार न हो और परेशानी से बच सकें।
* प्रतिदिन टाइट जींस का प्रयोग करने से बचें।
* ऐसी जींस पहने जो कंफर्टेबल हो और उसमें आपका दम न घुट रहा हो। यानी आप सहज महसूस करें और आराम से उठ-बैठ सकें, चल पाएं।
* कुछ खास मौकों पर ही टाइट जींस पहने तो बेहतर होगा।
* गर्मी के मौसम में खासतौर पर टाइट जींस के बजाए लूज कपड़े या लूज जींस पहने।
* एलर्जी होने पर जींस पर मेटल बटन के बजाए प्लास्टिक के बटन लगाएं या फिर बटन पर नेल पालिश लगाएं।
* एक जींस को बिना धोएं दो-तीन बार से अधिक न पहनें।
* जरूरत न हो तो टाइट जींस पर बेल्ट का प्रयोग न करें।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

योग को मिलेगी अंतरराष्ट्रिय मान्यता

प्रमोद भार्गव
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

योग को मिलेगी अंतरराष्ट्रिय मान्यता


संदर्भः- संयुक्त राष्ट्र में योग दिवस मनाए जाने पर 130 देशों का समर्थन।
प्रमोद भार्गव
शायद आने वाले 10 दिसंबर को योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिल जाएगी और हरेक साल 21 जून को योग दिवस मनाए जाने का अंतरराष्ट्रिय स्तर पर सिलसिला शुरु हो जाएगा। अंतरराष्ट्रिय योग दिवस मनाए जाने के बावत इसी साल सिंतबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र में दिए अपने पहले भाषण में योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव की पुरजोर पैरवी करते हुए कहा था कि योग जीवनशैली को बदलकर और मस्तिष्क की चेतना को जगाकर जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है। याद रहे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक रिपोर्ट में कहा भी गया है कि लोगों में जो गुस्सा देखा जा रहा है और जिस तेजी से दुनिया में आत्महत्याएं बढ़ रही हैं उनका एक कारण जलवायु में हो रहा बदलाव भी है। शायद इसीलिए मोदी के इस प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में से 130 देशों ने समर्थन दे दिया है। इस समर्थन में सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य देश रूस, चीन, फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन तो शामिल है ही ईराक, ईरान, मिश्र और बांग्लादेश जैसे इस्लामिक देश भी शामिल हैं।
योग शब्द अपने भावार्थ में आज अपनी सार्थकता पूरी दुनिया में सिद्ध कर रहा है। योग का अर्थ है जोड़ना। वह चाहे किसी भी धर्म जाति अथवा सम्प्रदाय के लोग हों,योग का प्रयोग सभी को शारीरिक रूप से स्वास्थ्य और मानसिक रूप से सकारात्मक सोच विकसित करता है। योग भारत के किसी ऐसे धर्म ग्रन्थ का हिस्सा भी नहीं है, जो बाइबिल और कुरान की तरह पवित्र आस्था का प्रतीक हो। योग की आसनें प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथ पतंजली योग सूत्र के प्रयोग हैं। जो हिंदु अथवा अन्य भारतीय धर्मों में धर्म ग्रन्थों की तरह पूज्य नहीं है। पतंजली योग सूत्र का सार इस एक वाक्य ‘‘योगष्तिवृत्ति निरोधः‘‘ में निहित है। इसका भावार्थ है चित्त अथवा मन की चंचलता को स्थिर करना अथवा रखना। जिससे मन भटके नहीं और इन्द्र्रियों के साथ वासनाएं भी नियंत्रित हों। लेकिन योग केवल वासनाओं को नियंत्रित करने तक ही सीमित नहीं है। योग के नियमित प्रयोग से मधुमेह, रक्तचाप तो नियंत्रित होते ही हंै,कमोवेश मोटापा भी दूर होता है। यदि बाबा रामदेव की बात पर विश्वास करें तो कैंसर और एड्स जैसे असाध्य रोगों को भी योग नियंत्रित करता है। शायद इसीलिए मोदी ने योग को जीवन की चेतना का मंत्र बताया है।
हालांकि योग शिक्षा को लेकर एक समय अमेरिका और ब्रिटेन के धर्मगुरुओं में भय व्याप्त हो चुका है क्योंकि वे योग को धार्मिक शिक्षा के रुप में देखते हैं। उन्हें आशंका है कि यदि योग की शिक्षा दी जाती रही तो उनके बच्चे भारतीय धर्म की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसी शंका के चलते केलिर्फोनिया नगर में तो विद्यालयों में योग की शिक्षा से जुड़े पाठों को हटाने की मांग भी की जा चुकी हैं। अकेले इस शहर की पाठशालाओं में पांच हजार से भी ज्यादा बच्चे योग सीखकर स्वास्थ्य व आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे है।
धार्मिक पूर्वाग्रह के चलते ही योग के पाठ पर इग्ंलैण्ड की दो चर्चों ने पाबंदी लगा दी थी, जबकि योग के रहस्यों को स्वास्थ लाभ से जोड़कर बाबा रामदेव ने जबसे सार्वजानिक करना शुरू किया है,तभी से योग की महत्ता को पूरे विश्व ने स्वीकारा, न कि किसी धार्मिक प्रचार प्रसार के चलते ? योग ध्यान,और प्राणायाम मस्तिष्क को एकाग्र कर शरीर को चुस्त – दुरूस्त व निरोग बनाए रखने की धर्मनिरपेक्ष वैज्ञानिक आसनें हैं, न कि हिंदु धर्म के विस्तार के उपाय।
दरअसल भारत अथवा पूर्वी देशों से जो भी ज्ञान यूरोपीय देशों में पहुंचता है, तो इन देशों की ईसाइयत पर सकंट के बादल मंडराने लगते हैं। इसी तरह भगवान रजनिश ने जब अमेरिका में गीता और उपनिषदों को बाइबिल से तथा राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर को जीसस से श्रेष्ठ घोषित करना शुरू किया और धर्म तथा अधर्म की अपनी विशिष्ट शैली में व्याख्या की तो रजनिश के आश्रमों में अमेरिकी लेखक ,कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, वैज्ञानिक और प्राध्यापकों के साथ आमजनों की भीड़ उमड़ने लगी थी। उनमें यह जिज्ञासा भी पैदा हुई कि पूरब के जिन लोगों को हम हजारों ईसाई मिशननरियों के जरिए शिक्षित करने में लगे हैं उनके ज्ञान का आकाश तो कहीं बहुंत ऊंचा है। यही नहीं जब रजनिश ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन जो, ईसाई धर्म को ही एक मात्र धर्म मानते थे और वेटीकन सिटी में पोप को धर्म पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी तो ईसाइयत पर संकट छा गया और देखते ही देखते रजनिश को उनके तामझाम समेत अमेरिका से बेदखल कर दिया गया।
लेकिन अब लगता है मोदी के प्रभाव के चलते दुनिया में सद्भाव और सहिष्णुता का वातावरण नये ढंग से निर्मित हो रहा है। वरना महज दो माह के भीतर योग दिवस के प्रस्ताव पर 130 देशों का समर्थन मिलना मुश्किल था। सह प्रायोजक के रुप में इतने देशों का समर्थन मिलना आश्चर्य है। इस मसौदे को एल डाक्यूमेंट का नाम दिया गया है। यदि इस प्रस्ताव को 10 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा की बैठक में मान्यता मिल जाती है तो इसे स्वास्थ्य एवं कल्याण के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण मुहैया कराने वाला प्रस्ताव माना जाएगा।

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

निरामिष निष्कर्ष

"निरामिष"सामूहिक ब्लॉग के दो वर्ष सम्पन्न. प्रस्तुत है विभिन्न आलेखोँ के प्रकाश में निरामिष निष्कर्ष.....
"निर्जर निरामिष" - अमृत है शाकाहार
"निरोगी निरामिष" - स्वास्थ्यप्रद है शाकाहार
"निर्विकार निरामिष" - विकार रहित है शाकाहार
"निरापद निरामिष" - आपदा रहित है शाकाहार
"निसर्गमित्र निरामिष" - पर्यावरण मित्र है शाकाहार
"निर्मल निरामिष" - शुद्ध सात्विक है शाकाहार
आरोग्य वर्धक (स्वास्थ्यप्रद शाकाहार) 
  1. स्वस्थ व दीर्घ जीवन का आधार है शाकाहार। 
  2. आरोग्य संवर्धक है शाकाहार। 
  3. विश्व स्वास्थ्य शाकाहार में निहित है। 
  4. रोगप्रतिरोध शक्तिवर्धक है शाकाहार। 
सभ्य-खाद्याचार (सुसंस्कृत सभ्य आहार) 
  1. अप्राकृतिक भोज्य विकृति का सुसंस्कृत रूप है शाकाहार । 
  2. आदिमयुग से विकास और सभ्यता की धरोहर है शाकाहार। 
  3. शाकाहारी संस्कृति का संरक्षण ही हमारी सुरक्षा है। 
  4. मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है शाकाहार। 
तर्कसंगत-विकल्प (सर्वांग न्यायसंगत) 
  1. प्रागैतिहासिक मानव, प्राकृतिक रूप से शाकाहारी ही था। 
  2. मनुष्य की सहज वृति और उसकी कायिक प्रकृति दोनो ही शाकाहारी है।
  3. मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल। 
  4. शाक अभावग्रस्त दुर्गम क्षेत्रवासी मानवो का अनुकरण मूर्खता!!
  5. सभ्यता व विकास मार्ग का अनुगमन या भीड़ का अंधानुकरण? 
  6. यदि अखिल विश्व भी शाकाहारी हो जाय, सुलभ होगा अनाज!!
  7. भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस-उद्योग!!
  8. शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल !!! 
  9. हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है। 
  10. प्रोटीन प्रलोभन का भ्रमित दुष्प्रचार। 
  11. प्रोटीन मात्राप्रोटीन यथार्थ
  12. विटामिन्स का दुष्प्रचार। 
  13. विटामिन बी12,निरामिष: विटामिन डी,विटामिन 'सी'।
  14. उर्ज़ा व शक्ति का दुष्प्रचार।