गुरुवार, 11 सितंबर 2014

देश के भीतर युद्ध भूमि का ग्राउंड जीरो

पुलिस के शव में बम रखने की जिस घटना ने पूरे देश को अंदर से हिला दिया,अगर उसी घटना वाले इलाके लातेहार के हर दिन के सच को देश जान जाये तो उसे समझ में आ सकता है देश के भीतर कैसी युद्द भूमि तैयार है। और कैसे युद्द भूमि में हर दिन बारुद के बंकर बनाये जाते हैं। कैसे आईईडी घमाके होते हैं । कैसे डायनामायट से सरकारी इमारतों को नेस्तानाबूद किया जाता है। कैसे हर सरकारी योजना नक्सल लूट में बदल दी जाती है। कैसे खाद्यान्न से लेकर मनरेगा के रोजगार का पैसा विकास के नाम पर खपा भी दिया जाता है और हर हाथ खाली होकर पेट की खातिर बंदूक थामने से कतराता भी नहीं है। कैसे पक्की सड़क पर दौड़ती पुलिसिया जीप ही सरकार के होने का ऐलान करती है और कैसे पक्की सड़क से नीचे उतरती हर कच्ची सडक सरकार के सामानातंर माओवाद की व्यवस्था को चलाती है।

यह ऐसा सच है जो लातेहार के हर गांव में हर बच्चा और बुजुर्ग हर दिन देखता है। जीता है और फिर कभी इनकाउंटर में मारे जाने के बाद पक्की सड़क पर माओवादी और कच्ची सड़क पर मारे गये ग्रामीण आदिवासी
के तौर पर अपनी पहचान पाता है। दिन के उजाले में पक्की सड़क पर सुरक्षाकर्मियों के लिये हर इनकाउंटर तमगे का काम करता है और कच्ची पगडंडियो पर इनकाउंटर में मारे गये ग्रामीण का परिवार आक्रोश की आग में खुद को झोकने के लिये तैयार हो जाता है। यानी वर्तमान का सच भविष्य के लिये ना रुकने वाली ऐसी उर्वर युद्द भूमि तैयार करता जा रहा है, जहां सभ्य देश के लिये आने वाले वक्त में कौन कौन सी त्रासदी किस किस रुप में देश का सिर शर्म से झुकायेगी, इसका सिर्फ इंतजार किया जा सकता है। क्योंकि वहां युद्द ही जीने का आक्सीजन है। जरा सिलसिलेवार तरीके से पुलिस शवों में लगाये गये बम के इलाकों को परखें। 6-7 जनवरी को माओवादियों का हमला लातेहार के कोमांडी, हेहेगढा और अमवाटीकर गांव के इलाके में हुआ। 10 सुरक्षाकर्मी मारे गये। तीन गांववाले तब मारे गये, जब पुलिस के शव में रखा बम फटा। जाहिर है शव के भीतर बम रखने की यह अपने तरह की पहली घटना थी जो इतनी वीभत्स है कि देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे तक परेशान हो गये।

सवाल उठ सकता है कि अब माओवाद वैचारिक संघर्ष को छोड़कर और खौफ पैदा कर अपने होने का अहसास करा रहा है। इसे अमानवीयता का आखिरी रुप भी माना जा सकता है। इसे मानसिक दिवालियापन से भी जोड़ा जा सकता है। लेकिन जिस लातेहार को युद्द भूमि मान कर पुलिस-सरकार काम कर रही हो। जहां रहने वाले लोगो की पहचान दुश्मन और दोस्त के तौर पर कच्ची और पक्की सड़क के साथ बदल जाती हो। वहां कौन सी व्यवस्था मानवीयता को जिन्दा रखे हुये है, यह समझना भी जरुरी है। युद्द भूमि कैसे और किसके बीच बनी हुई है, यह एनकाउंटर वाले तीन गांव ही नहीं बल्कि लातेहार के बनवीरुआ, डीहीमारी, टुबेड, नेबारी, मानगरा, लूटी, अमेझाहारण समेत दो दर्जन से ज्यादा गांव के हर दिन के हालात को देखकर समझा जा सकता है। लातेहार में सरकार का मतलब चतरा से डालटेनगंज जाने वाली सडक पर पुलिस पेट्रोलिंग है। जिसके बीच में लातेहार आता है। यह पेट्रोलिंग भी जब तक सूरज की रोशनी पक्की सड़कों पर रहती है तभी तक होती है। गांवों के बीच में पुलिस कैंप नहीं सीआरपीएफ कैंप और झारखंड जगुआर सेना के कैंप हैं, जो सरकार की इमारतों में कैद रहते हैं। किसी पुरानी सभ्यता की तरह सुरक्षाकर्मियों के कैंप नदी या पानी के सोते के किनारे ही हैं। जिससे पीने के पानी की कोई दिक्कत ना हो। हर सुबह सूरज निकलने के बाद ग्रामीण इलाकों में सेना की हलचल पानी इकठ्टा करने और नित कार्य करने को लेकर ही होती है। पक्की सड़क से होते हुये जब सीआरपीएफ या जगुआर फोर्स के जवान गांव में घुसते हैं तो ही कैंपो से सुरक्षाकर्मी सड़क के लिये निकलते हैं। सीधे कहे तो पक्की सड़क से गांव तक कोई लैंड माइन नहीं है, इसकी जांच करते हुये जब सुरक्षाकर्मियो का दस्ता गांव के सुरक्षा दस्ते के पास पहुंचता है तो ही गांव के कैंप में तैनात सुरक्षा दस्ता बाहर निकलता है। लेकिन इस पक्की और कच्ची सड़क के बीच हर सुबह आईईडी ब्लास्ट की ट्रेनिग गांव वालो को मिलती है। बंकर ब्लास्ट की जानकारी गांव वाले अपने स्तर पर पाते हैं।

डायनामाइट कैसे लगाया जाये, जिससे किसी सरकारी इमारत को एक ही धमाके में उड़ा दिया जाये। यह जानकारी होना हर गांव वाले की जरुरत है। और जिस कैंप के सुरक्षाकर्मियो के शिकार जो गांववाले उससे पहले हुये होते हैं, उस गांव की ही यह जिम्मदारी होती है कि कैंप से बाहर निकले सुरक्षाकर्मी वापस कैंप में लौट ना सके। इस युद्द के बीच खेती, मजदूरी, विकास परियोजना या औघोगिक विकास का कोई मतलब नहीं होता । क्योंकि युद्ध के नियम या जीत हार जान लेने की तादाद पर ही निर्भर करते हैं। जिसका खौफ ज्यादा होता है, उसके लिये इलाका सुरक्षित होता है। और खौफ पैदा करने के लिये हर रणनीति अपनायी जाती है। इस युद्द भूमि में सरकार की कोई भूमिका क्यों नहीं होती, इसे मौजूदा मुंडा सरकार के बनने और वर्तमान के राजनीतिक संकट से भी जोडकर समझ जा सकता है। तीन बरस पहले अक्टूबर 2009 में जब झारखंड विधानसभा के चुनाव हो रहे थे, तब लातेहार के 22 गांवों ने चुनाव का बहिष्कार किया था। उस वक्त बहिष्कार के तीन आधार थे । पहला मनरेगा की बात कहने वाली कांग्रेस के ही लोगों ने मनरेगा का पैसा खा लिया गांव के गांव में रोजगार दे दिया का दस्तावेजी पुलिंदा तैयार कर लिया। दूसरा, जो खाद्दान्न गांव में सरकार ने बांटने भेजा उसकी काला बाजारी अधिकारियो ने कर दी और दस्तावेज में बताया कि अन्न बांट दिया है। और तीसरा ट्यूब नदी पर बांध बनने का वादा कर तीन साल सरकार ने गुजार दिये । लेकिन गांव वालों को मिला कुछ नहीं। तो यहां सिर्फ चुनाव बहिष्कार ही नहीं हुआ बल्कि रांची में सरकार बनी तो लातेहार में सिलसिलेवार तरीके से न्याय शुरु हुआ। युद्द भूमि है तो न्याय भी यूद्द के तौर पर ही शुरु हुआ । बीते तीन बरस में सोलह पंचायत भवन डायनामाइट से उड़ा दिये गये। पोचरा पंचायत की इमारत की छत को उड़ाकर गांववालों के लिये न्याय घर बनाया गया। जहां नौ गांव में किसी भी मुद्दे के उलझने पर सुलझाया जाता। जिन छह माध्यामिक स्कूलों की इमारतों की स्कूलों में सीआरपीएफ जवान ने कैंप लगाये उन्हे विस्फोट से ध्वस्त कर दिया गया। नेवारी गांव के मिडिल स्कूल की इमारत को गिराकर गांववालों ने अपने युद्द का ट्रेनिंग सेंटर बनाया। फुड

एंड सप्लायी विभाग के एमओ केसर मर्मू का अपहरण कर सबक सिखाया गया। जेरुआ गांव के मनरेगा एक्टीविस्ट नियामत अंसारी की हत्या की गई। इसी तर्ज पर हर गांव वाले ने औतसन तीन बरस में छह से नौ पुलिस या सुरक्षाकर्मियों के वाहनो को नष्ट किया। सीधे समझे तो माइन ब्लास्ट से उड़ाया। इसमें पुलिस मोटरसाइकिल भी है। इस युद्दभूमि में युद्द करना ही कैसे जीने का तरीका बन चुका है, यह सुरक्षाकर्मियों की रणनीति से लेकर माओवाद के नाम पर संघर्ष करते नक्सलियों से लेकर गाम्रीण आदिवासियों के तौर तरीकों से समझा जा सकता है। राज्य पुलिस और सीआरपीएफ के अलावे जगुआर पुलिस से लेकर आधे दर्जन नाम से हंटिंग सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी इस युद्द भूमि में है। वहीं दूसरी तरफ सीपीआई माओवादी-पीपुल्सवार से लेकर झारखंड प्रस्तुति कमेटी और तृतिया प्रसूती कमेटी से लेकर स्वतंत्र इंडियन पीपुल्स कमेटी सरीखे दर्जन भर संगठन अपनी अपनी युद्दभूमि बनाकर अपने जीने के लिये संघर्ष कर रहे है। यानी कोई भी बिना सेना के नहीं है। हर सेना का एक नाम है, जो गांव और पुलिस कैप के साथ बदल जाता है। इस युद्दभूमि में यह सवाल बहुत छोटा है कि कौन सही है या कौन गलत। क्योंकि तीन बरस में मारे गये सात सौ से ज्यादा ग्रामिणों के परिजनो का जो हाल है, उससे बुरा हाल मारे गये सुरक्षाकर्मियो के परिजनो का है । इस युद्द में मारे गये सुरक्षाकर्मी दुधवा मुंडा हो या गोपाल लकडा । या मारे गये ग्रामीण अशोक टोपो हो या प्रकाश घान। इनके परिजन युद्द भूमि में ना सरकार की रियायत पा सकते हैं या युद्द से मुंह मोड़ सकते हैं। और युद्द करते रहना ही क्यों जरुरी है, इसे बताने के लिये घायलों को टटोला जा सकता है। 16 जुलाई 2010 को चाहे वह घायल सुरक्षाकर्मी सुलेमान धान हो या सुरेश टोपो या फिर चन्द्रमोहन जो माओवादियों के एनकाउंटर में घायल हो गये। या फिर इसी इनकाउंटर में घायल कुदमु गांव के मोहन माझी या नायकी। सरकार से मदद किसी को नहीं मिली। अस्पताल का इलाज किसी के पास नहीं पहुंचा। कोई राहत किसी को नहीं मिली । यानी देश की मुख्यधारा से जोड़ने की जो पहल दस्तावेजो में दिल्ली के नार्थ ब्लाक से लेकर रांची में सीएम दफ्तर तक हर दिन हो रही है, वह लातेहार के प्वाइंट जीरो पर कैसे गायब है और कैसे प्वाइंट जीरो पर युद्द ही जीने का एकमात्र रास्ता है। यह ना तो दिल्ली समझ पा रही है और ना ही इसे समझने की जरुरत सत्ता बनाने में भिडे झारखंड की सियासत को है ।

शनिवार, 6 सितंबर 2014

शिक्षक दिवस की उलझन

मुश्किल होता है मेरे लिए। हमेशा ये शिक्षक दिवस हमारे लिए अजीब सी उलझन खड़ी कर देता है। मैं बहुत ध्यान से सोचता हूं तो भी शिशु से लेकर डिग्री लेने की आखिरी कक्षा तक मुझे ऐसा कोई शिक्षक याद नहीं आता, जिसे यादकर मैं ये कह सकूं कि ये वो शिक्षक थे, जिन्होंने मेरे जीवन में शिक्षक की भूमिका अदा की। सब कक्षाओं के शिक्षक की तरह आए-गए। शुरुआती शिक्षा यानी सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षकों (आचार्य जी और दीदी जी) को याद करता हूं तो जरूर कुछ चेहरे आंखों के सामने घूमते हैं, जो बेहद अच्छे लोग थे। लेकिन, मेरे शिक्षक के तौर पर उन्होंने क्या किया - ये मुझे याद नहीं आता।

फिर धीरे-धीरे आगे की कक्षाओं में बढ़ते गए। लेकिन, शिक्षक कोई मेरा रहा, मुझे मिला - इस पर मैं आज तक भ्रम में हूं। न तो मैं बहुत तोड़ विद्यार्थी रहा और न ही बहुत कमजोर। एक अच्छा छात्र, विद्यार्थी रहा। 5 से 8 तक जिन शिक्षकों के नाम भी याद आते हैं तो कान उमेठने के संदर्भ में या फिर डरावने शिक्षक के रूप में। लेकिन, कोई भी शिक्षक मुझे ऐसा नहीं याद आ रहा है, जिसने मुझे कुछ अलग से समझाने, बनाने की कोशिश की हो। सरस्वती शिशु मंदिर शिशु से पंचम तक और छ: से आठ तक स्वामी विवेकानंद विद्याश्रम में। हर जगह मेरी पहचान एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में ही रही। इसके बाद इंटर कॉलेज में पहुंचा तो शहर का एक ऐसा कॉलेज जिसकी इमारत शहर की सबसे खूबसूरत इमारत थी। शानदार खेल का मैदान था। लेकिन, छवि केपी कॉलेज की बहुत अच्छी नहीं थी। यानी पढ़ने वाले बड़े कम थे। इतने बड़े क्लासरूम थे कि दिल्ली एनसीआर में उतनी शानदार इमारत और कक्षाओं वाला विद्यालय बीस हजार रुपये महीने की फीस तो उसी को दिखाकर वसूल ले। 9, 10, 11 और 12 की पढ़ाई मेरी इसी कॉलेज से हुई। पढ़ाई क्या हुई सिर्फ यहां से पंजीकरण के आधार पर यूपी बोर्ड की परीक्षा में बैठने की अर्हता मिल गई और पास होने का प्रमाणपत्र भी। 

शिक्षक तो यहां का भी कोई मुझे याद नहीं आ रहा है। सिवाय एक एम एम सरन के। एम एम सरन भौतिक विज्ञान पढ़ाते थे। शानदार पीएलटी यानी फिजिक्स लेक्चर थियेटर में सरन सर की क्लास चलती थी। सरन सर बच्चों की पीटते भी गजब थे। हालांकि, उनकी क्लास अच्छी होती थी और वो फिजिक्स के मास्टर टीचर थे। 12वीं में सरन सर की कक्षा में एक दिन आगे की सीट पर मैं बैठा हुआ था। वो पढ़ा रहे थे और मैं बगल के बच्चे से बात कर रहा था कि उन्होंने देख लिया। आदेश आया खड़े हो जाओ। बेंच पर खड़े हो जाओ। मैं सिर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा लेकिन, बेंच पर नहीं खड़ा हुआ। गुस्से में सरन सर ने पूछा तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं। मैंने कहा मैनेजर हैं। इतना सुनते ही सरन सर ने गुस्से में कहा तुम चपरासी भी नहीं बन पाओगे। मैंने भी पलटकर जवाब दिया- मैं चपरासी तो नहीं ही बनूंगा। और वैसे तो हमेशा सेकेंड डिवीजनर ही रहा। लेकिन, फिजिक्स में मेरे 100 में से 74 नंबर आए। और इतने नंबर आने के बाद जब मैंने सरन सर को मार्कशीट जाकर दिखाई तो सरन सर ने मेरी पीठ ठोंकी। लेकिन, उससे पहले जब घर जाकर मैंने अपने पिताजी को ये बात बताई कि सरन सर ने मुझे कहा कि तुम चपरासी भी नहीं बन पाओगे, तो पिताजी ने तुरंत कहा सरन के घर चलना है। पिताजी बैंक के बाद यूनियन दफ्तर चले जाते थे। उस दिन करीब आठ बजे यूनियनबाजी करके लौटे थे। लेकिन, तुरंत उन्होंने फिर से अपनी यजदी मोटरसाइकिल स्टार्ट की। मुझे लिया और चल पड़े सरन सर के यहां। काफी खोजने के बाद उनका घर मिला। पिताजी पहुंचते ही सरन सर पर फट पड़े। उन्होंने कहा आप डांटते, मारते, समझाते - लेकिन आपने ये कैसे कह दिया कि तुम चपरासी भी नहीं बन पाओगे। चपरासी बनने के लिए ये आपके पास पढ़ने आता है। पिताजी इतने गुस्से में थे और बात भी उनकी सही थी। कोई शिक्षक अपने ही छात्र को चपरासी भी न बन पाने का आशीर्वाद कैसे दे सकता है। सरन सर बैकफुट पर चले गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान मैंने जीवन सीखा। बहुत कुछ सीखा। और वहां मैं खुद बहुत ज्यादा कक्षाओं में शामिल नहीं हो पाया। इसलिए विश्वविद्यालय के शिक्षकों के ध्यान में न आने की बड़ी वजह मैं खुद हूं। इसके बाद भी विश्वविद्यालय में कक्षाओं, शिक्षकों की स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं कही जा सकती।

इन बातों का जिक्र मैं दरअसल इसलिए कर रहा हूं कि आज जो हर तरफ इस बात की चर्चा होती है कि महंगी फीस वसूल रहे निजी स्कूलों ने कैसे पूरी भारतीय शिक्षा को चौपट कर दिया है। बाजारू बना दिया है। दरअसल उसमें सबसे गंदी भूमिका इन्हीं शिक्षकों की रही। जिन्होंने बस ऐसे ही शिक्षक की भूमिका निभाई। कभी नहीं तय किया कि कक्षा के बच्चों में कौन सा बच्चा क्या कर सकता है, उसे आगे बढ़ाया जाए। विद्यालयों ने बच्चों के आने-जाने की संख्या और हर साल पास होने वाले बच्चों के आधार पर खुद का प्रमाणपत्र पेश किया। सबसे बड़ी मुश्किल भी यही रही। इसीलिए जब आज मैं जिंदगी के इस पड़ाव पर शिक्षक दिवस के लिए एक शिक्षक को याद करने की कोशिश करता हूं तो मुझे कोई शिक्षक याद नहीं आता है।

डिग्री पाने की शिक्षा के दौरान बेहतर शिक्षक हमेशा मेरे आसपास के लोग रहे। हमेशा मेरे पिताजी रहे। हमेशा मेरे पिताजी के पिताजी रहे। मेरी मां रहीं। मेरे घर-परिवार वाले रहे। मेरे दोस्त रहे। मेरी पत्नी रहीं। मेरे साथ काम करने वाले लोग रहे। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग रहे। सबने बिना शिक्षक की पदवी के कुछ न कुछ शिक्षा दी। अब भी मुझे लगता है कि मेरे शिक्षक ऐसे ही राह चलते मिलते रहते हैं। बिना पदवी वाले शिक्षक ही मेरी जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे और निभाते रहेंगे। लेकिन, शिक्षक अगर ये तय नहीं कर पाता कि हर शिक्षक किसी एक छात्र के लिए चाणक्य, द्रोणाचार्य, संदीपनी जैसे याद नहीं किया जा पा रहा तो, मेरी चिंता जायज है। हो सकता है कि शिक्षक दिवस पर हर किसी को अपना कोई शिक्षक महान लगने लगे या फिर ऐसा बताना उसकी मजबूरी हो जाए। लेकिन, मुश्किल ही है कि सच में कितने छात्र अपने जीवन के एक शिक्षक को भी श्रद्धाभाव से देख पाते हैं या उसके बारे में सचमुच बता सकते हैं कि आखिर उस शिक्षक ने उसके जीवन में क्या बदला, बेहतर किया है। यही सबसे बड़ी समस्या है। इसी का समाधान मिल जाए तो शिक्षक दिवस सार्थक हो सके। ये मेरी बदनसीबी रही। लेकिन, खुशनसीब छात्र कितने होंगे।

लोकतंत्र को निगलने को बेताब खड़ा पुलिस तंत्र

उत्पीड़कों और हत्यारों का गिरोह बनती पुलिस मशीनरी, आखिर देश की राजनीति इस पर कब संजीदा होगी?

हरे राम मिश्र

वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए सीरियल बम विस्फोट के आरोप में लखनऊ जिला जेल में बंद जौनपुर केमौलाना खालिद की 18 मई 2013 को पुलिस हिरासत में की गई हत्या के विरोध तथा उनके हत्यारों को तत्काल गिरफ्तार करने की मांग को लेकर उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने मैं स्वयं तथा मेरे कई पत्रकार साथी जाने-माने राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ धरने पर बैठै। मृतक को इंसाफ देने के सवाल पर दिए जा रहे इस अनिश्चितकालीन धरने के दौरान एक दिन हमारे साथियों को रजिस्टर्ड पोस्ट से एक पत्र मिला जो कि इलाहाबाद की नैनी सेन्ट्रल जेल की अंडा बैरक से भेजा गया था। यह पत्र सहारनपुर निवासी एक युवक था जिसे उत्तर प्रदेश की एसटीएफ द्वारा सन् 2005 में अयोध्या में हुए एक कथित नाकाम आतंकी हमले की साजिश रचने में मदद के आरोप में हिरासत में लिया गया था। पेशे से यूनानीपैथी का डाक्टर रह चुके इस युवक को सन् 2005 से ही सहारनपुर से उठाकर नैनी सेन्ट्रल जेल लाया गया था। पत्र के प्राप्त होने तक न तो उस युवक को अदालत से जमानत ही मिल सकी थी और न ही उसका जुडीशियल ट्रायल ही शुरू हो सका था। पत्र के मुताबिक उसे जेल में बंद हुए आठवां साल शुरू हो चुका था। अगर अदालत द्वारा उसे दोषी भी ठहरा दिया जाता तो उसे इतनी सजा नही हो सकती थी। उस पत्र में भारतीय न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर टिप्पणियां की गई थीं।

यहां यह ध्यान देने लायक है कि यह वह समय था जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार को बने लगभग एक साल से ज्यादा हो चुक थे। समाजवादी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वादा किया था कि अगर वह प्रदेश में सत्ता में आयी तो आतंकवाद के आरोपों में बंद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों पर से मुकदमें वापस ले लिए जाएंगे और अगर तत्काल ऐसा संभव न हो सका तो उन्हें जमानत पर तो तुरंत छोड़ दिया जाएगा। इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब किसी राजनैतिक दल ने सार्वजनिक तौर पर यह माना था कि इस देश के मुसलमानों को बेगुनाह होते हुए भी जानबूझ कर आतंकवाद के आरोपों में फंसाया जाता है। पुलिस हिरासत में अमानवीय उत्पीड़न भी होता है तथा पुलिस द्वारा जानबूझ कर उनके पूरे जीवन को तबाह कर दिया जाता है।

यह पत्र युवक द्वारा जब भेजा गया था तब भी उत्तर प्रदेश में बेगुनाहों की रिहाई की मांग को लेकर जबरदस्त आंदोलन चल रहा था। ’एक आतंकवादी का खुला खत सदर-ए-जम्हूरिया के नाम’ शीर्षक से आए इस पत्र में युवक ने आतंकवाद के आरोप में पुलिस और एसटीएस तथा एसटीएफ द्वारा किस अमानवीय तरीके से कार्रवाई की जाती है, का दिल दहला देने वाला वर्णन किया है। उसने अपने पत्र में सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों को संबोधित करते हुए लिखा है कि विस्फोटों के कुछ दिन बाद, एक दिन जब मैं अपनी दिल्ली स्थित क्लीनिक पर मरीज देख रहा था तभी सहारनपुर पुलिस अधीक्षक का संदेश लेकर कुछ सिपाही आए और तत्काल एसपी साहब के पास चलने को कहा। यह कहने पर कल मैं स्वयं आकर मिल लूंगा- वे नहीं माने। थोड़ी देर बाद पता चला कि मेरे छोटे भाई को पुलिस ने घर से उठा लिया है। तत्काल मैं अपनी क्लीनिक बंद कर शाम को पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचा। उसके बाद गाड़ी से मुझे एक सूनसान जगह पर बने मकान पर ले जाया गया जहां पर मेरा भाई भी था। इसके बाद मेरे भाई को छोड़ दिया गया और मुझसे लगातार पांच दिन पूछताछ की गई। इसके बाद मुझे बम विस्फोटों में साजिश रचने वालों की मदद का आरोपी बताते हुए लगातार जुर्म स्वीकार करने के लिए दबाव बनाया जाने लगा। मेरे इनकार करने पर रात में एक बंद गाड़ी में भरकर एक सूनसान जगह पर बने मकान में ले जाया गया। जगह मेरे लिए अनजान थी। वह कमरा काफी बड़ा था और उसके बीच में बने एक खंबे से मुझे जबरिया नंगा करके बांध दिया गया।

उसके थोड़ी देर बाद कुछ सिपाही वहां आए। मेरे कमरे में एक सिपाही ने प्रवेश किया जिसे उसके अन्य साथी ’त्यागी’ नाम से बुला रहे थे। उसने सबसे पहले मेरी दाड़ी जोर-जोर से खींचनी शुरू की। इसके बाद मेरे चीखने पर वह बाहर चला गया। लगभग दस मिनट बाद वह वापस आया और फिर मेरे मुंह पर थूकना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद दो लोग जो काफी डरे हुए लग रहे थे, कमरे में आए। ’त्यागी’ नाम के सिपाही ने उनसे मेरी पहचान करने को कहा। वे रोने लगे और पहचान करने से इनकार कर दिया। इस पर त्यागी सिपाही ने उन दोनों कों लात-जूते और तमाचों से काफी देर तक पीटा। इसके बाद भी जब वे पहचान को तैयार नही हुए तो त्यागी ने उन्हें गाली देते हुए भगा दिया। इसके बाद मुझे भी उसने कई थप्पड़ मारे तथा रात में कमरे से बाहर चला गया। कमरे में मैं अकेला रात भर बंधा खड़ा रहा और रोता रहा।

युवक ने अपने पत्र में आगे लिखा है कि अगले दिन सुबह ’त्यागी’ फिर आया और आते ही उसने सबसे पहले मेरे नीचे के सारे बाल उखाड़ डाले। सीने और चूचक के बालों को भी नोच डाला। फिर कई सिपाहियों ने मेरे साथ उसी कमरे में दुष्कर्म किया। नीचे के रास्ते डंडा डाल दिया। लिंग पर बिजली के झटके दिए गए। लगातार नौ दिन तक नंगा रख कर अमानवीय उत्पीड़न पुलिस द्वारा लगातार जारी रहा। फिर कुछ अफसर आए और नौवें दिन मुझे जेल भेज दिया गया। मैं आज भी बिना ट्रायल के ही जेल में सड़ रहा हूं।

गौरतलब है कि आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए युवकों के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार पहली बार नहीं हुआ है। ज्यादातर की कहानी ऐसी ही मार्मिक है। पुलिस गिरोह द्वारा किया गया उत्पीड़न अगर जानना हो तो खालिद का रिट्रैक्शन देखने लायक है। खालिद ने बताया है कि हिरासत के दौरान उसे नंगाकर के एसटीएफ के सिपाही उसकी टांगों पर चढ़ जाते थे और उसी से उसका लिंग चुसवाते थे। यही नहीं पुलिस हिरासत के दौरान पेशाब करने के लिए कई पुलिस अधिकारी मूत्रालय की जगह उसके मुंह का इस्तेमाल करते थे। अक्षरधाम हमले के आरोपी और अब बरी हो चुके आदम अजमेरी, मुफ्ती कयूम, चांद खान से लेकर उन सबकी आप-बीती दिल दहला देने वाली है। यहीं नहीं, सामान्य केसों में भी पुलिस द्वारा उत्पीड़न की खबरें लगातार आती रहती हैं। थाने में बलात्कार, हत्या हिरासत में गैर कानूनी रूप से रखना बेहद सामान्य बाते हैं। वास्तव में देश के समूची पुलिस मशीनरी आज हत्यारों के सममूह में बदल चुकी है।

अब सवाल यह है कि आखिर हमारी सरकारें पुलिस को इतनी निरंकुश बना कर आखिर आम जनता को क्या संदेश देना चाहती हैं? आखिर समूचा पुलिस तंत्र इस लोकतंत्र और आम जनता को निगलने को बेताब खड़ा है और फिर भी इतनी खतरनाक चुप्पी? आखिर राजनीति द्वारा इन बेगुनाहों के उत्पीड़न पर चुप्पी क्यों है? क्या पुलिस को उत्पीड़कों के गिरोह में बदले बिना लोकतंत्र और इस व्यवस्था को बचाना मुश्किल दिख रहा है। आखिर क्या इसी तरह के लोकतंत्र की कल्पना की गई थी जहां पुलिस ही अदालत की भूमिका में आ रही है। हर उत्पीड़न अक्षम्य अपराध है। आखिर देश की राजनीति इस पर कब संजीदा होगी?

धर्मनिरपेक्ष हिंदू हमारे सहयोगी हैं, हमें अल कायदा की जरूरत नहीं- भारतीय मुस्लिम

नई दिल्ली। आतंकी संगठन अल कायदा के भारत में शाखा खोले जाने के कथित वीडियो के सामने आने के बाद भारतीय मुस्लिमों ने दो टूक कहा है कि धर्मनिरपेक्ष हिंदू हमारे सहयोगी हैं, और हमें अल कायदा की जरूरत नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप में अल कायदा की शाखा के निर्माण की निंदा करते हुए मौलवियों, प्रगतिशील कार्यकर्ताओं और समुदाय के नेताओं ने साफ कहा कि अल कायदा एक आतंकी संगठन है और मुसलमानों के दोस्त नहीं हो सकता।

ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल के महासचिव मौलाना महमूद दरयावी ने एक अंग्रेजी अखबार से कहा “भारत के मुसलमान भारत के संविधान में यकीन रखते हैं, जो उन्हें अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हम आत्मनिर्भर हैं और भारतीय संविधान के ढांचे के अंतर्गत अपनी समस्याओं को हल करने में सक्षम हैं। हमें अलकायदा की जरूरत नहीं है।

कुछ कार्यकर्ताओं ने कहा कि अल कायदा ने पहले से भारत को अपना ‘दुश्मन’ घोषित कर रखा है। प्रमुख मुस्लिम चिंतक और मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी से जुड़े हुए जावेद आनंद ने कहा कि बड़ी मुस्लिम आबादी के साथ भारत आतंकवादी संगठनों के लिए एक आदर्श लक्ष्य हो सकता है लेकिन मेला दृढ़ विश्वास है कि अलकायदा को यहां पैर जमाने की जगह नहीं मिलेगी. मुसलमानों का भारी बहुमत अलकायदा की विचारधारा को स्वीकार नहीं करते।

श्री जावेद ने आगे कहा कि मुस्लिम धर्मगुरुओं को अलकायदा और आईएसआईएस जैसे जिहादी संगठनों की कड़ी निंदा करनी चाहिए।

एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के एम ए खालिद ने कहा, “अल-कायदा हमारा मित्र नहीं हो सकता। वे सच्चे मुसलमान भी नहीं हैं। उन्होंने निर्दोषों की हत्या की है। उन्होंने इस्लामके नाम पर जनसंहार कर इस्लाम को क्षति पहुंचाई है। वे हमारे युवाओं को लुभाने का प्रयास करते हैं, जिसमें वे विफल हो जाएंगे। वे मुसलमानों के दुश्मन हैं और हमें उनकी सहानुभूति की जरूरत नहीं है, ”

हालांकि मुस्लिम समुदाय के भीतर के टिप्पणीकार हैरान नहीं हैं, कि तथाकथित जिहाद के नाम पर कुछ मुस्लिम युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वे आश्वस्त हैं कि कुछ पथभ्रष्ट युवाओं, जैसे कल्याण के 4 लड़के कथित तौर पर सीरिया में आईएसआईएस में शामिल हो गए, मुसलमान इस जिहादी कॉज़ के प्रति आकृष्ट नहीं होंगे।

उर्दू स्तंभकार हन कमाल कहते हैं, “हमारे सबसे अच्छे सहयोगी दलों धर्मनिरपेक्ष हिंदू हैं। जब भी अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय किया गया है उन्होंने हमारी लड़ाई लड़ी है। भारत में पैर जमाने के लिए अलकायदा की कोई विश्वसनीयता नहीं है।” उन्होंने भारतीय मुसलमानों खासकर मौलवियों से, आईएसआईएस और अल कायदा के खतरनाक मंसूबों के खिलाफ खुलकर बोलने की अपील की।

कमल हसन ने कहा, “अल कायदा के अपने खतरनाक आतंकी खेल में उन्हें फंसाने के षडयंत्र के खिलाफ उन्हें उठ खड़ा होना चाहिए।”

जमात ए इस्लामी (हिंद) के अब्दुल हफीज फारुकी ने कहा अलकायदा सांप्रदायिक ताकतों को भारतीय समाज में ध्रुवीकरण करने का एक और कारण उपलब्ध करा देगा। उन्होंने कहा भारतीय मुसलमानों के अलकायदा की विचारधारा से प्रभावित होने का कोई कारण मौजूद नहीं है।

अलकायदा और आईएसआईएस के बीच वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा हो सकता है यह

23 मणिपुरी युवकों के अलकायदा में भर्ती होने का संदेह !
नई दिल्ली। एक अंग्रेजी अखबार ने खबर दी है कि मणिपुर के थोबल जिले के लिलोंग क्षेत्र से कम से कम 23 युवाओं ने हाल के महीनों में अल कायदा की भारतीय इकाई में शामिल होने के लिए घर छोड़ दिया है।
एक शीर्ष पुलिस अधिकारी के अपना नाम न छापने की शर्त के साथ बयान को एक अंग्रेजीअखबार ने प्रकाशित किया है जिसके मुताबिक “वे दो बैच में गए, उनमें से चार वापिस आ गए जबकि अन्य का कोई पता नहीं है।” पुलिस अधिकारी ने कहा कि इन रंगरूटों को अफगानिस्तान व इराक में युद्ध में उतारे जाने से पहले हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया।
अखबार ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि हो सकता है इंडियन मुजाहिदीन का मिर्ज़ा शादाब बेग का धड़ा जिसका आधार अफगानिस्तान में है, ने भारत से नए रंगरूट के रूप में वैश्विक आतंकी संगठन को ज्वाइन किया हो।
बता दें, पहले भी आरोप लगते रहे हैं कि इंडियन मुजाहिदीन नामका कोई संगठन नहीं है और यह खुफिया एजेंसियों का अपना मनगढ़ंत संगठन है। वैसे भी मणिपुर में अलकायदा का ढांचा होने का आधार मालूम नहीं पड़ता है।
राज्य प्रायोजित आतंकवाद के विशेषज्ञ व रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि जिस तरह से देश में सांप्रदायिक ताकतें मजबूत हुई हैं उससे हमारे समाज की कमजोरी बढ़ी है, जाहिर है ऐसे में इस तरह की बाहरी ताकतों का स्कोप बढ़ेगा। इससे मुकाबला करने का एक ही तरीका है कि हम एक समाज के रूप में एकजुट रहें और बाहरी ताकतों के मंसूबों का नाकाम कर दें।
उधर एक अन्य अंग्रेजी अखबार के एक विश्लेषण के अनुसार यह अलकायदा और आईएसआईएस के बीच वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा हो सकता है। क्योंकि अलकायदा, आईएसआईएस से जमीनी जंग हार रहा है। एक इस्लामिक खलीफा राज्य का निर्माण अल कायदा का सपना रहा है। दुर्भाग्य से, इस प्रतियोगिता मे बाज़ी अबू बकर बगदादी ने मार ली। इसी वर्ष फरवरी महीने में अल कायदा ने आईएसआईएस को अपने संगठन से बाहर कर दिया था।
फाउण्डेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज़ के सीनियर फैलो डेनिड गार्टेंसटाईन रॉस के हवाले से अखबार कहता है- अल कायदा, आसानी से नए सहयोगियों की घोषणा नहीं करता, न ही यह मक्खियों की तरह रात ही रात में संगठनों से बना होना प्रतीत होता है। जवाहिरी की यह घोषणा, भारत और अलकायदा के सांगठनिक ढांचे का विश्लेषण दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। यह संभावना है कि हूजी और एचयूएम की शाखाएं जिस तरह इस प्रयास में शामिल हैं, उसी तरह आईएम भी शामिल हो रहा हो।
अखबार कहता है- अब तक, अल कायदा और उसके सहयोगी संगठनों का वैश्विक जिहादी आंदोलन का एक ढीला फ्रेंचाइज़ी मॉडल रहा है. क्षेत्रीय संगठनों ने अपने स्थानीय हितों के अनुसार काम किया लेकिन ओसामा बिन लादेन और अल कायदा की विचारधार के प्रति निष्ठा की कसम खाई। उन्होंने अफगानी तालिबानी नेता मुल्ला उमर के प्रति बैत ( निष्ठा की कसम) किया। बगदादी को इससे परेशानी हुई और और, अल कायदा में और अधिक दरारें सतह पर दिखाई दीं। आईएसआईएस को एक वैकल्पिक जिहादी शक्ति केन्द्र बनाने के लिए इसने बगदादी को प्रेरित किया। अल कायदा में अरब प्रायद्वीप के एक मौलवी मामून हातेम ( Mamoun Hatem) ने आईएसआईएस को समर्थन दिया। पूर्ववर्ती जेम्माह इस्लामिया के इण्डेनेशियन नेता अबू बकर बशीर (Abu Bakar Bashir, Indonesian leader of former Jemaah Islamiyah) ने भी इसका समर्थन किया, इस तरह दक्षिण पूर्व एशिया, और मलेशिया आईएसआईएस के मजबूत भर्ती आधार बन गए।
बगदादी को अबू सय्याफ के सदस्यों का भी समर्थन मिला और मिस्र के अंसार-अल-मकदीस (Ansar Bayt al-Maqdis) ने भी पाला बदलकर बगदादी का साथ दिया।
आईएसआईएस अबू मुसाब अल ज़रकावी के जमात अल तवाहिद अल जिहाद का उत्तराधिकारी है। अखबार अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट स्थित अल कायदा विशेषज्ञ कैथरीन जिम्मेरमान के हवाले से कहता है कि रणनीति को लेकर बिन लादेन और जरकावी में मतभेद हो गया। बिन लादेन और बाद में जवाहिरी ने शिया-सुन्नी विवाद से ऊपर उठकर जिहाद उद्यम में मुस्लिम एकता के आग्रह को बल दिया, जबकि जरकावी ने खुलेआम शियाओं को निशाना बनाया। बाद में आईएसआईएस ने भी जरकावी की लीइन को ही पकड़ा।
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प्रधानमंत्री जी, बच्चों की सुनते तो ज्यादा मुफीद होता

जावेद अनीस
डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिवस (5 सितम्बर ) को पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन इस बार देश के प्रधानमंत्री ने यह फैसला किया है कि 5 सितंबर को देश के सभी स्कूलों के बच्चे उनका भाषण सुनेंगे। इसको लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से सभी शिक्षा बोर्डों को सर्कुलर भी जारी किया गया है, जिसके मुताबिक स्कूलों में प्रधानमंत्री का भाषण दोपहर तीन बजे शुरू होकर 4.45 बजे खत्म होगा और इसे दिखाने के लिए सभी स्कूलों को ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि बच्चे प्रधानमंत्री के भाषण का सीधा प्रसारण देख सकें। इसके लिए उन्हें सैटेलाइट चैनल, रेडियो, इंटरनेट और डीटीएच में से किसी भी संचार माध्यम का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है। निर्देश में यह भी कहा गया है कि इसमें की गयी किसी तरह की भी लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा, निगरानी के लिए सभी डीडीई शिक्षा अधिकारी, उप शिक्षा अधिकारी दौरे पर रहेंगे। हालांकि इसको लेकर हंगामा खड़ा होने के बाद केंद्र सरकार ने इस कार्यक्रम को ऐच्छिक कर दिया है ।
देश में बच्चों की मौजूदा हालात को देखते हुए केंद्र सरकार का यह फरमान कुछ अटपटा सा लगता है। इस मुल्क में 5 से 14 साल के बच्चों की कुल 25.96 करोड़ आबादी है, लेकिन इन बच्चों की स्थिति गंभीर है। आज भी बड़े पैमाने पर बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। जरूरत इस बात की थी कि बच्चों को इन स्थितियों से बाहर निकलने के लिए कोई फरमान जारी किया जाता, एक निश्चित समय सीमा तय की जाती और हमेशा से चले आ रहे संसाधनों की कमी को दूर किया जाता। लेकिन शायद हमारे हुकुमतदानों को यह सब करना मुफीद नहीं लगा।
अगर देश में बच्चों के शिक्षा की ही बात करें तो इसकी सेहत खासी खराब है, देश में अब भी करीब 14 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। कभी देश में प्राथमिक शिक्षा के प्रमुख केन्द्र रहे सरकारी स्कूल अपनी अंतिम सांसें गिनते दिखाई दे रहे है और उनकी जगह पर गावों-गावों तक में अपनी पाँव पसार रहे प्राइवेट स्कूल ले रहे हैं। एक सुनोयोजित तरीके से सरकारी स्कूलों को इतना पस्त कर दिया गया है कि वे अब मजबूरी की शालायें बन चुकी हैं, अब यहाँ उन्हीं परिवारों के बच्चे जाते हैं जिनके पास विकल्प नहीं होता है। आज सरकारी स्कूल हमारे समाज में दिनों- दिन बढती जा रही असमानता के जीते जागते आईना बन गये हैं। शिक्षा और व्यक्ति निर्माण के मसले को बाजार के हवाले किया जा चूका है। कहने को तो देश में सभी बच्चों को चार साल पहले से ही शिक्षा अधिकार कानून (आर. टी. ई.) के तहत शिक्षा का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन इससे हालात में कोई ख़ास सुधार नहीं आया है। सरकारी स्कूल के हालात बिगड़ने की दर उसी मात्रा में जारी है, हालांकि यह शिक्षा का अधिकार भी आधा अधूरा ही है क्योंकि यह सभी बच्चों के सामान शिक्षा की बात को नजरंदाज करता है और इसके दायरे में केवल 6 से 14 साल के ही बच्चे आते हैं। दूसरी तरफ यह कानून शिक्षा के बाजारीकरण को लेकर भी खामोश है। इस कानून के लागू होने के लगभग साढ़े चार साल बीत जाने के बाद हम पाते हैं कि अभी भी हालात में ज्यादा सुधार देखने को नहीं मिलता है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जनवरी 2014 में शिक्षा के अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर जारी रिपोर्ट के अनुसार, भौतिक मानकों जैसे शालाओं की अधोसंरचना, छात्र- शिक्षक अनुपात आदि को लेकर तो सुधार देखने को मिलता है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता, नामांकन के दर आदि मानकों को लेकर स्थिति में ज्यादा परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है,जैसे प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का नामांकन अभी भी 2009-10 के स्तर 48% पर ही बना हुआ है, इसी रिपोर्ट के मुताबिक देश 6.69 लाख शिक्षकों की खतरनाक कमी से जूझ रहा है, देश के 31% प्रतिशत शालाओं में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है जो कि लड़कियों के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने का एक प्रमुख है।
एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की नौवीं रिपोर्ट 2013 शिक्षा की और चिंताजनक तस्वीर पेश करती है, रिपोर्ट हमें बताती है कि कैसे शिक्षा का अधिकार कानून मात्र बुनियादी सुविधाओं का कानून साबित हो रहा है। स्कूलों में अधोसंरचना सम्बन्धी सुविधाओं में तो लगातार सुधार हो रहा है लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरने के बजाये बिगड़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में कक्षा 3 के 43.8% बच्चे कक्षा 1 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे वही 2013 में यह अनुपात कम होकर 32.6 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह से 2009 में कक्षा 5 के 50.3 % बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे वही 2013 में यह भी अनुपात घट कर 41.1 प्रतिशत हो गया है। इसके बरअक्स शिक्षा के बाजारीकरण की दर तेजी से बढ़ रही है। 2013 में भारत के ग्रामीण इलाकों में 29 प्रतिशत बच्चों के दाखिले प्राइवेट स्कूलों में हुए हैं और पिछले साल के मुकाबले इसमें 7 से 11 प्रतिशत वृद्धि हुई है । विश्व बैंक ने हाल ही में दक्षिण एशियाई देशों के छात्रों में ज्ञान के बारे में एक रिपोर्ट जारी की थी, इस रिपोर्ट के अनुसार इन देशों में शिक्षण की गुणवत्ता का स्तर यह है कि कक्षा पांच के विद्यार्थी को सामान्य जोड़-घटाव और सही वाक्य लिखना तक नहीं आता है।
उधर हयूमन राइटस वॉच की रिपोर्ट दे से वी आर डर्टी : डिनाईंग एजुकेशन टू इंडियाज मार्जिनलाइज्ड, हमारे शालाओं में दलित, आदिवासी और मुस्लिम बच्चों के साथ भेदभाव की दास्तान बयान करती है, जिसकी वजह से इन समुदाय के बच्चों में ड्रापआउट होता है।
अगर देश में बाल सुरक्षा की स्थिति को देखें तो यहाँ भी मामला गंभीर स्थिति तक पहुँच गया है, बीते कुछ वर्षों से बच्चों के लापता होने के लगातार बृद्धि हुई है। अदालतों द्वारा इससे निपटने के लिए बार–बार निर्देश दिए जाने के बावजूद सरकारों की तरफ से इस मसले पर गंभीरता नहीं देखने को मिली है। सरकार द्वारा संसद में दी गयी जानकारी के अनुसार 2011 से 2014(जून तक) देश में तीन लाख 25 हजार बच्चे गायब हुए। इस हिसाब से हर साल करीब एक लाख बच्चे गायब हो रहे हैं, जिनमें आधी से ज्यादा लड़कियां होती हैं। इन आकड़ों को देख कर तो यही लगता है कि हमारी सरकारों को इन बच्चों की कोई फिक्र ही नहीं है।
इसी तरह से भारत में लगातार घटता लिंग अनुपात एक चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। 2001 की जनगणना के अनुसार मुल्क में छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों के लिंगानुपात में सबसे ज्यादा गिरावट देखने में आयी है और यह गिर कर 914 तक पहुँच गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि अब तक की सारी जनगणनाओं में बच्चों के लिंगानुपात का यह निम्नतम स्तर है। क्या घटते लिंग अनुपात की यह तस्वीर सरकार और समाज के लिए शर्मनाक नहीं है ?
बाल मजदूरी की बात करें तो 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 से 14 आयु समूह के  1.01करोड़ बच्चे बाल मजदूरी में संलग्न है, इनमें से 25.33 लाख बच्चे तो 5 से 9 आयु वर्ग के हैं। बाल मजदूरी की वजह से ये बच्चे अपने बचपन से महरूम हैं, जहाँ उन्हें अपनी क्षमताओं को बढाने का मौका भी नहीं मिलेगा।
बाल विवाह को लेकर भी तस्वीर अच्छी नहीं है,पूरे विश्व में हर वर्ष होने वाले तकरीबन छह करोड़ बाल विवाहों के 40 फीसदी हमारे देश में ही होते है।
अभाव और भुखमरी की मार सबसे ज्यादा बच्चों पर पड़ती है। गर्भवती महिलाओं को जरूरी पोषण नही मिल पाने के कारण उनके बच्चे तय मानक से कम वजन के पैदा होते हैं। जन्म के बाद अभाव और गरीबी उन्हें भरपेट भोजन भी नसीब नही होने देती है। पर्याप्त पोषण ना मिलने का असर बच्चों के शरीर को और कमजोर बना डालता है, जिसकी मार या तो दुखद रूप से बच्चे की जान ही ले लेती है या इसका असर ताजिंदगी दिखता है। ऐसे में हम पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति देखें तो हमारा मुल्क बाल पोषण के मामले में पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश से भी नीचे की सूची में हैं। यही नहीं भारत में लगभग हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। विकास के तमाम दावों के बावजूद अभी तक हम केवल 40 प्रतिशत बच्चों का सम्पूर्ण टीकाकरण कर पाए हैं जिसकी वजह से बड़ी संख्या में बच्चे पांच साल से पहले ही दम तोड़ देते हैं।
किसी भी देश में बच्चों की स्थिति से उस देश की प्रगति और सामाजिक, सांस्कृतिक विकास का पता चलता है। बचपन एक ऐसी स्थिति है जब बच्चे को सबसे अधिक सहायता, प्रेम, देखभाल और सुरक्षा की जरुरत होती है वे वोट तो नहीं दे सकते हैं फिर भी हमें उन्हें देश के नागरिक के रूप में अधिकार देना ही होगा। इसलिए जब देश के बच्चों की हालात इतनी नाजुक हो तो उन्हें भाषण पिलाने से ज्यादा उनके समस्याओं को लेकर कुछ ठोस और टिकाऊ उपाय करने की जरूरत है, होना तो यह चाहिए था कि बच्चों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए उनके मुद्दों और समस्याओं को प्राथमिकता से केन्द्र में लाया जाता। अगर नयी सरकार को कुछ नयापन ही दिखाना था तो वह बच्चों को भी नागरिक के रुप में मान्यता देते हुए उनकी समस्याओं को पूरी प्राथमिकता और संवेदनशीलता के साथ अपने कार्यक्रमों में शामिल करती और उन्हें दृढ़ता एवं ईमानदारी के साथ लागू करने का संकल्प प्रस्तुत करती।

अच्छे छात्र शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहते हैं-मोदी

नई दिल्ली। शिक्षक दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को देश भर के बच्‍चे को संबोधित करते हुए कहा कि जो पीढ़ियों की सोचते हैं, वे लोग इंसान बोते हैं। मोदी ने छात्रों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए इस बात पर हैरानी जताई कि अच्छे छात्र शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहते हैं।

शिक्षक दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ ऑडिटोरियम में 1,000 स्कूली बच्चों से बात की और उनके द्वारा पूछे गए सभी सवालों का जबाव दिया। यहीं नहीं, वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये भी मोदी देश भर से जुड़े और बच्चों से पूछे गए सवाल दिया। इस विशेष कार्यक्रम का देश भर के स्कूलों में टेलीविजन, रेडियो और इंटरनेट पर सीधा प्रसारण किया गया। गौरतलब है देशभर में अलग-अलग राज्यों ने पीएम के भाषण को स्कूलों में दिखाने के लिए व्यापक इंतजाम किए थे, जिन स्कूलों में बिजली उपलब्ध नहीं है, वहां जनरेटर की व्यवस्था की गई है, जिन स्कूलों के पास टीवी नहीं है, उन्होंने मोदी से जुड़ने के लिए टीवी किराए पर लिए।

इसके अलावा जिन दूर दराज के इलाकों में जहां स्कूलों में टीवी की सुविधा नहीं है, वहां रेडियो पर इसका प्रसारण किया जा रहा है, जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है, वह पीएम और विद्यार्थियों की इस बातचीत को यू ट्यूब पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चैनल तथा प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर देखा।

छात्रों को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा मेरे लिए सौभाग्‍य की बात है। आज सारी दुनिया में अच्‍छे शिक्षकों की मांग है। उन्‍होंने कहा कि महापुरुषों के जीवन में शिक्षकों का बड़ा योगदान रहा है। जो पीढ़ियों के बारे में सोचते हैं, वो इंसान बोते हैं। गांवों में एक समय सबसे आदरणीय शिक्षक हुआ करते थे। शिक्षकों से बच्‍चों का अपनापन होता है। हमारे देश के बच्‍चों में आगे बढ़ने का काफी सामर्थ्‍य है। बच्‍चों की ओर से पूछे गए एक सवाल के जवाब में मोदी ने कहा कि मैं टास्क मास्टर हूं, मैं खुद भी काम करता हूं और औरों से भी काम लेता हूं। उन्‍होंने यह भी कहा कि मेरा ध्यान यह सुनिश्चित करने पर है कि लड़कियां स्कूली पढ़ाई बीच में न छोड़ें। सभी स्कूलों में शौचालय की पहल इसी प्रयास का हिस्सा है।

एक अन्‍य के सवाल के जवाब में मोदी ने कहा कि राजनीति को सेवा के तौर पर लेना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि आज देश में एक माहौल बनना चाहिए और इसके लिए मुझे हर स्‍कूल से मदद चाहिए। शिक्षकों को तकनीकी पर जोर देना चाहिए। छात्रों को तकनीकी से दूर रखना गुनाह है। बच्‍चों के लिए खेल कूद जरूरी है। खेल कूद के बिना जीवन खिलता नहीं है। छात्रों को टीवी की दुनिया से बाहर आना चाहिए। किताबों, टीवी के दायरे से बाहर भी जीवन है। पीएम ने कहा कि जिंदगी में परिस्थितियां किसी को रोक नहीं सकती है। जीवन में मस्‍ती भी होनी चाहिए।

‘क्या हमें अपने साध्य और साधनों का ज्ञान है?’

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

यदि हमने साध्य को भुले हैं तो समझिये कि हमारा जीवन बर्बाद हो रहा है-

साध्य लक्ष्य या उद्देश्य को कहते हैं। साधन वह है जिसकी सहायता से साध्य या लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि हमें दिल्ली जाना है तो दिल्ली हमारा साध्य कहलायेगा। दिल्ली जाने के लिए हम पैदल, दो पहिया वाहन, चार या अधिक पहियों के वाहन यथा कार, बस आदि अथवा रेलगाड़ी का प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए प्रयोजन और साधनों के प्रयोग के लिए आवश्यकता के अनुरूप धन आदि भी होना चाहिये। ऐसी अवस्था में पैदल चलना, गाड़ी की सहायता लेना तथा धन आदि साधन कहलाते हैं। इन साधनों का प्रयोग कर दिल्ली पहुंच जाते हैं और हमें हमारे साध्य वा लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है।

यह तो बात हुई साध्य व साधनों की। अब विचार करना है कि हमारे जीवन का असली साध्य क्या है? मनुष्य माता-पिता से जन्म लेकर संसार में आता है। जन्म क्यों होता है? इसका उत्तर हमें ज्ञात करना है। हमारे वेद आदि शास्त्रों व ऋषि-मुनियों ने इस प्रश्न का उत्तर शास्त्रों के अध्ययन, उनके ज्ञान व अपने अनुभवों से दिया हुआ है जिसका हमें मात्र अध्ययन कर चिन्तन करना है। हमारे वेदादि शास्त्र एवं महर्षि दयानन्द सहित ऋषि-मुनियों के ग्रन्थ बताते हैं कि मनुष्य का जन्म पूर्व जन्म में किये हुए अवशिष्ट कर्मों के फलों के भोग के लिए व साध्य को जानने व उसकी प्राप्ति के लिए पुरूषार्थ करने के लिए होता हे। हम मनुष्य जीवन में जो कर्म करते हैं उनमें कुछ ऐसे होते हैं कि जिनका फल हमें साथ-साथ या इसी जन्म में मिल जाता है, यह क्रियमाण कर्म कहे जाते हैं। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो हमारे कर्मों के खाते में जमा हो जाते हैं और वह हमारे पुनर्जन्म या मोक्ष आदि में सहायक होते हैं। यह जो कर्म किये जाते हैं इनमें एक तो अपने शरीर की रक्षा के लिए होते हैं जिसमें भोजन, आवास, वस्त्र, स्वयं व अपने परिवार की शिक्षा-दीक्षा, परिवार में रोग आने पर उनकी चिकित्सा, सन्तानों के विवाह, वाहन आदि खरीदने के साथ भावी आपातकालीन स्थिति के लिए कुछ अतिरिक्त संग्रहित धन की व्यवस्था भी करनी होती है जिसे धन के उपार्जन अर्थात् अध्ययन-अध्ध्यापन, सेवा या नौकरी, स्वतन्त्र व्यवसाय, राजनीति, कृषि व अन्य-अन्य कार्यों से प्राप्त किया जाता है। यह सब तो जीवन यापन के लिये किया जाता है। क्या जीवन यापन व सुख-दुःख भोगने के लिए ही हमारा जन्म हुआ है? विचार व विवेचन करने पर ज्ञात होता है कि नहीं यह तो जीवन के महद् उद्देश्य के पूरक व आरम्भिक सोपान हैं। जीवन का उद्देश्य अथवा साध्य तो इन सब कार्यों से भिन्न है। वह है – सुख व दुःखों की सदा-सदा अर्थात् बहुत लम्बी अवधि तक के लिए पूर्ण निवृत्ति व परमानन्द=सर्वश्रेष्ठ आनन्द की उपलब्घि या प्राप्ति। क्या ऐसा सम्भव है कि हमें सुख व दुःख दोनों ही न हों और परम आनन्द अर्थात् सर्वश्रेष्ठ सुख की उपलब्धि हो जाये। वेद और वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन, विचार व चिन्तन से यह सिद्ध होता है कि यह सम्भव है और इससे पूर्व अनेकानेकं मनुष्य सुख-दुःख जिसका कारण मनुष्य जन्म व मृत्यु होता है, इससे मुक्त होकर परमानन्द प्राप्त कर चुके हैं। आईये, अब इस परमानन्द और इसकी प्राप्ति पर विचार एवं इसकी विधि पर विचार करते हैं।

हमने उपर्युक्त संक्षिप्त विचार व चिन्तन में देखा कि हमारे सभी सुख व दुःख हमारे पूर्व जन्म व इस जन्म के अच्छे व बुरे कर्मों के कारण होते हैं। यदि हम कर्मों में आसक्ति अर्थात् फलों की इच्छा का त्याग कर दे, उसी प्रकार जिस प्रकार से बुरे कर्मों के फल भोगने में हमारी प्रवृत्ति किंचित भी नहीं होती, तो क्या होगा? यह होगा कि हम जो अच्छे कर्म करेगें वह इकट्ठे होते रहेगें और अच्छे कर्मों का खाता बढ़ता रहेगा। इससे ऐसी स्थिति आयेगी की जब हमारे अच्छे कर्म 100 प्रतिशत हो जायेगें एवं बुरे व पाप कर्म जिनका फल या कारण दुःख होता है, वह शून्य हो जायेगें या बहुत कम रह जायेगें। यह भी मान लीजिये कि इस अवस्था तक पहुंचने में जीवात्मा ने ईश्वर विचार, चिन्तन, ध्यान व समाधि का भी अधिकाधिक अभ्यास किया है और वह उसे प्राप्त भी हुई है। वह जान गया है कि ध्यान करने का अन्तिम परिणाम समाधि होती है और समाधि में इस संसार को बनाने व चलाने वाले तथा जीवात्मा को जन्म व मृत्यु प्रदान करने वाले परमात्मा वा ईश्वर का निभ्र्रान्त ज्ञान भी उस ध्यान करने वाले व्यक्ति को हो जाता है। जब वह समाधि में होता है तो उसका बाह्य संसार, जगत् या वातावरण से सम्पर्क विछिन्न हो जाता है और ध्यान कर रहा व्यक्ति ईश्वर के स्वरूप को अपनी आत्मा में प्रत्यक्ष अनुभव करता है व साक्षात् करता है। यहां विचार करने की बात यह है कि हम सांसारिक पदार्थों को आंखों की सहायता से देखते हैं क्योंकि इनका स्वरूप ही परिमित आकार वाला व स्थूल होता है। आकार व आकृति को देखती अर्थात् अनुभव करती मनुष्य की आत्मा ही है। इसी प्रकार से समाधि में भी उस निराकार, ज्ञान स्वरूप सर्वज्ञ प्रकाशस्वरूप परमात्मा को हमारी आत्मा ही साक्षात् अनुभव करती है। जिस प्रकार से भौतिक जगत में हम वस्तुओं को उनके स्थूल व आकार वाले रूपों को देखते हैं इसी प्रकार से ध्यान व समाधि में ईश्वर को उसके सच्चिदानन्द, निराकार, प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्परूप यथार्थ स्वरूप को देखा अर्थात् उसे साक्षात्, निभ्र्रान्त रूप में देखा व अनुभव किया जाता है। इसी को ब्रह्म साक्षात्मकार व आत्म साक्षात्कार कहा जाता है। यह ईश्वर-साक्षात्कार व निभ्र्रान्त अनुभव, जीवात्मा के सत्कर्मों अर्थात् पुण्यकर्मो का फल होता है। यह अवस्था तभी प्राप्त होती है जीवन में इसके लिए पात्रता आ जाती है व जब ईश्वर जीव पर कृपा करके अपना साक्षात् स्वरूप प्रदर्शित करते हैं। सभी जीवों को इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए ही यह मनुष्य जन्म मिला है इस ब्रह्म साक्षात्कार की स्थिति के प्राप्त हो जाने पर ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूरा होता है। इसी अवस्था को कहा जाता है कि मनुष्य जीवन का ‘‘साध्य’’, लक्ष्य अर्थात् ईश्वर की यथावत् प्राप्ति हुई है। इस अवस्था को प्राप्त होने के बाद मनुष्य जीवन्मुक्त कहा जाता है और कालान्तर में मृत्यु होने पर ईश्वर उस जीवात्मा को मोक्ष अवस्था प्रदान करते हैं। मोक्ष अर्थात् सभी दुःखों से पूर्णतः निवृत्ति की अवस्था। जब जीवात्मा को कुछ जानना होता है व कोई सात्विक इच्छा होती है तो वह ईश्वर के सान्निध्य व साक्षात् सम्बन्ध के होने से पूरी हो जाती है। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु होने पर वह अपने यथार्थ स्वरूप=आत्मस्थ स्वरूप में विद्यमान रहते हुए अपने संकल्प शरीर से ईश्वर से युक्त होकर आनन्द की अनुभूति के साथ लोक लोकान्तरों का भ्रमण व विचरण आदि करता है व ईश्वर के कार्यों व सृष्टि को देखता है।

मित्रों, महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना की और उसके 10 नियम बनायें हैं। इन नियमों पर जब हम विचार करते हैं तो हमें लगता है पहला व दूसरा नियम तो मनुष्य जीवन के साध्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है और शेष आठ नियम उस साध्य की प्राप्ति के साधनों को प्राप्त कराने के लिए एक प्रकार से साधन है। पहले नियम में मनुष्य को ईश्वर के स्वरूप व कृतित्व से परिचय कराते हुए कहा गया है कि ‘‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है।’’ यहां एक बात तो यह कही गई कि मनुष्य से भिन्न एक पृथक ईश्वर की सत्ता है जो सब सत्य विद्याओं का मूल कारण या आदि कारण हैं। उदाहरण के रूप में हम कम्प्यूटर साइंस विद्या को लेते हैं। इस नियम में गौण रूप से यह कहा गया है कि यह जो कम्प्यूटर विज्ञान की विद्या है, यह ईश्वर द्वारा इस संसार को बनाने में ही विद्यमान थी। ईश्वर इसका आदि व मूल कारण है। मनुष्यों, वैज्ञानिकों ने तो बस सृष्टि में उपलब्ध विविध प्रकार के ज्ञान व नियमों की खोज की है, जिसे विज्ञान का नाम दिया गया है और उसका उपयोग वह वैज्ञानिक व अन्य मनुष्यादि लोग कर रहे हैं। यही हाल सभी सत्य विद्याओं का है। ईश्वर है तो सब विद्यायें हैं। ईश्वर न होता तो कोई भी विद्या न होती क्योंकि तब उसके न होने पर यह संसार ही न बनता। हम देश व दुनियां के सच्चे वैज्ञानिकों का श्रद्धापूर्वक हार्दिक धन्यवाद व उन्हें नमन करना चाहते हैं। उनका कार्य भी कुछ-कुछ हमारे ऋषियों की ही तरह आध्यात्मिक न होकर प्रकृति के अध्ययन से जुड़ा है जिसमें कल्पनातीत नियमबद्ध पुरूषार्थ शामिल है। हम सभी मत-मतान्तरों के मठाधीशों, महन्तों व प्रवतर्कों से यह भी कहना चाहते हैं कि वैज्ञानिकों का अनुकरण व अनुसरण करते हुए ईश्वर की बात करते समय वैज्ञानिकों की भांति पूर्ण सत्य की खोज कर ईश्वर का केवल सत्य स्वरूप ही अपने अनुयायियों में प्रस्तुत व प्रचारित करें और अज्ञान व स्वार्थ से ऊपर उठने का प्रयास करें। हमे लगता है कि अधिकांश मत-मतान्तरों में ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरूप का ज्ञान आज भी नहीं है इसलिये जो भी उपासना, पूजा व अन्य प्रक्रिया सभी संसार के मनुष्य कर रहे हैं वह मनुष्य जीवन के साध्य वा लक्ष्य में साधक न होकर बाधक लग रही है।

हम आर्य समाज के लोग यूरोप आदि के वैज्ञानिकांे के इस लिए भी आभारी है कि उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान कर कागज व मुद्रण यन्त्रों का निर्माण किया जिससे हम वेदों की रक्षा कर सके। कल्पना कीजिए कि यदि वैज्ञानिकों ने कागज व मुद्रण प्रैस की खोज व निर्माण न किया होता या एक दो शताब्दी हुआ होता, तो महर्षि दयानन्द व आर्य समाज वेदों का संरक्षण व प्रचार प्रसार वर्तमान व पूर्व काल की भांति नहीं कर पाते। यदि महर्षि दयानन्द को वेदों की प्रति उपलब्ध भी हो जाती तो शायद उसे देश-देशान्तर में प्रचारित करना कठिन होता क्योंकि उन्होंने जो सत्यार्थ प्रकाश एवं वेदभाष्य आदि लिख कर सहस्रों प्रतियों में प्रचारित व प्रसारित किए उसके न होने पर प्रचार अत्यन्त सीमित होता। हम कभी-2 सोचते हैं कि आज हमारे पास साहित्य का प्रचुर भण्डार है। हमें लगता है कि प्राचीन काल अर्थात् अब से 500 वर्ष व उससे पूर्व यह सुविधा हमारे देशवासियों को सुलभ नहीं थी। अतः हम सौभाग्यशाली है कि आज सभी वेद अन्य अनेक वैदिक ग्रन्थ हमारे घर पर हैं वह वह हमारी निजी सम्पत्ति हैं। हमारे पास केवल एक विद्वान का ही नहीं अपितु अनेक विद्वानों का भाष्य है। इसका श्रेय महर्षि दयानन्द व उनके अनुयायी वेदभाष्यकारों सहित हमारे यूरोपीय वैज्ञानिकों को भी हैं। इसके लिए महर्षि दयानन्द, वेदों के सच्चे अर्थ करने वाले वेदभाष्यकारों तथा सभी वैज्ञानिकों को भी हमारा नमन है।

आर्य समाज के दूसरे नियम में ईश्वर के सत्य स्वरूप का वर्णन किया गया है जो चारों वेदों के अध्ययन का महर्षि दयानन्द का निचोड़ व सार है। इसकी परीक्षा करने पर इस नियम में कहे गये एक-एक शब्द पूर्ण सत्य अनुभव होते हैं, हमारी आत्मा उसकी साक्षी देती है। इसकी आज तक किसी मत-मतान्तर के विद्वान ने आलोचना नहीं की जिससे इसका शत प्रतिशत सत्य होना सिद्ध है। आईये, आर्य समाज के दूसरे नियम पर दृष्टि डाल लेते हैं- ‘‘ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र व सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।‘‘ महर्षि दयानन्द ने देश-देशान्तर के सभी लोगों के लिए ईश्वर के सच्चे स्वरूप का संक्षेप में यह वर्णन किया है। वेदाध्ययन कर ईश्वर के बारे में विस्तार से भी जाना जा सकता है। जितना महर्षि दयानन्द ने इस नियम में वर्णन किया है, इतना भी जानकर और उसे जीवन में धारण करने से मनुष्य जीवन का कल्याण हो सकता है व अनेकों का हुआ है। इन्हीं गुणों से साध्य की सफलता के लिए ईश्वर की उपासना प्रत्येक मनुष्य=स्त्री व पुरूष को करनी चाहिये। इन गुणों पर विचार व चिन्तन करने व ध्यानावस्था में इसमें खो जाने पर कालान्तर में समाधि अवस्था की सम्भावना बनती है। इसके साथ योगदर्शन का अध्ययन कर आध्यात्म विज्ञान व इसके रहस्यों को जाना जा सकता है। महर्षि दयानन्द और आर्य समाज की कृपा से यह सब ज्ञान पुस्तकों में हिन्दी भाषा में उपलब्ध है जिसे हिन्दी के अक्षरों व शब्दों का ज्ञान रखने वाला अल्प शिक्षित व्यक्ति भी जान व समझ सकता है और अपने जीवन का कल्याण कर सकता है। महर्षि दयानन्द की यह संसार को बहुत बड़ी देन है।

आईये, अब अन्य 8 नियमों की चर्चा करते हैं। यह सब साध्य=ईश्वर प्राप्ति के एक प्रकार से साधन ही हैं। आर्य समाज के तीसरे नियम में कहा गया है कि ‘‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’’ यहां साधनों का मार्ग दर्शन करते हुए कहा गया है कि साध्य व साधनों को जानने के लिए वेदों का ज्ञान व वेद की पुस्तकें हैं। उसे पढ़ने से साध्य व साधन दोनों का ज्ञान हो जाता है। चैथा नियम है कि ‘‘सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।’’ यहां महर्षि दयानन्द बता रहे हैं कि साध्य को हम तभी पकड़ सकते हैं जब हम सत्य को ग्रहण करेंगे और असत्य को छोड़ेंगे। यदि हम सत्य को ग्रहण व असत्य को नहीं छोडंे़गे तो प्रलय काल तक भी साध्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसी प्रकार से पांचवें नियम में कहा गया है कि ‘‘सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार कर करने चाहिये।’’ इस नियम में यह कहा गया है कि कर्म करने से पूर्व सत्य व असत्य का विचार कर लेना चाहिये। यदि पता न चले तो स्वाध्याय से या फिर अपने से अधिक विद्वान व बुद्धिमानों से परामर्श कर समाधान कर लेना चाहिये। यदि कोई काम असत्य हो गया तो वह साध्य की प्राप्ति में बाधक होता है। अतः यहां सावधान किया गया है कि कोई भी असत्य काम न हो अपितु सब काम सत्य अर्थात् धर्मानुसार ही करने चाहियें। ‘‘ससार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना’’, इस छठे नियम में भी साधक को प्रेरणा की गई है कि साध्य की प्राप्ति के लिए वह संसार, देश व समाज के लोगों की शारीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति करे व कराये। इसमें यह भी शामिल है कि उसे अपनी भी तीनों प्रकार की उन्नति करनी है जो साध्य की प्राप्ति में सहायक एवं आवश्यक है। सातवें नियम में महर्षि दयानन्द आर्य समाज के सदस्यों को उपदेश करते हैं कि ‘‘सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये।’’ इस नियम में निर्दिष्ट तीन बातों का पालन करने से भी साध्य की निकटता होती है और विपरीत आचरण करने से साध्य से दूरी बनती है। आठवें नियम में महर्षि दयानन्द आधुनिक संसार के निर्माण की नींव रखते हुए कहते हैं कि ‘‘अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’’ इस नियम के पालन करने से न केवल हमारा समाज व विश्व ही उन्नत व आधुनिक बनता है साथ हि अध्यात्म में भी तीव्रतम प्रगति की जा सकती है और साध्य शीघ्र प्राप्त व सफल किया जा सकता है। ‘‘प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।’’ यह आर्य समाज का नवम् नियम है जिसके पालन की आज के युग में सबसे अधिक आवश्यकता है। आज जो सामाजिक व आर्थिक विषमता है उसकी नींव में इस नियम के विरूद्ध व्यवहार का होना है। इस नियम का पालन भी साध्य की प्राप्ति में आवश्यक है और इसके विरूद्ध व्यवहार साध्य की प्राप्ति में बाधक है। अन्तिम दशम् नियम है कि ‘‘सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में सब स्वतन्त्र रहें।’’ यह नियम सद्कर्मों का प्रेरक और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की हानि करने का विरोध कर रहा है और ऐसा करके ही हम अपने ‘‘साध्य’’ सर्वव्यापक ईश्वर के समीप हो सकते हैं और उसे प्राप्त कर सकते हैं। अतः आर्य समाज के सभी नियम साध्य व साधनों का वर्णन कर रहे है व उनके प्रेरक हैं। इस दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति को आर्य समाज का अनुयायी व प्रचारक बनना चाहिये जिससे वह साध्य को यथाशीघ्र प्राप्त कर सके। हम यहां यह भी कहना चाहते हैं कि आर्य समाज जैसे नियम विश्व में किसी धार्मिक व सामाजिक संस्था के नहीं हंै, राजनीतिक संस्थाओं के होने की आशा करना तो बन्ध्या के पुत्र के समान है।

लेख में हम वैशेषिक दर्शन (अध्याय 1 सूत्र 2) ‘‘यतोभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।’’ का भी उल्लेख करना चाहते हैं। इसमें कहा गया है जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्ध होती है वह धर्म होता है। अभ्युदय का अर्थ सुख व समृद्धि से युक्त सम्मानित जीवन और निःश्रेयस, साध्य = ईश्वर व मोक्ष की प्राप्ति के होने को कहते हैं। जिन साधनों, कार्यों व उपायों से यह दोनों सफल होते हैं उनका नाम धर्म है। यह धर्म ही हमें साध्य को प्राप्त कराता है अर्थात् यह धर्म ही साध्य की सिद्धि व सफलता का साधन है। धर्म केवल वह है जो वेद व वेदानुकुल शास्त्र व ग्रन्थों में उपदिष्ट है। इनके विरूद्ध जो बातें व कार्य हैं वह धर्म की कोटि में नहीं आते अतः वह साध्य प्राप्ति के साधन नहीं हो सकते हैं।

हमने इस लेख में जाना है कि प्रत्येक मनुष्य का साध्य ईश्वर की प्राप्ति व उसका साक्षात्कार है। इसके साधन ईश्वर का ज्ञान, ईश्वर की उपासना, सेवा, परोपकार, यज्ञ, अग्निहोत्र, माता-पिता-आचार्यों-गुंरूजनों-सच्चे साधुओं व संन्यासियों आदि की सेवा व वेद का अध्ययन, अध्यापन व वेदाचरण के साथ सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, आर्याभिविनय, संस्कार विधि आदि का अध्ययन भी हैं। यह जान लेने के बाद आवश्यकता है कि साधनों का उपयोग कर साध्य को प्राप्त करने के लिए संकल्पपूर्वक अग्रसर होना। ईश्वर आपके अवश्य सहायक होंगे, आप आरम्भ करें।

-मनमोहन कुमार आर्य

सरकार के 100 दिन : ‘अच्छे दिनों’ की ओर पहला कदम

सिद्धार्थ शंकर गौतम
ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।
http://www.pravakta.com/author/siddharthashankargautamgmail-com
पहली बार प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने 100 दिन पूरे कर लिए हैं।वैसे तो किसी भी नई-नवेली पार्टी की सरकार के कार्यों की समीक्षा हेतु 100 दिनों का समय काफी कम है, अतः समीक्षा नहीं ही होना चाहिए किन्तु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली के कारण इन 100 दिनों में भी सरकार की समीक्षा हो रही है।चूंकि मोदी ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान देश की जनता के समक्ष विकास और सुशासन का जिस तरह का खाका खींचा था और 100 दिनों में ‘अच्छे दिन‘ लाने का वादा किया था, उस लिहाज से यदि मोदी सरकार को वादों की कसौटी पर कसा जाए तो सरकार का प्रदर्शन संतोषजनक ही कहा जाएगा।वैसे भी यूपीए सरकार के दो कार्यकालों के दौरान जिस तरह लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास हुआ, उसकी भरपाई में मोदी को वक़्त तो लगना ही है। हालांकि प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट की दूसरी बैठक के बाद सरकार के कामकाज को रफ्तार देने के लिए सरकार का 10 सूत्री एजेंडा तय किया था और अपने मंत्रियों को ‘सुशासन, कार्यकुशलता और क्रियान्वयन‘ रखते हुए इसके हिसाब से काम करने का मंत्र दिया था।इसके साथ ही सभी मंत्रियों से कहा गया कि वे अपने मंत्रालय के लिए 100 दिनों का एजेंडा बनाएं और उस पर अमल करें।

प्रधानमंत्री ने मंत्रियों से कहा था कि मुख्य मुद्दा सुशासन है।इसके ऊपर प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना चाहिए।इसके बाद डिलिवरी सिस्टम पर भी ध्यान देना होगा।उन्होंने कहा था कि राज्य सरकारों से जो चिट्ठियां आती हैं, उन्हें महत्व दिया जाना चाहिए।संसद और जनता के भी सुझावों पर ध्यान देकर समाधान करने का प्रयास करने की सीख भी दी गई थी।यह भी तय हुआ था कि प्रधानमंत्री मोदी मंत्रियों और सचिवों के साथ अलग-अलग बैठकें भी किया करेंगे।कैबिनेट की 2 बैठकों में मोदी ने जिस तरह सरकार के सभी सूत्र अपने हाथ में रखे और सुशासन को सर्वोपरि बताया, उससे यह संकेत भी गया कि अबकी बार मोदी सरकार से जनता को धोखा तो नहीं मिलेगा।

प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेन्द्र मिश्र ने भी मोदी की कार्यप्रणाली पर जोर देते हुए यह बताने की कोशिश की, कि मोदी अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को पूरा करने लिए पूरी सरकारी मशीनरी को चुस्त करेंगे।यानि यह संकेत था कि मंत्रियों की टीम के बाद अब मोदी ब्यूरोक्रेसी में भी अपने हिसाब से बदलाव कर सकेंगे, क्योंकि वह अपने एजेंडे को लागू करवाने के लिए ब्यूरोक्रेसी पर बहुत अधिक निर्भर रहते हैं।मोदी ने हर विभाग के सचिव पद के लिए तीन संभावित नाम और उनके ट्रैक रेकॉर्ड तलब किए।यह भी तय हुआ कि मोदी की प्राथमिकता वाली योजनाओं को पूरा करने के लिए एक समयसीमा तय होगी।वहीं लंबे समय से अटकी अहम परियोजनाओं की अड़चनें दूर कर उन्हें रफ्तार देने पर ख़ास ध्यान दिया जाएगा।मंत्रियों को अपने निजी स्टॉफ में अपने रिश्तेदारों और संबंधियों को न रखने का सुझाव देकर मोदी ने यकीनन राजनीति में सुचिता की ओर पहला कदम बढ़ाया है।निजी माहतमों के होने से सरकार के कई काम प्रभावित होते हैं वहीं भ्रष्टाचार और परिवारवाद को भी बढ़ावा मिलता है।हालांकि अपने सुझाव में मोदी को मंत्रियों को यह हिदायत भी दे देनी चाहिए थी कि देशी-विदेशी सरकारी दौरों पर भी अपने परिवार को वे दूर ही रखें।चूंकि इस परिपाटी से सरकार पर सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप लगता है वहीं सरकार में शामिल मंत्रियों की संवेदनाओं पर सवालिया निशान लगाए जाते हैं।लिहाजा मोदी को इस परिपेक्ष्य में थोड़ा सख्त होना पड़ेगा।

देखा जाए तो 12 सालों के गुजरात में शासन के अनुभव ने मोदी को इतना राजनीतिक पांडित्य तो सिखा ही दिया है कि वे मंत्रियों, अधिकारियों और जनता की नब्ज़ पर हाथ रखकर अपनी नीतियों और कार्यों के क्रियान्वयन को साकार कर सकें।फिर मोदी की राज करने की नीति भी उनकी सोच को यथार्थ के धरातल पर उतारने का हौसला देती है।उसपर से पूर्ण बहुमत से सरकार गठन भी मोदी को स्वतंत्रता प्रदान कर रहा है जहां वे जनता से किए वादों को सच में तब्दील कर सकें।जिस गुजरात मॉडल का जिक्र वे अपनी जनसभाओं में किया करते थे, उसे देशभर में लागू करने का जिम्मा भी आखिर उन्हीं के कन्धों पर है।महत्वपूर्ण महकमों के हिसाब से अधिकारियों की नियुक्ति और उनसे काम करवाने की कला मोदी बखूबी जानते है।अत: यह विश्वास तो करना लाजमी हो जाता है कि यूपीए-2 की तरह लालफीताशाही मोदी को मौन मानने की गलती कभी नहीं करेगी।फिलहाल जिन मुद्दों को सर्वोपरि रखा गया है, उन्हें देखने से यह तो प्रतीत होता है कि सरकार की शुरुआत तो अच्छी हुई है।हां, इसका अंजाम क्या होगा यह तय करने के लिए सरकार के निर्णयों और कार्यों पर पैनी नज़र रखनी होगी।

मोदी सरकार के 10 अहम फैसले :

1. काले धन पर एसआईटी : एनडीए सरकार बनने के साथ ही मोदी ने विदेशों में जमा काले धन की वापसी के लिए एसआईटी के गठन का फैसला लिया।

2. नियुक्ति आयोग के गठन को मंजूरी : सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए मौजूदा कोलिजियम व्यवस्था को बदलकर नई व्यवस्था के तहत नियुक्ति आयोग के गठन को मंजूरी दी गई।

3. योजना आयोग भंग : स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में 64 साल पुराने योजना आयोग को खत्म कर उसकी जगह नई व्यवस्था लाने का ऐलान किया।

4. महंगाई पर रोक के लिए कदम : महंगाई रोकने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जरूरी खाद्य उत्पादों के लिए राष्ट्रीय खाद्य ग्रिड बनाने ऐलान किया है।

5. गंगा सफाई अभियान : गंगा सफाई को राष्ट्रीय मिशन का बनाने का मोदी ने न केवल ऐलान किया बल्कि इसके लिए बजट भी आवंटित कर दिया।

6. निर्मल भारत अभियान का ऐलान : मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में दो अक्टूबर से निर्मल भारत अभियान के शुरुआत की घोषणा की।

7. पर्यावरण की मंजूरी को ऑनलाइन सेवा : मोदी सरकार ने पर्यावरण मंजूरी के लिए ऑनलाइन सेवा शुरू की है ताकि मंत्रालयों के बीच आपसी लड़ाई खत्म हो और लोगों को इधर-उधर भटकना न पड़े।

8. जन-धन योजना : प्रधानमंत्री मोदी ने महात्वाकांक्षी जन-धन योजना की शुरुआत की। इस योजना के माध्यम से आर्थिक रूप से पिछड़े जिन परिवारों के पास बैंक खाता नहीं है उनके बैंक खाते खोले जा रहे हैं।

9. अफसरशाही पर नकेल : मोदी ने पीएमओ के अधिकारियों को समय पर कार्यालय आने, दफ्तर में साफ-सफाई आदि का पाठ पढ़ाया। अब मंत्री और वरिष्ठ नौकरशाह सीधे प्रधानमंत्री से निर्देश लेते हैं।

10. विदेश नीति : मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रण भेजकर संदेह दे दिया कि वह किस तरह के विदेश नीति के हिमायती हैं? उन्होंने सबसे पहले पाकिस्तान को दोस्ती का संदेश देने की कोशिश की।

अन्य अहम फैसले :

1. माई गवर्नमेंट पोर्टल की शुरुआत की।

2. डब्यूवर् टीओ ट्रेड डील पर हस्ताक्षर करने से इंकार।

3. बाल अपराधियों की उम्र सीमा कम की।

4. भारत में जापान 2.10 लाख करोड़ करेगा निवेश।

अंकों में बड़ी सफलता :

1. एक ही दिन में 1.5 करोड़ बैंक खाते खोले गए।

2. सीमा रक्षा और बीमा क्षेत्र में 49 फीसद एफडीआई।

3. सामुदायिक रेडियो के लिए 100 करोड़ रुपए आवंटित किए।

4. महिलाओं की सुरक्षा के लिए 11 फीसद बजट बढ़ाया। इस वर्ष 65 हजार, 745 करोड़ रुपए महिलाओं की सुरक्षा के लिए आवंटित किए जाएंगे।

5. 100 स्मार्ट शहर बनाने के लिए 7 हजार, 60 करोड़ रुपए आवंटित किए।

6. 14 आईआईटी, आईआईएम और एम्स स्थापित किए जाएंगे।

7. 2.5 लाख रुपए की कर में छूट।

8. 5.7 फीसद जीडीपी की वृद्धि दर रही अप्रैल से जून के बीच तिमाही में।

इन चर्चित मुद्दों पर मोदी सरकार की दृढ़ता :

1. राजनाथ सिंह के खिलाफ प्रदर्शन, पीएमओ ने‍ किया बचाव।

2. यूपीए द्वारा नियुक्त राज्यपालों की जगह नए राज्यपालों की नियुक्ति।

3. विधायक संगीत सोम को जेड श्रेणी की सुरक्षा देना।

4. न्यायाधीशों की नियुक्ति पर नजर।

5. गोपाल सुब्रमण्याम बनान सरकार विवाद।

6. नेता विपक्ष के मुद्दे पर रस्सारकशी।

7. यूपीएससी परीक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान निर्णय।

8. मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी की शैक्षणिक योग्यता पर उठे सवाल के दौरान दृढ़ता।

इन योजनाओं की हुई शुरुआत :

1. गरीबों के लिए भी बैंकिंग सेवा।

2. एक गांव को गोद।

3. डिजिटल युग में प्रवेश।

4. कुशल कर्मचारियों पर जोर।

5. भारत में उत्पादन के लिए कदम उठाना।

6. स्वच्छ‍ भारत अभियान की शुरूआत।

7. सभी स्कू‍लों में शौचालय बनाना।

8. ‘नमामि गंगे’ अभियान की शुरुआत।

9. गरीबी को हराना।

भ्रष्टाचार के सत्ताधारी नैक्सेस को कौन तोड़ेगा

एक लाख 70 हजार करोड़ का 2 जी घोटाला और 1लाख 86 हजार करोड़ के कोयला घोटाले ने मनमोहन सरकार की सियासी नाव में ऐसा छेद किया की सरकार का सूपड़ा ही साफ हो गया और कांग्रेस इतिहास के सबसे बुरे दौर में जा पहुंची। और इसी दौर में इन घोटालों की जांच कर रही सीबीआई के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सरकारी तोता कहने में कोताही नहीं बरती। इसलिये 2 जी सपेक्ट्रम और कोयलागेट की जांच को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में ले लिया। लेकिन दिल्ली के 2 जनपथ यानी सीबीआई डायरेक्टर के सरकारी घर पर मिलने वालो की सूची ने देश के प्रीमियर जांच एजेंसी सीबीआई के डायरेक्टर को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। और अब यह सवाल देश के सामने सबसे बड़ा हो चला है कि क्या कोई पद अगर संवैधानिक हो उसे कटघरे में खड़ा करना प्रधानमंत्री के लिये भी मुश्किल है। हालात परखे तो पहली बार भ्रष्टाचार को लेकर जांच कर रही सीबीआई के डायरेक्टर के घर के मेहमानों ने यह तो सवाल खड़ा कर ही दिया है कि देश में सबसे ताकतवर वहीं है जिसके पास न्याय करने के सबसे ज्यादा अधिकार है। कांग्रेस के दौर में चीफ जस्टिस रहे रंगनाथ मिश्र को सियासी लाभ और बीजेपी के दौर में चीफ जस्टिस

रहे सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने को भी इस हालात से जोड़ा जा सकता है। पूर्व सीएजी विनोद राय की बीजेपी से निकटता भी इस दायरे में आ सकता है। लेकिन बड़ा सवाल तो सीबीआई डायरेक्टर का है, जिन्हें लोकपाल में लाने के खिलाफ वही सियासत थी जो दागियो की फेरहिस्त से इतर मुलाकातियों की सूची में दर्ज है। मुलाकातियों के डायरी के इन पन्नो में जिन नामों को जिक्र बार बार है। उनमें 2 जी स्पेक्ट्रम, कोयला खादानों के अवैध आंवटन, हवाला घपले, सरघाना चीटफंड का घपला यानी किसी आरोपी ने सीबीआई दफ्तर जाकर अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं दिखायी बल्कि सभी ने दसियों बार सीबीआई डायरेक्टर के घर का दरवाजा खटखटाने में कोई हिचक नहीं दिखायी। फेहरिस्त खुद ही कई सवालो को जन्म देती है। मसलन, कोयला घोटाले में फंसे महाराष्ट्र के दर्डा परिवार के देवेन्द्र दर्डा एक दो बार नहीं बल्कि 30 बार सीबीआई डायरेक्टर से मिलने पहुंचे। तीन कोयला खादान पाने वाले एमपी रुगटा तो 40 बार सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे। रिलायंस यानी अनिल अंबानी का नाम भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आया है तो उसके दिल्ली के एक अधिकारी टोनी पचास बार मिलने पहुंचे। इस फेहरिस्त में हवाला घोटाले में फंसे पूर्व सीबीआई डायरेक्टर एपी सिंह और विवादास्पद मोईन अख्तर कुरैशी भी कई बार सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे। खास बात यह भी है कि चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री मोदी भी मीट एक्सपोर्टर मोईन अख्तर कुरैशी को आरोपो के कटघरे में खडा कर चुके थे और उन्होंने कुरैशी के संबंध 10 जनपथ से भी जोड़े थे। मुश्किल सिर्फ यह नहीं है कि सीबीआई डायरेक्टर के घर कोयलाघोटाले के आरोपियों के अलावा 2 जी स्पेक्ट्रम के खेल में फंसे कई कारपोरेट्स के अधिकारी भी पहुंचे। परेशानी का सबब यह है कि 2013-2014 के दौरान आधे दर्जन से ज्यादा अधिकारियों के नाम सीबीआई डायरेक्टर के साथ मुलाकातियों की फेरहिस्त में जिक्र है जिनके खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। और नामों की फेरहिस्त में देश के वीवीआईपी भी है । यानी देश की जिस जांच एंजेसी को लेकर लोगो में भरोसा जागना चाहिये उस जांच एजेंसी का खौफ ही इस तरह हो चुका है कि हर कोई सीबीआई डायरेक्टर की मेहमाननवाजी चाहती है क्योंकि सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे मेहमानों की डायरी के इन पन्नो में सिर्फ दागी नहीं है बल्कि राजनीतिक गलियारे के दलाल भी है राजनेता भी और वीवीआईपी कतार में खड़े खास भी।

तो क्या सीबीआई डायरेक्टर इस देश का सबसे ताकतवर शख्स है जिसके सामने हर किसी को नतमस्तक होना पड़ता है या फिर सीबीआई डायरेक्टर से हर खास की मुलाकात एक आम बात है। क्योंकि नामों की फेरहिस्त में हिन्दुस्तान जिंक के विनिवेश मामले में फंसे वेदांता के अनिल अग्रवाल का नाम भी है। एस्सार कंपनी के प्रतिनिधि सुनील बजाज का भी नाम है जो कंपनी 2 जी मामले में फंसी है। दीपक तलवार का नाम भी है जो राजनीति गलियारे में लॉबिइस्ट माना जाता है। इतना ही नहीं देश के पूर् विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद हो या सेबी के पूर्व अध्यक्ष यू के सिन्हा, पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य हो या दिल्ली के पूर्व पुलिस कमीशनर नीरज कुमार या फिर ओसवाल ग्रूप के अनिल भल्ला या बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन। हर ताकतवर शख्स सीबीआई डायरेक्टर के घर सिर्फ चाय पीने जाता है या सीबीआई डायरेक्टर के घर मेहमान बनना दिल्ली की रवायत है। यह सारे सवाल इसलिये बेमानी है क्योंकि खुद सीबीआई डायरेक्टर को इससे ताकत मिलती है। और ताकतवर लोग अपनी ताकत, ताकतवाले ओहदे के नजदीकी से पाते है। क्योंकि सीबीआई डायरेक्टर ही लगातार बदलते रहे और आखिर में यह कहने से नहीं चुके कि अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जांच पर असर पड़ेगा तो वह खुद को अलग कर सकते है। लेकिन यह हालात क्यों कैसे आ गये। यह भी दिलचस्प है। मीडिया में डायरी की बात आई तो सबसे पहले कहा ऐसी कोई डायरी नहीं है। जब पन्ने छपने लगे तो फिर कहा , मैंने किसी को लाभ नहीं पहुंचाया। अब कहा सुप्रीम कोर्ट चाहे तो वह खुद को जांच से अलग कर लेंगे। मुश्किल सिर्फ इतनी नहीं है बल्कि ताकतवर नैक्सेस कैसे मीडिया को भी दबाना चाहता है यह भी इसी दौर में नजर आया क्योंकि मीडिया डायरी के पन्नों को ना छापे, ना दिखाये या सीबीआई डायरेक्टर एक प्रीमियर पद है इसलिये इसपर रोक लगनी चाहिये। यह सवाल भी सीबीआई डायरेक्टर ने ही सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जब इससे इंकार कर दिया तो फिर सबसे दिलचस्प सच सामने यह आ गया कि जबसे सीबीआई के मेहमानों के नाम सार्वजनिक होने लगे उन 72 घंटों में सीबीआई डायरेक्टर के घर देश का कोई वीवीआईपी चाय पीने नहीं पहुंचा। यानी 2013-14 के दौरान दिल्ली में 2 जनपथ यानी सीबीआई डायरेक्टर का सरकारी निवास जो हर दागी और खास का सबसे चुनिंदा घर था उस घर में जाने वालों ने झटके में ब्रेक लगा दी।

देश में भ्रष्टाचार की असल मुश्किल यही है कि ताकतवर को हर रास्ता कानून की ताकत तबतक देता है जब तक वह कानून की पकड़ में ना आये और इस दौर में जबतक वह चाहे कानून की घज्जिया उड़ा सकता है। क्योंकि ताकतवर लोगों के सरोकार आम से नहीं खास से होते है। और यही नैक्सस इस दौर में सत्ता का प्रतीक बन चुका है। और संसद कुछ कर नहीं पाती क्योंकि वहा भी दागियों की फेरहिस्त सांसदों से नैतिक बल छिन लेती है। और चुनाव के दौर में चुनावी पूंजी को परखे तो ज्यादातर पूंजी उन्हीं कारपोरेट और उघोगपतियों की लगी होती है जो एक वक्त दागी होते है और संसद के जरिये दाग घुलवाने के लिये चुनाव से लेकर सत्ता बनने तक के दौर में राजनेताओं के सबसे करीब हो जाते है!

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

पेड़ खामोश होना चाहते हैं मगर हवाएं हैं कि रूकती नहीं हैं

स्याह दौर में कागज कारे
- सुभाष गाताडे
‘‘अंधेरे वक्त़ में
क्या गीत होंगे ?
हां, गीत भी होंगे
अंधेरे वक्त़ के बारे में
-बर्तोल्त ब्रेख्त
हरेक की जिन्दगी में ऐसे लमहे आते हैं जब हम वाकई अपने आप को दिग्भ्रम में पाते हैं, ऐसी स्थिति जिसका आप ने कभी तसव्वुर नहीं किया हो। ऐसी स्थिति जब आप के इर्द-गिर्द विकसित होने वाले हालात के बारे में आप के तमाम आकलन बेकार साबित हो चुके हों, और आप खामोश रहना चाहते हों, अपने इर्द गिर्द की चीजों के बारे में गहन मनन करना चाहते हों, अवकाश लेना चाहते हों, मगर मैं समझता हूं कि यहां एकत्रित लोगों के लिए – कार्यकर्ताओं, प्रतिबद्ध लेखकों – ऐसा कुछ भी मुमकिन नहीं है। जैसा कि अपनी एक छोटी कविता में फिलीपिनो कवि एवं इन्कलाबी जोस मारिया सिसोन लिखते हैं
‘पेड़ खामोश होना चाहते हैं
मगर हवाएं हैं कि रूकती नहीं हैं’
मैं जानता हूं कि इस वक्त़ हमारा ‘मौन’, हमारी ‘चुप्पी’ अंधेरे की ताकतों के सामने समर्पण के तौर पर प्रस्तुत की जाएगी, इन्सानियत के दुश्मनों के सामने हमारी बदहवासी के तौर पर पेश की जाएगी, और इसीलिए जबकि हम सभी के लिए चिन्तन मनन की जबरदस्त जरूरत है, हमें लगातार बात करते रहने की, आपस में सम्वाद जारी रखने की, आगे क्या किया जाए इसे लेकर कुछ फौरी निष्कर्ष निकालने की और उसे समविचारी लोगों के साथ साझा करते रहने की जरूरत है ताकि बहस मुबाहिसा जारी रहे और हम आगे की दूरगामी रणनीति तैयार कर सकें।

आज जब मैं आप के समक्ष खड़ा हूं तो अपने आप को इसी स्थिति में पा रहा हूं।

क्या यह उचित होगा कि हमें जो ‘फौरी झटका’ लगा है, उसके बारे में थोड़ा बातचीत करके हम अपनी यात्रा को उसी तरह से जारी रखें ?

या जरूरत इस बात की है कि हम जिस रास्ते पर चलते रहे हैं, उससे रैडिकल विच्छेद ले लें, क्योंकि उसी रास्ते ने हमारी ऐसी दुर्दशा की है, जब हम देख रहे हैं कि ऐसी ताकतें जो ‘इसवी 2002 के गुजरात के सफल प्रयोग’ को शेष मुल्क में पहुंचाने का दावा करती रही हैं, आज हुकूमत की बागडोर को सम्भाले हुए हैं।


अगर हम 1992 – जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था – से शुरू करें तो हमें यह मानना पड़ेगा कि दो दशक से अधिक वक्त़ गुजर गया जबकि इस मुल्क केसाम्प्रदायिकता विरोधी आन्दोलन को, धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक के बाद एक झटके खाने पड़े हैं। हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि बीच में ऐसे भी अन्तराल रहे हैं जब हम नफरत की सियासत करने वाली ताकतों को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर कर सके हैं, मगर आज जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो यही लगता है कि वह सब उन्हें महज थामे रखने वाला था, उनकी जड़ों पर हम आघात नहीं कर सके थे।

न इस अन्तराल में ‘‘साम्प्रदायिकता विरोधी संघर्ष को सर्व धर्म समभाव के विमर्श से आगे ले जाया जा सका और नही समाज एवं राजनीति के साम्प्रदायिक और बहुसंख्यकवादी गढंत (कान्स्ट्रक्ट) को एजेण्डा पर लाया जा सका। उन्हीं दिनों एक विद्वान ने इस बात की सही भविष्यवाणी की थी कि जब तक भारतीय राजनीति की बहुसंख्यकवादी मध्य भूमि majoritarian middle ground – जिसे हम बहुसंख्यकवादी नज़रिये की लोकप्रियता, धार्मिकता की अत्यधिक अभिव्यक्ति, समूह की सीमारेखाओं को बनाए रखने पर जोर, खुल्लमखुल्ला साम्प्रदायिक घटनाओं को लेकर जागरूकता की कमी, अल्पसंख्यक हितों की कम स्वीकृति – में दर्शनीय बदलाव नहीं होता, तब तक नयी आक्रामकता के साथ साम्प्रदायिक ताकतों की वापसी की सम्भावना बनी रहेगी। आज हमारी स्थिति इसी भविष्यवाणी को सही साबित करती दिखती है।

और इस तरह हमारे खेमे में तमाम मेधावी, त्यागी, साहसी लोगों की मौजूदगी के बावजूद ; लोगों, समूहो, संगठनों द्वारा अपने आप को जोखिम में डाल कर किए गए काम के बावजूद और इस तथ्य के बावजूद कि राजनीतिक दायरे में अपने आप के धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली पार्टियों की तादाद अधिक है और यह भी कि इस देश में एक ताकतवर वाम आन्दोलन – भले ही वह अलग गुटों में बंटा हो – की उपस्थिति हमेशा रही है, यह हमें कूबूल करना पड़ेगा कि हम सभी की तमाम कोशिशों के बावजूद हम भारतीय राजनीति के केन्द्र में हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथ के आगमन को रोक नहीं सके।

और जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं स्थिति की गम्भीरता अधिकाधिक स्पष्ट हो रही है।

इस मौके पर हम अमेरिकन राजनीतिक विज्ञानी डोनाल्ड युजेन स्मिथ के अवलोकन को याद कर सकते हैं, जब उन्होंने लिखा था: ‘‘ भारत में भविष्य में हिन्दू राज्य की सम्भावना को पूरी तरह खारिज करना जल्दबाजी होगी। हालांकि, इसकी सम्भावना उतनी मजबूत नहीं जान पड़ती। भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के बने रहने की सम्भावना अधिक है।’ (इंडिया एज सेक्युलर स्टेट, प्रिन्स्टन, 1963, पेज 501) इस वक्तव्य के पचास साल बाद आज भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य बहुत कमजोर बुनियाद पर खड़ा दिख रहा है और हिन्दु राज्य की सम्भावना 1963 की तुलना में अधिक बलवती दिख रही है।

निस्सन्देह कहना पड़ेगा कि हमें शिकस्त खानी पड़ी है।

हम अपने आप को सांत्वना दे सकते हैं कि आबादी के महज 31 फीसदी लोगों ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया और वह जीते नहीं हैं बल्कि हम हारे हैं। हम यह कह कर भी दिल बहला सकते हैं कि इस मुल्क में जनतांत्रिक संस्थाओं की जड़ें गहरी हुई हैं और भले ही कोई हलाकू या चंगेज हुकूमत में आए, उसे अपनी हत्यारी नीतियों से तौबा करनी पड़ेगी।

लेकिन यह सब महज सांत्वना हैं। इन सभी का इस बात पर कोई असर नहीं पड़ेगा जिस तरह वह भारत को और उसकी जनता को अपने रंग में ढालना चाहते हैं।

हमें यह स्वीकारना ही होगा कि हम लोग जनता की नब्ज को पहचान नहीं सके और जाति, वर्ग, नस्लीयता आदि की सीमाओं को लांघते हुए लोगों ने उन्हें वोट दिया। निश्चित ही यह पहली दफा नहीं है कि लोगों ने अपने हितों के खिलाफ खुद वोट दिया हो।

यह हक़ीकत है कि लड़ाई की यह पारी हम हार चुके हैं और हमारे आगे बेहद फिसलन भरा और अधिक खतरनाक रास्ता दिख रहा है।

यह सही कहा जा रहा है कि जैसे-जैसे यह ‘जादू’ उतरेगा नए किस्म के पूंजी विरोधी प्रतिरोध संघर्ष उभरेगे और हरेक को इसमें अपनी भूमिका निभानी पड़ेगी। मगर यह कल की बात है। आज हमें अपनी शिकस्त के फौरी और दूरगामी कारणों पर गौर करना होगा और हम फिर किस तरह आगे बढ़ सकें इसकी रणनीति बनानी होगी।

.……जारी

( Revised version of presentation at All India Consultative meeting of Progressive Organisations and Individuals, organised by Karnataka Kaumu Sauhardu Vedike [Karnatak Communal Harmony Forum] to discuss the post-poll situation and the way ahead, 16-17 th August 2014, Bengaluru)


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About The AuthorSubhash gatade is a well known journalist, left-wing thinker and human rights activist. He has been writing for the popular media and a variety of journals and websites on issues of history and politics, human right violations and state repression, communalism and caste, violence against dalits and minorities, religious sectarianism and neo-liberalism, and a host of other issues that analyse and hold a mirror to South asian society in the past three decades. He is an important chronicler of our times, whose writings are as much a comment on the mainstream media in this region as on the issues he writes about. Subhash Gatade is very well known despite having been published very little in the mainstream media, and is highly respected by scholars and social activists. He writes in both English and Hindi, which makes his role as public intellectual very significant. He edits Sandhan, a Hindi journal, and is author of Pahad Se Uncha Admi, a book on Dasrath Majhi for children, and Nathuram Godse’s Heirs: The Menace of Terrorism in India.

यह जनांदोलनों को हाईजैक करने का नया दौर है


हम बाकी जो हैं गिरगिट बने सत्ता में धंस जायेंगे। लक्षण यही है और स्थाईभाव भी यही। अलाप प्रलाप भी वहीं।
पलाश विश्वास
विकास दर का फरेब फिर लबालब है। दो साल में सबसे तेज विकास दर 5.7 अच्छे दिनों की सेंचुरी के बाद सबसे महतीमीडिया खबर है। अर्थव्यवस्था पर 75 हजार करोड़ के बोझ के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग को चूना लगाने के चाकचौबंद इंतजाम और बैंकिंग में निजी क्षेत्र और औद्योगिक घरानों के वर्चस्व के स्थाई बंदोबस्त के बाद आंकड़ा यह है। अर्थव्यवस्था की बुनियाद में लेकिन कोई हलचल नहीं है। बजरिये आधार और नकदी मुक्त प्रवाह से एकमुश्त त्योहारी सीजन में खरीददारी को लंबा उछाला और सब्सिडी खत्म का किस्सा खत्म। डीजल का भाव बाजार दर के मुताबिक है और रिलायंस का बाकी बचा कर्ज उतारने की बारी है। तेल और गैस में सब्सिडी घाटा पाटने के चमत्कार से ही वृद्धिदर में यह इजाफा और रेटिंग एजंसियां बल्ले-बल्ले। खनन, मैनुफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर उछलकर 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गई। पिछले ढाई साल में दर्ज यह सबसे ज्यादा वृद्धि है। वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अग्रिम कर प्रवाह अवधि को छोड़कर, नकदी की स्थिति संतोषजनक रही है।
इसी बीच शारदा फर्जीवाड़े मामले में मंत्री मदन मित्र से लेकर राज्यसभा सांसद मिथून चक्रवर्ती तक सारे के सारे दिग्गज उज्ज्वल चेहरे अब सीबीआई शिकंजे में हैं तो दीदी लालू नीतीश की तर्ज पर बंगाल में भाजपा विरोधी वाम तृणमूल गठबंधन की गुहार लगा रहे हैं और केंद्र सरकार की सारी पीपीपी परिकल्पनाओं को भी अंजाम दे रही है। डायरेक्ट टेक्स कोड से लेकर जीएसटी और राज्यसभा में समर्थन तक दीदी केसरिया हैं।
इसी बीच शारदा घोटाले में रिजर्व बैंके के चार अफसर और सेबी के तमाम अफसरों के नाम भी सामने आने लगे हैं, जिन तक पैसा पहुंचाया जाता रहा है। मिथून को भी सर्वोच्च शिखर तक जनगण की जमा पूंजी स्थानांतरित करने के आरोप में घेरा जा रहा है।
बंगाल में दीदी से लेकर मदन मित्र सीबीआई के खिलाफ जिहाद के मूड में है और इसी जिहाद की गूंज वाम तृणमूल एकता पेशकश है।
यह दिलचस्प वाकया मुक्त बाजारी अर्थव्वस्था के राजनीतिक तिलिस्म को समझने में बेहद काम का है।
हमारे युवा मित्र सत्यनारायण जी ने फेसबुक पर मार्के की बात लिखी है-
रोजगार छीनो, जीरो अकाउंट खाता खोलो
फिर 5000 का कर्जा दो (उसके लिए आधार कार्ड भी अनिवार्य)
कर्ज वापसी ना करने पर रहे सहे लत्‍ते कपड़े भी छीन लो
और इस तरह हमारे प्रधानमंत्री ने अर्थव्‍यवस्‍था मे उन लोगों की “भागीदारी” सुनिश्चित कर दी है जो सुई से लेकर जहाज बनाते हैं और जिनके दम पर यह सारी अर्थव्‍यवस्‍था है।
इससे बेहतर तस्वीर मैं आंक नहीं सकता। धन्यवाद सत्यनारायण।
आगे सत्यनारायण ने यह भी लिखा हैः
वैसे जोशी आडवाणी वाजेपेयी के साथ जो हो रहा है वो अच्छा ही है। ये लोग फासीवादी राजनीति के मुख्‍य चेहरे थे व अपने सक्रिय कार्यकाल में इन्‍होने जो जो दंगे करवाये (प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष तौर पर), देशी विदेशी लुटेरों को भारत को बेचा (वाजपेयी ने इसके लिये विशेष विनिवेश मंत्रालय बनवाया था), उसके बाद इनके लिए दिल के किसी कोने में सहानुभूति नहीं होनी चाहिए।
फासीवादियों आपस में लड़ो, एक दूसरे को नंगा करो, हमारी “दुआएं” भी तुम्‍हारे साथ हैं।
यह गौरतलब है खासकर इस संदर्भ में देश बेचो अभियान, हिंदू राष्ट्र का अश्वमेधी अभियान तो स्वदेशी का छद्म भी उन्हीं का। ऐसा हम पिछले 23 साल से नाना प्रकार के विदेशी वित्त पोषित जनांदोलनों में देखते रहे हैं, जो जल जंगल जमीन नागरिकता और प्रकृति और पर्यावरण की बातें खूब करते हैं, सड़क पर उतरते भी हैं प्रोजेक्ट परिकल्पना के तहत, लेकिन होइहिं सोई जो वाशिंगटन रचि राखा। 
इन फर्जी जनांदोलनों से वर्गों का ध्रुवीकरण लेकिन नहीं हुआ है और न इनका कोई प्रहार जनसंहारक राज्यतंत्र पर है किसी भी तरह।हर हाल में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट हित ही साधे जाते हैं, क्योंकि दरअसल असली कोई जनांदोलन है ही नहीं।
केसरिया कारपोरेट उत्तरआधुनिक मनुस्मृति नस्ली राजकाज का सार जो न्यूनतम सरकार, अधिकतम प्रशासन है, यह मनुस्मृति का तरह ही दरअसल एक मुकम्मल अर्थव्यवस्था है।
हिंदू राष्ट्र के झंडेवरदार जो हैं वहीं अब जनांदोलनों के धारक वाहक भी। पुरातन गैरसरकारी संगठनों के नेटवर्क में बारुदी सुरंगें बसा दी गयी हैं क्योंकि उस छाते की आड़ में भारी संख्या में प्रतिबद्ध और सक्रिय लोग भी हैं।
अब सीधे प्रधानमत्री कार्यालय से जुड़ा केसरिया एनजीओ नेटवर्क का आगाज है तो संघ परिवार की तमाम शाखाएं किसान, मजदूर, छात्र, मेधा संगठनों की ओर से अखंड जाप स्वदेशी का हो रहा है।
इसी स्वदेशी का मूल मंत्र लेकिन फिर वही हिंदी हिंदू हिंदुस्तान का वंदेमातरम है।
वे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और जीएम बीजों का विरोध कर रहे हैं तो विनिवेश और बेदखली का भी। यह जनांदोलनों को हाईजैक करने का नया दौर है।जिसे मीडिया स्वदेशी सूरमाओं का धर्मयुद्ध बतौर खूब हाई लाइट कर रहा है।
समावेशी विकास कामसूत्र की ये मस्त धारियां हैं, इसके सिवाय कुछ नहीं। जैसे हमारे पुरातन सीईओ शेखर गुप्ता महामहिम का वैज्ञानिक केसरिया चंतन मनन लेखन है वैसा ही इतिहास बोध है हिंदुय़ाये तत्वों का जो इतिहास भूगोल वे नये सिरे से गढ़ने पर आमादा हैं।
फासीवादी दरअसल आपस में लड़ते नहीं है। लड़ाई सिर्फ संसदीय राजनीति की नौटंगी का अहम हिस्सा है और वे अपने एजेंडे के बारे में सबसे प्रतिबद्ध लोग हैं तो हम अलग अलग द्वीप हैं, जिनके बीच कोई सेतुबंधन नहीं है क्योंकि सारे के सारे बजरंगवली तो उन्हीं के पाले में हैं।
आज सुबह अखबार पढ़ने के बाद मोबाइल टाकअप के लिए मित्र की दुकान पर गया तो वहां एक करिश्माई चिकित्सक के दर्शन हो गये, जो वृद्धावस्था में अपने सारे बाल नये सिरे से उगाने में कामयाबी का दावा कर रहे थे। वे प्राकृतिक चिकित्सक हैं और निःशुल्क चिकित्सा करते हैं। मुहल्ले में उन्होंने पचास लाख टकिया फ्लैट खरीदा है और स्वयंसेवक हैं। उन्होंने भारत दर्शन का प्रवचन भी सुनाया। उनकी आमदनी के बारे में पूछा तो बोले बेटी कांवेंट हैं, सारी भाषाएं जानती हैं और खूब कमा रही हैं। वे सारे रोग निर्मूल करने का प्राकृतिक स्वदेशी निदान बांटते फिर रहे हैं। उनका कामकाज और नमो महाराज का राजकाज मुझे पता नहीं क्यों समानधर्मी लग रहा है। करिश्मे और चमत्कार के तड़के में स्वदेशी और आमदनी विदेशी।
संजोग से सांप्रदायिक राजनीति, द्विराष्ट्र सिद्धांत की मौलिक मातृभूमि बंगाल में ऐसे तत्वों की बाढ़ आ गयी है और देश भर में पद्मप्रलयभी सबसे तेज यही है और गुजराती पीपीपी माडल के कार्यान्वयन में भी बंगाल सबसे आगे। आर्थिक सुधारों को लागू करने में, सब कुछ विनियमित विनियंत्रित करने में बंगाल जो कर रहा है, मोदी सरकार उसके पीछे पीछे है।
हाल में एक्सकैलिबर स्टीवेंस ने लिखा कि बंगाल में माकपा और तृणमूल गठजोड़ का इंतजार है लोगों को, तो धुर मार्क्सवादियों ने लिखा, ऐसा कभी नहीं होगा।
मजा यह है कि बंगाल में लाल का नामोनिशान मिटाने पर अमादा, वामासुर वध करने वाली बंगाल की महिषमर्दिनी देवी का अब जैसे सेजविरोधी आंदोलन से पीपीपी गुजराती कायकल्प हुआ है,उ सी तरह मोदी केसरिया विरुद्धे अपनी जिहाद में वे अब लालू नीतीश की तर्ज पर बंगाल में संघ परिवार की बढ़त के लिए माकपा से गठबंधन बनाने की सार्वजनिक पेशकश कर दी। जाहिर है कि पत्रपाठ माकपाइयों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है।
बंगाल में इन दिनों सीबीआई का जाल भयंकर है। सारी हस्तियां चंगुल में है। नेता, मंत्री, सांसद, स्टार, मेगा स्टार, मैदान, उत्सव सबकुछ माइक्रोसेकोप की निगरानी में हैं।
दीदी का मोदी के खिलाफ जिहाद दरअसल सीबीआई के खिलाफ जिहाद है। उनके सारे सिपाहसालार घिरते जा रहे हैं। शह मात की बारी बस बाकी है। आखिरी चाल में मात खाने से पहले वे तिनके के सहारे में मंझधार में हैं और तिनके को इस डूब की परवाह है नहीं।
इस प्रलय परिदृश्य में जबकि खतरों में घिरे हैं वाम तृणमूल शिविर और केंद्र की केसरिया शिविर रोजगार का पार्टीबद्ध इंतजाम से कैडरतंत्र का अपहरण करने लगा तो ना-ना करते-करते कब मुहब्बत का इकरार हो जाये, देखना यही बाकी है।
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About The Author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।