गुरुवार, 12 जून 2014

नाग देवता का कहर और नाग पंचमी

डाँ कुणाल सिंह 

नाग अर्थात सर्प दंश की सर्वाधिक घटनाएं बरसात मे ही हुआ करती हैं।पंचांग और मौसम विभाग दोनो की ही गणना के अनुसार अषाढ सावन व भादों यानी लगभग 15 जून से 15 अगस्त ये तीन मॉंह बरसात के मौसम मे शुमार हैं।जीवन की मूलभूत सुविधाओं व विकास की परछाईं से कोसों दूर ग्रामीण अंचल मे सर्पदंश से हो रहे अकाल मौतों का सिलसिला रूकने का नाम न्ही ले रहा है।गांवों मे चिकित्सा के साधन नहीं और सरकारी अस्पतालें इतने दूर हैं कि वहां तक पहुचते पहुंचते या तो लोग दम तोडने को मजबुर हो रहे हैं या मरणसन्न अवस्था मे अस्पताल पहुंच कर दम तोड रहे है।लाचार और निराश लोग झाडफुंक का सहारा ले कर अपने प्रिय की जान बचाने की कोशिश करने लगते हैं।कौन जिम्मेदार है इसके लिये सोचना होगा।नाग देवता का कहर बेचारे निरीह और सीधेसादे ग्रामीणो पर ही अक्सर टूटा करता है।

नागों का कहर और नागपंचमी का त्यौहार एक ही मौसम मे पड़ना कोई संयोग नहीं है।बरसात के मौसम का मध्य काल सावन माह ही माना गया है।नाग पंचमी भी सावन के शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन पडता है।जेष्ठ अर्थात मई जून की भीषण गर्मी से बचने के लिये ये विषैले जीव सुरंग बिल के ठंढे माहौल मे पनाह लिये रहते हैं और बरसाती मौसम की उमस से परेशान व बिल मे पानी घूस जाने के डर से बाहर निकल अंधेरे कोने कतरों कीछांव मे छुपे रहते हैं।लोग अनजाने व असावधानी बस इन स्थानो मे पहुंच सर्पदंश के शिकार हो जाते हैं।सर्पदंश के इसी कहर से बचने के लिये लोग नागपंचमी पर इनकी पुजा कर प्राणरक्षा की गुहार करते हैं।

दूःखद है कि सांपों को दूध पिला कर लोग नागपंचमी त्योहार मना लेते हैं।उन्हें यह भी नही पता कि सांपों का असली भोजन दूध नही बल्कि कीडे मकोडे होते हैं।इस तरह की दूःखद मौतों से बचने के लिये जनता को जगरूक किये जाने की जरूरत हैऔर सुदूर ग्रामीण इलाकों मे प्राथमिक इलाज दे रहे ग्रामीण लोगों को एन्टी वेनम इन्जेक्शन वायल दे कर उसे लगाने का तरीका बताया जाना चाहिये। आयुर्वेद देहात की लोकप्रिय चिकित्सा पद्धति है और लोग जडी बूटी से इलाज कराना ज्यादा पसंद करते हैं। सर्पविष को नष्ट कर देने मे सक्षम आयुर्वेद ग्रन्थों मे वर्णित वनस्पतियों मे से एक ईशरमूल बनाम इसरमूल है ।सर्प विष की अचूक दवा है। आयुर्वेद के माहिर चिकित्सकों के अनुसार इसकी पांच मैच्योर पत्ती और पांच दाना कालीमिर्च को हर बार पीस कर होश आने तक हर दस दस मिनट पर किसी भी तरीके से आंत मे पहुंचाते रहने से सर्पदंशित व्यक्ति को बचाया जा सकता है।नागपंचमी त्योहार पर स्वयंसेवी संस्थाओं .ग्रमीणक्षेत्र मे कार्य कर रहे चिकित्सकों एवं सरकार को इस तरह के कार्यक्रम अवश्य चलाना चाहिये ताकि लोग सर्पदंश से अकाल मौत न मर सकें।नागपंचमी का त्योहार तभी सार्थक हो सकता है।इस वर्ष नागपंचमी 23 जुलाई को पड रहा है।


लेखक - डाक्टर कुणाल सिंह सम्पादक(आवाज़-ए-हिन्द.इन) और पूर्व वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आयुष मेडिकल एशोसिएशनAll Right Reserved aawaz-e-hind.in.|Online News Channel

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